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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. तीन ‘F’— Funds (निधि), Functions (कार्य) और Functionaries (पदाधिकारी) का अपर्याप्त अंतरण पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के सशक्तीकरण में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। इस चुनौती का विश्लेषण कीजिये तथा प्रभावी विकेंद्रीकरण के लिये व्यावहारिक सुधारों की अनुशंसा कीजिये। (250 शब्द)

    18 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • 73वें संविधान संशोधन के संदर्भ से तीन ‘F’ की अवधारणा स्पष्ट करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये। 
    • मुख्य भाग में निधि, कार्य तथा कार्यप्रणाली के अपर्याप्त अंतरण का पृथक विश्लेषण कीजिये। 
    • व्यावहारिक सुधारों जैसे: वित्तीय स्वायत्तता, स्पष्ट गतिविधि सर्वेक्षण तथा समर्पित पंचायत कैडर की अनुशंसा कीजिये।
    • उचित निष्कर्ष दीजिये। 

    परिचय:

    संविधान के 73 वें संशोधन ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को सुदृढ़ करने के लिये पंचायती राज संस्थाओं (PRI) को शासन के तृतीय स्तर के रूप में संस्थागत रूप दिया। हालाँकि, निधि, कार्य और कार्मिक इन तीन मुख्य कारकों का अपर्याप्त और असमान अंतरण PRI की स्वायत्तता एवं प्रभावशीलता को बाधित करता रहता है। यह कमी ज़मीनी स्तर पर सशक्तीकरण में मुख्य बाधा बनी हुई है।

    3F के अंतरण में चुनौतियाँ

    • Funds (निधि): 
      • पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति अभी भी राज्य और केंद्र सरकारों पर निर्भर है। पंचायत अंतरण सूचकांक- 2024 के अनुसार, कुल अंतरण केवल 39.9% (2013-14) से बढ़कर 43.9% (2021-22) हो गया है।
      • राज्य वित्त आयोग (SFC) अनियमित होते हैं, प्रायः उनमें विलंब होता है और उनकी सिफारिशों का कार्यान्वयन ठीक से नहीं हो पाता है।
      • अप्रतिबंधित निधियों की कमी के कारण स्थानीय योजना निर्माण में लचीलापन सीमित रहता है।
    • Functions (कार्य): 
      • संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों के बावजूद, राज्यों ने निर्णय लेने की शक्तियों को पूरी तरह से अंतरित नहीं किया है।
      • वर्ष 2022 के एक अध्ययन से पता चलता है कि कार्यात्मक विकेंद्रीकरण 35.34% से घटकर 29.18% हो गया।
      • स्वास्थ्य, शिक्षा, जल तथा कृषि जैसे क्षेत्रों में अब भी क्षेत्रीय प्रशासनिक विभागों का प्रभुत्व बना हुआ है।
      • समानांतर प्रशासनिक संरचनाएँ सार्वजनिक क्षेत्र के सरकारी संस्थानों को दरकिनार कर देती हैं, जिससे भ्रम की स्थिति और कमज़ोर जवाबदेही उत्पन्न होती है।
    •  Functionaries (कार्मिक): 
      • पंचायती राज संस्थाओं को प्रशासनिक, तकनीकी और वित्तीय कर्मचारियों की दीर्घकालिक कमी का सामना करना पड़ता है।  
      • मौजूदा कर्मचारी प्रायः पंचायतों के बजाय संबंधित विभागों को रिपोर्ट करते हैं।
      • योजना, बजट, इंजीनियरिंग, लेखापरीक्षा और सेवा वितरण से संबंधित क्षमताएँ कमजोर बनी रहती हैं।
      • राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA) के तहत प्रशिक्षण असमान और अपर्याप्त है।
    • संस्थागत और शासन संबंधी कमियाँ:
      • कमज़ोर ग्राम सभाएँ सामुदायिक भागीदारी को कम करती हैं।
      • अपर्याप्त लेखापरीक्षा प्रणालियाँ, सीमित पारदर्शिता तथा राजनीतिक हस्तक्षेप विकेंद्रीकरण को कमज़ोर करती हैं।
      • अंतर-राज्यीय असमानताएँ स्पष्ट हैं— केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु बेहतर प्रदर्शन करते हैं जबकि अनेक राज्य पीछे हैं।

    प्रभावी विकेंद्रीकरण के लिये सुधार

    • राजकोषीय सशक्तीकरण को सुदृढ़ करना:
      • SFC की सिफारिशों को नियमित रूप से लागू किया जाना चाहिये।
      • OSR को बढ़ावा देने के लिये अप्रतिबंधित अनुदान बढ़ाया जाना चाहिये और स्थानीय कराधान में सुधार करना चाहिये।
      • वित्त आयोग की प्रक्रियाओं का उपयोग करके पूर्वानुमानित वित्तीय अंतरण सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
    • स्पष्ट गतिविधि सर्वेक्षण:
      • सभी 29 कार्यों का पूर्ण अंतरण स्पष्ट उत्तरदायित्व रेखाओं के साथ किया जाना चाहिये। 
      • समानांतर प्रशासनिक ढाँचों को समाप्त कर फील्ड-स्तरीय कर्मचारियों को पंचायती राज संस्थाओं के अधीन किया जाना चाहिये।
    • कार्मिकों का पेशेवर विकास:
      • RGSA-आधारित प्रशिक्षण का विस्तार किया जाना चाहिये।
      • योजना, लेखा, इंजीनियरिंग और सामाजिक लामबंदी के लिये एक समर्पित पंचायत कैडर का गठन किया जाना चाहिये।
      • शासन व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिये ई-ग्रामस्वराज, जीआईएस मैपिंग और डिजिटल डैशबोर्ड का लाभ उठाया जाना चाहिये। 
    • ग्राम सभाओं तथा जवाबदेही को सशक्त बनाना:
      • ग्राम सभाओं की अनिवार्य और नियमित बैठकें सुनिश्चित की जानी चाहिये।
      • सामाजिक लेखापरीक्षाओं को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिये और पारदर्शिता बढ़ायी जानी चाहिये।
      • लेखापरीक्षा एवं निगरानी संस्थानों को सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
    • अंतर-राज्यीय असमानताओं को कम करना:
      • केरल जैसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों से सहकर्मी-शिक्षण मॉडल को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
      • स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर संदर्भ-संवेदनशील विकेंद्रीकरण नीतियों का अंगीकरण किया जाना चाहिये।

    निष्कर्ष:

    प्रभावी लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लिये तीन ‘F’— Funds (निधि), Functions (कार्य) और Functionaries (कार्मिक) का अंतरण केवल शब्दों में नहीं बल्कि भावना में भी होना चाहिये। पर्याप्त वित्त, स्पष्ट कार्य-विभाजन तथा सक्षम कार्मिकों से युक्त पंचायती राज संस्थाएँ ही ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र तथा समावेशी स्थानीय विकास की वास्तविक संवाहक बन सकती हैं।

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