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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    भारत में सर्वोच्च न्यायालय के लिये क्षेत्रीय पीठ स्थापित करने की आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिये। (250 शब्द)

    27 Feb, 2024 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • उत्तर की शुरुआत परिचय के साथ कीजिये, जो प्रश्न के लिये एक संदर्भ निर्धारित करता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों के पक्ष में तर्क बताइये।
    • सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों के विरुद्ध तर्कों का वर्णन कीजिये।
    • तद्नुसार निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    हाल ही में कानून मंत्रालय ने संपूर्ण भारत में सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठ स्थापित करने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 130 में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में या ऐसे किसी अन्य स्थान पर होगा, जहाँ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को समय-समय पर राष्ट्रपति की स्वीकृति के साथ नियुक्त किया जा सकता हो।

    मुख्य भाग:

    • सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों के पक्ष में तर्क:
    • पहुँच में वृद्धि: क्षेत्रीय पीठ दूरदराज के क्षेत्रों या राजधानी से दूर रहने वाले लोगों के लिये न्याय को और अधिक सुलभ बनाएँगी। इससे व्यक्तियों को कानूनी मामलों के लिये दिल्ली जाने की आवश्यकता कम हो जाएगी, विशेष रूप से वित्तीय या तार्किक चुनौतियों का सामना करने वालों के लिये।
    • संवैधानिक मामलों पर बढ़ा हुआ फोकस: नई दिल्ली में प्राथमिक पीठ विशेष रूप से संवैधानिक मुद्दों को संबोधित करने के साथ, क्षेत्रीय पीठ अपीलीय मामलों को संभालने में विशेषज्ञ हो सकती हैं।
    • बेहतर न्यायिक प्रभावशीलता: क्षेत्रीय पीठें स्थानीय मुद्दों और चिंताओं को संबोधित करने के लिये बेहतर स्थिति में होंगी, जिन पर राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सकता है। क्षेत्रीय संदर्भों से परिचित न्यायाधीश अधिक प्रासंगिक और प्रभावी निर्णय दे सकते हैं।
    • अधिक अवसर: क्षेत्रीय पीठों की स्थापना से देश के विभिन्न हिस्सों में कानूनी बुनियादी ढाँचे और विशेषज्ञता के विकास को बढ़ावा मिल सकता है, स्थानीय कानूनी पेशेवरों को सशक्त बनाया जा सकता है तथा ज़मीनी स्तर पर कानूनी जागरुकता बढ़ाई जा सकती है।
    • लंबित मामलों में कमी: वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट में वर्ष 2022 की तुलना में मामलों के निपटान में 31% की वृद्धि देखी गई। वर्तमान में 80,000 से अधिक मामले निर्णय के लिये लंबित हैं, जिनमें से 60,000 दीवानी हैं।
      • सर्वोच्च न्यायालय के कार्यभार को विकेंद्रीकृत करके, क्षेत्रीय पीठें दिल्ली में मुख्य पीठ पर बोझ को कम करने में सहायक हो सकती हैं। इससे मामलों का तेज़ी से समाधान हो सकेगा और लंबित मामलों में कमी आएगी।

    सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों के विरुद्ध तर्क:

    • न्यायशास्त्र का विखंडन: क्षेत्रीय पीठें कानूनों और कानूनी सिद्धांतों की भिन्न-भिन्न व्याख्याओं को जन्म दे सकती हैं, जिसके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न क्षेत्रों में न्यायिक निर्णयों में विसंगतियाँ हो सकती हैं।
    • मुकदमेबाज़ी में बढ़ोत्तरी: क्षेत्रीय पीठें संभावित रूप से निरर्थक या फोरम-शॉपिंग मुकदमेबाज़ी में वृद्धि कर सकती हैं क्योंकि मुकदमेबाज़ अपने मामलों के प्रति अधिक सहानुभूति रखने वाली पीठों से अनुकूल परिणाम चाहते हैं।
    • संभावित पूर्वाग्रह और प्रभाव: क्षेत्रीय पीठों में न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करने के लिये क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों या राजनीतिक प्रभाव की संभावना के बारे में चिंताएँ हो सकती हैं, मूलतः उन क्षेत्रों में जहाँ मज़बूत स्थानीय हित या राजनीतिक दबाव हैं।
    • संसाधनों और बुनियादी ढाँचे पर बढ़ा हुआ व्यय: क्षेत्रीय पीठों की स्थापना और रखरखाव के लिये न्यायालयी सुविधाओं एवं सहायक कर्मचारियों सहित बुनियादी ढाँचे में महत्त्वपूर्ण वित्तीय संसाधनों तथा निवेश की आवश्यकता होगी। इससे पहले से ही सीमित न्यायिक संसाधनों तथा बजट पर दबाव पड़ सकता है।

    अग्रिम मार्ग के रूप में कई उपायों पर विचार किया जा सकता है:

    • अपीलीय क्षेत्राधिकार पीठों से संवैधानिक क्षेत्राधिकार पीठों का पृथक्करण: भारत के दसवें विधि आयोग ने प्रस्तावित किया कि सर्वोच्च न्यायालय को दो भागों में विभाजित किया जाए, संवैधानिक भाग और कानूनी भाग। हालाँकि प्रस्ताव में कहा गया है कि केवल संवैधानिक कानून से संबंधित मुद्दों को प्रस्तावित संवैधानिक भाग में लाया जाएगा।
    • विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) के लिये एक राष्ट्रीय अपील न्यायालय की स्थापना करना: बिहार लीगल सपोर्ट सोसाइटी बनाम भारत के मुख्य न्यायाधीश, 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक राष्ट्रीय अपीलीय न्यायालय की स्थापना करना "वांछनीय" था जो विशेष अनुमति याचिकाओं पर विचार करने में सक्षम होगा।
    • कार्य दिवसों की संख्या बढ़ाना: मलिमथ समिति ने सुझाव दिया कि सुप्रीम कोर्ट को 206 दिनों तक काम करना चाहिये, साथ ही यह भी सिफारिश की कि लंबित मामलों को ध्यान में रखते हुए अवकाशों की अवधि को 21 दिनों तक कम किया जाना चाहिये।
    • मौजूदा बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करना: न्याय तक पहुँच में सुधार और मामलों के बैकलॉग को कम करने के लिये उच्च न्यायालयों तथा ज़िला न्यायालयों सहित मौजूदा न्यायिक बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने और आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देना।
      • पूर्व भारतीय मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने भारतीय राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना प्राधिकरण (NJIAI) स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जो न्यायिक बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने में मदद करेगा, जिस पर वर्तमान में तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
    • व्यवहार्यता अध्ययन संचालित करना: क्षेत्रीय पीठों की स्थापना के संभावित लाभों, चुनौतियों और निहितार्थों का आकलन करने के लिये संपूर्ण व्यवहार्यता अध्ययन आयोजित करना। इन अध्ययनों में कानूनी, तार्किक, वित्तीय और संवैधानिक पहलुओं जैसे कारकों पर विचार किया जाना चाहिये।
      • न्याय तक पहुँच, न्यायिक दक्षता और निर्णयों की स्थिरता पर उनकी प्रभावशीलता एवं प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिये चुनिंदा स्थानों पर पायलट परियोजनाओं या प्रायोगिक क्षेत्रीय पीठों को लागू करने पर विचार करना।
    • व्यापक न्यायिक सुधार: न्यायिक बैकलॉग, न्याय वितरण में देरी और न्यायिक रिक्तियों जैसे प्रणालीगत मुद्दों को संबोधित करने के उद्देश्य से व्यापक न्यायिक सुधार करना, जो कानूनी प्रणाली के समग्र कामकाज में सुधार के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
    • प्रौद्योगिकी का उपयोग: न्याय तक पहुँच बढ़ाने और विशेष रूप से दूरदराज या वंचित क्षेत्रों में मामलों के दूरस्थ न्यायनिर्णयन की सुविधा के लिये वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग एवं वर्चुअल कोर्टरूम जैसी प्रौद्योगिकी के उपयोग का पता लगाना।

    निष्कर्ष:

    भारत की न्यायपालिका के भविष्य की कल्पना करते समय, हमें एक साहसिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये जो परंपरा को नवाचार के साथ, क्षेत्रीय विविधता को राष्ट्रीय एकता के साथ और पहुँच को उत्कृष्टता के साथ संतुलित करता है। सर्वोच्च न्यायालय के लिये क्षेत्रीय पीठों की स्थापना इस दृष्टिकोण को साकार करने में महत्त्वपूर्ण प्रगति का संकेत प्रदान कर सकती है।

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