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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    संयुक्त राष्ट्र (UN) की उसके सराहनीय कार्यों के बावजूद विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखने में विफलता के लिये अक्सर आलोचना की जाती है। इसके सामने आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये तथा 21वीं सदी में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका एवं प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिये कुछ सुधारों का सुझाव दीजिये। (250 शब्द)

    31 Oct, 2023 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • अपने उत्तर की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के संक्षिप्त परिचय से कीजिये और कुछ उदाहरणों का उल्लेख कीजिये, जहाँ इसकी विफलता के लिये इसकी आलोचना की गई है।
    • संयुक्त राष्ट्र के समक्ष आने वाली चुनौतियों और सीमाओं पर चर्चा कीजिये।
    • संयुक्त राष्ट्र के प्रदर्शन और विश्वसनीयता में सुधार के लिये कुछ सुधारों का सुझाव दीजिये।
    • संतुलित दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय

    संयुक्त राष्ट्र (UN) दुनिया का सबसे प्रमुख और प्रभावशाली बहुपक्षीय संगठन है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना है। हालाँकि संयुक्त राष्ट्र को सीरिया, यमन, म्याँमार, लीबिया और दक्षिण सूडान जैसे हाल ही के कुछ सबसे हिंसक तथा जटिल संघर्षों को रोकने या हल करने में विफलता के कारण कई चुनौतियों और आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है।

    मुख्य भाग

    • संयुक्त राष्ट्र के समक्ष कुछ चुनौतियाँ:
      • राजनीतिक इच्छाशक्ति और आम सहमति का अभाव: स्थायी सदस्य (P5) जिनके पास वीटो शक्ति है, वे अक्सर मानवीय परिणामों या संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों की परवाह किये बिना अपने स्वयं के हितों या सहयोगियों की रक्षा के लिये अपने वीटो का गलत उपयोग करते हैं।
        • उदाहरण के लिये रूस एवं चीन ने सीरिया को लेकर उन प्रस्तावों को बार-बार अवरुद्ध किया है जो प्रतिबंध लगाते हैं या सैन्य हस्तक्षेप को अधिकृत करते हैं।
      • पुराना और प्रतिनिधित्व विहीन: UNSC ने 1965 के बाद से अपनी सदस्यता में कोई परिवर्तन नहीं किया है। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे कई क्षेत्रों का UNSC में प्रतिनिधित्व कम है या बिल्कुल भी नहीं है।
        • इसके अलावा भारत जैसी कुछ उभरती शक्तियाँ दशकों से UNSC में स्थायी सीट की मांग कर रही हैं।
      • शांति स्थापना से संबंधित मुद्दे: संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियान अपर्याप्त संसाधनों, शत्रुतापूर्ण वातावरण, मानवाधिकारों के उल्लंघन तथा सदस्य राज्य के स्वैच्छिक योगदान पर वित्तपोषण निर्भरता सहित कई चुनौतियों से ग्रस्त हैं।
      • कमज़ोर समन्वय और सुसंगतता: संयुक्त राष्ट्र एक जटिल संरचना है जिसमें कभी-कभी विभिन्न संस्थाओं के बीच दोहराव, ओवरलैप या प्रतिस्पर्द्धा देखी जाती है।
      • उदाहरण के लिये एक ही संघर्ष के लिये कई मध्यस्थ या दूत होते हैं, जैसे लीबिया या यमन में।

    21वीं सदी में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और प्रभावशीलता को बढ़ाने हेतु कुछ संभावित सुधार:

    • सुरक्षा परिषद में सुधार: सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक बनाने और P5 वीटो शक्ति के प्रभाव को कम करने के लिये इसके पुनर्गठन पर विचार करना। इसमें अधिक क्षेत्रों तथा भारत जैसी उभरती शक्तियों को शामिल करने के लिये अपनी सदस्यता का विस्तार करना, वीटो शक्ति को सीमित करना या समाप्त करना, इसके कामकाज़ के तरीकों एवं निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सुधार करना तथा इसके निरीक्षण व मूल्यांकन तंत्र को मज़बूत करना शामिल हो सकता है।
    • संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों को मज़बूत करना: इसमें उनके वित्तपोषण और संसाधनों, प्रशिक्षण और उपकरणों में वृद्धि,, स्पष्ट तथा यथार्थवादी अधिदेश विकसित करना, अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं मानवाधिकार मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना और क्षेत्रीय संगठनों के साथ साझेदारी को बढ़ावा देना शामिल हो सकता है।
    • समन्वय और सुसंगतता में सुधार: इसमें उनके अधिदेशों और संरचनाओं को सुव्यवस्थित करना, उनके संचार एवं सूचना-साझाकरण को बढ़ाना, सहयोग तथा नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देना और संयुक्त राष्ट्र के दृष्टिकोण के साथ उनकी रणनीतियों एवं कार्यों को संरेखित करना शामिल हो सकता है।
    • नागरिक समाज की भागीदारी: शांति निर्माण एवं संघर्ष समाधान प्रयासों में नागरिक समाज संगठनों और गैर-सरकारी अभिनेताओं को शामिल करना। वे बहुमूल्य स्थानीय ज्ञान एवं ज़मीनी स्तर पर सहायता प्रदान कर सकते हैं।
    • आधुनिक तकनीक को अपनाना: इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिये रणनीतियाँ और क्षमताएँ विकसित करके साइबर युद्ध, आतंकवाद एवं पर्यावरणीय संकटों सहित संघर्षों की बदलती प्रकृति को पहचानना और उनके अनुकूल बनाना।

    निष्कर्ष:

    संयुक्त राष्ट्र ने पिछले 75 वर्षों में वैश्विक शांति और सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। हालाँकि इसे 21वीं सदी की नई चुनौतियों और वास्तविकताओं के अनुरूप ढलने की भी ज़रूरत है। इन सुधारों को लागू करके संयुक्त राष्ट्र अपने सदस्य देशों और दुनिया भर के लोगों के लिये अधिक प्रभावी, कुशल, विश्वसनीय और प्रासंगिक बन सकता है।

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