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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: भारतीय संसदीय प्रणाली में राज्यसभा की भूमिका और प्रासंगिकता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। इसकी प्रभावशीलता और जवाबदेहिता बढ़ाने हेतु आवश्यक सुधारों के बारे में बताइये। (250 शब्द)

    27 Jun, 2023 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • राज्यसभा का संक्षिप्त में परिचय देकर अपने उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • राज्य सभा की भूमिका एवं प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिये।
    • राज्यसभा से संबंधित कुछ सुधार सुझाएँ।
    • उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    राज्यसभा या राज्यपरिषद भारतीय संसद का उच्च सदन है, जो संघीय व्यवस्था में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के हितों का प्रतिनिधित्त्व करती है। यह एक स्थायी सदन है जो विघटित नहीं होती है, बल्कि इसके एक तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष के बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

    मुख्य भाग:

    • भूमिका और प्रासंगिकता:
      • कानून का निर्माण करना:
        • राज्यसभा लोकसभा या निचले सदन के साथ विधायी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाती है।
        • यह धन विधेयक को छोड़कर, जो कि लोकसभा का विशेष विधेयक है, किसी भी विधेयक को शुरू, संशोधित या अस्वीकार कर सकती है। इसके लिये 14 दिनों के भीतर अपनी अनुशंसाओं के साथ या उसके बिना विधेयक को लोकसभा को वापस भेजना अनिवार्य है।
        • हालाँकि, किसी विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गतिरोध की स्थिति में, संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है, जहाँ लोकसभा को अधिक संख्या और अपने बड़े आकार के कारण लाभ होता है।
        • इसके अलावा, राज्यसभा संवैधानिक संशोधन विधेयकों, जिसके लिये दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है, को शुरू या संशोधित नहीं कर सकती है।
      • नियंत्रण:
        • राज्यसभा प्रश्न पूछकर, प्रस्ताव शुरू करके, संकल्प पारित करके, चर्चा की मांग आदि द्वारा कार्यपालिका पर निगरानी रखती है।
        • सरकार के गठन या विघटन में राज्यसभा की कोई भूमिका नहीं होती है, सरकार का गठन या विघटन केवल लोकसभा में बहुमत के समर्थन पर निर्भर करता है।
      • प्रतिनिधित्त्व:
        • राज्यसभा, राष्ट्रीय विधायिका में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिनिधित्त्व देकर भारत के संघीय सिद्धांत और विविधता को प्रदर्शित करती है।
        • यह अपनी संरचना में विभिन्न दलों, समूहों और हितों को समायोजित करके भारत के बहुलवाद और विविधता को भी दर्शाती है।
        • हालाँकि, राज्यसभा में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं है, क्योंकि 250 निर्वाचित सदस्यों की सीमा है और प्रत्येक राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश के लिये न्यूनतम एक सदस्य है।
        • इसके अलावा, ऐतिहासिक कारणों या राजनीतिक गणनाओं के कारण कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व अधिक या कम है।
      • विचार विमर्श :
        • राज्यसभा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के विभिन्न मुद्दों पर बहस और चर्चा के सदन के रूप में कार्य करती है।
        • यह विविध विचारों और राय को व्यक्त करने के साथ-साथ नीतियों और कानूनों की जाँच और सुधार के लिये एक मंच प्रदान करती है।
        • इसे अपने सदस्यों, विशेषकर नामांकित सदस्यों की विशेषज्ञता और अनुभव से भी लाभ मिलता है, जो अपने ज्ञान और अंतर्दृष्टि से इसके विचार-विमर्श को समृद्ध करते हैं।
        • हालाँकि, बार-बार होने वाले व्यवधान, पक्षपातपूर्ण राजनीति, शिष्टाचार की कमी, कोरम की अनुपस्थिति, नियमों का दुरुपयोग आदि जैसे कारकों के कारण समय के साथ राज्यसभा में विचार-विमर्श की गुणवत्ता और मात्रा में गिरावट आई है।
    • सुधार:
      • कानून निर्माण को सुदृढ़ बनाना:
        • राज्यसभा को कानून बनाने में अधिक शक्तियाँ और स्वायत्तता दी जानी चाहिये, खासकर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित मामलों पर। संयुक्त बैठक बुलाने या संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित करने से पहले भी इससे परामर्श किया जाना चाहिये।
        • इसे धन विधेयक पर भी अधिक अधिकार होना चाहिये, जिसमें अक्सर गैर-वित्तीय मामले शामिल होते हैं जो इसके अधिकार क्षेत्र को प्रभावित करते हैं।
      • पर्यवेक्षण में वृद्धि:
        • राज्यसभा को विभिन्न संसदीय उपकरणों और तंत्रों का उपयोग करके कार्यपालिका की देखरेख में अधिक सक्रिय और प्रभावी होना चाहिये।
        • न्यायाधीशों, चुनाव आयुक्तों, सीएजी, सीवीसी आदि जैसे प्रमुख संवैधानिक पदाधिकारियों की नियुक्ति और निष्कासन में भी इसकी अधिक भूमिका और प्रभाव होना चाहिये।
        • शिकायत संबंधी जाँच को सक्षम करने के लिये सूचना और दस्तावेज़ों तक इसकी अधिक पहुंच होनी चाहिये।
      • प्रतिनिधित्त्व में वृद्धि:
        • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का उनकी जनसंख्या के अनुपात में निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये राज्यसभा में सुधार किया जाना चाहिये।
        • इसमें महिलाओं, अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों आदि का पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करना चाहिये।
        • इसे राजनीतिक संबद्धता या हितों के टकराव वाले व्यक्तियों के नामांकन से भी बचना चाहिये।
      • विचार-विमर्श को बढ़ावा देना:
        • राज्यसभा को संसदीय आचरण के नियमों और मानदंडों का पालन करते हुए अपने सदस्यों के बीच बहस और संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिये।
        • अनुपस्थिति या अनुशासनहीनताकी स्थिति में सदस्यों पर दंड आरोपित करने के माध्यम से इसे अपने सदस्यों की अधिक भागीदारी और उपस्थिति को प्रोत्साहित करना चाहिये।
        • इसे अपनी विचार-विमर्श क्षमता और आउटरीच को बढ़ाने के लिये प्रौद्योगिकी एवं नवाचार का भी लाभ उठाना चाहिये।

    निष्कर्ष:

    राज्यसभा भारतीय संसदीय प्रणाली का एक अभिन्न और अपरिहार्य हिस्सा है जो देश के शासन तथा विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँनिभाती है। यह भारत की संघवाद और विविधता का भी प्रतीक है जो इसके संवैधानिक मूल्यों और दृष्टि को दर्शाता है। हालाँकि, इसे कुछ चुनौतियों और सीमाओं का भी सामना करना पड़ता है जो इसकी प्रभावशीलता एवं जवाबदेही में बाधा डालती हैं। इसलिये, लोगों और राष्ट्र की अपेक्षाओं तथा आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये इसमें सुधार करने और इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

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