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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    क्या विभागों से संबंधित संसदीय स्थायी समितियाँ प्रशासन को अपने पैर की उँगलियों पर रखती हैं और संसदीय नियंत्रण के लिये सम्मान प्रदर्शन हेतु प्रेरित करती हैं? उपयुक्त उदाहरणों के साथ ऐसी समितियों के कार्यों का मूल्यांकन कीजिये।

    24 May, 2022 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    भारत की शीर्ष विधि निर्मात्री संस्था के रूप में संसद का कार्य बेहद व्यापक व जटिल है। ऐसे में संसद में प्रस्तुत होने वाले प्रत्येक कानून व बजटीय प्रावधान की समुचित स्क्रूटनी सामान्य प्रक्रिया के तहत किया जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता। इसी समस्या के समाधान के लिये विभिन्न समितियों की स्थापना की गई है। इन समितियों में प्रमुख ‘विभाग-संबंधी स्थायी समितियाँ’ (Department-related Standing Committees–DRSCs) हैं, जिनके कार्यों में अपने संबंधित विभाग से जुड़े किसी कानून के सभी प्रावधानों का परीक्षण करना, संबंधित विभाग की अनुदान मांगों की जाँच करना, विभाग की वार्षिक रिपोर्ट का मूल्यांकन करना आदि शामिल हैं।

    आमतौर पर संसदीय समितियों की रिपोर्टें बहुत ही विस्तृत होती हैं और शासन से संबंधित मामलों पर प्रामाणिक जानकारी प्रदान करती हैं। इन समितियों से संदर्भित विधेयक महत्त्वपूर्ण मूल्यवर्द्धन के साथ सदन में वापस आते हैं। इसके अतिरिक्त इन समितियों को अपने कार्य के निर्वहन के दौरान विशेषज्ञ सलाह और सार्वजनिक राय प्राप्त करने का अधिकार होता है। ये समितियाँ दोनों सदनों के सदस्यों (सांसदों) की छोटी इकाइयाँ होती हैं और ये सदस्य अलग-अलग राजनीतिक दलों से आते हैं। ये समितियाँ पूरे वर्ष कार्य करती हैं। इसके अलावा संसदीय समितियाँ लोकलुभावन मांगों को लेकर बाध्य नहीं होती हैं, जो आमतौर पर संसद के काम में बाधा उत्पन्न करती हैं।

    चूँकि समितियों की बैठकें ‘बंद-दरवाजे’ के पीछे होती हैं और ऐसे में समितियों के सदस्य पार्टी व्हिप द्वारा बाध्य नहीं होते हैं, इसलिये संसदीय समितियाँ बहस तथा चर्चा के लोकाचार पर कार्य करती हैं। इसके अलावा समितियाँ सार्वजनिक चकाचौंध से दूर रहकर काम करती हैं और संसदीय कार्रवाई को संचालित करने वाले कोड, जो सदन के नए और युवा सदस्यों के लिये महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण संस्था है, की तुलना में अनौपचारिक बने रहते हैं।

    इसके बावजूद बीते कुछ समय में देखा गया है कि स्थायी समितियाँ प्रशासन को उत्तरदायी बनाने में पूरी तरह कारगर सिद्ध नहीं हो सकी हैं। हाल ही के वर्षों में संसद के कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य; जैसे- अनुच्छेद-370 का निरसन और जम्मू एवं कश्मीर को 2 संघ राज्यक्षेत्रों में विभाजित करना, किसी भी सदन की समिति द्वारा संसाधित नहीं किये गए थे। हाल ही में कृषि उपज से संबंधित 3 विधेयकों और 3 श्रम विधेयकों के विरुद्ध तीव्र विरोध हुआ, जो निश्चित रूप से सदनों की चुनिंदा समितियों द्वारा जाँच के योग्य हैं, जिन्हें बहुमत का उपयोग करके ही सरकार द्वारा पारित किया गया था। समितियों के कामकाज को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों पर बैठकों में सांसदों की कम उपस्थिति होती है। एक समिति के अंतर्गत बहुत सारे मंत्रालय, सांसदों को समितियों में नामित करते समय अधिकांश राजनीतिक दलों द्वारा मानदंडों का पालन नहीं किया गया।

    स्पष्ट है कि संसदीय समितियों के पास प्रशासन को उत्तरदायी बनाने के पर्याप्त साधन मौजूद हैं और वे कुछ हद तक इसमें सफल भी होती हैं। हालाँकि भारी बहुमत वाली सरकारों के अंतर्गत प्रशासन पर नियंत्रण करने के लिये इन समितियों की कार्यशैली में निरंतर नवाचार की आवश्यकता है।

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