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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. 'आज़ादी के 75 साल बाद भी, लोकसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में ज़्यादा बढ़ोतरी नहीं देखी गई है।' इसके कारणों पर चर्चा कीजिये और संसद में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के उपायों का सुझाइये।

    14 Jan, 2022 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण

    • भारतीय संसद में महिलाओं की स्थिति पर जोर देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये और कुछ आँकड़े दीजिये।
    • इस निराशाजनक प्रदर्शन के कारणों पर चर्चा कीजिये।
    • संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के उपाय सुझाइये।
    • उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।
    • अंतर-संसदीय संघ द्वारा संकलित आँकड़ों के अनुसार, विश्व भर में महिलाएँ लोकसभा के कुल सदस्यों के 14.44% का प्रतिनिधित्व करती हैं।
    • भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India- ECI) के नवीनतम आँकड़े के अनुसार:
      • अक्तूबर 2021 तक महिलाएँ संसद के कुल सदस्यों के 10.5% का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।
      • भारत में सभी राज्य विधानसभाओं को एक साथ देखें तो महिला सदस्यों (विधायकों) की स्थिति और भी बदतर है, जहाँ राष्ट्रीय औसत मात्र 9% है।
      • आज़ादी के पिछले 75 वर्षों में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत भी नहीं बढ़ा है।

    कम प्रतिनिधित्व के प्रमुख कारण

    • लिंग संबंधी रूढ़ियाँ:
      • पारंपरिक रूप से घरेलू गतिविधियों के प्रबंधन की भूमिका महिलाओं को सौंपी गई है।
      • महिलाओं को उनकी रूढ़ीवादी भूमिकाओं से बाहर निकलने और देश की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
    • प्रतिस्पर्द्धा:
      • राजनीति, किसी भी अन्य क्षेत्र की तरह, प्रतिस्पर्द्धा का क्षेत्र है। अंततः महिला राजनेता भी प्रतिस्पर्द्धी ही मानी जाती हैं।
      • कई राजनेताओं को भय है कि महिला आरक्षण लागू किये जाने पर उनकी सीटें बारी-बारी से महिला उम्मीदवारों के लिये आरक्षित की जा सकती हैं, जिससे स्वयं अपनी सीटों से चुनाव लड़ सकने का अवसर वे गँवा सकते हैं।
    • राजनीतिक शिक्षा का अभाव:
      • शिक्षा महिलाओं की सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करती है। शैक्षिक संस्थानों में प्रदान की जाने वाली औपचारिक शिक्षा नेतृत्व के अवसर पैदा करती है और नेतृत्व को आवश्यक कौशल प्रदान करती है।
      • राजनीति की समझ की कमी के कारण वे अपने मूल अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों से अवगत नहीं हैं।
    • कार्य और परिवार:
      • पारिवारिक देखभाल उत्तरदायित्वों के असमान वितरण का परिणाम यह होता है कि महिलाएँ घर और बच्चों की देखभाल में पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक समय देती हैं।
      • एक महिला को न केवल गर्भावस्था और प्रसव के दौरान अपना समय देना पड़ता है, बल्कि यह तब तक जारी रहता है जब तक कि बच्चा देखभाल के लिये माता-पिता पर निर्भर न रह जाए।
    • राजनीतिक नेटवर्क का अभाव:
      • राजनीतिक निर्णय-निर्माण में पारदर्शिता की कमी और अलोकतांत्रिक आंतरिक प्रक्रियाएँ सभी नए प्रवेशकों के लिये चुनौती पेश करती हैं, लेकिन महिलाएँ इससे विशेष रूप से प्रभावित होती हैं, क्योंकि उनके पास राजनीतिक नेटवर्क की कमी होती है।
    • संसाधनों की कमी:
      • भारत की आंतरिक राजनीतिक दल संरचना में महिलाओं के कम अनुपात के कारण, महिलाएँ अपने राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों के संपोषण हेतु संसाधन और समर्थन जुटाने में विफल रहती हैं।
      • महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिये राजनीतिक दलों से पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिलती है।
    • सोशल कंडीशनिंग:
      • उन्हें अपने ऊपर थोपे गए निर्देशों को स्वीकार करना होता है और समाज का बोझ उठाना पड़ता है।
      • सार्वजनिक दृष्टिकोण न केवल यह निर्धारित करता है कि आम चुनाव में कितनी महिला उम्मीदवार जीतेंगी, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से यह भी निर्धारित करता है कि किस पद के लिये उन्हें नामांकित किया जाए।
    • प्रतिकूल वातावरण:
      • कुल मिलाकर राजनीतिक दलों का माहौल भी महिलाओं के अधिक अनुकूल नहीं है; उन्हें पार्टी में जगह बनाने के लिये कठिन संघर्ष और बहुआयामी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
      • राजनीति में हिंसा बढ़ती जा रही है। अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, असुरक्षा में उल्लेखनीय वृद्धि ने महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र से बाहर कर दिया है।

    आगे की राह

    यह भारत जैसे देश के लिये आवश्यक है कि मुख्यधारा की राजनीतिक गतिविधियों में समाज के सभी वर्गों की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए; इसलिये इसको बढ़ावा देने हेतु सरकार को आवश्यक कदम उठाने पर विचार करना चाहिये।

    • महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना:
      • सभी राजनीतिक दलों को एक आम सहमति तक पहुँचते हुए महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पारित करना चाहिये, जिसमें संसद और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव किया गया है।
    • राज्य स्तर पर स्थानीय निकायों की महिला प्रतिनिधियों को बढ़ावा देना:
      • स्थानीय स्तर पर महिलाओं का एक ऐसा समूह उभर चुका है, जो सरपंच और स्थानीय निकायों के सदस्य के रूप में स्थानीय स्तर के शासन का तीन दशक से अधिक समय का अनुभव रखता है।
      • वे अब राज्य विधानसभाओं और संसद में बड़ी भूमिका सकती हैं।
    • राजनीतिक दलों में महिला कोटा:
      • गिल फॉर्मूला: भारतीय निर्वाचन आयोग के उस प्रस्ताव को लागू किये जाने की आवश्यकता है, जिसके अनुसार किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को अपनी मान्यता बनाए रखने के लिये राज्य विधानसभा और संसदीय चुनावों में महिलाओं के एक न्यूनतम सहमत प्रतिशत को अवसर देना ही होगा।
    • पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बढ़ावा देना:
      • कोई राजनीतिक दल—जो वास्तविक अर्थ में लोकतांत्रिक होगा, वह निर्वाचन प्रक्रिया से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष जैसे पदों पर दल की महिला सदस्यों को उचित अवसर प्रदान करेगा।
    • रूढ़ियों को तोड़ना:
      • समाज को महिलाओं को घरेलू गतिविधियों तक सीमित रखने की रूढ़िवादिता को तोड़ना होगा।
      • सभी संस्थानों (राज्य, परिवार और समुदाय) के लिये यह महत्त्वपूर्ण है कि वे महिलाओं की विशिष्ट आवश्यकताओं—जैसे शिक्षा में अंतराल को कम करने, लिंग भूमिकाओं पर फिर से विचार करने, श्रम के लैंगिक विभाजन और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण को दूर करने के प्रति सजग हों और इस दिशा में आवश्यक कदम उठाएँ।

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