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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा ग्राम न्यायालयों की स्थापना न किये जाने पर चिंता व्यक्त की गई।‘ग्राम न्यायालय’ से आप क्या समझतें हैं? इनकी संरचना तथा प्राधिकार संबंधी मुद्दों पर प्रकाश डालें।

    09 Sep, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण-

    • भूमिका

    • ग्राम न्यायालय का परिचय

    • संरचना तथा प्राधिकार संबंधित मुद्दे 

    • निष्कर्ष

    देश के आम नागरिकों तक न्याय व्यवस्था की पहुँच को बढ़ाने और प्रत्येक नागरिक को देश के न्यायिक तंत्र से जोड़ने के लिये ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008’ के तहत ‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। इस व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों को ग्राम पंचायत स्तर पर ‘ग्राम न्यायलयों’ की स्थापना करने के निर्देश दिये गए हैं, जिससे पंचायत स्तर पर दीवानी या फौजदारी के सामान्य मामलों (अधिकतम सज़ा 2 वर्ष) में सुनवाई कर नागरिकों को त्वरित न्याय उपलब्ध कराया जा सके। इस व्यवस्था को लागू करने का मुख्य उद्देश्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे नागरिकों को स्थानीय स्तर पर संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से न्याय उपलब्ध कराना था।

    ग्राम न्यायालय’ की संरचना के मुख्य बिंदु-

    • ‘ग्राम न्यायालय’ के संचालन के लिये राज्य सरकार हाईकोर्ट के परामर्श पर एक ‘न्यायाधिकारी’ की नियुक्ति करेगी।
    • न्यायाधिकारी के रूप में नियुक्ति की अर्हताएँ एक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समान होंगी।
    • इसके साथ ही न्यायाधिकारी के वेतन, भत्ते और उसकी सेवा से संबंधित अन्य नियम व शर्तें भी प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समान होंगी।

    ‘ग्राम न्यायालय’ की शक्तियाँ और प्राधिकार:

    • ‘ग्राम न्यायालयों’ में सिर्फ उन्ही मामलों की सुनवाई की जाएगी जिनमें अधिकतम सज़ा दो वर्ष का कारावास (ज़ुर्माने के साथ या बगैर) या इससे कम हो, अपराध क्षमायोग्य हो आदि।
    • ‘ग्राम न्यायालयों’ को ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008’ की अनुसूची (1) व (2) में निर्धारित दीवानी और फौजदारी के सामान्य मामलों में सुनवाई करने के लिये कुछ शक्तियाँ और अधिकार प्रदान किये गए हैं।
    • केंद्र तथा राज्य सरकारें इस अधिनियम में निर्धारित मामलों की सूची में परिवर्तन या संशोधन कर सकती हैं।
    • अधिनियम में प्रदत्त विशेष अधिकारों के तहत ग्राम न्यायालय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 व भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 का अनुसरण करने के लिये बाध्य नहीं होंगे।
    • ग्राम न्यायालय आपराधिक मामलों में न्याय की संक्षिप्त प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए शीघ्र न्याय प्रदान करने का प्रयास करेंगे।
    • ग्राम न्यायालयों में दीवानी मामलों में आपसी समझौतों और फौजदारी मामलों में ‘प्ली बार्गेनिंग’ के माध्यम से मामलों का निपटारा करने की व्यवस्था भी की गई है।

    निष्कर्षतः ‘ग्राम न्यायालय’ न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे नागरिकों को आसानी से न्याय उपलब्ध कराने में सहायक हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में सुधारों के परिणामस्वरूप न्याय तंत्र पर दबाव को कम करने व आम जनता के बीच विधि व्यवस्था के प्रति उनके नज़रिये को पुनः परिभाषित करने का अवसर प्रदान करते हैं।

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