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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    संप्रदायवाद और धर्मनिरपेक्षता पर नेहरू की विचारधारा एवं प्रतिक्रिया ने ही आधुनिक ‘सेक्यूलर’ भारत की नींव को मज़बूत किया। विवेचना करें।

    28 Jul, 2018 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    उत्तर की रूपरेखा

    • प्रभावी भूमिका में नेहरू की विचारधारा को संक्षेप में स्पष्ट करें।
    • तार्किक एवं संतुलित विषय-वस्तु में प्रश्नगत कथन की विवेचना करें।
    • प्रश्नानुसार संक्षिप्त एवं सारगर्भित निष्कर्ष लिखें।

    जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। उन्होंने भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक चिंतन प्रक्रिया एवं कार्यक्रमों को गहराई तक प्रभावित किया। नेहरू का जीवन ‘पुनर्जागरण’ से प्रभावित था। वे अपने स्वभाव, अध्ययन एवं अभिधारणाओं के कारण रूढ़िवाद, कट्टरवाद और संप्रदायवाद के विरोधी थे। संप्रदायवाद के संबंध में उनके विचार अभिनव एवं शिक्षाप्रद थे। वे भारत के प्रथम नेता थे जिन्होंने संप्रदायवाद के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक आयामों, प्रकृति, लक्षणों एवं कारणों को गहराई से समझा।

    नेहरू अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती वर्षों से ही संप्रदायवाद के विरोधी थे। नेहरू की राजनीतिक यात्राओं तथा विभिन्न युवा सम्मेलनों में उनके द्वारा दिये गए भाषणों में सांप्रदायिकता को मुख्य निशाना बनाया गया। नेहरू तथा अन्य राष्ट्रवादियों द्वारा स्थापित ‘स्वतंत्र भारत लीग’ में किसी भी संप्रदायवादी या सांप्रदायिक संगठन से जुड़े व्यक्ति को सदस्यता प्रदान करने का निषेध किया गया था। नेहरू ने धर्म को मात्र एक सांस्कृतिक प्रेरणा तथा विरासत के रूप में स्वीकार किया। वे महात्मा गांधी की तरह धर्म की नैतिक अनिवार्यता को व्यावहारिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार करते थे।

    नेहरू संगठित धर्म के विरोधी थे। उन्होंने सदैव धर्म के राजनीतीकरण को घृणास्पद बताया। उनके अनुसार, "कोई भी संगठित धर्म निरपवाद रूप से एक निहित स्वार्थ बन जाता है, जो अनिवार्यतः प्रगति एवं परिवर्तन विरोधी प्रतिक्रियावादी शक्ति के रूप में परिवर्तित हो जाता है।" स्वतंत्र भारत में संप्रदायवाद के खात्मे के लिये प्रतिबद्ध नेहरू ने अनंतशेनम आयंगर के माध्यम से संसद में एक संकल्प पारित कराया। नेहरू सांप्रदायिकता को किसी भी बाह्य आक्रमण से अधिक खतरनाक मानते थे। उनके द्वारा विज्ञान एवं तकनीकी के प्रचार-प्रसार पर बल दिया गया ताकि बुद्धिवादी तथा धर्मनिरपेक्ष शक्तियाँ मज़बूत हो सकें। 1962 के जबलपुर दंगों ने नेहरू को बुरी तरह आहत किया, जिसके बाद उन्होंने ‘राष्ट्रीय एकता परिषद’ का गठन किया।

    नेहरू के अनुसार, धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि लोग अपने-अपने धर्मों का त्याग कर दें, बल्कि इसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों की सुरक्षा करे किंतु दूसरों की कीमत पर किसी धर्म का पक्षपोषण न करे और न ही किसी धर्म को राज्यधर्म के रूप में स्वीकार करे। नेहरू के दृष्टिकोण में लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता आपस में घनिष्ठता से जुड़े हैं तथा संयुक्त रूप से ये एक ऐसे भारत का निर्माण करने में सक्षम हैं जो मानव की महत्ता तथा उसके व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास को प्रोत्साहित करे एवं जिसमें दलितों एवं गरीबों के जीवन स्तर में भी स्तरीय सुधार आए। 

    धर्मनिरपेक्षता के प्रति नेहरू की प्रतिबद्धता संपूर्ण, व्यापक एवं शर्तरहित थी। उन्होंने भाखड़ा नांगल जैसे बांधों को आधुनिक मंदिर, मकबरा या विश्वविद्यालय की संज्ञा दी। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को एक आदर्श के रूप में सामने रखा और समाज में उसके प्रचार-प्रसार के लिये गंभीरता से कार्य किया। स्वतंत्रता के पश्चात् की सर्वाधिक असहज परिस्थितियों में एक धर्मनिरपेक्ष संविधान का निर्माण तथा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और समाज की नींव स्थापना नेहरू के प्रयासों से ही संभव हो सकी। कालांतर में 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्यूलर’ शब्द जोड़ा गया।

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