सामाजिक न्याय
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) विधेयक, 2026
- 19 Mar 2026
- 99 min read
प्रिलिम्स के लिये: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ, 2014, ट्रांसजेंडर, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय परिषद, आयुष्मान भारत, विश्व बैंक, सकल घरेलू उत्पाद
मेन्स के लिये: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 में प्रस्तावित प्रमुख बदलाव और उनसे संबंधित चिंताएँ, ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रमुख प्रावधान, भविष्य में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सशक्त बनाने के लिये आवश्यक कदम।
चर्चा में क्यों?
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में प्रमुख बदलाव प्रस्तावित करता है।
- ट्रांसजेंडर लोगों को आशंका है कि ये संशोधन सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ, 2014 के फैसले के परिप्रेक्ष्य में भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए कानूनी संरचना को पुनर्गठित करने का प्रयास जारी है।
सारांश
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) विधेयक, 2026 स्व-पहचान के अधिकार को एक चिकित्सा प्रमाणन प्रक्रिया से बदलने का प्रस्ताव करता है, जो NALSA निर्णय (2014) के विपरीत है।
- अपराधों के लिये सख्त दंड की प्रस्तुति करते हुए यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा को संकुचित करता है।
- इससे क्लिनिकल गेटकीपिंग और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बहिष्कार के बारे में चिंताएँ बढ़ गई हैं।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 में प्रस्तावित परिवर्तन क्या हैं?
- स्व-पहचान का उन्मूलन: वर्ष 2026 का विधेयक अधिनियम 2019 की धारा 4(2) को हटा देता है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में स्व-पहचान करने का अधिकार निहित था। सरकार का तर्क है कि मूल परिभाषा "अस्पष्ट" थी और इससे "वास्तविक रूप से उत्पीड़ित" लाभार्थियों की पहचान करना मुश्किल हो गया था।
- सरकार का यह भी मानना है कि मौज़ूदा परिभाषा कई आपराधिक, नागरिक और व्यक्तिगत कानूनों को "अव्यावहारिक" बनाती है और यह विभिन्न वैधानिक प्रावधानों के साथ "संगत नहीं" है। कानून का इच्छित उद्देश्य विविध लैंगिक पहचानों, स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों के प्रत्येक वर्ग की रक्षा करना कभी नहीं था।
- सीमित परिभाषा: ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा को काफी सीमित कर दिया गया है। यह मुख्य रूप से उन लोगों को मान्यता देती है जिनकी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान होती है (जैसे– किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता) या ऐसे व्यक्तियों को, जिनमें जन्मजात जैविक भिन्नताओं की एक निर्धारित, चिकित्सकीय सूची (जैसे– गुणसूत्र पैटर्न, गोनैडल विकास आदि) पाई जाती है।
- नाम परिवर्तन: इसमें प्रस्तावित किया गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपने जन्म प्रमाण पत्र और पहचान दस्तावेज़ों में अपना पहला नाम बदल सकते हैं। इसके लिये व्यक्तियों को “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की नई प्रस्तावित वैधानिक परिभाषा को पूरा करना होगा।
- चिकित्सकीय प्रमाणन की शुरुआत: यह पहचान पत्र जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया को बदलकर एक चिकित्सा बोर्ड (मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता में) के अधीन कर देता है। अब पहचान प्रमाण पत्र जारी करने से पहले ज़िला मजिस्ट्रेट के लिये इस बोर्ड की सिफारिश पर विचार करना अनिवार्य होगा।
- निगरानी में वृद्धि: राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय परिषद में प्रतिनिधियों को अब संबंधित मंत्रालय या विभाग में कम-से-कम निदेशक स्तर का अधिकारी होना आवश्यक है, जो उच्च स्तर की नौकरशाही निगरानी को बढ़ावा देने का संकेत देता है।
- जबरन पहचान के लिये नया आपराधिक प्रावधान: यह विधेयक ‘जबरन’ ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के मामलों को संबोधित करने हेतु एक अलग श्रेणी प्रस्तुत करता है। यह किसी व्यक्ति को बल, धोखे या प्रलोभन के माध्यम से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिये मजबूर करने (जैसे– नपुंसकीकरण या हाॅर्मोनल बदलाव जैसी प्रक्रियाएँ करवाना) को दंडनीय बनाता है।
- बढ़ी हुई सज़ाएँ: यह विधेयक कड़े दंडात्मक प्रावधानों को प्रस्तुत करता है।
- किसी वयस्क का अपहरण कर उसे ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिये मजबूर करने पर न्यूनतम 10 वर्ष के कठोर कारावास (RI) की सज़ा हो सकती है, जो आजीवन कारावास तक बढ़ाई जा सकती है। यदि यही अपराध किसी बच्चे के साथ किया जाता है, तो आजीवन कठोर कारावास अनिवार्य है और न्यूनतम ₹5 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा।
- किसी वयस्क ट्रांसजेंडर व्यक्ति को भीख मांगने या बँधुआ मज़दूरी के लिये मजबूर करने पर 5 से 10 वर्ष की सख्त कैद (RI) हो सकती है। किसी बच्चे के साथ यही अपराध करने पर 10 से 14 वर्ष की कारावास होती है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 से जुड़े प्रमुख भय/चिंताएँ क्या हैं?
- स्व-पहचान के सिद्धांत का अस्वीकार: 2019 के अधिनियम की धारा 4(2) को हटाकर यह विधेयक सीधे तौर पर NALSA बनाम भारत संघ के मूल सिद्धांत के विपरीत जाता है, जिसने स्व-निर्धारण के अधिकार को मान्यता दी थी और यह कहा था कि इसे बाहरी, विशेष रूप से चिकित्सकीय माध्यमों से साबित करने की आवश्यकता नहीं है।
- क्लिनिकल गेटकीपिंग: मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता वाले बोर्ड द्वारा किसी व्यक्ति के लिंग की “सिफारिश” ज़िला मजिस्ट्रेट को करना अनिवार्य बनाकर, यह विधेयक फिर से उस व्यवस्था की ओर लौटता है जहाँ ट्रांसजेंडर पहचान को एक सामाजिक या व्यक्तिगत पहचान के बजाय एक चिकित्सकीय स्थिति के रूप में देखा जाता है।
- किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिये गहराई से जमी ट्रांसफोबिया वाली व्यवस्था में अपने अस्तित्व को साबित करना और डॉक्टरों के एक बोर्ड के सामने अपनी पहचान सिद्ध करना अत्यंत कठिन, अपमानजनक तथा पिछड़ापन दर्शाने वाला होगा।
- जेंडर फ्लूइडिटी का बहिष्करण: स्पष्ट रूप से यह उल्लेख करके कि यह कानून ‘स्व-निर्धारित’ या ‘जेंडर फ्लूइड’ पहचान वाले लोगों के लिये नहीं है, यह समुदाय के एक बड़े हिस्से की अनदेखी करता है जो कठोर जैविक श्रेणियों (rigid biological categories) हेतु उपयुक्त नहीं होते हैं।
- सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों से बाहर के व्यक्तियों के लिये खतरा: यद्यपि यह विधेयक हिजड़ा या किन्नर जैसे समूहों को मान्यता देता है, लेकिन यह उन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अवैध घोषित करने की क्षमता रखता है जो इन पारंपरिक प्रणालियों (जैसे– गुरु-चेला प्रणाली) से स्वतंत्र रहकर अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। इसके कारण वे बिना किसी कानूनी आधार या मान्यता के रह सकते हैं।
- प्रगति का उलटाव और सांख्यिकीय प्रभाव: 2019 के अधिनियम के तहत अब तक 32,424 ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र तथा पहचान पत्र पहले ही जारी किये जा चुके हैं, लेकिन यह संशोधन अनिश्चितता की स्थिति पैदा करता है। यदि परिभाषा बदलती है, तो यह स्पष्ट नहीं है कि क्या इन व्यक्तियों को नए एवं अधिक कठोर चिकित्सा मानदंडों के तहत अपनी पहचान को ‘पुनः सिद्ध’ करना होगा।
- ‘जबरन पहचान’ प्रावधानों पर चिंता: यह आशंका है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग कर ट्रांसजेंडर समुदायों या उन परिवारों को निशाना बनाया जा सकता है जो किसी नाबालिग के जेंडर परिवर्तन का समर्थन करते हैं और नई कड़ी परिभाषाओं के तहत इसे ‘प्रलोभन’ या ‘उकसावा’ बताया जा सकता है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, जो NALSA बनाम भारत संघ के निर्णय के बाद लागू किया गया, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कानूनी मान्यता और अधिकार प्रदान करता है।
- ट्रांसजेंडर की परिभाषा: ट्रांसजेंडर से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसका लिंग जन्म के समय उसे दिये गए लिंग से मेल नहीं खाता है। इसमें ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, इंटरसेक्स व्यक्ति और किन्नर व हिजड़ा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानें शामिल हैं, चाहे कोई चिकित्सकीय हस्तक्षेप हुआ हो या नहीं।
- जनगणना 2011 के अनुसार, भारत में ट्रांसजेंडर जनसंख्या लगभग 4.88 लाख है, जिसमें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष तीन राज्य हैं।
- स्व-पहचान का अधिकार: यह स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान का अधिकार प्रदान करता है। पहचान प्रमाण पत्र ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा एक पूर्णतः प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से जारी किया जाता है, जिसमें किसी प्रकार की चिकित्सकीय जाँच की आवश्यकता नहीं होती।
- भेदभाव का निषेध: यह शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक सुविधाओं में भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
- संस्थागत तंत्र: यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिये एक राष्ट्रीय परिषद की स्थापना करता है, जो सरकार को कल्याणकारी नीतियों पर सलाह देने, उनके क्रियान्वयन की निगरानी करने और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करने का कार्य करती है।
- अपराध और दंड: बलपूर्वक श्रम, दुर्व्यवहार और अधिकारों से वंचित करने जैसे अपराधों के लिये कारावास (6 माह से 2 वर्ष) और जुर्माने का प्रावधान है।
भारत को भविष्य में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सशक्त बनाने हेतु कौन-से कदम उठाने चाहिये?
- स्व-पहचान की बहाली: यह सुनिश्चित करने के लिये कि लैंगिक पहचान चिकित्सा प्रमाणन के बजाय व्यक्तिगत स्वायत्तता का विषय बनी रहे, राष्ट्रीय कानूनों को NALSA (2014) के निर्णय के अनुरूप बनाया जाए।
- ज़िला मजिस्ट्रेटों, पुलिसकर्मियों और चिकित्सा बोर्डों को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाए कि वे समुदाय के साथ बिना पूर्वाग्रह और ‘गेटकीपिंग’ व्यवहार के संवाद कर सकें।
- समग्र स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच: सरकारी अस्पतालों में जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी (GRS) और हार्मोन थेरेपी को मानकीकृत किया जाए, ताकि यह सुलभ और सुरक्षित बन सके।
- आयुष्मान भारत जैसी सार्वजनिक योजनाओं में संक्रमण-संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए तथा मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान हेतु समर्पित हेल्पलाइन और समुदाय-नेतृत्व वाले परामर्श केंद्र स्थापित किये जाएँ।
- रोज़गार के अवसर: कर्नाटक में सरकारी सेवाओं में 1% आरक्षण और टाटा स्टील की कॉर्पोरेट विविधता भर्ती जैसे सफल मॉडलों का विस्तार किया जाना चाहिये। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट (2021) के अनुसार, कार्यबल में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के समावेशन से भारत के GDP में 1.7% तक वृद्धि हो सकती है।
- सामाजिक जागरूकता एवं सांस्कृतिक परिवर्तन: ‘मैं भी इंसान हूँ (I Am Also Human)’ जैसे निरंतर जन-जागरूकता अभियान और सम्मानजनक मीडिया प्रस्तुति, कलंक को चुनौती देने के लिये आवश्यक हैं। इसे कोवागम उत्सव (तमिलनाडु) जैसे सांस्कृतिक प्रयासों और मणिपुर की ‘या_ऑल स्पोर्ट्स क्लब’ जैसी समावेशी पहलों (संपूर्ण ट्रांसजेंडर फुटबॉल टीम) को बढ़ावा देकर सशक्त किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
प्रस्तावित ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों की सुरक्षा) संशोधन विधेयक, 2026 ने प्रशासनिक नियमन और NALSA (2014) के निर्णय में मान्यता प्राप्त स्व-पहचान के अधिकार के बीच संतुलन पर चर्चा उत्पन्न कर दी है। भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों और गरिमा को आगे बढ़ाने के लिये कानूनी मान्यता, सामाजिक समावेश, स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच और रोज़गार के अवसर सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) विधेयक, 2026 द्वारा पेश किये गए मुख्य परिवर्तनों पर चर्चा कीजिये। ये परिवर्तन भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की कानूनी और सामाजिक मान्यता पर किस प्रकार प्रभाव डालते हैं? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 क्या है?
यह ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन का प्रस्ताव करता है, जिसमें पहचान के लिये चिकित्सा प्रमाणन और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषाओं में संशोधन शामिल है।
2. NALSA बनाम भारत संघ (2014) के निर्णय का महत्त्व क्या था?
सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी और स्व-निर्धारित लिंग पहचान को मूल अधिकार के रूप में स्थापित किया।
3. 2026 का संशोधन विधेयक लिंग पहचान की प्रक्रिया में कैसे बदलाव करता है?
यह ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र जारी करने से पहले चिकित्सा बोर्ड की अनिवार्य अनुशंसा को शामिल करता है।
4. जनगणना 2011 के अनुसार भारत में अनुमानित ट्रांसजेंडर जनसंख्या कितनी है?
भारत में लगभग 4.88 लाख ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गणना हुई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में सबसे अधिक जनसंख्या है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत में, विधिक सेवा प्रदान करने वाले प्राधिकरण (Legal Services Authorities) निम्नलिखित में से किस प्रकार के नागरिकों को नि:शुल्क विधिक सेवाएँ प्रदान करते हैं? (2020)
- 1,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले व्यक्ति को
- 2,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले ट्रांसजेंडर को
- 3,00,000 रुपए से कम वार्षिक आय वाले अन्य पिछडे़ वर्ग (OBC) के सदस्य को
- सभी वरिष्ठ नागरिकों को
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3 और 4
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 1 और 4
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. भारत में महिला सशक्तीकरण के लिये जेंडर बजटिंग अनिवार्य है। भारतीय प्रसंग में जेंडर बजटिंग की क्या आवश्यकताएँ एवं स्थिति हैं? (2016)
