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सामाजिक न्याय

भारतीय राजनीति में महिलाएँ

  • 19 Mar 2026
  • 98 min read

प्रिलिम्स के लिये: लोकसभा, 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन, संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023, SVEEP

मेन्स के लिये: भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व, लैंगिक समानता और लोकतांत्रिक गहनता, समावेशी लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी एक बड़े लोकतांत्रिक विरोधाभास को उजागर करती है। चुनावी भागीदारी में वृद्धि का समानुपाती राजनीतिक प्रतिनिधित्व या निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति में पर्याप्त रूप से रूपांतरण नहीं हुआ है। यह अंतर संरचनात्मक बाधाओं और सार्थक सुधारों की आवश्यकता पर निरंतर प्रकाश डालता है।

सारांश

  • भारत ने मतदाता भागीदारी में लगभग लैंगिक समानता प्राप्त कर ली है, लेकिन महिलाएँ विधानसभाओं में संरचनात्मक, संस्थागत और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं के कारण कम प्रतिनिधित्व में बनी हुई हैं।
  • इस अंतर को पाटने हेतु आरक्षण नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन, राजनीतिक दलों में सुधार और निर्णय लेने में महिलाओं की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये बाधाओं का उन्मूलन आवश्यक है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • मतदाता के रूप में: पिछले छह दशकों में महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच मतदान भागीदारी का अंतर धीरे-धीरे घटा है, जो भारत के चुनावी परिदृश्य में एक गहन परिवर्तन को दर्शाता है।
    • 1967 के लोकसभा चुनाव में पुरुष मतदान दर 66.7% और महिला मतदान दर 55.5% थी अर्थात 11.2 प्रतिशत का अंतर, जो 1971 में संरचनात्मक बाधाओं, जैसे– कम साक्षरता और सीमित गतिशीलता के कारण 11.8 प्रतिशत हो  गया।
    • समय के साथ शिक्षा, जागरूकता, राजनीतिक पहुँच और गतिशीलता में सुधार के कारण यह अंतर लगातार घटा और वर्ष 2014 तक लगभग 1.5 प्रतिशत रह गया।
    • वर्ष 2019 और 2024 के सामान्य चुनावों में, महिलाएँ लगभग उसी दर से वोट डालती हैं जितना पुरुष (लगभग 66%)।
      • 1980 के दशक से कई राज्य विधानसभा चुनावों में महिलाओं की मतदान भागीदारी पुरुषों से भी अधिक रही है।
  • राजनीतिक अभियानों: हालाँकि पुरुषों और महिलाओं के बीच मतदाता भागीदारी लगभग बराबर हो गई है, अभियान स्तर पर भागीदारी में अभी भी लैंगिक अंतराल दिखाई देता है।
    • वर्ष 2009 से 2024 के बीच महिलाओं की चुनावी बैठकों और रैलियों में उपस्थिति 9% से बढ़कर लगभग 16% हुई, जबकि जुलूसों और घर-घर प्रचार में भागीदारी 5-6% से बढ़कर लगभग 11% हो गई, फिर भी पुरुषों की भागीदारी लगभग दोगुनी बनी हुई है।
  • प्रतिनिधियों के रूप में: रिकॉर्ड संख्या में मतदान करने के बावजूद महिलाएँ अधिकांशतः सत्ता के गलियारों से बाहर बनी हुई हैं।
    • 18वीं लोकसभा में केवल 74 महिला सांसद हैं, जो 543 सीटों का 13.6% है। यह 17वीं लोकसभा की तुलना में गिरावट है, जिसमें 78 महिला सांसद (14.4%) थीं, जो अब तक का सबसे उच्च प्रतिनिधित्व था। भारत का यह आँकड़ा वैश्विक औसत लगभग 26% से काफी कम है।
    • राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व अभी भी लगभग 9% से 10% के दयनीय स्तर पर है।
    • उज्ज्वल पहलू यह है कि स्थानीय स्वशासी संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 44% से अधिक है, जिसे पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के तहत आरक्षण प्रावधानों द्वारा समर्थित किया गया है।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करने वाली कौन-सी बाधाएँ हैं? 

  • संस्थागत और संरचनात्मक बाधाएँ: राजनीतिक दल प्रमुख द्वारपाल के रूप में कार्य करते हैं और अक्सर महिलाओं को टिकट देने से मना कर देते हैं, यह तर्क देते हुए कि उनकी ‘जीत की संभावना’ कम है, जबकि तथ्य यह है कि महिला उम्मीदवारों की सफलता दर अक्सर तुलनीय या अधिक होती है।
    • उम्मीदवारों का चयन और पार्टी के निर्णय पुरुष-प्रधान असाधिकारिक नेटवर्क के भीतर होते हैं, जिससे महिलाओं के लिए नेतृत्व पदों तक पहुँच सीमित रह जाती है।
    • निर्वाचित होने पर भी महिलाओं को अक्सर ‘सॉफ्ट मंत्रालय’ (जैसे- महिला एवं बाल विकास, संस्कृति) सौंपा जाता है, जबकि महत्त्वपूर्ण मंत्रालय, जैसे– गृह मंत्रालय या रक्षा मंत्रालय उनके लिये उपलब्ध नहीं होते।
  • आर्थिक बाधाएँ: चुनावी राजनीति अत्यधिक पूंजी-प्रधान होती है, जिससे महिलाओं के लिये नुकसान की स्थिति बनती है, क्योंकि उनके पास सामान्यतः संपत्ति, धन और चुनावी वित्तपोषण तक कम पहुँच होती है।
    • महिलाओं को अक्सर उन राजनीतिक और वित्तीय नेटवर्क से बाहर रखा जाता है जो चुनावी अभियानों के लिये धन और संसाधन मुहैया कराते हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक बाधाएँ: पितृसत्तात्मक मानदंड समाज को सार्वजनिक (पुरुष) और निजी (महिला) क्षेत्रों में बांटते रहते हैं, जिससे महिलाओं को राजनीति में प्रवेश करने से हतोत्साहित किया जाता है।
    • अवैतनिक देखभाल कार्य और घरेलू ज़िम्मेदारियों का बोझ महिलाओं की राजनीतिक गतिविधियों के लिये समय को सीमित कर देता है।
    • कुछ मामलों में प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व देखा जाता है (जैसे– ‘सरपंच पति’ संस्कृति), जहाँ पुरुष रिश्तेदार निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों पर प्रभाव या नियंत्रण रखते हैं।
  • प्रतिकूल राजनीतिक वातावरण: राजनीति में हिंसा, डराने-धमकाने और अपराधीकरण की स्थिति महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करती है।
    • महिला राजनेताओं को अक्सर लैंगिक हमलों, चरित्र हनन और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिसमें धमकियाँ और डिजिटल दुर्व्यवहार शामिल हैं। ये कारक राजनीति में सक्रिय भागीदारी के मार्ग में गंभीर मनोवैज्ञानिक बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।
  • क्षमता और नेतृत्व पथ का अभाव: महिलाओं को अक्सर छात्र संघों और कार्यकर्त्ता नेटवर्कों जैसे पारंपरिक राजनीतिक नेतृत्व पथ से बाहर रखा जाता है। मेंटरशिप (मार्गदर्शन) तथा नेतृत्व प्रशिक्षण की कमी उनकी राजनीतिक क्षमता को सीमित करती है, जिससे कभी-कभी शासन में पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भरता (जैसे– 'प्रधान पति' संस्कृति) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • चुनावी प्रणाली और वर्तमान पदधारक की बाधाएँ: फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) चुनावी प्रणाली पार्टियों को “सुरक्षित” उम्मीदवार उतारने के लिये प्रोत्साहित करती है, जो आमतौर पर मज़बूत स्थानीय नेटवर्क वाले पुरुष वर्तमान पदधारक होते हैं।
    • चूँकि अधिकांश सीटें पहले से ही पुरुषों के पास हैं, इसलिये वर्तमान पदधारक का लाभ नए प्रवेशकों के अवसरों को और सीमित कर देता है, जिससे महिलाओं के लिये चुनाव लड़ने और जीतने के अवसर असमान रूप से प्रभावित होते हैं।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने हेतु भारत की क्या पहलें हैं?

  • स्थानीय शासन के लिये संवैधानिक प्रावधान: 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) ने पंचायत राज संस्थाओं (PRIs) और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण अनिवार्य किया।
    • बीस से अधिक राज्यों (जैसे– बिहार, मध्य प्रदेश, केरल और गुजरात) ने इस आरक्षण को 50% तक बढ़ा दिया है।
    • इसके परिणामस्वरूप भारत में अब स्थानीय स्तर पर 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं।
  • नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023: संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण प्रदान करता है।
    • कार्यान्वयन जनगणना 2027 और परिसीमन के बाद शुरू होगा तथा यह प्रावधान 15 वर्षों तक लागू रहेगा।
  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की पहलें: SVEEP (सिस्टमैटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन) कार्यक्रम जागरूकता बढ़ाने और लक्षित अभियानों के माध्यम से महिलाओं के मतदान प्रतिशत को बढ़ाने के लिये काम करता है।
    • “सखी” या पिंक मतदान केंद्र पूरी तरह महिलाओं द्वारा संचालित होते हैं, ताकि मतदान के दौरान एक सुरक्षित और आरामदायक वातावरण सुनिश्चित किया जा सके।
    • विशेष मतदाता पंजीकरण अभियान पहली बार मतदान करने वाली महिलाओं और विवाह के बाद स्थानांतरित होने वाली महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
  • क्षमता निर्माण और नेतृत्व प्रशिक्षण: पंचायती राज मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
    • ये कार्यक्रम शासन, वित्तीय प्रबंधन और विधायी प्रक्रियाओं में कौशल विकसित करते हैं।
  • राजनीतिक दल स्तर की पहलें: कुछ पार्टियों ने स्वेच्छा से उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई है।
    • उदाहरण के लिये, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजू जनता दल (BJD) जैसी पार्टियों ने चुनावों में महिलाओं को 33% या उससे अधिक टिकट आवंटित किये हैं।
  • स्व-सहायता समूहों (SHGs) की भूमिका: आजीविका मिशन के तहत महिला स्व-सहायता समूह नेतृत्व विकास के प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करते हैं।
    • SHGs में भागीदारी महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक बोलने की क्षमता और सामूहिक निर्णय लेने के कौशल को सुधारती है, जिससे वे स्थानीय राजनीति में प्रवेश करने के लिये प्रोत्साहित होती हैं।

महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को कौन-से उपाय मज़बूत कर सकते हैं?

  • 1951 के प्रतिनिधित्व कानून (RPA) में कानूनी संशोधन: राजनीतिक दलों का पंजीकरण और मान्यता महिलाओं के लिये लागू किये जाने योग्य यह आंतरिक पार्टी आरक्षण के पालन के लिये कठोर रूप से बाध्य होगा।
    • पार्टियों को अपने संगठनात्मक पदों (संसदीय बोर्ड, केंद्रीय चुनाव समितियाँ) में से कम-से-कम 33% पद महिलाओं के लिये आवंटित करने होंगे।
    • चुनावी भ्रष्टाचार की कानूनी परिभाषा को अद्यतन किया जाना अनिवार्य है। महिला उम्मीदवारों के चरित्र हनन, लैंगिक-लक्षित डीपफेक की तैनाती और हथियारबंद डिजिटल स्त्री-द्वेष को स्पष्ट रूप से 'भ्रष्ट आचरण' के रूप में संहिताबद्ध किया जाना चाहिये, जिसके परिणामस्वरूप दोषी उम्मीदवार को तत्काल अयोग्य घोषित करने का प्रावधान हो।
  • द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों का पुनरुद्धार: भारत ने वर्ष 1952 और 1957 के चुनावों में द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों का सफलतापूर्वक उपयोग किया था।
    • एकल-सदस्यीय आरक्षित सीटों को बारी-बारी से बदलने के बजाय, कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्र दो प्रतिनिधियों को चुन सकते हैं—एक पुरुष और एक महिला।
      • यह पार्टियों को प्रत्येक क्षेत्र में महिला नेतृत्व को विकसित करने के लिये मजबूर करता है, बिना पुरुष नेताओं को विस्थापित किये।
  • सटीक वित्तीय इंजीनियरिंग: निर्वाचन आयोग लैंगिक आधार पर चुनावी खर्च की सीमा में संशोधन कर सकता है।
    • चुनावी ट्रस्टों और कॉर्पोरेट दानदाताओं को बढ़े हुए कर में छूट दी जा सकती है यदि उनका दान विशेष रूप से महिला उम्मीदवारों या महिला राजनेताओं के लिये क्षमता निर्माण कार्यक्रम हेतु निर्धारित किया गया हो।
  • "प्रॉक्सी" (सरपंच पति) घटना का कानूनी रूप से समापन: ग्राम पंचायत निधियों के लिये आधार-लिंक्ड बायोमेट्रिक प्राधिकरण को अनिवार्य करके ज़मीनी स्तर पर प्रतिनिधित्व को मज़बूत किया जा सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि केवल निर्वाचित महिला प्रतिनिधि ही वित्तीय नियंत्रण का प्रयोग करे, जिससे पुरुष रिश्तेदारों द्वारा प्रॉक्सी शासन को रोका जा सके।
  • शैडो कैबिनेट को औपचारिक रूप देना: विपक्ष को "शेडो कैबिनेट" सिस्टम (UK) को संस्थागत बनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
    • टॉप शैडो डिपार्टमेंट में महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य बनाने से उन्हें सदन में वित्त और रक्षा पर बहस करने का मौका मिलता है, जिससे गंभीर प्रशासक के रूप में उनकी दृश्यता और सार्वजनिक विश्वसनीयता बढ़ती है।

निष्कर्ष

भारत में महिलाएँ मूक मतदाता होने की तुलना में सक्रिय राजनीतिक भागीदार बन गई हैं, जो ज़मीनी स्तर के लोकतंत्र की मज़बूती को दर्शाता है। हालाँकि वास्तविक प्रगति के लिये केवल मतदान की तुलना में अधिक प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की शक्ति की आवश्यकता है। इसके लिये नारी शक्ति वंदन अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन, पार्टी-स्तरीय सुधारों और संरचनात्मक एवं पितृसत्तात्मक बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता है, जिससे महिलाओं का नेतृत्व समावेशी शासन और एक विकसित भारत के लिये आवश्यक हो जाता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत में महिलाएँ पुरुषों को समान या उनसे भी अधिक संख्या में मतदान करती हैं, फिर भी विधायिकाओं में उनका प्रतिनिधित्व कम बना हुआ है। इस विरोधाभास के पीछे के कारणों की विवेचना कीजिये।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की वर्तमान स्थिति क्या है?
18वीं लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 13.6% है, उनकी भागीदारी मतदाताओं में कम है और यह वैश्विक औसत से काफी पीछे है।

2. नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 क्या है?
यह परिसीमन के बाद लागू होने वाली लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण प्रदान करता है।

3. संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों ने महिलाओं की किस प्रकार मदद की है?
इसमें पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में न्यूनतम 33% आरक्षण अनिवार्य किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप ज़मीनी स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व 44% से अधिक हो गया है।

4. महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में प्रमुख बाधाएँ क्या हैं?
प्रमुख बाधाओं में पितृसत्ता, पार्टी टिकटों की कमी, वित्तीय बाधाएँ, अवैतनिक देखभाल संबंधी कार्य और राजनीतिक हिंसा शामिल हैं।

5. महिलाओं की मतदान भागीदारी अधिक होने के बावज़ूद प्रतिनिधित्व कम क्यों है?
सीमित पार्टी नामांकन, ढाँचागत असमानताओं और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं के कारण भागीदारी सत्ता में तब्दील नहीं होती।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में महिलाओं के समक्ष समय और स्थान संबंधित निरंतर चुनौतियाँ क्या हैं? (2019)

प्रश्न 2. विविधता, समता और समावेशिता सुनिश्चित करने के लिये उच्चतर न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की वांछनीयता पर चर्चा कीजिये। (2021)

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