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पंजाब-राजस्थान जल विवाद

  • 26 Mar 2026
  • 103 min read

प्रिलिम्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय जल विवाद, सिंचाई, जलविद्युत, सतलुज नदी, सिंधु जल संधि, 1960, सर्वोच्च न्यायालय, धान, गन्ना, अंतर्राष्ट्रीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, अनुच्छेद 21, अधिकरण, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग।                         

मेन्स के लिये: पंजाब-राजस्थान जल बँटवारा विवाद से संबंधित प्रमुख तथ्य, अंतर्राष्ट्रीय जल विवादों में वृद्धि के कारण, अंतर-राज्यीय जल विवादों से संबंधित समाधान एवं प्रावधान और आगे की राह।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

पंजाब के मुख्यमंत्री ने एक औपनिवेशिक काल के राजकोषीय समझौते और राज्य के गंभीर भूजल संकट का हवाला देते हुए राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की मांग की है। यह मांग वर्ष 1960 से राज्य द्वारा उपयोग किये गए 18,000 क्यूसेक जल के लिये की गई है, जिसने एक पुराने अंतर-राज्यीय जल विवाद को फिर से चर्चा में ला दिया है।

सारांश

  • भारत में बढ़ते जल संकट के संदर्भ में पंजाब और राजस्थान के बीच का यह विवाद 'रिपरियन प्रिंसिपल' और पुराने त्रिपक्षीय समझौतों के बीच एक गहरे टकराव को दर्शाता है।
  • अनुच्छेद 262 जैसे संवैधानिक प्रावधान न्यायाधिकरणों के माध्यम से न्यायनिर्णयन  की अपेक्षा करते हैं। हालाँकि, राजनीतिक और कृषि संबंधी मांगें अक्सर इस प्रक्रिया में बाधा डालती हैं, जिससे "संघर्षपूर्ण संघवाद" की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • भविष्य में इस समस्या का समाधान डिजिटल ट्विंस तकनीक और लाभ-साझाकरण मॉडल की ओर बदलाव में निहित है।

पंजाब-राजस्थान जल बँटवारा विवाद से संबंधित प्रमुख बिंदु क्या हैं?

  • ऐतिहासिक आधार (1920 के दशक का समझौता): यह विवाद बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह और ब्रिटिश शासन के अधीन अविभाजित पंजाब के बीच सतलुज नदी से गंग (बीकानेर) नहरों के माध्यम से जल प्राप्त करने के लिये हुए एक वाणिज्यिक समझौते से संबंधित है। रॉयल्टी का भुगतान लगभग वर्ष 1960 तक जारी रहा।
  • सिंधु जल संधि (1960) में बदलाव: सिंधु जल संधि, 1960 ने भारत को पूर्वी नदियों (सतलुज, ब्यास, रावी) पर  "अप्रतिबंधित उपयोग" के लिये नियंत्रण प्रदान किया, जिससे आंतरिक पुनर्वितरण संभव हो सका। 
    • वर्ष 1960 के बाद जल बँटवारे को एक व्यावसायिक (भुगतान-आधारित) व्यवस्था के बजाय अंतर-राज्यीय आवंटन के रूप में देखा जाने लगा। परिणामस्वरूप, राजस्थान ने भुगतान करना बंद कर दिया।
  • त्रिपक्षीय समझौता (1981): यह समझौता तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समर्थन से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच हस्ताक्षरित किया गया था।
    • इसमें राजस्थान को 8.6 मिलियन एकड़ फीट (कुल 17.17 मिलियन एकड़ फीट में से) आवंटित किया गया था, जो कि सबसे बड़ा हिस्सा था। यह आवंटन इस तथ्य के बावजूद किया गया था कि राजस्थान एक गैर-तटीय राज्य है और इसने इंदिरा गांधी नहर के विस्तार का समर्थन किया।
  • पंजाब समझौता समाप्ति अधिनियम, 2004: पंजाब ने जल बँटवारे के समझौतों को समाप्त करने के उद्देश्य से पंजाब समझौता समाप्ति अधिनियम, 2004 लागू किया, लेकिन इसने मौजूदा उपयोग की रक्षा की, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि राजस्थान को चल रही आपूर्ति बाधित न हो। 
    • वर्ष 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि कोई भी राज्य एकतरफा रूप से अंतर-राज्यीय समझौतों को समाप्त नहीं कर सकता है, जिससे प्रभावी रूप से पहले के कानूनी ढाँचे को बहाल कर दिया गया।
  • पंजाब का नवीनतम नदी तट संबंधी दावा: पंजाब ने एक नया नदी तट संबंधी दावा पेश किया है, जिसमें नदी तट संबंधी सिद्धांत का उल्लेख किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, जिन राज्यों से होकर नदियाँ प्रवाहित होती हैं, उन्हें जल पर प्राथमिक अधिकार प्राप्त होता है। इस दावे के तहत पंजाब का मानना है कि राजस्थान को सबसे बड़ा हिस्सा मिलना अनुचित है। इसका कारण यह है कि राजस्थान नदी तट से संबंधित राज्य नहीं है (यह रावी, ब्यास या सतलुज के बेसिन में नहीं आता है), खासकर वर्तमान जल संकट को देखते हुए।

अंतर-राज्यीय जल बँटवारे से संबंधित प्रावधान

  • संवैधानिक प्रावधान:
    • राज्य सूची (प्रविष्टि 17): जल मुख्यतः राज्य का विषय है। इसमें जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी, तटबंध, जल भंडारण और जल विद्युत जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
    • संघ सूची (प्रविष्टि 56): केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के नियंत्रण तथा विकास का अधिकार है, जब संसद इसे जनहित में आवश्यक रूप में घोषित करे।
    • समवर्ती सूची (प्रविष्टि 32): यह अंतर्देशीय जलमार्गों पर यांत्रिक जहाज़ों के संचालन, नौवहन और उनसे जुड़े मार्ग-नियमों से संबंधित है।
    • अनुच्छेद 262: यह संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के समाधान का अधिकार देता है। साथ ही यह संसद को ऐसे मामलों में भारत का सर्वोच्च न्यायालय और अन्य न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को सीमित या समाप्त करने की अनुमति भी प्रदान करता है।
  • वैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 262 के अधिकार के तहत संसद ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (ISWD) अधिनियम, 1956 पारित किया।
    • यदि किसी राज्य सरकार को लगता है कि जल विवाद उत्पन्न हो गया है और इसे बातचीत के माध्यम से सुलझाया नहीं जा सकता, तो वह केंद्र सरकार से अनुरोध कर सकती है कि मामले को एक ट्रिब्यूनल (जिसे 2002 के संशोधन के अनुसार अनुरोध के एक वर्ष के भीतर गठित किया जाना चाहिये) को भेजा जाए।
    • ट्रिब्यूनल का निर्णय (अवार्ड), एक बार आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित हो जाने पर, भारत के  सर्वोच्च न्यायालय के आदेश या डिक्री के समान प्रभाव रखता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:
    • कर्नाटक राज्य बनाम तमिलनाडु राज्य (2018): इस ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कर्नाटक के पानी छोड़ने के दायित्व को कम किया, बंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को मान्यता दी और कावेरी नदी को एक ‘राष्ट्रीय संपत्ति’ घोषित किया।
    • पंजाब जल समझौता निरस्तीकरण अधिनियम, 2004 (2016): यह एक राष्ट्रपति संदर्भ का मामला था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने पंजाब के उस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसने एकतरफा तरीके से सभी जल बँटवारा समझौतों को रद्द कर दिया था।
    • तमिलनाडु राज्य बनाम केरल राज्य (2014): इस महत्त्वपूर्ण मामले में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केरल सिंचाई और जल संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006 को रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से केरल ने मुल्लापेरियार बांध के जल स्तर को सीमित करने की कोशिश की थी। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि केरल ‘सुरक्षा कानून’ की आड़ में न्यायिक आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
    • नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2000): यह मामला मुख्य रूप से सरदार सरोवर बांध के निर्माण और विस्थापितों के पुनर्वास (R&R) से संबंधित था। इसमें सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने स्पष्ट किया कि नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) का निर्णय अंतिम तथा बाध्यकारी है।

Inter_State_Water_Disputes

अंतर-राज्यीय जल विवादों के बढ़ने के क्या कारण हैं?

  • जल की बढ़ती कमी: तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण के कारण जल की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जैसे-जैसे प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटती जा रही है, राज्य अपने हिस्से के पानी को लेकर अधिक सतर्क और संरक्षणवादी हो रहे हैं, जिससे शून्य-योग (zero-sum) जैसी मानसिकता विकसित हो रही है।
    • उदाहरण: भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1950 के लगभग 5,200 घन मीटर (जल-समृद्ध स्थिति) से घटकर वर्ष 2024 में लगभग 1,400–1,500 घन मीटर (जल-संकटग्रस्त स्थिति) तक पहुँच गई है। वर्ष 2050 तक इसके लगभग 1,191 घन मीटर तक गिरने का अनुमान है, जो 1,000 घन मीटर के जल-अभाव की खतरनाक सीमा के करीब है।
  • कृषि गहनता: जल-गहन फसलों (जैसे– पंजाब में धान या महाराष्ट्र में गन्ना) की ओर बढ़ते रुझान ने भूजल के स्तर को गंभीर रूप से घटा दिया है। पंजाब में पानी की मांग अत्यधिक जल तनाव के कारण है, भारत में भूजल दोहन की दर पंजाब में सबसे अधिक (156.36%) है, जो राष्ट्रीय औसत (60.63%) से काफी ज़्यादा है।
  • क्षेत्राधिकार संबंधी संघर्ष: जल मुख्य रूप से एक राज्य का विषय (राज्य सूची की प्रविष्टि 17) है, जबकि अंतर-राज्यीय नदियाँ केंद्र के कार्यक्षेत्र (संघ सूची की प्रविष्टि 56) में आती हैं। अधिकारों का यह विभाजन और राज्यों द्वारा अपनी स्वायत्तता पर अत्यधिक बल देना अक्सर ‘संघर्षपूर्ण संघवाद’ का कारण बनता है, जहाँ राज्य पूरे नदी बेसिन के सहकारी प्रबंधन के बजाय अपने निजी हितों को प्राथमिकता देते हैं।
  • राजनीतीकरण और जल-राजनीति: जल के मुद्दे अक्सर चुनावी राजनीति, क्षेत्रीय पहचान तथा वोट-बैंक की गणनाओं में उलझ जाते हैं। राज्य अपनी घरेलू जनता को लुभाने के लिये कठोर रुख अपना सकते हैं या एकतरफा कार्रवाई कर सकते हैं, जिससे आपसी बातचीत से होने वाले समझौतों में देरी होती है।
  • तटवर्ती बनाम गैर-तटवर्ती विवाद: ऊपरी तटवर्ती राज्य (जहाँ से नदी का उद्गम होता है) अक्सर अपने विकास के लिये पानी के उपयोग के प्राथमिक अधिकारों का दावा करते हैं। इसके विपरीत निचले तटवर्ती राज्य ऐतिहासिक उपयोग और अपनी आवश्यकताओं के आधार पर अधिकारों का दावा करते हैं। उदाहरणतः पंजाब तथा राजस्थान के बीच अंतर-राज्यीय जल विवाद इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
  • न्यायाधिकरणों की अक्षमता: 'अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956' के तहत गठित अधिकरणों की अक्सर अत्यधिक देरी के लिये आलोचना की जाती है। कावेरी जल विवाद जैसे कुछ मामले 30 वर्षों से अधिक समय तक चले हैं और इस लंबी अवधि में राजनीतिक तथा पर्यावरणीय स्थितियाँ पूरी तरह बदल जाती हैं, जिससे अंतिम ‘पुरस्कार’ को लागू करना अत्यंत कठिन हो जाता है।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?

  • जल-वितरण के बजाय लाभ-साझाकरण की ओर परिवर्तन: पारंपरिक विवाद जल की मात्रा (कितने क्यूसेक पानी) के बँटवारे पर केंद्रित होते हैं। एक अधिक नवोन्मेषी दृष्टिकोण नदी से प्राप्त सामूहिक लाभों पर केंद्रित होता है।
    • उदाहरणार्थ, राज्य अपने-अपने कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुरूप फसलों में विशेषज्ञता विकसित कर परस्पर सहयोग कर सकते हैं। जल-अधिशेष वाले राज्य जल-अभाव वाले राज्यों के लिये जल-गहन फसलों का उत्पादन कर सकते हैं तथा इसके बदले संबंधित राज्य औद्योगिक या ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग प्रदान कर सकते हैं।
  • नदी बेसिन के डिजिटल ट्विन: उपग्रह चित्रों (जैसे– RISAT) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर पूरे नदी बेसिन का हाई-रिज़ॉल्यूशन 3D डिजिटल मॉडल तैयार किया जा सकता है। इसके माध्यम से “क्या हो यदि” (What-If) प्रकार के सिमुलेशन संभव होते हैं, जिनसे यह वस्तुनिष्ठ आकलन किया जा सकता है कि कोई नया बांध निर्माण या सूखे का वर्ष सभी तटीय राज्यों को किस प्रकार प्रभावित करेगा।
  • संस्थागत एवं विधिक नवाचार: तदर्थ अधिकरणों से हटकर एक स्थायी एकल अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिकरण की ओर अग्रसर होना चाहिये, जिसमें विशेषज्ञ पीठें हों, जैसा कि अतंर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2019 में प्रस्तावित है, ताकि संस्थागत स्मृति और कार्यवाही की गति सुनिश्चित की जा सके।
    • किसी भी विधिक निर्णय से पहले तटस्थ विशेषज्ञों से युक्त DRC के माध्यम से ‘मध्यस्थता-प्रथम’ (मीडिएशन-फर्स्ट) दृष्टिकोण को अनिवार्य किया जाए। इससे विवाद की प्रतिद्वंद्वी प्रकृति कम होती है।
  • मांग-पक्ष प्रबंधन एवं पारिस्थितिक अखंडता: प्रत्येक राज्य के लिये ‘जल बजट’ लागू किया जाए, जिसमें उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि वे नदी में अधिक हिस्सेदारी मांगने से पहले कुशल तकनीकों (जैसे– ड्रिप सिंचाई या मल्चिंग) का उपयोग कर रहे हैं।
    • नदी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिये जल का एक अनिवार्य प्रतिशत नदी में ही बना रहना चाहिये, जिससे ‘बेसिन क्लोज़र’ की स्थिति को रोका जा सके, जहाँ पानी समुद्र तक नहीं पहुँच पाता।
  • सहकारी संघवाद: संयुक्त परियोजनाओं के लिये द्विपक्षीय या बहु-राज्य समझौतों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जैसे– नहरों का लिंकिंग या साझा जल भंडारण ताकि संभावित विवादों को सहयोगात्मक अवसरों में परिवर्तित किया जा सके। उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों को ‘ब्लू ग्रांट्स’ या अतिरिक्त केंद्रीय वित्तपोषण प्रदान किया जा सकता है।

निष्कर्ष

पंजाब-राजस्थान विवाद यह संकेत करता है कि जल-संकट से प्रभावित भारत में संघर्ष अब केवल ‘जल-साझाकरण’ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह “जीवन-साझाकरण” का रूप ले चुका है। ऐसे विवादों का समाधान केवल ऐतिहासिक तटीय दावों पर आधारित होकर संभव नहीं है, इसके लिये बेसिन-स्तरीय प्रबंधन की आवश्यकता है, जिसमें सहकारी संघवाद और डिजिटल ट्विन जैसे तकनीकी साधनों का उपयोग करके पारिस्थितिक संतुलन और राष्ट्रीय जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: अंतर-राज्यीय जल विवादों के निदान हेतु संवैधानिक और कानूनी तंत्र पर चर्चा कीजिये। उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. पंजाब का राजस्थान के विरुद्ध जल विवाद में मूल कानूनी आधार क्या है?
पंजाब ने रिपेरियन (संगम) सिद्धांत और औपनिवेशिक युग के एक वाणिज्यिक समझौते का उल्लेख करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया है कि राजस्थान एक गैर-रिपेरियन राज्य होने के नाते, सतलज जल (Sutleut waters) से सबसे बड़ा आवंटन प्राप्त करने का स्वाभाविक अधिकार नहीं रखता।

2. जल विवादों से संबंधित कौन-सा संवैधानिक प्रावधान है?
अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा करने का अधिकार प्रदान करता है और इस प्रकार उच्च न्यायालय की क्षेत्राधिकारता को समाप्त कर देता है।

3. रिपेरियन सिद्धांत क्या है?
यह उन राज्यों को नदी के जल पर प्राथमिक अधिकार देता है जिनके माध्यम से नदी प्राकृतिक रूप से प्रवाहित होती है।

4. अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की भूमिका क्या है?
उत्तर: यह विवादों के निपटारे के लिये अधिकरण-आधारित न्याय सुनिश्चित करता है, जिनके पुरस्कारों का कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रभाव होता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  (PYQ) 

मेन्स 

प्रश्न. अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान करने से संबंधित सांविधिक प्रक्रियाएँ समस्याओं को संबोधित करने व हल करने असफल रही हैं। क्या यह असफलता संरचनात्मक अथवा प्रक्रियात्मक अपर्याप्तता अथवा दोनों के कारण हुई है? चर्चा कीजिये। (2013)

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