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एग्री-फोटोवोल्टिक्स

  • 25 Mar 2026
  • 85 min read

प्रिलिम्स के लिये: PM-कुसुम योजना, एग्री-फोटोवोल्टिक्स, नेट-ज़ीरो उत्सर्जन, किसान उत्पादक संगठन, कृषि विज्ञान केंद्र

मेन्स के लिये: ऊर्जा सुरक्षा बनाम खाद्य सुरक्षा पर बहस (भोजन बनाम ईंधन की दुविधा), सतत कृषि में नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका, PM-कुसुम योजना और विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जाकरण।

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय बजट 2026–27 में PM-कुसुम योजना के लिये आवंटन को लगभग दोगुना करके 5,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो किसान-केंद्रित सौरकरण को बढ़ावा देने पर नए सिरे से ज़ोर को दर्शाता है। इस संदर्भ में एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) भारत में ऊर्जा विस्तार और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के समाधान के रूप में ध्यान आकर्षित कर रहा है।

सारांश

  • एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) ‘खाद्य बनाम ईंधन’ के संघर्ष को हल करता है, क्योंकि यह एक साथ सौर ऊर्जा उत्पादन तथा फसल खेती को संभव बनाता है, जिससे भारत के 300 गीगावाट सौर लक्ष्य एवं ग्रामीण आय वृद्धि को समर्थन मिलता है।
  • हालाँकि इसके बड़े पैमाने पर अपनाने के लिये नीतिगत स्पष्टता, वित्तीय सहायता और क्षेत्र-विशिष्ट डिज़ाइन की आवश्यकता है, क्योंकि उच्च लागत, नियामक खामियाँ तथा उत्पादन जोखिम जैसी विद्यमान चुनौतियाँ अभी भी इसके मार्ग में प्रमुख बाधाएँ बनी हुई हैं।

एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) क्या है?  

  • परिचय: एग्री-फोटोवोल्टाइक्स (AgriPV) भूमि के एक ही हिस्से पर सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि उत्पादकता के मध्य 'सह-अस्तित्व' सुनिश्चित करने वाली एक एकीकृत तकनीक है। यह मॉडल सौर पैनलों और फसलों के बीच संसाधनों के अनुकूलन पर आधारित है। भूमि के एक ही हिस्से पर सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि उत्पादकता के मध्य 'सह-अस्तित्व' सुनिश्चित करने वाली एक एकीकृत तकनीक है। यह मॉडल सौर पैनलों और फसलों के बीच संसाधनों के अनुकूलन पर आधारित है।
  • तंत्र: पारंपरिक सौर पार्क स्थापित करने के लिये कृषि भूमि खाली करने की बजाय सौर पैनलों को सीधे खेती के साथ समन्वित किया जाता है।
    • इन्हें या तो फसलों के ऊपर ऊँचाई पर लगाया जाता है या उनके बीच रणनीतिक रूप से दूरी बनाकर स्थापित किया जाता है।
    • यह एक पारस्परिक रूप से लाभकारी सूक्ष्म जलवायु बनाता है। सौर पैनल आंशिक छाया प्रदान करते हैं, जिससे फसलें अत्यधिक गर्मी से सुरक्षित रहती हैं और जल की हानि कम होती है। 
      • इसके प्रतिफल के रूप में, पौधों की प्राकृतिक वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया सौर पैनलों के निचले हिस्से को शीतलता प्रदान करती है। यह तापीय शमन उनकी फोटोवोल्टिक दक्षता (PV Efficiency) में गुणात्मक वृद्धि करने में सहायक सिद्ध होता है।"
  • एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) प्रणालियों के प्रकार: AgriPV प्रणाली का डिज़ाइन स्थानीय जलवायु, फसल के प्रकार और सिंचाई पद्धतियों पर अत्यधिक निर्भर करता है।
    • उच्च-स्थापित प्रणाली: पैनलों को ऊँची संरचनाओं पर लगाया जाता है ताकि फसलें सीधे उनके नीचे उग सकें और भारी कृषि मशीनरी (जैसे– ट्रैक्टर) आसानी से काम कर सके।
    • पंक्ति-आधारित प्रणाली: सौर पैनलों को पंक्तियों में इस प्रकार स्थापित किया जाता है कि उनके बीच पर्याप्त चौड़ा अंतर बना रहे।
      • सूर्य-प्रेमी फसलों को पैनलों के बीच के खाली स्थानों (Gaps) में लगाया जाता है, जबकि छाया-सहिष्णु फसलों को सीधे पैनलों के नीचे उगाया जा सकता है।
    • ऊर्ध्वाधर प्रणाली: सौर पैनलों को सीधा (बाड़ जैसी संरचना में) स्थापित किया जाता है और वे दोनों तरफ से सूर्य के प्रकाश को ग्रहण करने के लिये बाइफेशियल तकनीक का उपयोग करते हैं।
    • ग्रीनहाउस-समेकित प्रणाली: सौर पैनलों को नियंत्रित वातावरण वाले ग्रीनहाउस की छतों या दीवारों में सीधे शामिल किया जाता है।
  • एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) के लिये उपयुक्त फसलें: फसल का चयन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि छाया-सहिष्णु फसलें पैनलों के नीचे अच्छी तरह बढ़ती हैं, जबकि अधिक धूप की आवश्यकता वाली फसलें पैनलों की पंक्तियों के बीच बेहतर प्रदर्शन करती हैं।
    • उपयुक्त फसलें क्षेत्र के अनुसार भिन्न होती हैं, जैसे– मध्य प्रदेश में टमाटर, प्याज़, हल्दी, तुलसी तथा कर्नाटक और महाराष्ट्र में रागी, ज्वार, अंगूर, केला, बैंगन उगाए जाते हैं। इसलिये जलवायु और सिंचाई के आधार पर क्षेत्र-विशिष्ट योजना बनाना आवश्यक है।
  • AgriPV के लाभ:
    • आय विविधीकरण: किसानों को एक भरोसेमंद अतिरिक्त आय स्रोत मिलता है। वे डीज़ल पंपों के स्थान पर सौर ऊर्जा का उपयोग करके खर्च बचाते हैं और अतिरिक्त बिजली को ग्रिड (DISCOMs) को बेच सकते हैं।
    • जल संरक्षण: सौर पैनलों की छाया वाष्पोत्सर्जन (मिट्टी और पौधों से होने वाली जल हानि) को काफी हद तक कम कर देती है।
      • इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे जल उपयोग दक्षता में काफी सुधार होता है, खासकर राजस्थान और गुजरात जैसे शुष्क क्षेत्रों में।
    • मौसम से सुरक्षा: सौर पैनल एक भौतिक अवरोध के रूप में कार्य करते हैं, जो नाज़ुक फसलों को अत्यधिक गर्मी की लहरों, भारी वर्षा और ओलावृष्टि से बचाते हैं।
    • ग्रामीण मूल्य शृंखलाओं को सुदृढ़ करना: उत्पन्न विकेंद्रीकृत बिजली का उपयोग स्थानीय सहायक सेवाओं, जैसे– कोल्ड स्टोरेज इकाइयों, चारा काटने की मशीनों और सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को चलाने में किया जा सकता है।
  • व्यवसाय मॉडल: एग्री-फोटोवोल्टिक्स कई मॉडलों के माध्यम से संचालित हो सकता है, जिसमें किसान का स्वामित्व (स्वयं-उपयोग और अधिशेष ऊर्जा की बिक्री) और सहकारी/किसान उत्पादक संगठन-आधारित एग्रीगेशन शामिल है, जो बड़े, वित्त-अनुकूल परियोजनाओं के लिये है।
    • इसमें डेवलपर के साथ निजी पट्टे या राजस्व-साझाकरण और ग्रामीण ऊर्जा आवश्यकताओं का समर्थन करने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व वाला विकास भी शामिल है।
  • भारत में वर्तमान स्थिति: वर्ष 2026 तक देश भर में लगभग 50 पायलट AgriPV इंस्टाल हुए हैं (जैसे– जोधपुर में ICAR-CAZRI द्वारा), जो विभिन्न फसल-पैनल संयोजनों का मूल्यांकन कर रही हैं। हालाँकि अभी बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक प्रतिकृति की शुरुआत नहीं हुई है।
    • सरकारी परामर्शकर्त्ता PM-कुसुम 2.0 के तहत एक प्रस्तावित 'नेशनल एग्री-फोटोवोल्टिक्स मिशन' में AgriPV को एकीकृत करने का सुझाव देते हैं, संभावित रूप से 10-GW के समर्पित घटक के रूप में।
  • भारत के लिये महत्त्व:
    • "खाद्य बनाम ईंधन" की दुविधा: भारत ने वर्ष 2030 तक 300 GW स्थापित सौर क्षमता और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने के महत्त्वाकांक्षी ऊर्जा लक्ष्य निर्धारित किये हैं।
      • उपयोगिता-स्तरीय सौर परियोजनाओं के लिये भूमि के विशाल क्षेत्रों की आवश्यकता होती है। भारत की 50% से अधिक भूमि कृषि के लिये समर्पित होने के कारण AgriPV स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के बीच खतरनाक व्यापार-संतुलन को रोकता है।
    • कृषि अर्थव्यवस्था: कृषि पर निर्भर विशाल ग्रामीण आबादी के साथ AgriPV कृषि के आधुनिकीकरण का एक मार्ग प्रदान करता है, जिससे खेत राष्ट्रीय ग्रिड में योगदान करते हुए ऊर्जा में आत्मनिर्भर बन जाते हैं।
    • राष्ट्रीय मिशनों के साथ संरेखण: यह प्रत्यक्ष रूप से PM-कुसुम योजना को पूरक बनाता है, जिसका उद्देश्य भारतीय कृषि को सोलराइज़ करना, कृषि क्षेत्र को डीकार्बोनाइज़ करना और किसानों की आय को दोगुना करना है।

एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) को अपनाने में क्या बाधाएँ हैं?

  • उच्च पूंजीगत लागत: AgriPV के लिये आवश्यक विशिष्ट माउंटिंग सिस्टम और ऊँची संरचनात्मक स्टील पारंपरिक भूमि-आधारित सोलर फार्मों की तुलना में प्रारंभिक निवेश को काफी अधिक बनाते हैं।
  • उपज संबंधी जोखिम: इनकरेक्ट पैनल-क्रॉप कॉम्बिनेशन वाली खराब डिज़ाइन की गई प्रणालियाँ कृषि उपज में कमी ला सकती हैं।
  • नियामक संबंधी बाधाएँ: दोहरे उपयोग वाली भूमियों के लिये भूमि वर्गीकरण, ग्रिड कनेक्टिविटी और टैरिफ के संबंध में स्पष्ट नियामक ढाँचे का अभाव है।
  • स्वामित्व संबंधी अनिश्चितता: किसानों और डेवलपर्स के बीच दीर्घकालिक भूमि अधिकारों और राजस्व-साझाकरण समझौतों पर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
  • डेटा की कमी: वर्तमान में देश भर में लगभग 50 पायलट इंस्टालेशन सक्रिय होने के कारण भारत के विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अनुभवजन्य डेटा का अभाव है।
  • रखरखाव संबंधी मुद्दे: सौर पैनलों की सफाई के लिये जल की आवश्यकता होती है। यदि ठीक से प्रबंधन न किया जाए, तो अपवाह (जिसमें धूल या सफाई एजेंट हो सकते हैं) मृदा स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है या फसलों में पानी भर सकता है।`````````````````````````````````````````````````````२२२१२`

एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • लक्षित अनुसंधान एवं विकास और मानचित्रण: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE) जैसे संस्थानों को भारत के विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिये उपयुक्त सर्वोत्तम फसल-पैनल संयोजनों की पहचान करने के लिये सहयोग करना चाहिये।
  • वित्तीय नवाचार: सरकार को AgriPV परियोजनाओं के लिये उच्च संरचनात्मक लागतों की भरपाई के लिये सब्सिडी, व्यवहार्यता अंतर निधि (VGF) और सॉफ्ट लोन शुरू करने की आवश्यकता है।
  • मानक नीतिगत ढाँचा: दोहरे उपयोग वाली कृषि भूमि के लिये विशेष रूप से तकनीकी मानकों (पैनल हाइट, दूरी) और ग्रिड-कनेक्टिविटी मानदंडों को परिभाषित करने के लिये एग्री-फोटोवोल्टिक्स पर एक समर्पित राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है।
  • क्षमता निर्माण: किसानों को दोहरे उद्देश्य वाली भूमि के प्रबंधन पर प्रशिक्षित करने के लिये कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) का उपयोग किया जाना चाहिये, जिसमें छायांकित वातावरण के लिये उपयुक्त आधुनिक ड्रिप सिंचाई और संशोधित कृषि तकनीकें शामिल हैं।
  • राज्य-स्तरीय सुविधा: राज्य सरकारों को उपयुक्त AgriPV क्लस्टरों की पहचान करने, अनुमोदन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और स्पष्ट डिज़ाइन बेंचमार्क स्थापित करने के लिये आगे आना चाहिये।

निष्कर्ष

AgriPV भारत के ऊर्जा संक्रमण को कृषि उत्पादकता के साथ संरेखित करने का एक सतत मार्ग प्रस्तुत करता है। उचित नीतिगत समर्थन और नवाचार के साथ यह किसानों की आय को बढ़ाते हुए और जलवायु एवं भूमि चुनौतियों का समाधान करते हुए खेतों को ऊर्जा-कृषि केंद्रों में बदल सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. ‘एग्री-फोटोवोल्टिक्स भारत में 'भोजन बनाम ईंधन' की दुविधा का एक समाधान प्रस्तुत करता है।’ समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) क्या है?
यह सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि के लिये भूमि का एक साथ दोहरा उपयोग है, जिससे भूमि दक्षता बढ़ती है।

2. भारत में कृषि के सोलराइज़ेशन का समर्थन कौन-सी योजना करती है?
PM-कुसुम योजना, जिसका उद्देश्य विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा, किसानों की आय में वृद्धि और डीकार्बोनाइजेशन है।

3. किसानों के लिये AgriPV का प्रमुख लाभ क्या है?
सतत कृषि के साथ-साथ विद्युत विक्रय के माध्यम से आय विविधीकरण प्रदान करता है।

4. AgriPV अपनाने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
उच्च पूंजी लागत, नियामक अंतराल, उपज अनिश्चितता और डेटा की कमी।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन के संदर्भ में नीचे दिये गए कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. भारत प्रकाश-वोल्टीय इकाइयों में प्रयोग में आने वाले सिलिकॉन वेफर्स का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
  2. सौर ऊर्जा शुल्क का निर्धारण भारतीय सौर ऊर्जा निगम के द्वारा किया जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1   

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों   

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न. भारत में सौर ऊर्जा की प्रचुर संभावनाएँ हैं हालाँकि इसके विकास में क्षेत्रीय भिन्नताएँ हैं। विस्तृत वर्णन कीजिये। (2020)

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