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सामाजिक न्याय

भारत में मासिक धर्म अवकाश

  • 18 Mar 2026
  • 94 min read

प्रिलिम्स के लिये: अनुच्छेद 21, कन्वेंशन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ ऑल फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वूमेन (CEDAW), अनुच्छेद 42, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम, सबला कार्यक्रम

मेन्स के लिये: भारत में लैंगिक समानता और श्रम अधिकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के मुद्दे के रूप में मासिक धर्म स्वास्थ्य, कार्यस्थल पर समानता तथा लैंगिक संवेदनशील नीतियों के मध्य संतुलन

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मासिक धर्म हेतु सवैतनिक अवकाश को एक अनिवार्य विधिक अधिकार बनाना अनपेक्षित रूप से महिलाओं की कॅरियर संभावनाओं एवं रोज़गार अवसरों को प्रभावित कर सकता है। यह टिप्पणी कार्यरत महिलाओं तथा छात्राओं हेतु मासिक धर्म अवकाश पर एक समान राष्ट्रीय नीति की मांग करने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान की गई।

सारांश

  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह चिंता व्यक्त की है कि भुगतान किये जाने वाले मासिक धर्म अवकाश को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना अनजाने में कार्यस्थल पर भेदभाव उत्पन्न कर सकता है और महिलाओं के कॅरियर अवसरों को प्रभावित कर सकता है, जबकि एक समान राष्ट्रीय नीति लागू करने की याचिका पर सुनवाई चल रही थी।
  • इस चर्चा में मासिक धर्म स्वास्थ्य, वैधानिक अधिकारों और कार्यस्थल समानता के बीच संतुलन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया, जिसमें न्यायालय ने अनिवार्य कानून के बजाय स्वैच्छिक नीतियों और सभी हितधारकों से परामर्श को प्राथमिकता दी।

मासिक धर्म अवकाश नीतियों पर सर्वोच्च न्यायालय की क्या टिप्पणियाँ हैं?

  • मासिक धर्म अवकाश (या पीरियड लीव):  यह कार्यस्थल या शैक्षणिक नीतियों को संदर्भित करता है जो कर्मचारियों या छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान दर्द या असुविधा (डिसमेनोरिया) के कारण अवकाश लेने की अनुमति देती हैं।
    • यह अवकाश सवैतनिक या अवैतनिक हो सकता है अथवा मासिक धर्म चक्र के दौरान विश्राम-अवकाश के रूप में भी प्रदान किया जा सकता है।
    • चिकित्सकीय अध्ययनों से यह ज्ञात होता है कि 50% से अधिक महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान प्रत्येक माह में कुछ दिनों तक पीड़ा का अनुभव करना पड़ता है।
      • लगभग 15–25% महिलाओं को मध्यम से गंभीर स्तर की पीड़ा होती है, जो दैनिक उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ: भारत के मुख्य न्यायाधीश ने यह अभिमत व्यक्त किया कि मासिक धर्म अवकाश को एक अनिवार्य विधिक अधिकार बनाना कार्यस्थल पर अनपेक्षित भेदभाव को जन्म दे सकता है।
    • न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि अनिवार्य मासिक धर्म अवकाश, नियोक्ताओं को महिलाओं की नियुक्ति से हतोत्साहित कर सकता है, क्योंकि उन्हें अधिक लागत-प्रधान कार्यबल के रूप में देखा जा सकता है।
    • न्यायालय ने आशंका व्यक्त की कि बार-बार अनुपस्थिति के अनुमान के आधार पर महिलाओं को नेतृत्वकारी भूमिकाओं, पदोन्नति या महत्त्वपूर्ण दायित्वों से वंचित किया जा सकता है।
    • न्यायालय ने अनिवार्य विधिक प्रावधान के स्थान पर राज्यों एवं कंपनियों द्वारा स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश पहल का समर्थन किया।
    • न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी नीति का निर्माण कार्यपालिका तथा विधायिका के अधिकार-क्षेत्र में आता है तथा सरकार को हितधारकों से परामर्श के उपरांत इस विषय का परीक्षण करने की सलाह दी।

मासिक धर्म संबंधी न्यायिक घोषणाएँ

  • शैलेंद्र मणि त्रिपाठी बनाम भारत संघ (2023): सर्वोच्च न्यायालय ने जटिल नीतिगत निहितार्थों का हवाला देते हुए राष्ट्रव्यापी मासिक धर्म अवकाश नीति को अनिवार्य करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्त्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संपर्क करने की सलाह दी। 
    • न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यद्यपि महिला श्रम बल की भागीदारी में पर्याप्त वृद्धि हुई है, जो 2017-18 के 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हो गई है—फिर भी अनौपचारिक और असुरक्षित रोज़गार में लगी कई महिलाएँ कार्यदिवसों की हानि सहन नहीं कर सकती हैं। यह स्थिति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि मुफ्त स्वच्छता उत्पाद और अवकाश प्रावधानों जैसे सहायक उपाय उनके लिये अधिक उपयोगी और व्यावहारिक सिद्ध हो सकते हैं।
    • डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य (2026): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता (MHH) को अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।

मासिक धर्म अवकाश के पक्ष में क्या तर्क हैं?

  • वास्तविक समानता: कार्यस्थल पर वास्तविक समानता स्थापित करने के लिये यह आवश्यक है कि मासिक धर्म की पीड़ा (डिसमेनोरिया) जैसी जैविक वास्तविकताओं को स्वीकार किया जाए, क्योंकि ये कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।
  • संवैधानिक आधार: मासिक धर्म अवकाश को राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (DPSP) के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) और अनुच्छेद 42 के तहत उचित ठहराया जा सकता है, जो मानवीय कार्य परिस्थितियों और स्वास्थ्य संरक्षण का आह्वान करते हैं। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिये विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है, जो ऐसे उपायों के लिये संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
  • सामाजिक पाबंदियों को तोड़ना: मासिक धर्म अवकाश की औपचारिक स्वीकृति इसे एक सामान्य, प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया के रूप में स्थापित करने में सहायक होगी, जिससे मासिक धर्म से जुड़े कलंक और रूढ़ियाँ दूर हो सकेंगी।
  • बेहतर स्वास्थ्य और उत्पादकता: गंभीर मासिक धर्म की पीड़ा के दौरान आराम करने से तनाव और स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं को कम करके समग्र कार्यक्षमता और कल्याण में सुधार हो सकता है।
  • लैंगिक संवेदनशील कार्यस्थल नीतियाँ: मासिक धर्म अवकाश जैसी लैंगिक-संवेदनशील श्रम प्रथाओं को लागू करने से कार्यस्थल महिलाओं के लिये अधिक समावेशी और सहायक बन सकते हैं।
  • अस्वस्थ होने पर भी काम करने की प्रवृत्ति में कमी: यह प्रेजेंटिज़्म (अस्वस्थ होने पर भी काम करने की प्रवृत्ति) को कम करने में सहायक है, जो अक्सर कम कार्यक्षमता और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है।

भारत और विश्व स्तर पर मासिक धर्म अवकाश की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • राष्ट्रीय स्तर पर कानून का अभाव: भारत में वर्तमान में ऐसा कोई केंद्रीय कानून नहीं है जो महिला कर्मचारियों या छात्राओं के लिये मासिक धर्म अवकाश अनिवार्य करता हो।
  • राज्य स्तरीय पहल:
    • बिहार: वर्ष 1992 से महिला सरकारी कर्मचारियों को प्रति माह दो दिन का मासिक धर्म अवकाश प्रदान किया जाता है।
    • केरल: विश्वविद्यालयों में छात्राओं के लिये मासिक धर्म अवकाश तथा उपस्थिति में छूट का प्रावधान किया गया है।
  • निजी क्षेत्र की नीतियाँ: ज़ोमैटो, स्विगी और बायजू जैसी कुछ कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के लिये स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश नीतियाँ लागू की हैं।
  • विधायी प्रयास: मासिक धर्म लाभ विधेयक (2017) और महिलाओं के मासिक धर्म अवकाश व  मासिक धर्म स्वास्थ्य उत्पादों तक मुफ्त पहुँच का अधिकार विधेयक, 2022 जैसे निजी सदस्यों के विधेयक प्रस्तावित किये गए हैं, लेकिन इनमें से कोई भी कानून नहीं बन पाया है
  • वैश्विक स्थिति: स्पेन और स्वीडन जैसे यूरोपीय देशों ने राज्य द्वारा वित्तपोषित सवैतनिक अवकाश की शुरुआत की।
    • जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, फिलीपींस, ताइवान और इंडोनेशिया जैसे एशियाई देशों में मासिक धर्म अवकाश संबंधी कानून हैं। 
    • यद्यपि, आँकड़े दर्शाते हैं कि इन देशों (विशेषतः जापान और दक्षिण कोरिया) में महिलाओं द्वारा इस अवकाश की वास्तविक उपयोग दर अत्यंत कम है—प्रायः 1% से भी कम। इसका मुख्य कारण गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक पाबंदियाँ और कॅरियर की प्रगति पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का भय है।

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिये विभिन्न योजनाएँ

ऐसे कौन-से उपाय हैं जो कार्यस्थल पर समानता को कमज़ोर किये बगैर मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य सहायता को मज़बूत कर सकते हैं?

  • "स्वास्थ्य अवकाश" ढाँचे को अपनाना: गंभीर माइग्रेन, एंडोमेट्रियोसिस जैसी स्थितियों पर लागू होने वाला लिंग-तटस्थ अल्पकालिक स्वास्थ्य अवकाश (2 दिन/माह) प्रारंभ करना।
    • यह मासिक धर्म स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करते हुए महिलाओं के विरुद्ध नियुक्ति पूर्वाग्रह से बचाता है।
  • कार्यस्थल आवास मॉडल: गंभीर मासिक धर्म में होने वाले दर्द के दौरान दूरस्थ कार्य, विश्राम कक्ष और हल्के कार्यभार जैसे उचित कार्यस्थल आवासों को अनिवार्य बनाना।
  • व्यावसायिक सुरक्षा मानकों में मासिक धर्म स्वास्थ्य: श्रम संहिताओं और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियाँ संहिता, 2020 के तहत श्रम कल्याण और कार्यस्थल संबंधी स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों में मासिक धर्म स्वास्थ्य को एकीकृत करना।
  • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: मासिक धर्म स्वास्थ्य, उत्पादकता हानि और कार्यस्थल भेदभाव पर राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन करना, जिससे धारणाओं के बजाय डेटा पर आधारित नीतिगत निर्णय संभव हो सकें।
  • शिक्षा क्षेत्र में लक्षित समर्थन: विश्वविद्यालय केरल मॉडल के समान उपस्थिति में छूट संबंधी नीतियाँ और छात्रों के लिये वैकल्पिक अवकाश की नीति को अपना सकते हैं, जिससे मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य मुद्दों से जुड़ी ड्रॉपआउट दरों में कमी आए।
  • कॉर्पोरेट ESG प्रोत्साहन: कंपनियों को ESG (पर्यावरण, सामाजिक, शासन) मानकों के भाग के रूप में मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य नीतियों को अपनाने के लिये प्रोत्साहित करना, जिससे लैंगिक रूप से संवेदनशील कार्यस्थल की प्रथाओं को कॉर्पोरेट रेटिंग से जोड़ा जा सके।

निष्कर्ष

मासिक धर्म अवकाश पर चल रही बहस इस बात की आवश्यकता को रेखांकित करती है कि महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा के साथ-साथ कार्यस्थल पर समानता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यद्यपि मासिक धर्म समानता पर संवाद जारी रहना चाहिये, किंतु किसी भी नीति को विधिक आधार पर स्थापित, सामाजिक रूप से संवेदनशील तथा व्यावहारिक रूप से क्रियान्वयन योग्य होना चाहिये, साथ ही इसके संभावित अनपेक्षित परिणामों के प्रति भी सजग रहना आवश्यक है। तब तक “रक्तस्राव की स्वतंत्रता” का विचार वास्तविकता से अधिक एक आकांक्षा ही बना रह सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत में मासिक धर्म अवकाश के संवैधानिक और सामाजिक आयामों पर चर्चा कीजिये। क्या इसे एक वैधानिक अधिकार होना चाहिये?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मासिक धर्म अवकाश क्या है?
मासिक धर्म अवकाश से तात्पर्य ऐसी कार्यस्थल या शैक्षणिक नीतियों से है, जो महिलाओं या मासिक धर्म वाले व्यक्तियों को दर्द या डिसमेनोरिया के कारण मासिक धर्म के दौरान अवकाश लेने या आराम करने की अनुमति देती हैं।

2. भारत में मासिक धर्म अवकाश की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है?
भारत में मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने वाला कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है, हालाँकि बिहार एवं  केरल में राज्य-स्तरीय प्रावधान हैं और कुछ कंपनियाँ स्वैच्छिक नीतियाँ प्रदान करती हैं।

3. कौन-से संवैधानिक प्रावधान मासिक धर्म अवकाश की बहस से संबंधित हैं?
यह मुद्दा अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार), अनुच्छेद 42 (मानवीय कार्य परिस्थितियाँ) और अनुच्छेद 15(3) से जुड़ा है, जो महिलाओं के लिये विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है।

4. अनिवार्य मासिक धर्म अवकाश को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या चिंताएँ व्यक्त कीं?
न्यायालय ने चेतावनी दी कि कानून द्वारा मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने से नियोक्ता महिलाओं को काम पर रखने से हतोत्साहित हो सकते हैं और इससे उनके कॅरियर के अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

5. किन देशों में मासिक धर्म अवकाश नीतियाँ हैं?
स्पेन, जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, ताइवान, वियतनाम और फिलीपींस जैसे देशों में मासिक धर्म अवकाश की अनुमति देने वाली नीतियाँ हैं, हालाँकि पूर्वाग्रह और कार्यस्थल संबंधी चिंताओं के कारण उपयोग दर कम बनी हुई है।

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