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जैव विविधता और पर्यावरण

ग्लोबल विंड रिपोर्ट 2022

  • 13 Apr 2022
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

वर्ष 2022 के लिये ग्लोबल विंड रिपोर्ट, ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल।

मेन्स के लिये:

वर्ष 2022 के लिये ग्लोबल विंड रिपोर्ट, भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य, चुनौतियाँ और  नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य प्राप्त करने हेतु की गई पहलें।

चर्चा में क्यों?

  • GWEC की स्थापना वर्ष 2005 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संपूर्ण पवन ऊर्जा क्षेत्र हेतु एक विश्वसनीय और प्रतिनिधि मंच प्रदान करने हेतु की गई थी।

प्रमुख बिंदु 

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ:

  • वैश्विक ऊर्जा क्षमता में वृद्धि की आवश्यकता:
    • वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने हेतु पवन ऊर्जा प्रतिष्ठानों में वर्ष 2021 के दौरान स्थापित 94 GW (गीगावाट) की पवन ऊर्जा क्षमता को वैश्विक स्तर पर प्रत्येक वर्ष चार गुना बढ़ाने की आवश्यकता है।
      • आवश्यक प्रवर्धन के बिना पूर्व-औद्योगिक स्तरों पर ग्लोबल वार्मिंग को पेरिस समझौते द्वारा निर्धारित लक्ष्य के तहत 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना तथा वर्ष 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।
  • वर्ष 2021 में स्थापित क्षमता:
    • वर्ष 2021 में 93.6 GW की नई स्थापनाओं ने 12% की सालाना (Year-on-Year- YoY) वृद्धि के साथ वैश्विक संचयी पवन ऊर्जा क्षमता को 837 GW तक पहुँचा दिया है।
    • वैश्विक स्तर पर तटवर्ती पवन बाज़ार (Onshore Wind Market) में 72.5 GW की वृद्धि हुई है। विश्व के दो सबसे बड़े पवन बाज़ारों चीन और अमेरिका में मंदी के कारण पिछले वर्ष की तुलना में यह वृद्धि 18% कम है।
    • वर्ष 2021 में अपतटीय पवन बाज़ार ने 21.1GW के साथ अपनी अब तक की सर्वश्रेष्ठ सालाना क्षमता प्राप्त की।
  • नए अपतटीय प्रतिष्ठानों में गिरावट की संभावना:
    • वर्ष 2022 में नए अपतटीय प्रतिष्ठानों के वर्ष 2019/2020 के स्तर तक घटने की संभावना है।
      • यह गिरावट मुख्य रूप से चीन में प्रतिष्ठानों की कमी के कारण होगी।
    • हालाँकि वर्ष 2023 में बाज़ार में पुनः वृद्धि होने की संभावना है जो अंततः वर्ष 2026 में 30GW के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगी।
  • अपतटीय पवन ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि:
    • अपतटीय पवन ऊर्जा उत्पादन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के साथ-साथ निवेश पर लाभ को बढ़ाता है।
    • यदि अपतटीय पवन ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाया जाता है तो वर्ष 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन प्रत्येक वर्ष 0.3-1.61 गीगाटन कम हो सकता है।

पवन ऊर्जा क्षेत्र के विकास में चुनौतियाँ:

  • अल्पकालिक राजनीतिक उद्देश्यों पर केंद्रित असंगत नीतिगत वातावरण।
  • खराब तरीके से निर्मित बाज़ार, जो अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को सक्षम नहीं बनाते है।
  • आधारभूत संरचना और हस्तांतरण संबंधी बाधाएँ।
  • नवीकरणीय प्रौद्योगिकियों से संबंधित पर्याप्त औद्योगिक तथा व्यापार नीतियों का अभाव।
  • शत्रुतापूर्ण राजनीति या गलत सूचना अभियान।

भारत में पवन ऊर्जा क्षेत्र का दायरा:

  • भारत में वर्ष 2021 में 1.4 GW से अधिक पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित की गई जो पिछले वर्ष प्राप्त 1.1 GW की क्षमता से अधिक थी।
  • सरकार ने वर्ष 2022 तक 5 GW अपतटीय क्षमता तथा वर्ष 2030 तक 30 GW स्थापित क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।
    • भारत को अभी अपनी अपतटीय पवन ऊर्जा सुविधा और विकसित करनी है।
  • भारत अपनी 7,600 किमी. की तटरेखा के साथ 127 गीगावाट अपतटीय पवन ऊर्जा का उत्पादन कर सकता है।
    • तटवर्ती पवन ऊर्जा उन टर्बाइनों को संदर्भित करती है जो भूमि पर स्थित हैं तथा विद्युत उत्पादन हेतु पवन का उपयोग करती हैं।
  • अपतटीय पवन ऊर्जा समुद्र में हवा से उत्पन्न एक ऊर्जा है।
  • वर्ष 2022 और वर्ष 2023 के लिये भारतीय पवन बाज़ार क्रमशः 3.2 GW और 4.1 GW तटवर्ती पवन तक विस्तारित होने का अनुमान है। 
  • राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति: राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति, 2018 का मुख्य उद्देश्य बड़े ग्रिड से जुड़े पवन-सौर फोटो-वोल्टेइक हाइब्रिड प्रणाली को बढ़ावा देने हेतु एक ढाँचा प्रदान करना है।
  • राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति: राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति को अक्तूबर, 2015 में भारतीय अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में 7600 किलोमीटर की भारतीय तटरेखा के साथ अपतटीय पवन ऊर्जा विकसित करने के उद्देश्य से अधिसूचित किया गया था।

आगे की राह

  • सरकारों को नियोजन संबंधी बाधाओं और ग्रिड कनेक्शन संबंधी चुनौतियों जैसे मुद्दों से निपटने की ज़रूरत है।
  • पवन आधारित उत्पादन क्षमता में वृद्धि को बनाए रखने तथा बढ़ाने के लिये नीति निर्माताओं को भूमि आवंटन एवं ग्रिड कनेक्शन परियोजनाओं सहित परमिट देने की प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है।
  • बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा परिनियोजन हेतु कार्यबल की योजना एक प्रारंभिक नीतिगत प्राथमिकता होनी चाहिये तथा ग्रिड में निवेश वर्तमान स्तरों से वर्ष 2030 तक तिगुना होना चाहिये।
  • "पवन आपूर्ति शृंखला की नई भू-राजनीति" का सामना करने के लिये अधिक-से-अधिक सार्वजनिक-निजी सहयोग की भी आवश्यकता है।
  • वस्तुओं और महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिये बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा को दूर करने हेतु एक मज़बूत अंतर्राष्ट्रीय नियामक ढाँचे की आवश्यकता है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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