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शुद्ध शून्य उत्सर्जन: आईईए

  • 25 May 2021
  • 10 min read

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency’s- IEA) द्वारा शुद्ध शून्य उत्सर्जन (Net Zero Emissions - NZE) हेतु  'नेट ज़ीरो बाय 2050'  (Net Zero by 2050) नाम से अपना रोडमैप जारी किया गया है।

  • यह विश्व का पहला व्यापक ऊर्जा रोडमैप है जिसे नवंबर 2021 में जलवायु परिवर्तन पर  स्कॉटलैंड के ग्लासगो में संपन्न होने वाले संयुक्त राष्ट्र के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ कोप-26 सम्मेलन में अपनाया जाएगा।
  • ‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन' का तात्पर्य उत्पादित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और वातावरण से निकाले गए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मध्य एक समग्र संतुलन स्थापित करना है।

 प्रमुख बिंदु: 

 आवश्यकता:

  • यदि अभी भी देशों द्वारा जलवायु संबंधी  प्रतिबद्धताओं जिसमें वर्ष 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन को ‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन' तक लाना तथा वैश्विक तापन को 1.5 °C तक सीमित करना शामिल है को पूरी तरह से हासिल कर लिया जाए तो उसके बाद भी वे वैश्विक ऊर्जा लक्ष्य को प्राप्त करने से काफी पीछे होगी ।

रोडमैप का उद्देश्य:

  • प्रभाव की जांँच करना:
    • घोषित ‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन’ लक्ष्यों के प्रभावों की जांच करना तथा ऊर्जा क्षेत्र में  उनके महत्त्व को बताना।
  • नया ऊर्जा मार्ग:
    • वर्ष 2050 तक विश्व स्तर पर NZE प्राप्त करने की दिशा में नया ऊर्जा-क्षेत्र मार्ग (Energy-Sector Pathway ) विकसित करना।
  • सरकारों को सिफारिशें:
    • निकट अवधि में कार्य करने हेतु सरकारों के लिये प्रमुख नीतिगत सिफारिशों को निर्धारित करना,अन्य सतत् विकास लक्ष्यों तक पहुँचने की दृष्टि से शुद्ध-शून्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये एक दीर्घकालिक एजेंडा निर्धारित करना।

अनुसरण किये जाने वाले सिद्धांत:

  • प्रौद्योगिकी तटस्थता:
    • प्रौद्योगिकी तटस्थता, लागत, तकनीकी तैयारी, देश और बाजार की स्थितियांँ तथा व्यापक सामाजिक विशेषताओं  के साथ व्यापार की स्थिति ।
      • प्रौद्योगिकी तटस्थता को सामान्यत सूचना या डेटा के रूप में शामिल ज्ञान पर निर्भरता के बिना, विकास, अधिग्रहण, उपयोग या व्यवसायीकरण हेतु अपनी आवश्यकताओं के लिये सबसे उपयुक्त तथा  उचित प्रौद्योगिकी चुनने के लिये  व्यक्तियों और संगठनों की स्वतंत्रता के रूप में वर्णित किया जाता है।
  • सार्वभौमिक सहयोग:
    • सार्वभौमिक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, जिसमें सभी देश न्यायसंगत पारगमन (Just Transition) दृष्टिकोण से तथा जहांँ उन्नत अर्थव्यवस्थाएंँ नेतृत्व करती हैं, निवल शून्य में योगदान करते हो।
  • अस्थिरता को कम करना:
    • जहांँ भी संभव हो  क्षेत्र में एक व्यवस्थित पारगमन या ट्रांज़िशन हो जो ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करे तथा ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता को कम  करती हो।   

रोडमैप द्वारा निर्धारित महत्त्वपूर्ण कदम: वर्ष 2050 तक वैश्विक लक्ष्य को शून्य उत्सर्जन तक ले जाने हेतु 400 से अधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय शामिल हैं, इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • जीवाश्म ईंधन:
    • नई जीवाश्म ईंधन आपूर्ति परियोजनाओं में कोई निवेश नहीं किया जाएगा तथा नए निर्बाध कोयला संयंत्रों हेतु निवेश से संबंधित कोई और अंतिम  निर्णय नहीं लिया जाएगा ।
  • वाहन बिक्री:
    • वर्ष 2035 तक नई आंतरिक दहन इंजन वाली कारों की बिक्री पर  प्रतिबंध।
  • विद्युत उत्पादन:
    • वर्ष 2040 तक वैश्विक बिजली क्षेत्र को शुद्ध-शून्य उत्सर्जन तक पहुंँचना।
    • रोडमैप में वर्ष 2030 तक सौर ऊर्जा के वार्षिक परिवर्द्धन या वृद्धि को 630 गीगावाट तक पहुंँचने और पवन ऊर्जा के 390 गीगावाट तक पहुंँचने का आह्वान किया गया है।
      • यह 2020 में निर्धारित किये गए रिकॉर्ड स्तर का चार गुना है।
    • वर्ष 2050 तक वैश्विक बिजली उत्पादन को बढ़ाने हेतु रोडमैप में निम्नलिखित सुझाव दिये गए हैं:
      • 714% अधिक नवीकरणीय ऊर्जा।
      • 104% अधिक परमाणु ऊर्जा।
      • 93% कम कोयला ( कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) के साथ सभी शेष कोयला)।
      • 85% कम प्राकृतिक गैस (CCS के साथ 73%)।

महत्त्व:

  • यह रोडमैप ऊर्जा और उद्योग क्षेत्रों से ग्रीनहाउस गैस (GreenHouse Gas- GHG) उत्सर्जन को कम करने में आदर्श और वास्तविकता के मध्य मौजूदा अंतर को कम करने वाला माना जा रहा है।

आलोचना:

  • सिद्धांत को ज़रअंदाज करना:
    • IEA ने 'जलवायु न्याय' के सिद्धांत की अनदेखी करते हुए महत्त्वपूर्ण उत्सर्जकों (Historical Emitters) पर विचार नहीं किया।
    • विकसित देशों को GHG उत्सर्जन की कीमत पर औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) से लाभ हुआ, जिसने जलवायु परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
      • विकसित देशों के पास डीकार्बोनाइज़ करने हेतु अर्थव्यवस्थाएंँ विद्यमान हैं, जिससे गरीब और विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों पर चुनाव करने के लिये वित्तपोषण और नवाचार को व्यवस्थित करने का विकल्प मिल जाता है।
  • विनियमों की आवश्यकता:
    • संभावित रूप से ऊर्जा की कम खपत हेतु व्यवहार परिवर्तन पर अधिक निर्भर होने की आवश्यकता है।
    • अर्थव्यवस्थाओं में रचनात्मक सामाजिक परिवर्तन को सकारात्मक रूप से प्रेरित करने हेतु  उन्हें  विनियमित करना आवश्यक होगा।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA):

  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी वर्ष 1974 में पेरिस (फ्राँस) में स्थापित एक स्वायत्त अंतर-सरकारी संगठन है।
  • IEA मुख्य रूप से ऊर्जा नीतियों पर ध्यान केंद्रित करती है, जिसमें आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण आदि शामिल हैं। इन नीतियों को 3 E’s of IEA के रूप में भी जाना जाता है।
  • भारत मार्च 2017 में IEA का एसोसिएट सदस्य बना था, हालाँकि भारत इससे पूर्व से ही संगठन के साथ कार्य कर रहा था।
    • हाल ही में,भारत ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता में सहयोग को मज़बूत करने हेतु  IEA के साथ एक रणनीतिक साझेदारी समझौता किया है।
  • IEA द्वारा  प्रतिवर्ष विश्व ऊर्जा आउटलुक रिपोर्ट जारी की जाती है।
  • IEA का इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी क्लीन कोल सेंटर, कोयले को सतत् विकास लक्ष्यों के अनुकूल ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत बनाने पर स्वतंत्र जानकारी और विश्लेषण प्रदान करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

आगे की राह: 

  •  विश्व को 30 वर्षों के भीतर ऊर्जा क्षेत्र को लागत प्रभावी तरीके से बदलने हेतु एक कठिन कार्य का सामना करना पड़ेगा, भले ही विश्व अर्थव्यवस्था का आकार दोगुने से अधिक हो और वैश्विक जनसंख्या में 2 अरब लोगों की वृद्धि क्यों  न हो।
  • वर्ष 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना कुछ प्रमुख आवश्यकता  अंतरिम कदमों पर  निर्भर करता है, जैसे- हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा को सस्ती करना और वर्ष 2030 तक हरित ऊर्जा को सभी के लिये सुलभ बनाना।

 स्रोत: डाउन टू अर्थ

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