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इंडिया एनर्जी आउटलुक 2021

  • 19 Feb 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency- IEA) द्वारा ‘भारत एनर्जी आउटलुक 2021’ रिपोर्ट जारी की गई है, जो भारत की बढ़ती आबादी हेतु विश्वसनीय, सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा सुनिश्चित करने के लक्ष्य के समक्ष मौजूद चुनौतियों के समाधान के साथ-साथ संभावनाओं पर ज़ोर देती है।

  • भारत एनर्जी आउटलुक 2021 अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की विश्व ऊर्जा आउटलुक शृंखला की एक नई एवं विशेष रिपोर्ट है।

प्रमुख बिंदु:

वर्ष 2030 तक तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता:

  • अगले दो दशकों में भारत की ऊर्जा मांग में 25% की वृद्धि होगी और वर्ष 2030 तक भारत यूरोपीय संघ को पीछे छोड़ते हुए विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश बन जाएगा।
    • वर्तमान में चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत चौथा सबसे बड़ा वैश्विक ऊर्जा उपभोक्ता देश है।
  • मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्ष 2040 तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 8.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगा, जिससे भारत की ऊर्जा खपत में भी लगभग दोगुनी बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
  • वैश्विक महामारी से पहले भारत की ऊर्जा मांग वर्ष 2019 - 2030 के बीच मध्य लगभग 50 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान था, लेकिन महामारी के पश्चात् अब यह 35 प्रतिशत के करीब पहुँच गई है।

औद्योगीकरण एक मुख्य कारक: 

  • पिछले तीन दशकों में क्रय शक्ति समता (PPP) के मामले में भारत ने वैश्विक औद्योगिक मूल्यवर्द्धन (Industrial Value-added) में 10 प्रतिशत का योगदान दिया है। 
  • अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2040 तक भारत वैश्विक औद्योगिक मूल्यवर्द्धन में 20 प्रतिशत का योगदान देगा, साथ ही भारत औद्योगिक ऊर्जा खपत में वैश्विक विकास का नेतृत्त्व करेगा।

आयात पर निर्भरता: 

  • भारत की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरत उसे जीवाश्म ईंधन के आयात पर अधिक निर्भर बना देगी, क्योंकि पेट्रोलियम अन्वेषण और उत्पादन तथा नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये सरकार की नीतियों के बावजूद भारत का घरेलू तेल और गैस उत्पादन वर्षों से स्थिर बना हुआ है।
  • तेल की बढ़ती मांग वर्ष 2019 की तुलना में वर्ष 2030 तक भारत के तेल आयात बिल को दोगुना (181 बिलियन डॉलर) और वर्ष 2040 तक तिगुना (255 बिलियन डॉलर) कर सकती है।

तेल की मांग

  • मौजूदा नीतिगत परिदृश्य में वर्ष 2040 तक भारत की तेल मांग 74 प्रतिशत तक बढ़कर 8.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुँच सकती है।
  • भारत में प्रति व्यक्ति कार स्वामित्व में पाँच गुना वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर तेल की मांग में हो रही वृद्धि का नेतृत्त्व करेगा। 
  • वर्ष 2040 तक तेल आयात पर भारत की शुद्ध निर्भरता (कच्चे तेल के आयात और तेल उत्पादों के निर्यात दोनों को ध्यान में रखते हुए) वर्तमान के 75% से बढ़कर 90% से अधिक के स्तर पर पहुँच सकती है क्योंकि उत्पादन की तुलना में घरेलू खपत बहुत अधिक हो जाएगी।

प्राकृतिक गैस की मांग

  • 2040 तक कोयले की मांग में तीन गुना वृद्धि के साथ, भारत प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में सबसे तेज़ी से विकसित बाज़ार बन जाएगा।
  • भारत में प्राकृतिक गैस आयात निर्भरता वर्ष 2010 के 20 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2019 में लगभग 50 प्रतिशत पर पहुँच गई है और अनुमान के अनुसार, वर्ष 2040 तक यह 60 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी।

कोयले की मांग

  • वर्तमान में भारत के ऊर्जा क्षेत्र में कोयले का वर्चस्व है, जो कि कुल उत्पादन के 70 प्रतिशत से अधिक है।
  • कोयले की मांग वर्ष 2040 तक 772 मिलियन टन तक पहुँच सकती है जो कि वर्तमान में 590 मिलियन टन है।

अक्षय ऊर्जा संसाधन की मांग

  • अक्षय ऊर्जा की मांग में वृद्धि के मामले में भारत की हिस्सेदारी चीन के बाद दुनिया में सबसे अधिक है।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA)

  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी वर्ष 1974 में पेरिस (फ्राँस) में स्थापित एक स्वायत्त अंतर-सरकारी संगठन है।
  • IEA मुख्य रूप से ऊर्जा नीतियों पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसमें आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण आदि शामिल हैं। 
  • भारत मार्च 2017 में IEA का एसोसिएट सदस्य बना था, हालाँकि भारत इससे पूर्व ही संगठन के साथ कार्य कर रहा था।
    • हाल ही में भारत ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता के क्षेत्र में सहयोग को मज़बूत करने के लिये IEA के साथ एक रणनीतिक समझौता किया है।
  • ‘वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक’ (World Energy Outlook- WEO) रिपोर्ट ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ द्वारा जारी की जाती है। 
  • IEA का इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी क्लीन कोल सेंटर, कोयले को सतत् विकास लक्ष्यों के अनुकूल ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत बनाने पर स्वतंत्र जानकारी और विश्लेषण प्रदान करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

आगे की राह

  • वर्तमान में संपूर्ण विश्व ऊर्जा क्षेत्र में परिवर्तन की गति को तेज़ करने के माध्यमों की तलाश कर रहा है, ऐसे में भारत को निम्न-कार्बन आधारित समावेशी विकास के लिये एक नवीन मॉडल विकसित करना चाहिये। यदि भारत इस तरह के मॉडल को विकसित करने में सफल रहता है तो यह विश्व के अन्य विकासशील देशों के लिये एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा कि किस तरह कार्बन उत्सर्जन में कमी करते हुए आर्थिक विकास में बढ़ोतरी की जा सकती है। 
  • भारत पहले से ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है तथा सौर उर्जा के माध्यम से भारत की स्थिति और भी मज़बूत हो सकती है, हालाँकि भारत को इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये अत्याधुनिक तकनीक एवं नवीनतम नीतियों की आवश्यकता होगी। 
  • उभरते नए औद्योगिक क्षेत्र के साथ ही स्वच्छ ऊर्जा से संबंधित रोज़गार में भी बढ़ोतरी हो रही है, भारत को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता होगी कि विकास की इस प्रकिया में कोई भी पीछे न रहे और इसमें वे क्षेत्र भी शामिल हों जो वर्तमान में कोयले पर निर्भर हैं।

स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस

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