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चार नए रामसर स्थल

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  • 14 Aug 2021
  • 14 min read

प्रिलिम्स के लिये:

मैंग्रोव, प्रवाल भित्ति, रामसर अभिसमय

मेन्स के लिये:

वर्तमान में आर्द्रभूमि क्षेत्रों के समक्ष प्रमुख खतरे, वैश्विक आर्द्रभूमि संरक्षण पहल

चर्चा में क्यों?   

हाल ही में  चार और भारतीय स्थल जिनमें दो हरियाणा और दो गुजरात में स्थित है, को रामसर अभिसमय (Ramsar Convention) के तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियों  (Wetlands) के रूप में मान्यता दी गई है।

  • इसके अलावा वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया (Wetlands International South Asia) के हालिया अनुमानों के अनुसार, पिछले तीन दशकों में भारत के प्राकृतिक आर्द्रभूमि क्षेत्र में लगभग 30%  की कमी हुई है। प्रमुख रूप से आर्द्रभूमि का नुकसान शहरी क्षेत्रों में अधिक हुआ है।
  • वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया की स्थापना वर्ष 1996 में नई दिल्ली में एक कार्यालय के साथ दक्षिण एशिया क्षेत्र में आर्द्रभूमियों  के संरक्षण और सतत् विकास को बढ़ावा देने हेतु वेटलैंड्स इंटरनेशनल नेटवर्क के एक हिस्से के रूप में की गई थी।

प्रमुख बिंदु

आर्द्रभूमियों के बारे में:

  • आर्द्रभूमि पारिस्थितिक तंत्र हैं जो या तो मौसमी या स्थायी रूप से जल से संतृप्त या भरे हुए  होते हैं। 
  • इनमें मैंग्रोव, दलदल, नदियाँ, झीलें, डेल्टा, बाढ़ के मैदान और बाढ़ के जंगल, चावल के खेत, प्रवाल भित्तियाँ, समुद्री क्षेत्र जहाँ निम्न  ज्वार 6 मीटर से अधिक गहरे नहीं होते तथा इसके अलावा मानव निर्मित आर्द्रभूमि जैसे- अपशिष्ट जल उपचारित जलाशय शामिल हैं। 
  • यद्यपि ये भू-सतह के  केवल 6% हिस्से हो ही कवर करते हैं। सभी पौधों और जानवरों की प्रजातियों का 40% आर्द्रभूमियों में ही पाया जाता  है या वे यहाँ प्रजनन करते हैं।

नए रामसर स्थल/साइट  

  • हाल ही में रामसर अभिसमय/समझौते (Ramsar Convention) ने भारत में चार नई आर्द्रभूमियों को वैश्विक महत्त्व की आर्द्रभूमि के रूप में नामित किया है। यह आर्द्रभूमि के संरक्षण और बुद्धिमानी से उपयोग हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
    •  भिंडावास वन्यजीव अभयारण्य, हरियाणा की सबसे बड़ी आर्द्रभूमि है। यह मानव निर्मित मीठे पानी की आर्द्रभूमि है।
    • हरियाणा का सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान स्थानीय प्रवासी जलपक्षियों (Local Migratory Waterbirds) की 220 से अधिक प्रजातियों का उनके जीवन चक्र के महत्वपूर्ण चरणों जिनमें निवास स्थल और उनका शीतकालीन प्रवास शामिल है, को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
    • गुजरात में थोल झील वन्यजीव अभयारण्य मध्य एशियाई फ्लाईवे पर स्थित है और यहांँ 320 से अधिक पक्षी प्रजातियांँ पाई जाती हैं।
    • गुजरात की  वाधवाना आर्द्रभूमि इसमें निवास करने वाले  पक्षियों के  जीवन के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है क्योंकि यह प्रवासी जलपक्षियों को सर्दियों के समय रुकने के लिये स्थान  प्रदान करती है, जिसमें 80 से अधिक प्रजातियांँ शामिल हैं जो मध्य एशियाई फ्लाईवे पर प्रवास करती हैं।
  • ये आर्द्रभूमि मिस्र के गिद्ध, सेकर फाल्कन,सोशिएबल लैपविंग और  संकटग्रस्त डेलमेटियन पेलिकन जैसी लुप्तप्राय पक्षी प्रजातियों का निवास स्थल हैं।
  • इसके साथ ही भारत में रामसर स्थलों की संख्या 46 हो गई है।

शहरी आर्द्रभूमि की भूमिका:

  • ऐतिहासिक महत्त्व: आर्द्रभूमि का मूल्य, विशेष रूप से शहरी परिप्रेक्ष्य में हमारे इतिहास के माध्यम से प्रमाणित होता है।
    • दक्षिण भारत में चोलों, होयसलों ने पूरे राज्य में तालाबों का निर्माण किया।
  • बहुस्तरीय भूमिका: आर्द्रभूमि न केवल जैव विविधता की उच्च सांद्रता का समर्थन करती है, बल्कि भोजन, पानी, फाइबर, भूजल पुनर्भरण, जल शोधन, बाढ़ नियंत्रण, तूफान संरक्षण, क्षरण नियंत्रण, कार्बन भंडारण, जलवायु विनियमन जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की एक विस्तृत शृंखला प्रदान करती है।
  • शहरों की तरल संपत्ति: वे सांस्कृतिक विरासत में योगदान देने वाले विशेष गुणों के रूप में कार्य करते हैं और शहर के लोकाचार के साथ गहरे संबंध रखते हैं।
    • मछली पकड़ने, खेती और पर्यटन जैसी गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय आजीविका हासिल करने में आर्द्रभूमि का मूल्य अतुलनीय है।

आर्द्रभूमि के लिये प्रमुख खतरे:

शहरीकरण

  • शहरी केंद्रों के पास आर्द्रभूमि आवासीय, औद्योगिक और वाणिज्यिक सुविधाओं के विकासात्मक दबाव में वृद्धि कर रही है। 

मानवजनित गतिविधियाँ

  • अनियोजित शहरी और कृषि विकास, उद्योगों, सड़क निर्माण, इंपाउंडमेंट, संसाधन निष्कर्षण और जल निकासी संबंधी समस्या के कारण, आर्द्रभूमियों की स्थिति खराब हुई है, जिससे लंबी अवधि में पर्याप्त आर्थिक व पारिस्थितिक नुकसान हुआ है।

कृषि गतिविधियाँ

  • 1970 के दशक की हरित क्रांति के बाद आर्द्रभूमि के विशाल हिस्सों को धान के खेतों में बदल दिया गया है। 
  • सिंचाई के लिये बड़ी संख्या में जलाशयों, नहरों और बाँधों के निर्माण ने संबंधित आर्द्रभूमि के जल विज्ञान को महत्त्वपूर्ण रूप से बदल दिया है।

जल विज्ञान संबंधी गतिविधियाँ

  • सिंचाई के लिये निचले शुष्क क्षेत्रों में पानी पहुँचाने हेतु नहरों के निर्माण और नदियों और नदियों के मोड़ ने जल निकासी पैटर्न को बदल दिया है तथा क्षेत्र की आर्द्रभूमि को काफी हद तक खराब कर दिया है।
  • केवलादेव घाना अभयारण्य, लोकटक झील, चिल्का झील, वेम्बनाड कोले उन स्थलों में से हैं जो पानी और गाद प्रवाह को प्रभावित करने वाले बाँधों से गंभीर रूप से प्रभावित हैं।

वनोन्मूलन

  • जलग्रहण क्षेत्र में वनस्पति को हटाने से मिट्टी का क्षरण और गाद जमा होती है।

प्रदूषण

  • उद्योगों से सीवेज और ज़हरीले रसायनों के अप्रतिबंधित डंपिंग ने कई मीठे पानी की आर्द्रभूमि को प्रदूषित कर दिया है।

लवणीकरण

  • भूजल के अत्यधिक दोहन से लवणीकरण में वृद्धि हो रही है।

मत्स्य पालन

  • झींगा और मछलियों की मांग ने मछली पालन व जलीय कृषि तालाबों को विकसित करने के लिये आर्द्रभूमि एवं मैंग्रोव वनों को परिवर्तित करने हेतु आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान किया है।

नई प्रजातियाँ

  • भारतीय आर्द्रभूमि को जलकुंभी और साल्विनिया जैसी विदेशी पौधों की प्रजातियों से खतरा है। वे जलमार्गों को रोकते हैं तथा देशी वनस्पतियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करते हैं।

जलवायु परिवर्तन

  • हवा के तापमान में वृद्धि; वर्षा में बदलाव; तूफान, सूखा और बाढ़ की आवृत्ति में वृद्धि; वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड एकाग्रता में वृद्धि; समुद्र के स्तर में वृद्धि भी आर्द्रभूमि को प्रभावित कर सकती है।

आर्द्रभूमि संरक्षण संबंधी मुद्दे:

  • ‘केंद्रीय आर्द्रभूमि विनियामक प्राधिकरण’ जैसे प्रमुख नियामक निकायों का सीमित प्रभाव और उनके पास केवल सलाहकारी शक्तियाँ होना।
  • इसके अतिरिक्त आर्द्रभूमि पर शासन और निगरानी में मौजूदा कानून स्थानीय समुदायों की भागीदारी की उपेक्षा करते हैं।
  • इसके अलावा नीतिगत शून्यता के कारण शहर पानी की मांग को पूरा करने में असमर्थ हैं, क्योंकि उनके पास शहरी जल प्रबंधन हेतु कोई भी बेहतर 'राष्ट्रीय शहरी जल नीति' नहीं है।
  • शहरीकरण संबंधी ज़रूरतों के अलावा इस व्यापक नुकसान के लिये आर्द्रभूमि और उनकी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के बारे में जागरूकता व ज्ञान की कमी को भी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

वैश्विक आर्द्रभूमि संरक्षण पहल

  • रामसर कन्वेंशन
  • मोंट्रेक्स रेकॉर्ड
  • विश्व आर्द्रभूमि दिवस
  • ‘सिटीज़4फाॅरेस्ट’ वैश्विक अभियान: यह वनों से जुड़ने के लिये दुनिया भर के शहरों के साथ मिलकर काम करता है, साथ ही शहरों में जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा जैव विविधता की रक्षा में मदद करने के लिये आर्द्रभूमि के कई लाभों पर ज़ोर देता है।

भारत द्वारा संरक्षण उपाय

आगे की राह

  • मेगा शहरी योजनाओं के साथ तालमेल करना: हमारी विकास नीतियों, शहरी नियोजन और जलवायु परिवर्तन शमन में आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को उजागर करने की आवश्यकता है।
  • लोगों की भागीदारी को सक्षम बनाना: दिल्ली विकास प्राधिकरण ने राजधानी की जैव विविधता और माइक्रोक्लाइमेट को बनाए रखने के लिये दिल्ली की 'हरी और नीली संपत्ति' के एक एकीकृत नेटवर्क की रक्षा एवं विकास हेतु मास्टर प्लान दिल्ली 2041 पर सार्वजनिक टिप्पणियाँ आमंत्रित कीं।
    • 'हरी-नीली नीति' से तात्पर्य उस स्थान से है जहाँ जल निकाय और भूमि अन्योन्याश्रित हैं तथा  पर्यावरण और सामाजिक लाभ प्रदान करते हुए एक-दूसरे की मदद से बढ़ रहे हैं।
    • इसी तरह स्वामीनी का दस महिलाओं का स्वयं सहायता समूह वर्ष 2017 से महाराष्ट्र में मांडवी क्रीक में पर्यटकों के लिये 'मैंग्रोव सफारी' का आयोजन कर रहा है। इसे पारिस्थितिक पर्यटन के माध्यम से समुदाय के नेतृत्व वाले संरक्षण हेतु एक मॉडल के रूप में मान्यता दी गई है।
  • आगे के विकास और गरीबी उन्मूलन को समायोजित करते हुए हमारे सतत् विकास लक्ष्यों तथा लचीले शहरों के निर्माण के महत्त्वाकांक्षी एजेंडे को प्राप्त करने हेतु आर्द्रभूमि द्वारा प्रदान किये जाने लाभ और सेवाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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