शासन व्यवस्था
विकसित भारत 2047 के लिये शहरी शासन सुधार
यह लेख 18/01/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित "Missing municipal governance” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। जो निर्वाचित महापौरों की भूमिका को सीमित कर प्रशासनिक शक्ति को अपेक्षाकृत गैर-जवाबदेह नौकरशाही के हाथों में केंद्रित करता है। इस संरचनात्मक विच्छेदन के परिणामस्वरूप असमान और अपर्याप्त सेवाओं से युक्त नगरों का निर्माण हुआ है, जिससे वर्ष 2047 तक भारत के विकसित बनने की परिकल्पना पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
प्रिलिम्स के लिये: शहरी शासन, 74वाँ संशोधन अधिनियम (1992), बारहवीं अनुसूची, राज्य वित्त आयोग, मेयर-इन-काउंसिल, अमृत 2.0 (अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन), प्रधानमंत्री आवास योजना - शहरी (PMAY-U), स्वच्छ भारत मिशन - शहरी (SBM-U) 2.0।
मेन्स के लिये: भारत में वर्तमान शहरी शासन अवसंरचना, भारत के शहरी शासन से संबंधित प्रमुख मुद्दे।
भारत के शहरी केंद्र अब भी औपनिवेशिक काल की शासन-व्यवस्था में जकड़े हुए हैं, जहाँ राज्यों से भी बड़े बजट नौकरशाहों के नियंत्रण में होते हैं और निर्वाचित महापौरों की भूमिका प्रायः औपचारिक रह जाती है। इसका दुष्परिणाम मुंबई जैसे महानगरों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहाँ लाखों लोग युद्धक्षेत्र-सदृश परिस्थितियों में जीवनयापन कर रहे हैं, जहाँ आवास, स्वच्छ जल और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। यही स्थिति भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों में प्रशासनिक विफलताओं के रूप में परिलक्षित होती है। वर्ष 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ बनने की परिकल्पना के बावजूद, प्रशासनिक संरचना और जवाबदेही के बीच मूलभूत असंगति ने शहरी भारत को प्रभावी नगर शासन से वंचित कर रखा है।
भारत में वर्तमान शहरी शासन अवसंरचना कैसी है?
- संवैधानिक आधार- 74वाँ संशोधन अधिनियम (1992)
- इस अधिनियम द्वारा शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया, जिससे भारत की शासन व्यवस्था द्वि-स्तरीय (केंद्र–राज्य) से त्रि-स्तरीय संरचना में परिवर्तित हुई। इसके अंतर्गत संविधान में भाग IX-A तथा बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई।
- त्रिस्तरीय संरचना:
- नगर पंचायत: ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में परिवर्तित हो रहे क्षेत्रों के लिये।
- नगर परिषद: छोटे शहरी क्षेत्रों के लिये।
- नगर निगम: बड़े शहरी क्षेत्रों के लिये।
- शक्तियों का विकेंद्रीकरण (12वीं अनुसूची):
- इसमें शहरी स्थानीय निकायों के लिये 18 कार्यात्मक विषयों की पहचान की गई है, जिनमें शहरी नियोजन, भूमि उपयोग विनियमन, जलापूर्ति, जनस्वास्थ्य तथा झुग्गी-झोपड़ी सुधार आदि सम्मिलित हैं।
- अनिवार्य संस्थागत व्यवस्थाएँ:
- राज्य निर्वाचन आयोग: नियमित नगरपालिका चुनावों के संचालन हेतु।
- राज्य वित्त आयोग (SFC): राज्य और स्थानीय स्थानीय निकायों के बीच करों के वितरण की संस्तुति करने हेतु।
- ज़िला एवं महानगर योजना समितियाँ (DPC/MPC): ग्रामीण (पंचायतों) और शहरी निकायों की योजनाओं को समेकित करके एक समग्र विकास योजना तैयार करने हेतु।
- संस्थागत संरचना:
- संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद, व्यवहार में प्रशासनिक शक्ति प्रायः निर्वाचित प्रतिनिधियों और नौकरशाही नियुक्तियों के बीच साझा अथवा प्रतिस्पर्द्धित रहती है।
- कार्यकारी संरचना:
- आयुक्त प्रणाली: अधिकांश नगर निगमों में, कार्यकारी शक्ति राज्य द्वारा नियुक्त नगर आयुक्त के पास निहित होती है, जबकि महापौर प्रायः सीमित अधिकारों वाला औपचारिक प्रमुख बना रहता है।
- मेयर-इन-काउंसिल प्रणाली: कुछ राज्यों (जैसे पश्चिम बंगाल) में ऐसा प्रयोग किया गया है, जिसमें महापौर को मुख्यमंत्री के समान कार्यकारी अधिकार प्राप्त होते हैं।
- अर्द्ध-सरकारी संस्थाएँ: भारतीय शहरी शासन की एक प्रमुख विशेषता राज्य-नियंत्रित ‘अर्द्ध-सरकारी’ संस्थाओं (जैसे DDA/BDA जैसे विकास प्राधिकरण, जलापूर्ति बोर्ड) की उपस्थिति है।
- ये संस्थाएँ प्रायः नियोजन, जल आपूर्ति और परिवहन जैसे प्रमुख कार्यों को शहरी स्थानीय निकायों (ULB) से अपने अधीन कर लेती हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्पष्ट जवाबदेही स्थापित नहीं हो पाती।
- विशेष प्रयोजन इकाई (SPV): स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत व्यापक रूप से गठित ये कॉर्पोरेट निकाय विशिष्ट परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु स्थापित किये गए हैं। इनका उद्देश्य पारंपरिक नगरपालिका प्रक्रियाओं को आंशिक रूप से सीमित करते हुए परियोजनाओं के त्वरित और केंद्रीकृत निष्पादन को सुनिश्चित करना है।
- कार्यक्रम संबंधी संरचना (मुख्य मिशन)
- केंद्र सरकार शहरी सुधारों को मुख्य रूप से "केंद्र प्रायोजित योजनाओं" के माध्यम से संचालित करती है, जो विशिष्ट शासन सुधारों से जुड़े वित्तीय प्रावधान सुनिश्चित करती हैं।
- अमृत 2.0 (अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन): जल सुरक्षा पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य जल आपूर्ति की सार्वभौमिक कवरेज प्रदान करना और जल की चक्रीय अर्थव्यवस्था के माध्यम से शहरों को "जल सुरक्षित" बनाना है।
- स्वच्छ भारत मिशन- शहरी (SBM-U) 2.0: "कचरा मुक्त शहरों" पर केंद्रित है, जिसमें ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, कचरा स्थलों का सुधार और प्रयुक्त जल प्रबंधन शामिल है।
- स्मार्ट सिटी मिशन: इस मिशन ने अपनी वित्तीय सहायता अवधि (मार्च 2025) लगभग पूरी कर ली। इसने डेटा-संचालित नगर प्रबंधन के लिये इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC) को संस्थागत रूप दिया और ऊपर वर्णित SPV मॉडल को लागू किया।
- प्रधानमंत्री आवास योजना- शहरी (PMAY-U): इसका उद्देश्य सभी पात्र लाभार्थियों को हर मौसम में रहने योग्य स्थायी मकान उपलब्ध कराना है, जिसमें अक्सर लाभार्थी-नेतृत्व वाली निर्माण मॉडल का उपयोग किया जाता है।
- नवीनतम वित्तीय घटनाक्रम
- पंद्रहवें वित्त आयोग: अब शहरी स्थानीय निकायों को दिये जाने वाले अनुदान अक्सर निष्पादित सुधारों से जुड़े होते हैं।
- शहरी अवसंरचना विकास कोष (UIDF): राष्ट्रीय आवास बैंक द्वारा प्रबंधित, यह कोष टियर-2 और टियर-3 शहरों में शहरी अवसंरचना के निर्माण के लिये बनाया गया है, जो छोटे शहरी स्थानीय निकायों के संसाधनों का पूरक है।
- शहरी शासन में उभरते सुधार
- ग्रेटर बंगलूरू अथॉरिटी: यह प्रयास विभिन्न सेवा प्रदाता संस्थाओं को एकीकृत करने का है, ताकि सीमित संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जा सके।
- वाटको (ओडिशा वाटर कॉर्पोरेशन): एक राज्य-स्वामित्व वाली, गैर-लाभकारी कंपनी जो शहरी जल आपूर्ति और सीवरेज के लिये एक विशेष, आधुनिक उपयोगिता प्रदाता के प्रमुख उदाहरण के रूप में कार्य करती है।
- राष्ट्रीय शहरी नीति ढाँचा (NUPF): यह राज्यों को तीव्र शहरीकरण के प्रबंधन के लिये एक रणनीतिक, समग्र मार्गदर्शिका प्रदान करता है।
भारत के शहरी शासन से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- राजकोषीय दुर्बलता और संरचनात्मक निर्भरता: भारत का संविधान केंद्रीय तथा राज्य सरकारों के बीच विभाजित किये जाने वाले करों को निर्दिष्ट करता है, लेकिन यह स्थानीय निकायों के लिये राजस्व आधार निर्दिष्ट नहीं करता है।
- वित्तीय स्वायत्तता की कमी के कारण भारतीय नगरपालिकाएँ कार्यात्मक रूप से निष्क्रिय हो गई हैं और संपत्ति कर जैसे "स्वयं के राजस्व" स्रोतों के स्थान पर विवेकाधीन अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर हैं।
- यह वित्तीय अपर्याप्तता दीर्घकालिक अवसंरचना निवेश को बाधित करती है, जिसके परिणामस्वरूप नगर निकायों को मूलभूत परिचालन व्ययों के लिये भी केंद्र अथवा राज्य सरकारों पर आश्रित रहना पड़ता है, जो 74वें संवैधानिक संशोधन में निहित विकेंद्रीकरण की मूल भावना को कमज़ोर करता है।
- पिछले एक दशक से अधिक समय से भारत में नगरपालिकाओं का राजस्व और व्यय सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 1% पर ही स्थिर बना हुआ है।
- अर्द्ध-सरकारी जाल और संस्थागत विखंडन: शहरी शासन व्यवस्था अनेक समानांतर संस्थाओं (जैसे SPV और विकास प्राधिकरणों) के प्रभुत्व के कारण शिथिल हो गई है, जो निर्वाचित शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को प्रभावी रूप से हाशिये पर धकेल देती हैं।
- राज्य-नियंत्रित अर्द्ध-सरकारी निकाय भूमि उपयोग नियोजन और परिवहन जैसे उच्च-महत्त्वपूर्ण तथा राजस्व-सक्षम कार्यों को अपने अधीन रख लेते हैं, जबकि शहरी स्थानीय निकायों को अपेक्षाकृत कम राजस्व वाले कार्य (जैसे कचरा प्रबंधन और झुग्गी-झोपड़पट्टी सेवाएँ) सौंप दिये जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप “शक्तिहीन उत्तरदायित्व” की स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ संस्थागत अंतरालों के कारण जवाबदेही अस्पष्ट हो जाती है।
- नोएडा में जनवरी 2026 में एक तकनीशियन की कार में जल भरने तथा बिना सुरक्षा घेराबंदी वाले गड्ढे में गिरने से हुई घातक दुर्घटना ने इस शासन-व्यवस्था की संरचनात्मक विफलता को प्रत्यक्ष रूप से उजागर किया।
- वर्ष 2015 से दी जा रही चेतावनियों और अक्तूबर 2023 में किये गए संयुक्त निरीक्षण के बावजूद, संस्थागत उदासीनता के कारण इस खतरे का समाधान नहीं किया गया।
- उदाहरणस्वरूप, CAG ऑडिट (2024) में 18 राज्यों के अध्ययन से यह पाया गया कि 12वीं अनुसूची में सूचीबद्ध 18 कार्यों में से केवल 4 ही वास्तविक रूप से स्वायत्त हैं।
- औपचारिक महापौर और नौकरशाही वर्चस्व: भारत में महापौर की भूमिका प्रायः प्रतीकात्मक रह जाती है, जबकि वास्तविक कार्यकारी अधिकार राज्य द्वारा नियुक्त नगर आयुक्त के हाथों में केंद्रित होते हैं।
- यह संरचनात्मक असंतुलन लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की शृंखला को बाधित करता है, क्योंकि जनता के प्रति जवाबदेह महापौर उस अधिकारी को न तो निर्देश दे सकता है और न ही दंडित कर सकता है, जो प्रशासनिक निर्णयों को लागू करता है। परिणामस्वरूप नगर परिषद की प्रभावशीलता क्षीण हो जाती है।
- प्रजा की अर्बन गवर्नेंस इंडेक्स (2024) के अनुसार, केवल केरल में महापौरों को नगर आयुक्तों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) लिखने का अधिकार प्राप्त है।
- योजनागत संकीर्णता और जलवायु-अंधता: भारत में शहरी नियोजन कठोर, स्थिर और जल-भौगोलिक वास्तविकताओं से अलग है, जहाँ भूमि को पारिस्थितिकी तंत्र की बजाए केवल “रियल एस्टेट” के रूप में देखा जाता है।
- मास्टर प्लान अक्सर दशकों पुराने होते हैं या अस्तित्व में ही नहीं होते, जिसके कारण "कंक्रीट-केंद्रित" विकास होता है जो प्राकृतिक नालियों को अवरुद्ध कर देता है, जिससे मध्यम वर्षा भी विनाशकारी शहरी बाढ़ (प्लुवियल फ्लडिंग) में बदल जाती है।
- उदाहरणस्वरूप, नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत की 65% शहरी बस्तियों के पास कोई मास्टर प्लान नहीं है तथा देश में प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर केवल 1 योजनाकार उपलब्ध है।
- बंगलूरू का "ब्रांड बंगलूरू" संघर्ष इस बात पर प्रकाश डालता है कि राजकालुवों (तूफानी जल निकासी नालियों) पर अतिक्रमण किस प्रकार तकनीकी गलियारे में बार-बार बाढ़ का कारण बनता है।
- मास्टर प्लान अक्सर दशकों पुराने होते हैं या अस्तित्व में ही नहीं होते, जिसके कारण "कंक्रीट-केंद्रित" विकास होता है जो प्राकृतिक नालियों को अवरुद्ध कर देता है, जिससे मध्यम वर्षा भी विनाशकारी शहरी बाढ़ (प्लुवियल फ्लडिंग) में बदल जाती है।
- कर्मचारी पक्षाघात और क्षमता का अभाव: शहरी स्थानीय निकायों में हाइड्रो-जियोलॉजिस्ट या अर्बन डिज़ाइनर जैसे विशेष तकनीकी कर्मियों का अभाव है।
- भर्ती संबंधी शक्तियाँ राज्य स्तर पर केंद्रीकृत हैं, जिसके कारण भर्तियों में अत्यधिक विलंब होता है और नगर निकायों को महत्त्वपूर्ण तकनीकी कार्यों के लिये अल्पकालिक सलाहकारों या अकुशल संविदा श्रमिकों पर निर्भर रहना पड़ता है।
- प्रजा इंडेक्स 2024 के अनुसार, नगर निगमों में स्वीकृत पदों के विरुद्ध रिक्तियों की दर अत्यधिक चिंताजनक है। अहमदाबाद, गुरुग्राम, शिमला, भोपाल, इंफाल, आइज़ोल, अमृतसर, ग्रेटर जयपुर तथा कोलकाता इन 9 शहरों में 40% से अधिक पद रिक्त हैं। पटना में नगर प्रशासन स्तर पर रिक्त पदों का अनुपात सर्वाधिक (89%) है।
- कई शहरों में अमृत 2.0 का क्रियान्वयन इसलिये बाधित हो रहा है क्योंकि शहरी स्थानीय निकायों के पास “चक्रीय जल अर्थव्यवस्था” परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार करने हेतु आवश्यक तकनीकी विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं।
- कागज़ों तक सीमित सहभागी लोकतंत्र: यद्यपि 74वें संविधान संशोधन द्वारा नागरिकों तक शक्ति के विकेंद्रीकरण हेतु “वार्ड समितियों” का प्रावधान किया गया है, परंतु अधिकांश राज्यों में वे या तो अस्तित्वहीन हैं या केवल “कागज़ी संस्था” बनी हुई हैं।
- इन समितियों के बिना, शासन एक शीर्ष-स्तरीय प्रक्रिया बनी रहती है जहाँ नागरिक स्थानीय पार्षद को स्ट्रीटलाइट या जल निकासी जैसे अति-स्थानीय मुद्दों के लिये जवाबदेह नहीं ठहरा सकते, जिससे स्वशासन का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
- जनाग्रह की रिपोर्ट 2023 के अनुसार, 35 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में से केवल 5 ने सामुदायिक सहभागिता कानून अधिनियमित किया है और उसके लिये नियम अधिसूचित किये हैं, जिनमें कार्यशील वार्ड समिति अनिवार्य है।
- भारत सरकार ने नगर कानूनों में सुधार हेतु राज्यों के मार्गदर्शन के लिये मॉडल म्युनिसिपल लॉ (2003) तैयार किया था, किंतु इसका अंगीकरण और प्रभावी क्रियान्वयन अधिकांशतः अपर्याप्त ही रहा है।
- अपशिष्ट प्रबंधन में "प्रसंस्करण बनाम संग्रहण" की असमानता: स्वच्छ भारत मिशन ने “संग्रह” को सफलतापूर्वक प्रोत्साहित किया है, परंतु “प्रसंस्करण” तथा “पुराने अपशिष्ट” के निपटान में नगर पूरी तरह विफल हो रहे हैं।
- उदाहरणस्वरूप, भारतीय शहरों में उत्पन्न होने वाले लगभग 77% अपशिष्ट को बिना उपचार खुले लैंडफिल स्थलों में डाल दिया जाता है।
- वास्तव में, हम अपशिष्ट को घरों के द्वार से उठाकर विशाल, अग्नि-प्रवण लैंडफिल स्थलों तक पहुँचा रहे हैं, क्योंकि शहरी स्थानीय निकायों के पास वैज्ञानिक पृथक्करण तथा जैव-उपचार के लिये आवश्यक प्रौद्योगिकी और वित्तीय संसाधनों का अभाव है। इससे पर्यावरणीय “टाइम बम” तैयार हो रहे हैं।
भारत शहरी शासन को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय अपना सकता है?
- संस्थागत उपाय: “मेयर-इन-काउंसिल” प्रणाली का कार्यान्वयन:
- निर्वाचित प्रतिनिधियों और नियुक्त नौकरशाहों के बीच खंडित उत्तरदायित्व की समस्या को दूर करने हेतु राज्यों को “मेयर-इन-काउंसिल” प्रणाली अपनानी चाहिये।
- इस व्यवस्था में मेयर को मुख्यमंत्री के समान कार्यकारी प्रमुख की भूमिका प्राप्त होती है, जिससे लोकतांत्रिक प्रत्युत्तर-तंत्र पुनर्स्थापित होता है और प्रशासन सीधे जनता के जनादेश के प्रति उत्तरदायी बनता है।
- यह “प्रतीकात्मक मुखिया” (ceremonial figurehead) की प्रवृत्ति को समाप्त करती है तथा यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय-निर्माण नौकरशाही जड़ता के स्थान पर राजनीतिक इच्छाशक्ति और जन-आकांक्षाओं से संचालित हो।
- वित्तीय उपाय: “मूल्य-सृजन वित्तपोषण (VCF) का संस्थानीकरण:
- नगरों को राज्य अनुदानों पर निर्भरता से आगे बढ़ते हुए मूल्य-सृजन वित्तपोषण जैसे साधनों को सक्रिय रूप से अपनाना चाहिये, ताकि सार्वजनिक अवसंरचना निवेशों से उत्पन्न मूल्य-वृद्धि का आंशिक लाभ प्राप्त किया जा सके।
- जब किसी नए मेट्रो मार्ग या राजमार्ग के निर्माण से समीपवर्ती भूमि के मूल्य में वृद्धि होती है, तो शहरी स्थानीय निकायों को इस अप्राप्त लाभांश (unearned increment) का एक हिस्सा “सुधार शुल्क” या उच्चतर FSI शुल्क के माध्यम से अर्जित करना चाहिये।
- इससे एक आत्मनिर्भर “सकारात्मक चक्र” (virtuous cycle) निर्मित होता है, जिसमें अवसंरचना स्वयं अपने लिये संसाधन जुटाती है, केंद्र पर वित्तीय निर्भरता कम होती है तथा निजी क्षेत्र को प्राप्त आकस्मिक लाभ का उपयोग सार्वजनिक हित में सुनिश्चित होता है।
- योजना बनाना: “ GIS-आधारित गतिशील मास्टर प्लान” को अनिवार्य बनाना:
- स्थिर और दीर्घकालिक (20 वर्षीय) मास्टर प्लान की व्यवस्था के स्थान पर गतिशील, GIS-आधारित स्थानीय क्षेत्र योजनाओं को अपनाया जाना चाहिये, जिन्हें वास्तविक समय में अद्यतन किया जा सके।
- उपग्रह आँकड़ों को स्थानीय स्तर से प्राप्त सूचनाओं के साथ समेकित कर शहर भूमि उपयोग में परिवर्तन, अतिक्रमण तथा हरित आवरण की निरंतर और सक्रिय निगरानी कर सकते हैं, जिससे पुराने तथा अप्रासंगिक मानचित्रों पर निर्भरता कम होगी।
- इससे “त्वरित योजना” (Agile Planning) को बढ़ावा मिलेगा, जिसमें आर्थिक आवश्यकताओं अथवा जलवायु जोखिमों के अनुरूप ज़ोनिंग विनियमों को शीघ्र अनुकूलित किया जा सकेगा, और वर्तमान में शहरी परिधि क्षेत्रों में देखे जा रहे अव्यवस्थित एवं अवैध शहरी विस्तार पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।
- शासन: अति-स्थानीय लोकतंत्र के लिये "क्षेत्रीय सभाओं" को सशक्त बनाना:
- 74वें संविधान संशोधन के वास्तविक क्रियान्वयन के लिये राज्यों को वार्ड समितियों से आगे बढ़ते हुए क्षेत्रीय सभाओं को वैधानिक शक्तियाँ हस्तांतरित करनी होंगी।
- सहभागी बजट को कानूनी रूप से अनिवार्य किये जाने पर ये सभाएँ स्थानीय पार्क, स्ट्रीटलाइट तथा जल निकासी जैसी सेवाओं हेतु विशिष्ट आवंटनों पर मतदान कर सकेंगी, जिससे नागरिक निष्क्रिय मतदाता के बजाए सक्रिय भागीदार बनेंगे।
- यह अति-स्थानीय निगरानी एक प्रभावी सामाजिक लेखापरीक्षा तंत्र का निर्माण करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि नगरपालिका निधि दिखावटी परियोजनाओं के बजाए वास्तविक जमीनी स्तर की आवश्यकताओं पर व्यय की जाती है।
- स्थिरता: "जल-शोषक शहर" संरचना को अपनाना:
- शहरी प्रशासन को सभी भवन उपनियमों और सार्वजनिक कार्यों में जल-शोषक शहर सिद्धांतों को कानूनी रूप से अनिवार्य करके जलवायु अनुकूलन को आत्मसात करना चाहिये।
- इसमें बड़े परिसरों के लिये "शून्य अपवाह" (zero-runoff) नियमों को लागू करना, शहरी आर्द्रभूमि को पुनर्जीवित करना और बाढ़ के पानी को अवशोषित करने के लिये फुटपाथों के लिये पारगम्य सामग्री का उपयोग करना शामिल है।
- “कंक्रीट-केंद्रित” अभियंत्रण से “प्रकृति-आधारित समाधानों” की ओर संक्रमण नगर को स्वयं एक जल-संग्रह अवसंरचना में रूपांतरित करता है, जिससे शहरी बाढ़ और जल-अभाव की दोहरी समस्या का समवर्ती समाधान संभव होता है।
- क्षेत्रीय: महानगरीय योजना समितियों” (MPC) को सक्रिय करना:
- शहर की सीमाओं से परे फैलने वाले अराजक शहरी विस्तार को नियंत्रित करने हेतु, संवैधानिक रूप से अनिवार्य महानगरीय नियोजन समितियों (MPC) को बाध्यकारी अधिकारों के साथ सक्रिय किया जाना आवश्यक है।
- वर्तमान में, शहरी बाहरी क्षेत्र एक “निर्जन क्षेत्र” के रूप में रह जाता है, जिसका संचालन ग्रामीण पंचायतों द्वारा किया जाता है, जो शहरीकरण के लिये अपर्याप्त रूप से सुसज्जित हैं। MPC इन खंडित अधिकार क्षेत्रों को एकीकृत क्षेत्रीय योजना के तहत समन्वित करेंगी।
- इससे सुनिश्चित होगा कि जल आपूर्ति, सीवेज और परिवहन जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं की योजना पूरे महानगरीय क्षेत्र के लिये समग्र रूप से बनाई जाए, जिससे बिना सुविधाओं वाले “जनगणना नगरों” (census towns) के गठन को रोका जा सके।
- जवाबदेही: नगरपालिकाओं के लिये "सेवाओं का अधिकार अधिनियम" बनाना:
- राज्यों को सख्त शहरी सार्वजनिक सेवा अधिकार अधिनियम लागू करना चाहिये, जिसमें जन्म प्रमाण-पत्र, जल कनेक्शन, सड़क और गड्ढों की मरम्मत जैसी नगरपालिका सेवाओं के लिये स्पष्ट समय-सीमाएँ निर्धारित हों।
- इस कानून में स्वचालित दंड प्रावधान शामिल होने चाहियें, जिसके तहत विलंब होने पर ज़िम्मेदार अधिकारी के वेतन से जुर्माना काटा जाए और नागरिक को भरपाई प्रदान की जाए।
- इससे प्रशासनिक संस्कृति “मनमानी से दिये जाने वाले विशेषाधिकार” से हटकर “अधिकारित हक” की ओर स्थानांतरित होती है, जिससे नौकरशाही को सेवा स्तर मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है, अन्यथा सीधे वित्तीय परिणामों का सामना करना पड़ता है।
निष्कर्ष:
भारत के विकसित भारत के दृष्टिकोण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि शहरी स्थानीय निकायों को 74वें संविधान संशोधन के तहत वास्तविक अधिकार और सशक्तीकरण प्रदान किया जाए, न कि औपनिवेशिक काल के नौकरशाही नियंत्रण में ही रह जाने दिया जाए।महापौर की भूमिका को सशक्त बनाना, वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित करना तथा नागरिक भागीदारी को बढ़ाना शहरों को अनुकूलित एवं विकासोन्मुखी इंजन में बदलने, सतत विकास लक्ष्य 11 (सतत शहर और समुदाय) को आगे बढ़ाने व सतत शहरी विकास के लिये आवश्यक जवाबदेही को सुदृढ़ करने के लिये आवश्यक है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न 74वें संविधान संशोधन के तहत संवैधानिक मान्यता मिलने के बावजूद, भारत में शहरी स्थानीय निकाय सीमित स्वायत्तता और खंडित जवाबदेही की समस्या से ग्रस्त हैं। भारत के शहरी शासन ढाँचे में विद्यमान संरचनात्मक तथा संस्थागत चुनौतियों का गहन विश्लेषण कीजिये तथा शहरों को समावेशी एवं सतत विकास के प्रभावी इंजन में बदलने के लिये आवश्यक सुधारों का सुझाव दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: भारत के शहरी शासन को अक्सर "औपनिवेशिक" क्यों कहा जाता है?
भारत के शहर अभी भी ब्रिटिश राज से विरासत में मिले नौकरशाही-केंद्रित मॉडल के तहत संचालित होते हैं, जहाँ वास्तविक कार्यकारी शक्ति राज्य द्वारा नियुक्त आयुक्तों के पास होती है, न कि निर्वाचित महापौरों के पास। इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही कमज़ोर होती है और शहरी स्थानीय निकाय राज्य सरकारों के प्रशासनिक अंग तक सीमित रह जाते हैं।
प्रश्न 2: 74वाँ संविधान संशोधन शहरी केंद्रों को सशक्त बनाने में कहाँ विफल रहा?
74वें संशोधन ने शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को संवैधानिक मान्यता दी और 12वें अनुसूची में 18 कार्य सूचीबद्ध किये, अधिकांश राज्यों ने वित्त, कार्य या कर्मियों का वास्तविक रूप से अधिकारिक हस्तांतरण नहीं किया। परिणामस्वरूप विकेंद्रीकरण ज्यादातर कागज़ों तक ही सीमित है, व्यवहार में नहीं।
प्रश्न 3: नगरपालिका प्रशासन को कमज़ोर करने में अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं और विशेष प्रयोजन इकाई (SPV) की क्या भूमिका है?
राज्य-नियंत्रित अर्द्ध-सरकारी संस्थाएँ और SPV, योजना, परिवहन तथा जल आपूर्ति जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यों को अपने हाथ में लेकर निर्वाचित शहरी स्थानीय निकायों (ULB) को दरकिनार कर देती हैं। इससे अधिकार का विखंडन, जवाबदेही की अस्पष्टता एवं नगरपालिकाओं के लिये "अधिकारहीन उत्तरदायित्व" की स्थिति उत्पन्न होती है।
प्रश्न 4: निर्वाचित होने के बावजूद भारतीय महापौर अधिकतर अप्रभावी क्यों होते हैं?
अधिकांश शहरों में, महापौरों के पास कार्यकारी अधिकार, कर्मचारियों पर नियंत्रण या वित्तीय स्वायत्तता का अभाव होता है, जबकि नगर आयुक्त राज्य के प्रति जवाबदेह होते हैं, न कि नागरिकों के प्रति। इससे मतदाताओं, प्रतिनिधियों और सेवा वितरण के बीच लोकतांत्रिक समन्वय टूट जाता है।
प्रश्न 5: कमज़ोर शहरी प्रशासन भारत के 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य के लिये खतरा क्यों है?
कमज़ोर प्रबंधित शहरों में आवास, जल, स्वच्छता और जलवायु परिवर्तन से निपटने की अपर्याप्त व्यवस्था है, जिसके कारण लाखों लोग अनौपचारिक तथा असुरक्षित जीवन स्थितियों में रहने को मजबूर हैं। सशक्त नगरपालिकाओं के बिना, भारत का शहरी संक्रमण विकास के चालक की बजाए अवरोध बन सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. संविधान (73वाँ संशोधन) अधिनियम, 1992, जिसका लक्ष्य देश में पंचायती राज संस्थापनों को प्रोत्साहित करना है, निम्नलिखित में से किस/किन चीजों की व्यवस्था करता है? (2011)
- ज़िला योजना समितियों का गठन करने की
- राज्य निर्वाचन आयोगों द्वारा सभी पंचायतों का चुनाव करने की
- राज्य वित्त आयोगों की स्थापना करने की
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: c
मेन्स
प्रश्न 1. क्या कमज़ोर और पिछड़े समुदायों के लिये आवश्यक सामाजिक संसाधनों को सुरक्षित करने के द्वारा, उनकी उन्नति के लिये सरकारी योजनाएँ, शहरी अर्थव्यवस्थाओं में व्यवसायों की स्थापना करने में उनको बहिष्कृत कर देती हैं? (2014)
प्रश्न 2. तेरहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं की विवेचना कीजिये, जो स्थानीय शासन की वित्त-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिये पिछले आयोगों से भिन्न हैं। (2013)