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डेली न्यूज़

  • 27 Apr, 2020
  • 39 min read
सामाजिक न्याय

नाबालिगों के लिये मृत्युदंड की सजा पर प्रतिबंध

प्रीलिम्स के लिये

मृत्युदंड, एमनेस्टी इंटरनेशनल

मेन्स के लिये

मौजूदा समय में मृत्युदंड की प्रासंगिकता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सऊदी अरब ने नाबालिगों द्वारा किये गए अपराधों के लिये मृत्युदंड की सजा के प्रावधान को समाप्त कर दिया है, ध्यातव्य है कि इससे पूर्व सऊदी अरब में कोड़े अथवा चाबुक मरने की सजा को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

प्रमुख बिंदु

  • नाबालिगों के लिये मृत्युदंड की सजा को समाप्त करना सऊदी अरब के शाही परिवार द्वारा किये गए मानवाधिकार सुधारों की श्रृंखला में एक नवीनतम कदम है।
  • यह घोषणा सऊदी अरब के राष्ट्र समर्थित मानवाधिकार आयोग द्वारा की गई है। आयोग के अनुसार, नवीनतम सुधार यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी व्यक्ति जो नाबालिग के तौर पर अपराध करता है, उसे मृत्युदंड की सजा न दी जाए।
  • मृत्युदंड के स्थान पर उस नाबालिग अपराधी को अधिकतम 10 वर्ष के लिये जुवेनाइल डिटेंशन फैसिलिटी (Juvenile Detention Facility) में भेजा जाएगा।

 सऊदी अरब- एक क्रूर देश के रूप में

  • मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने ईरान और चीन के बाद सऊदी अरब को लोगों को मरने वाले दुनिया के सबसे क्रूर देश के रूप में सूचीबद्ध किया है।
  • एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा कि  सऊदी अरब में वर्ष 2019 में लगभग 184 लोगों को मृत्युदंड की सजा दी गई थी।
    • वर्ष 2019 में मृत्युदंड देने वाले शीर्ष देशों में चीन (1000 मृत्यु); ईरान (251 मृत्यु); सऊदी अरब (184 मृत्यु); इराक (100 मृत्यु) और मिस्र (32 मृत्यु) शामिल हैं।
  • सऊदी अरब में जिन लोगों को मृत्युदंड की सजा दी गई, उनमें से अधिक लोगों को नशीली दवाओं और हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था।
  • एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में सऊदी अरब में अल्पसंख्यक शिया मुस्लिमों के विरुद्ध राजनीतिक हथियार के तौर पर मृत्युदंड के बढ़ते उपयोग पर चिंता ज़ाहिर की थी।
    • एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार 23 अप्रैल, 2019 को सऊदी अरब में 37 लोगों की सामूहिक रूप से मृत्यु कर दी गई, जिनमें से 32 शिया पुरुष थे, जिन्हें ‘आतंकवाद’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

कोड़े अथवा चाबुक मरने की सजा प्रतिबंधित

  • नाबालिगों के लिये मृत्युदंड को प्रतिबंधित करने से पूर्व सऊदी अरब ने कोड़े अथवा चाबुक मारने की सजा पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।
  • इस प्रकार की सजा को समाप्त करने से पूर्व इसका प्रयोग हत्या, शांति भंग करना, समलैंगिकता, शराब का प्रयोग करने, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने और इस्लाम का अपमान करने जैसे अपराधों के लिये किया जाता था।
    • वर्ष 2018 में महिला ड्राइवरों पर प्रतिबंध हटाए जाने से पूर्व, ड्राइविंग करने वाली किसी भी महिला को कोड़े मारने की सजा दी जा सकती थी।
  • उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 में ब्लॉगर रायफ बदावी (Raif Badawi) को 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी और साथ ही ‘इस्लाम का अपमान’ करने के आरोप में उन्हें 1,000 चाबुक की सजा भी दी गई थी।

मौजूदा समय में मृत्युदंड

  • मृत्युदंड (Capital Punishment) विश्व में किसी भी तरह के दंड कानून के तहत किसी व्यक्ति को दी जाने वाली उच्चतम सज़ा होती है। मानवाधिकार के दृष्टिकोण से मृत्युदंड सदैव ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है।
  • मृत्युदंड का प्रावधान मानव समाज में आदिम काल से लेकर आज तक उपस्थित है, किंतु इसके पीछे के कारणों और इसके निष्पादन के तरीकों में समय के साथ निरंतर बदलाव आता गया।
    • मृत्युदंड का पहला उल्लेख ईसा पूर्व अठारहवीं सदी के ‘हम्मूराबी की विधान संहिता’ में मिलता है जहाँ 25 प्रकार के अपराधों के लिये मृत्युदंड का प्रावधान था। 
  • एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, वर्ष 2017 तक 106 देश ऐसे थे जहाँ मृत्युदंड की सजा का प्रयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है। वहीं 7 देश ऐसे हैं जो असाधारण परिस्थितियों में गंभीर अपराधों के लिये मृत्युदंड की सजा की अनुमति देते हैं, जैसे कि युद्ध के समय में किये गए अपराध।
  • विश्व में कुल 56 देश ऐसे है जिन्होंने अपने कानून में मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखा है या अधिकारियों द्वारा इसका प्रयोग करने के संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
  • यह एक प्रचलित अवधारणा है कि समय के साथ दंड विधान भी अधिक नरम होते जाते हैं और क्रूरतम प्रकृति की सजा क्रमशः चलन से बाहर हो जाती है।
  • वहीं ऐसा कोई भी अध्ययन नहीं है जो यह स्पष्ट करता हो कि अपराध को रोकने में मृत्युदंड आजीवन कारावास की अपेक्षा अधिक कारगर है। अतः मात्र कल्पनाओं के आधार पर मृत्युदंड को अधिक कठोर नहीं माना जा सकता।
  • इसके विपरीत मृत्युदंड के समर्थकों का मत है कि हत्या करने वाला व्यक्ति किसी के जीवन जीने का अधिकार छीन लेता है जिसके कारण उसके जीवन का अधिकार भी समाप्त हो जाता है। इस प्रकार मृत्युदंड एक प्रकार का प्रतिकार होता है।

आगे की राह

  • सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्त्व में देश को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से कई सामाजिक और आर्थिक सुधारों की शुरुआत की गई है।
  • हालाँकि यह सिर्फ एक शुरुआत ही है और सऊदी अरब में मानवाधिकार तथा समाज सुधार के क्षेत्र में अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है।
  • अंततः महात्मा गांधी ने कहा है कि ‘नफरत अपराधी से नहीं, अपराध से होनी चाहिये’।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


शासन व्यवस्था

केंदुझर तथा अनूपपुर में क्रेच की स्थापना

प्रीलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय क्रेच (शिशुगृह) योजना, ज़िला खनिज फाउंडेशन, एकीकृत बाल विकास सेवा

मेन्स के लिये:

बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी समस्या दूर करने हेतु सरकार द्वारा किये गए प्रयास 

चर्चा में क्यों?

सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (Centre for Science and Environment- CSE) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के दो प्रमुख खनन ज़िलों में ज़िला खनिज फाउंडेशन (District Mineral Foundation-DMF) कोष के तहत बच्चों के लिये क्रेच (शिशुगृह) खोले गए हैं।

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि केंदुझर (ओडिशा) और अनूपपुर (मध्य प्रदेश) ज़िलों में कुपोषण खत्म करने हेतु स्थानीय लोगों एवं गैर-लाभकारी संगठन की सहभागिता से क्रेच (शिशु गृह) खोले गए हैं।
  • ध्यातव्य है कि बच्चों के जीवन के प्रथम तीन वर्ष दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। अतः इस क्रेच (शिशुगृह) का  उद्देश्य 0-3 वर्ष के बच्चों की पोषण आवश्यकताओं को पूरा करना है।

केंदुझर के संदर्भ में:

  • केंदुझर DMF के माध्यम से क्रेच में निवेश करने वाला भारत का पहला जिला था।
  • वर्ष 2018 में, केंदुझर जिले ने क्रेच (शिशुगृह) स्थापित करने के लिये एकजुट (Ekjut) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये।
    • एकजुट एक संगठन है जो बाल पोषण के संबंध में झारखंड तथा ओडिशा के आदिवासी इलाकों में कार्यरत है।
  • ज्ञातव्य है कि देशभर में केंदुझर ज़िला लौह अयस्क का सबसे बड़ा उत्पादक तथा ज़िला खनिज फाउंडेशन के तहत सबसे ज्यादा धनराशि प्राप्तकर्त्ता है। इस ज़िले में लगभग 45% आदिवासी रहते हैं।
  • केंदुझर ज़िले के बच्चों में पोषण मानक स्तर से काफी कम है। पाँच वर्ष से कम उम्र के लगभग 44% बच्चे बौने (Stunted) और कम वज़न (Underweight) वाले हैं। 
  • वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (Annual Health Survey)-2012 के अनुसार, पाँच वर्ष से कम आयु वाले बच्चों की मृत्यु दर 70 (प्रति 1000 बच्चों में) है। 
  • खनन प्रभावित बंसपाल और हरिचंदनपुर जैसे क्षेत्रो को ध्यान में रखते हुए पहले से चल रहे 30  क्रेच (शिशुगृह) की संख्या को अब दोगुना कर दिया गया है। 60  क्रेच (शिशुगृह) के संचालन हेतु वार्षिक खर्च लगभग 2.5 करोड़ रुपए है।

अनूपपुर के संदर्भ में:

  • अनूपपुर ज़िले में लगभग 40% कम वज़न (Underweight) वाले तथा 33% बौने (Stunted) बच्चे हैं।
  • 0-3 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी समस्या दूर करने हेतु जन स्वास्थ्य सहयोग (Jan Swasthya Sahyog-JSS) संस्था से एक समझौते के तहत ‘फुलवारिस’ (Phulwaris) क्रेच की स्थापना की गई है। इसे एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में शुरू किया गया है। वर्तमान में कुल 56 फुलवारिस संचालित किये जा रहे हैं।
  • ‘फुलवारी’ का संचालन व्यय (वार्षिक अनुमानित खर्च 1 लाख रुपए) DMF कोष के तहत होगा। पर्यवेक्षकों तथा परियोजना समन्वयक के वेतन का भुगतान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (National Health Mission- NHM) के अंतर्गत किया जाएगा।
  • बच्चों की देखभाल करने हेतु गाँव की महिलाओं को नियुक्त किया जाएगा।

ज़िला खनिज फाउंडेशन

(District Mineral Foundation-DMF):

  • DMF एक गैर-लाभकारी स्वायत्त ट्रस्ट है, जो खनन संबंधी संचालन से प्रभावित प्रत्येक ज़िले के समुदायों के हितों की रक्षा करता है और उन क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों को लाभ पहुँचाने का कार्य करता है।
  • DMF ‘खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम’ (MMDR) 1957, जिसमें वर्ष 2015 में संशोधन किया गया था, के तहत मान्यता प्राप्त है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट

(Centre for Science and Environment):

  • यह एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो भारत में पर्यावरण-विकास के मुद्दों पर थिंक टैंक के रूप में कार्य करता है।
  • इस संगठन ने वायु और जल प्रदूषण, अपशिष्ट जल प्रबंधन, औद्योगिक प्रदूषण, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संबंधी पर्यावरण के मुद्दों पर जागरूकता एवं शिक्षा का प्रसार करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
  • पर्यावरण शिक्षा और संरक्षण की दिशा में इसके योगदान के कारण वर्ष 2018 में इसे शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिये इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


भारतीय राजनीति

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामला

प्रीलिम्स के लिये:

आधारभूत संरचना, आधारभूत संरचना की सूची, शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार मामला, सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार मामला, केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार मामला, आरसी कूपर बनाम भारतीय संघ मामला, मदनराव सिंधिया बनाम भारतीय संघ मामला 

मेन्स के लिये:

भारतीय संविधान में आधारभूत संरचना का महत्त्व 

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने 47 वर्ष पूर्व 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य' (24 अप्रैल, 1973) मामले में संविधान की ‘आधारभूत संरचना’ (Basic Structure) का ऐतिहासिक सिद्धांत दिया था। 

मुख्य बिंदु:

  • 13 न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 7-6 के बहुमत से निर्णय किया कि संविधान की 'आधारभूत संरचना' अनुल्लंघनीय है और इसे संसद द्वारा परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। 
  • ‘आधारभूत संरचना’ को इस निर्णय के बाद से भारतीय संविधान में एक सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है।

संविधान की आधारभूत संरचना

(Basic Structure of the Constitution):

  • संविधान की आधारभूत संरचना का तात्पर्य संविधान में निहित उन प्रावधानों से है, जो भारतीय संविधान के लोकतांत्रिक आदर्शों को प्रस्तुत करते हैं। इन प्रावधानों को संविधान में संशोधन के द्वारा भी नहीं हटाया जा सकता है।
  • वस्तुतः ये प्रावधान अपने आप में इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि इनमें नकारात्मक बदलाव से संविधान का सार-तत्त्व, जो जनमानस के विकास के लिये आवश्यक है, नकारात्मक रूप से प्रभावित होगा।

‘आधारभूत संरचना’ सिद्धांत का विकास:

  • संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति क्या हो सकती है? इस पर भारतीय संविधान को अपनाने के बाद से ही बहस छिड़ी हुई है।
  • संसद को पूर्ण शक्ति:
    • स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार मामला’ (1951) और ‘सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार मामला’ (1965) जैसे मामलों में निर्णय देते हुए संसद को संविधान में संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्रदान की गई।
    • इसका कारण यह माना जाता है कि स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्त्व पर विश्वास जताया क्योंकि उस समय प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी संसद सदस्यों के रूप में सेवा कर रहे थे।
  • मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं:
    • जब सत्तारूढ़ सरकारों ने अपने राजनीतिक हितों के लिये संविधान में संशोधन करना चाहा तब ‘गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार’ (1967) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि "संसद अनुच्छेद 368 के अधीन मौलिक अधिकारों को समाप्त या सीमित करने की शक्ति नहीं रखती है। "
  • संसद और न्यायपालिका के बीच टकराव:
    • 1970 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन सरकार द्वारा ‘आरसी. कूपर बनाम भारतीय संघ (1970), ‘मदनराव सिंधिया बनाम भारत संघ (1970) आदि मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णयों को बदलने के लिये संविधान (24, 25, 26 और 29 वें) में व्यापक संशोधन किये गए।
    • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ‘आरसी कूपर’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी सरकार के ‘बैंकों के राष्ट्रीयकरण’ करने के निर्णय को अवैध घोषित किया गया था। जबकि ‘माधवराव सिंधिया’ मामले में पूर्व शासकों को दी जाने वाली ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त करने संबंधी संशोधन को अवैध घोषित किया गया था।
  • केशवानंद भारती मामला:
    • 24, 25, 26 और 29 वें संविधान संशोधनों तथा गोलकनाथ मामले के निर्णय को केशवानंद भारती मामले में चुनौती दी गई। 
    • चूंकि गोलकनाथ मामले का निर्णय ग्यारह न्यायाधीशों द्वारा किया गया था, इसलिये  इस मामले में सुनवाई के लिये एक बड़ी पीठ की आवश्यकता थी और इस प्रकार केशवानंद मामले में 13 न्यायाधीशों की पीठ का गठन किया, जहाँ प्रख्यात कानूनविद नानी पालखीवाला, फली नरीमन, सोली सोराबजी आदि ने सरकार के खिलाफ मामला प्रस्तुत किया।
  • आधारभूत संरचना का सिद्धांत: 
    • केशवानंद भारती की संवैधानिक पीठ में, सदस्यों के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद देखने को मिले तथा पीठ ने 7-6 से निर्णय किया कि संसद को संविधान के 'आधारभूत संरचना' में बदलाव करने से रोका जाना चाहिये। 
    • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 368; जो संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियाँ प्रदान करता है, के तहत संविधान की आधारभूत संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता है। 

‘आधारभूत संरचना’ की सूची:

  • यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने 'आधारभूत संरचना' को परिभाषित नहीं किया परंतु संविधान की कुछ विशेताओं को ‘आधारभूत संरचना’ के रूप निर्धारित किया है, यथा- संघवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र आदि। तब से अदालत ने इस सूची का निरंतर विस्तार किया है। 
  • निम्नलिखित को सर्वोच्च न्यायालय ने आधारभूत संरचना के रूप में सूचीबद्ध किया गया है:
    • संविधान की सर्वोच्चता
    • कानून का शासन
    • न्यायपालिका की स्वतंत्रता
    • शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत
    • संघवाद
    • धर्मनिरपेक्षता
    • संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य
    • संसदीय प्रणाली
    • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव
    • कल्याणकारी राज्य 

आधारभूत संरचना का महत्त्व:

  • किसी भी देश का संविधान उस देश के मौलिक नियमों का दस्तावेज़ होता है। इस दस्तावेज़ के आधार पर ही अन्य सभी कानून बनाए तथा लागू किये जाते हैं। 
  • संविधान के कुछ भागों को अन्य प्रावधानों की तुलना में विशेष दर्जा दिया जाता है तथा संविधान के ये भाग, व्यापक संविधान संशोधनों से संविधान की रक्षा करते हैं।
  • आधरभूत संरचना के महत्त्व को ‘एस. आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार’ (1994) मामले से समझ सकते हैं।  सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद राष्ट्रपति द्वारा भाजपा सरकारों की बर्खास्तगी को बरकरार रखा गया तथा सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इन सरकारों की बर्खास्तगी धर्मनिरपेक्षता के लिये आवश्यक है। 

आधारभूत संरचना की आलोचना:

  • आलोचकों ने इस सिद्धांत को अलोकतांत्रिक कहा है क्योंकि न्यायाधीश जो चुने हुए प्रतिनिधि नहीं है, संसद द्वारा पारित किये गए संविधान संशोधन को अवैध घोषित करके न्यायिक अतिक्रमण करते हैं।  जबकि समर्थकों ने इसे बहुलवाद और अधिनायकवाद के खिलाफ सुरक्षा के रूप में माना है।

आगे की राह:

  • भारतीय संविधान आज़ादी के 70 वर्षों बाद भी एक जीवंत दस्तावेज़ की तरह अपना अस्तित्त्व बनाए हुए है। भारतीय न्यायपालिका और संवैधानिक व्याख्या की प्रक्रिया अनवरत विकास कर रही है। आवश्यक है कि संविधान के माध्यम से भारतीय न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही के मध्य संतुलन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने का प्रयास किया जाए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

देवनहल्ली पोमेलो

प्रीलिम्स के लिये: 

देवनहल्ली पोमेलो

मेन्स के लिये:

भौगोलिक संकेतक 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘बंगलौर इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड’ (Bangalore International Airport Limited- BIAL) ने अपनी ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी’ (Corporate Social Responsibility- CSR) के हिस्से के रूप में 500 देवनहल्ली पोमेलो (Devanahalli Pomelo) के पेड़ लगाने का निर्णय लिया है। 

मुख्य बिंदु:

  • अपने अनूठे स्वाद के कारण देवनाहल्ली पोमेलो को ‘भौगोलिक संकेतक’ (Geographical Indication) के रूप में मान्यता प्राप्त है। देवनाहल्ली पोमेलो को लोकप्रिय रूप से ‘चकोटा’ (Chakota) के रूप में भी जाना जाता है।
  • नगरीकरण तथा भू-परिदृश्य में बदलाव के कारण ‘देवनहल्ली पोमेलो’ फल उगाने वाले किसानों की संख्या में लगातार कमी आई है।
  • देवनहल्ली पोमेलो एक साइट्रस फल (Citrus) की किस्म है, जो लगभग विलुप्त होने के कगार पर है। 

साइट्रस (Citrus):

  • साइट्रस रूई परिवार (Rue Family) के फूलों वाले वृक्षों और झाड़ियों का एक समूह है।
  • इस समूह के पौधे खट्टे फलों का उत्पादन करते हैं, जिसमें संतरे, नींबू, अंगूर, पोमेलो आदि शामिल हैं।

चकोटा की कृषि

  • चकोटा की कृषि मुख्यत: कर्नाटक के देवनहल्ली और डोड्डाबल्लापुर क्षेत्रों (कर्नाटक) में की जाती है। 
  • चकोटा को इन क्षेत्रों में किसान द्वारा खेतों की मेड़ पर या घरों के आसपास उगाया जाता है तथा यह प्रथा वर्षों से चली आ रही है।
  • चकोटा फलों को GI टैग मिलने के बाद किसान पौधे उगाने के लिये आगे आ रहे हैं तथा वर्तमान में इन फलों को बागानों में उगाने के लिये सरकार मदद कर रही है।

पोमेला फल की विशेषता:

  • पोमेलो को अंगूरों का जनक फल माना जाता है जो विटामिन C से भरपूर होता है। 
  • पोमेलो का वैज्ञानिक नाम ‘साइट्रस मैक्सिमा’ (Citrus Maxima) है।
  • प्रत्येक मौसम में पोमेलो के वृक्ष में लगभग 24 इंच की वृद्धि होती जो 25 फीट की ऊँचाई तक पहुँच सकता है। यह लगभग 50-150 वर्षों तक जीवित रह सकता है। 
  • प्रत्येक वृक्ष प्रतिवर्ष औसतन 300 से 400 फल देता है, जिसमें प्रत्येक फल आमतौर पर 2 से 2.5 किलोग्राम वजन का होता है। 
  • पोमेलो के फल गुलाबी या लाल रंग के तथा रसीले होते हैं।

स्रोत: द हिंदू


जीव विज्ञान और पर्यावरण

एटालिन जलविद्युत परियोजना और पर्यावरणीय मुद्दे

प्रीलिम्स के लिये:

वन सलाहकार समिति, प्रतिपूरक वनीकरण

मेन्स के लिये:

जलविद्युत परियोजना से उत्पन्न चुनौतियों से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी में प्रस्तावित 3097 मेगावाट की एटालिन जलविद्युत परियोजना की वजह से लगभग 270,000 पेड़ों की कटाई होने से जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर विभिन्न पक्षों में अंतर्विरोध की स्थिति उत्पन्न हुई है।  

प्रमुख बिंदु:

  • एटालिन जलविद्युत परियोजना दिबांग नदी पर प्रस्तावित है। इसके पूर्ण होने की समयावधि 7 वर्ष निर्धारित की गई है।
  • इस क्षेत्र में पक्षियों की 680 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो भारत में पाई जाने वाली कुल पक्षियों की प्रजातियों (Avian Species) का लगभग 56% है।
  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act, 1980) के प्रावधानों के तहत जब भी खनन या अवसंरचना विकास जैसे गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिये वन भूमि का उपयोग किया जाता है तो बदले में उस भूमि के बराबर गैर-वन भूमि अथवा निम्नीकृत भूमि के दोगुने के बराबर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) करना होता है।
  • पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee-FAC) से प्रस्तावित परियोजना को मंज़ूरी मिलनी बाकी है।
  • FAC के अनुसार, 1074.329 हेक्टेयर भूमि पर 19.6 करोड़ रुपए की लागत से प्रतिपूरक वनीकरण किया जाएगा।

वन सलाहकार समिति

(Forest Advisory Committee-FAC):

  • वन सलाहकार समिति औद्योगिक गतिविधियों के लिये वनों में पेड़ों की कटाई की अनुमति पर निर्णय लेती है।
  • FAC केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change-MOEF&CC) के अंतर्गत कार्यरत है, जिसमें केंद्र के वानिकी विभाग के स्वतंत्र विशेषज्ञ और अधिकारी शामिल होते हैं।

प्रतिपूरक वनीकरण

(Compensatory Afforestation):

  • प्रतिपूरक वनीकरण का आशय आधुनिकीकरण तथा विकास के लिये काटे गए वनों के स्थान पर नए वनों को लगाने से है। अर्थात् उद्योगों द्वारा वनों के नुकसान की प्रति पूर्ति हेतु वैकल्पिक भूमि का अधिग्रहण किया जाता है।

पर्यावरणविद् एवं स्थानीय निवासियों का मत:

  • स्थानीय निवासियों के अनुसार, दिबांग क्षेत्र में दो बांध प्रस्तावित ‘दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना’ और ‘एटलिन जल विद्युत परियोजना’ दोनों एक साथ एक बहुत बड़े क्षेत्र को जलमग्न कर देगीं।
  • पर्यावरणविदों एवं स्थानीय निवासियों का मत है कि परियोजना की वज़ह से विकृत पारिस्थितिकी को कृत्रिम वृक्षारोपण की सहायता से यथास्थिति में नहीं लाया जा सकता है।
  • इडू मिश्मी समुदाय (Idu Mishmi Community) के लोग चारागाह भूमि, वनों और वन्यजीवों को होने वाले नुकसान को लेकर चिंतित हैं।
  • दिबांग घाटी के अन्य हिस्सों के लोगों से न तो परामर्श लिया गया और न ही सार्वजनिक सुनवाई में पारिस्थितिकी नुकसान के बारे में बोलने की अनुमति दी गई।

आगे की राह:

  • व्यक्तियों/सरकारों को ज़रूरतों को पूरा करने के साथ-साथ प्रकृति के ह्रास के मानवीय कारणों को नियंत्रित करना चाहिये, जिससे मानव और प्रकृति के बीच का संतुलन बना रहे। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों कम करने तथा इसको दूर करने के लिये वन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करते हैं। अतः आवश्यक है कि वनों की कटाई और वृक्षारोपण जैसे मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाए तथा इस विषय को नीति निर्माण के केंद्र में रखा जाए।


स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 27 अप्रैल, 2020

‘रुहदार’ वेंटिलेटर

IIT बॉम्बे, NIT श्रीनगर और इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IUST) के छात्रों के एक समूह ने स्थानीय स्‍तर पर उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग करते हुए कम लागत वाला वेंटिलेटर बनाया। समूह के लिये ‘रुहदार’ वेंटिलेटर के प्रोटोटाइप की लागत लगभग 10,000 रुपए रही वहीं समूह के अनुसार, जब इस वेंटिलेटर का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाएगा, तो वेंटिलेटर की लागत इससे बहुत कम हो जाएगी। ध्यातव्य है कि वेंटिलेटर COVID-19 से संक्रमित रोगियों के उपचार हेतु आवश्यक चिकित्सा अवसंरचना का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो गंभीर रूप से बीमार लोगों को श्वास लेने में सहायता प्रदान करते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, संक्रमित होने वालों में लगभग 80 प्रतिशत केवल सामान्य रूप से बीमार होते हैं, लगभग 15 प्रतिशत को ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है और शेष 5 प्रतिशत जिनकी स्थिति गंभीर या नाज़ुक होगी, उन्हें वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है। ‘रुहदार’ वेंटिलेटर के प्रोटोटाइप का मेडिकल परीक्षण किया जाना अभी शेष है। इस वेंटिलेटर को स्वीकृति मिलते ही इसका बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाएगा और लघु उद्योग को इसके उत्पादन में शामिल किया जाएगा।

देवानंद कुंवर

बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल तथा कांग्रेस के दिग्गज नेता देवानंद कुंवर का 77 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। ध्यातव्य है कि देवानंद कुंवर एक कुशल राजनेता, विधिवेत्ता, शिक्षाविद व प्रशासक थे। देवानंद कुंवर का जन्म वर्ष 1934 को असम में हुआ था। उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत गुवाहाटी में अंग्रेज़ी के एक शिक्षक के तौर पर की थी। देवानंद कुंवर वर्ष 1955 में छात्र नेता के रूप में कॉन्ग्रेस में शामिल हुए थे। देवानंद कुंवर 29 जून, 2009 से 21 मार्च, 2013 तक बिहार के राज्यपाल रहे, जिसके पश्चात् उन्हें त्रिपुरा के राज्यपाल के पद पर नियुक्त कर दिया गया और वे 25 मार्च 2013 से 29 जून 2014 तक इस पद पर रहे। विदित है कि देवानंद कुंवर को दिसंबर 2009 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था। देवानंद कुंवर वर्ष 1991 और वर्ष 2001 में असम मंत्रिमंडल के सदस्य भी रहे थे।

ओज़ोन परत का छिद्र बंद हुआ

यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट European Centre for Medium-Range Weather Forecasts-ECMWF) ने पुष्टि की है कि पृथ्वी के बाहरी वातावरण की सुरक्षा के लिये ज़िम्मेदार ओज़ोन परत पर बना सबसे बड़ा छिद्र बंद हो गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, आर्कटिक के ऊपर बना 10 लाख वर्ग किलोमीटर की परिधि वाला छिद्र बंद हो गया है, ध्यातव्य है कि यह ओज़ोन परत का सबसे बड़ा छिद्र था। अनुमानानुसार, यह छिद्र उत्तरी ध्रुव पर कम तापमान के परिणामस्वरूप बना था और इसकी खोज वैज्ञानिकों द्वारा इसी वर्ष मार्च माह में की गई थी। ओज़ोन (Ozone-O3) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली एक गैस है जो वायुमंडल में बेहद कम मात्रा में पाई जाती हैं। पृथ्वी की सतह से 30-32 किमी. की ऊँचाई पर इसकी सांद्रता अधिक होती है। यह हल्के नीले रंग की तीव्र गंध वाली विषैली गैस है। ओज़ोन गैस समतापमंडल (Stratosphere) में अत्यंत पतली एवं पारदर्शी परत के रूप में पाई जाती है। हमारे वायुमंडल में ओज़ोन परत का बहुत महत्त्व है क्योंकि यह सूर्य से आने वाले अल्ट्रा-वॉयलेट रेडिएशन यानी पराबैंगनी विकिरण को सोख लेती है। पराबैंगनी विकिरण मनुष्य, जीव जंतुओं और वनस्पतियों के लिये अत्यंत हानिकारक है। ओज़ोन परत को पृथ्वी का सुरक्षा कवच कहा जाता है, हालाँकि पृथ्वी पर लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के कारण इस कवच की मज़बूती लगातार कम होती जा रही है। यदि यह परत समाप्त हो जाती है तो मानव जीवन के लिये बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है।

विश्व बौद्धिक संपदा दिवस

प्रतिवर्ष 26 अप्रैल को दुनिया भर में विश्व बौद्धिक संपदा दिवस (World Intellectual Property Day) का आयोजन किया जाता है। इस दिवस के आयोजन का उद्देश्य पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क तथा डिज़ाइन के महत्त्व के संबंध में जागरूकता को बढ़ावा देना है। वर्ष 2020 के लिये विश्व बौद्धिक संपदा दिवस का थीम ‘इनोवेट फॉर ए ग्रीन फ्यूचर’ (Innovate for a Green Future) है। इस दिवस की स्थापना विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (World Intellectual Property Organization-WIPO) द्वारा वर्ष 2000 में की गई थी, ध्यातव्य है कि 26 अप्रैल, 1970 को विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की स्थापना हेतु समझौता अर्थात् WIPO कन्वेंशन (WIPO Convention) लागू हुआ था। WIPO बौद्धिक संपदा सेवाओं, नीति, सूचना और सहयोग के लिये एक वैश्विक मंच है। यह संगठन 193 सदस्य देशों के साथ संयुक्त राष्ट्र की एक स्व-वित्तपोषित एजेंसी है। इसका उद्देश्य एक संतुलित एवं प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा (IP) प्रणाली के विकास हेतु नेतृत्त्व करना है जो सभी के लाभ के लिये नवाचार और रचनात्मकता को सक्षम बनाता है। इसकी स्थापना वर्ष 1967 में की गई थी। इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विटज़रलैंड में है।


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