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केंदुझर तथा अनूपपुर में क्रेच की स्थापना

  • 27 Apr 2020
  • 6 min read

प्रीलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय क्रेच (शिशुगृह) योजना, ज़िला खनिज फाउंडेशन, एकीकृत बाल विकास सेवा

मेन्स के लिये:

बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी समस्या दूर करने हेतु सरकार द्वारा किये गए प्रयास 

चर्चा में क्यों?

सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (Centre for Science and Environment- CSE) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के दो प्रमुख खनन ज़िलों में ज़िला खनिज फाउंडेशन (District Mineral Foundation-DMF) कोष के तहत बच्चों के लिये क्रेच (शिशुगृह) खोले गए हैं।

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि केंदुझर (ओडिशा) और अनूपपुर (मध्य प्रदेश) ज़िलों में कुपोषण खत्म करने हेतु स्थानीय लोगों एवं गैर-लाभकारी संगठन की सहभागिता से क्रेच (शिशु गृह) खोले गए हैं।
  • ध्यातव्य है कि बच्चों के जीवन के प्रथम तीन वर्ष दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। अतः इस क्रेच (शिशुगृह) का  उद्देश्य 0-3 वर्ष के बच्चों की पोषण आवश्यकताओं को पूरा करना है।

केंदुझर के संदर्भ में:

  • केंदुझर DMF के माध्यम से क्रेच में निवेश करने वाला भारत का पहला जिला था।
  • वर्ष 2018 में, केंदुझर जिले ने क्रेच (शिशुगृह) स्थापित करने के लिये एकजुट (Ekjut) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये।
    • एकजुट एक संगठन है जो बाल पोषण के संबंध में झारखंड तथा ओडिशा के आदिवासी इलाकों में कार्यरत है।
  • ज्ञातव्य है कि देशभर में केंदुझर ज़िला लौह अयस्क का सबसे बड़ा उत्पादक तथा ज़िला खनिज फाउंडेशन के तहत सबसे ज्यादा धनराशि प्राप्तकर्त्ता है। इस ज़िले में लगभग 45% आदिवासी रहते हैं।
  • केंदुझर ज़िले के बच्चों में पोषण मानक स्तर से काफी कम है। पाँच वर्ष से कम उम्र के लगभग 44% बच्चे बौने (Stunted) और कम वज़न (Underweight) वाले हैं। 
  • वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (Annual Health Survey)-2012 के अनुसार, पाँच वर्ष से कम आयु वाले बच्चों की मृत्यु दर 70 (प्रति 1000 बच्चों में) है। 
  • खनन प्रभावित बंसपाल और हरिचंदनपुर जैसे क्षेत्रो को ध्यान में रखते हुए पहले से चल रहे 30  क्रेच (शिशुगृह) की संख्या को अब दोगुना कर दिया गया है। 60  क्रेच (शिशुगृह) के संचालन हेतु वार्षिक खर्च लगभग 2.5 करोड़ रुपए है।

अनूपपुर के संदर्भ में:

  • अनूपपुर ज़िले में लगभग 40% कम वज़न (Underweight) वाले तथा 33% बौने (Stunted) बच्चे हैं।
  • 0-3 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी समस्या दूर करने हेतु जन स्वास्थ्य सहयोग (Jan Swasthya Sahyog-JSS) संस्था से एक समझौते के तहत ‘फुलवारिस’ (Phulwaris) क्रेच की स्थापना की गई है। इसे एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में शुरू किया गया है। वर्तमान में कुल 56 फुलवारिस संचालित किये जा रहे हैं।
  • ‘फुलवारी’ का संचालन व्यय (वार्षिक अनुमानित खर्च 1 लाख रुपए) DMF कोष के तहत होगा। पर्यवेक्षकों तथा परियोजना समन्वयक के वेतन का भुगतान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (National Health Mission- NHM) के अंतर्गत किया जाएगा।
  • बच्चों की देखभाल करने हेतु गाँव की महिलाओं को नियुक्त किया जाएगा।

ज़िला खनिज फाउंडेशन

(District Mineral Foundation-DMF):

  • DMF एक गैर-लाभकारी स्वायत्त ट्रस्ट है, जो खनन संबंधी संचालन से प्रभावित प्रत्येक ज़िले के समुदायों के हितों की रक्षा करता है और उन क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों को लाभ पहुँचाने का कार्य करता है।
  • DMF ‘खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम’ (MMDR) 1957, जिसमें वर्ष 2015 में संशोधन किया गया था, के तहत मान्यता प्राप्त है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट

(Centre for Science and Environment):

  • यह एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो भारत में पर्यावरण-विकास के मुद्दों पर थिंक टैंक के रूप में कार्य करता है।
  • इस संगठन ने वायु और जल प्रदूषण, अपशिष्ट जल प्रबंधन, औद्योगिक प्रदूषण, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संबंधी पर्यावरण के मुद्दों पर जागरूकता एवं शिक्षा का प्रसार करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
  • पर्यावरण शिक्षा और संरक्षण की दिशा में इसके योगदान के कारण वर्ष 2018 में इसे शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिये इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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