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डेली न्यूज़

  • 26 Jul, 2022
  • 47 min read
शासन व्यवस्था

स्ट्रीट वेंडर्स

प्रिलिम्स के लिये:

नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्ट्रीट वेंडर्स ऑफ इंडिया, स्वनिधि, मूल अधिकार, डीपीएसपी, द स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट 

मेन्स के लिये:

असंगठित अर्थव्यवस्था का महत्त्व, स्ट्रीट वेंडर्स के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ और उनके समाधान हेतु उपाय, संबंधित सरकारी पहल

चर्चा में क्यों?  

हाल ही में आवास और शहरी मामलों के मंत्री ने "अतिक्रमणकारियों से स्व-रोगार तक (From Encroachers to Self-Employed)" विषय पर आयोजित नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्ट्रीट वेंडर्स ऑफ इंडिया (NASVI) की छठी बैठक को संबोधित किया। 

स्ट्रीट वेंडर्स: 

  • परिचय: 
    • स्ट्रीट वेंडर ऐसे व्यक्ति हैं जो सामान की बिक्री के लिये एक स्थायी निर्मित संरचना के बिना जनता को बड़े पैमाने पर वस्तुओं की बिक्री की पेशकश करते हैं 
    • स्ट्रीट वेंडर सामान को बेचने के लिये स्थायी रूप से फुटपाथ या अन्य सार्वजनिक/निजी स्थानों पर कब्ज़ा कर लेते हैं या अस्थायी तौर पर अपने सामान को ठेले (Push Carts) या सिर पर टोकरियों में लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। 
  • जनसंख्या 
    • दुनिया भर के प्रमुख शहरों में विशेष रूप से एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के विकासशील देशों में स्ट्रीट वेंडर की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। 
    • भारत में लगभग 49.48 लाख स्ट्रीट वेंडर्स की पहचान की गई है। 
      • उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 8.49 लाख, उसके बाद मध्य प्रदेश में 7.04 लाख स्ट्रीट वेंडर हैं 
      • दिल्ली में केवल 72,457 स्ट्रीट वेंडर हैं। 
      • सिक्किम में किसी स्ट्रीट वेंडर की पहचान नहीं की गई है। 
  • संवैधानिक प्रावधान: 
    • व्यापार करने का अधिकार: 
      • अनुच्छेद 19 (1) (g) भारतीय नागरिकों को किसी भी पेशे को अपनाने या व्यवसाय, व्यापार या वाणिज्य करने का मौलिक अधिकार देता है। 
    • कानून के समक्ष समानता: 
      • संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार, राज्य भारत के क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। 
    • सामाजिक न्याय: 
      • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है और अपने समस्त नागरिकों के लिये सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय, प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता सुनिश्चित करेगा। 
    • निदेशक सिद्धांत:  
      • अनुच्छेद 38(1) के तहत राज्य द्वारा सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित कर लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने का निर्देश देना है, जिस्में राष्ट्रीय संस्थाओं में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित किया जाएगा 
      • अनुच्छेद 38 (2) 'आय की स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को कम करने' का निर्देश देता है। 
      • अनुच्छेद 39 (A) राज्य को यह सुनिश्चित करने के लिये नीति तैयार करने का निर्देश देता है कि नागरिकों, पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधनों तक पहुँच का अधिकार हो। 
      • अनुच्छेद 41 विशेष रूप से राज्य की आर्थिक क्षमता की सीमा के भीतर 'काम करने का अधिकार' प्रदान करता है। 

स्ट्रीट वेंडर्स की संख्या बढ़ने का कारण: 

  • पहला, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के साथ-साथ लाभकारी रोज़गार की कमी ने लोगों को शहरों में बेहतर जीवन की तलाश में अपने गाँवों से बाहर जाने को मजबूर किया है। 
    • इन प्रवासियों के पास संगठित क्षेत्र में बेहतर वेतन, सुरक्षित रोज़गार पाने के लिये कौशल या शिक्षा का अभाव होता है, अतः उन्हें असंगठित क्षेत्र में काम के लिये समझौता करना पड़ता है। 
  • दूसरा, देश में आबादी का एक और वर्ग है जो रोज़गार हेतु असंगठित क्षेत्र में जाने के लिये मज़बूर है। 
    • ये वे श्रमिक हैं जो कभी संगठित क्षेत्र में कार्यरत थे। 
      • उद्योगों के बंद होने, आकार घटने या विलय के कारण उन्होंने अपनी नौकरी खो दी और उन्हें या उनके परिवार के सदस्यों को जीवन-यापन लिये असंगठित क्षेत्र में कम वेतन पर काम की तलाश करनी पड़ी। 

स्ट्रीट वेंडर्स के समक्ष चुनौतियाँ: 

  • स्थान की कमी: 
    • हमारे शहरों के लिये तैयार किये गए मास्टर प्लान विक्रेताओं/हॉकरों को स्थान आवंटित नहीं करते हैं, क्योंकि नियोजक भारतीय परंपराओं की अनदेखी करते हुए विपणन की पश्चिमी अवधारणा की नकल करते हैं। 
  • कई प्राधिकरणों से निवारण: 
    • विक्रेताओं को कई प्राधिकरणों से निपटना पड़ता है- नगर निगम, पुलिस (थाना के साथ-साथ यातायात), क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण, ज़िला प्रशासन, स्थानीय पंचायत आदि। 
  •  शोषण और ज़बरन वसूली: 
    • कई मामलों में एक प्राधिकारी द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदम दूसरों के कार्यों की वजह से निष्प्रभावी हो जाते हैं। 
    • विक्रेताओं को विनियमित करने के बजाय नगर निगम उन्हें एक अतिक्रमणकारी और बाधा के रूप में मानते हैं, उनकी नीतियों और कार्यों का उद्देश्य विनियमन के बजाय उन्हें हटाना और परेशान करना अधिक है। 
  • बार-बार बेदखली: 
    • ज़िला या नगरपालिका प्रशासन द्वारा नियमित निष्कासन किया जाता है। 
    • वे निष्कासन टीम की कार्यवाही से डरते हैं जिसे स्थानीय रूप से अलग-अलग नामों से जाना जाता है। 
  • रंगदारी रैकेट: 
    • 'रंगदारी टैक्स' और 'हफ्ता वसूली' के मामले आम हैं। 
    • कई शहरों में विक्रेताओं को अपना व्यापार चलाने के लिये पर्याप्त धन देना पड़ता है। 

स्ट्रीट वेंडर्स के लिये सरकार की पहल: 

  • स्वनिधि योजना: 
    • स्वनिधि (SVANidhi) योजना शहरी क्षेत्रों के 50 लाख से अधिक स्ट्रीट वेंडर्स को लाभान्वित करने के लिये शुरू की गई थी, जिनमें आसपास के शहरी/ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी शामिल थे। 
    • इसका उद्देश्य 1,200 रुपए प्रतिवर्ष की राशि तक कैश-बैक प्रोत्साहन के माध्यम से डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना है। 
  • नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्ट्रीट वेंडर्स ऑफ इंडिया: 
    • NASVI एक ऐसा संगठन है जो देश भर के हज़ारों स्ट्रीट वेंडर्स के आजीविका अधिकारों की सुरक्षा के लिये कार्य कर रहा है। 
    • NASVI की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत में स्ट्रीट वेंडर संगठनों को एक साथ लाना था ताकि वृहद् स्तर पर बदलावों के लिये सामूहिक रूप से प्रयास किया जा सके। 
  • स्ट्रीट वेंडर्स (आजीविका का संरक्षण और स्ट्रीट वेंडिंग का नियमन) अधिनियम, 2014: 
    • इस अधिनियम को सार्वजनिक क्षेत्रों में स्ट्रीट वेंडर्स को विनियमित करने और उनके अधिकारों की सुरक्षा करने हेतु लागू किया गया था। 
    • यह अधिनियम स्ट्रीट वेंडर को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है, जो किसी भी सार्वजनिक स्थान या निजी क्षेत्र पर, किसी अस्थायी जगह पर बने ढाँचे से या जगह-जगह घूमकर, आम जनता के लिये रोज़मर्रा के उपयोग की वस्तुओं या सेवाओं की पेशकश करता है।

आगे की राह 

  • स्ट्रीट वेंडर्स के लिये कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं, किंतु इसके बावजूद इन योजनाओं के कार्यान्वयन, पहचान, जागरूकता और पहुँच से संबंधित विभिन्न चरणों में अंतराल देखा जा रहा है, जिन्हें समयबद्ध ढंग से दूर किया जाना आवश्यक है। 
  • इसके अलावा महिला स्ट्रीट वेंडर्स को मातृत्व भत्ता, दुर्घटना राहत, उच्च शिक्षा हेतु वेंडर के बच्चों को सहायता और किसी भी संकट के दौरान पेंशन जैसे लाभ प्रदान किये जाने चाहिये। 
  • राज्यों को यह सुनिश्चित करने के लिये कहा जाना चाहिये कि अधिकारियों द्वारा रेहड़ी-पटरी वालों को परेशान न किया जाए क्योंकि वे केवल आजीविका का अधिकार मांग रहे हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs): 

प्रश्न. वैश्वीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था के संगठित क्षेत्र में रोगार में कमी कैसे की है? क्या बढ़ी हुई अनौपचारिकता देश के विकास के लिये हानिकारक है? (2016, मुख्य परीक्षा) 

स्रोत: पी.आई.बी. 


भूगोल

सकुराजिमा ज्वालामुखी: जापान

प्रिलिम्स के लिये:

ज्वालामुखी और प्रकार।

मेन्स के लिये:

ज्वालामुखी और इसके प्रभाव, पर्यावरण

चर्चा में क्यों?

हाल ही में जापान के प्रमुख पश्चिमी द्वीप क्यूशू में सकुराजिमा ज्वालामुखी में विस्फोट देखा गया।

 सकुराजिमा ज्वालामुखी

  • सकुराजिमा जापान के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक है और इसमें विभिन्न स्तरों के विस्फोट नियमित आधार पर होते रहते हैं।
  • यह एक सक्रिय स्ट्रैटो वोलकानो है।
  • ऐतिहासिक रूप से सकुराजिमा में सबसे बड़े विस्फोट वर्ष 1471-76 के दौरान और 1914 में हुए थे।
  • इसमें विस्फोट 8वीं शताब्दी से दर्ज किया गया है।
  • कागोशिमा पर इसकी राख के लगातार जमा होने और इसकी विस्फोटक क्षमता के कारण इसे बहुत ही खतरनाक ज्वालामुखियों में से एक माना जाता है।

ज्वालामुखी:

volcano

  • परिचय:
    • ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह में एक उद्घाटन या टूटन है जिसमें मैग्मा के रूप में गर्म तरल और अर्द्ध-तरल चट्टानों, ज्वालामुखीय राख और गैसें बाहर निकलती है।
    • शेष सामग्री ज्वालामुखी विस्फोट का कारण बनती है। इसके कारण तीव्र विस्फोट हो सकता है जिससे अत्यधिक मात्रा में पदार्थों का निष्कासन होता है।
    • विस्फोटित सामग्री पृथ्वी पर तरल पदार्थ("लावा" जब यह सतह पर हो, "मैग्मा" जब यह भूमिगत हो), राख और/या गैस हो सकती है।
  • मैग्मा में वृद्धि का कारण:
    • मैग्मा का निष्कासन तब होता है जब पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट अभिसारी गति करते हैं। मैग्मा खाली स्थान को भरने के लिये ऊपर उठता है। जब ऐसा होता है तो जल के भीतर भी ज्वालामुखी निर्माण की प्रक्रिया हो सकती है।
    • जब ये टेक्टोनिक प्लेट एक-दूसरे की ओर बढ़ते हैं तो मैग्मा भी ऊपर उठता है और प्लेट के हिस्से इसके आंतरिक भाग में गहराई में चले जाते हैं तो उच्च ताप और दबाव के कारण पर्पटी पिघल जाती है तथा मैग्मा के रूप में ऊपर उठ जाती है।
    • मैग्मा अंतिम रूप से हॉट-स्पॉट से ऊपर उठता है। हॉट-स्पॉट पृथ्वी के अंदर के गर्म क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र मैग्मा को गर्म करते हैं। जब यह मेग्मा कम घना होता है तो ऊपर उठता है। हालाँकि मैग्मा के ऊपर उठने के कारण भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी इनमें प्रत्येक में ज्वालामुखी के निर्माण की क्षमता हो सकती है।

प्रकार:

  • शील्ड ज्वालामुखी:
    • यह ज्वालामुखी कम श्यानता, बहता हुआ लावा पैदा करता है जो स्रोत से बहुत दूर फैलता है और हल्का ढलान वाले ज्वालामुखी का निर्माण करता है।
    • अधिकांश शील्ड ज्वालामुखी तरल पदार्थ, बेसाल्टिक लावा प्रवाह से बनते हैं।
      • मौना केआ और मौना लोआ शील्ड ज्वालामुखी हैं। वे हवाई द्वीप के आसपास दुनिया के सबसे बड़े सक्रिय ज्वालामुखी हैं।

shield-volcano

  • स्ट्रैटो ज्वालामुखी:
    • स्ट्रैटो ज्वालामुखी में अपेक्षाकृत खड़ी ढलान होती हैं और शील्ड ज्वालामुखियों की तुलना में अधिक शंकु के आकार की होती है।
    • वे श्यान, चिपचिपे लावा से बनते हैं जो आसानी से नहीं बहते हैं।

straito

  • लावा गुंबद:
    • कैरिबियाई द्वीप मॉन्टसेराट पर स्थित सौफरिएर पहाड़ी ज्वालामुखी, ज्वालामुखी के शिखर पर अपने लावा गुंबद परिसर के लिये जाना जाता है, जो विकास और पतन के चरणों से गुज़रा है। चूँकि चिपचिपा लावा बहुत तरल नहीं होता है, इसलिये जब यह बाहर निष्कासित होता है तो आसानी से निकास छिद्र से ज़्यादा दूर नहीं जा सकता। इसके बजाय यह निकास के शीर्ष पर ढेर के रूप में जमा हो जाता है जो गुंबद के आकार की संरचना बनाता है।

lava

  • काल्डेरा:
    • मैग्मा ज्वालामुखी के नीचे मैग्मा कक्ष में जमा होता है। जब ज्वालामुखी विस्फोट होता है तो मैग्मा कक्ष से बाहर निष्कासित होता है, जिससे मैग्मा कक्ष की छत सतह पर खड़ी दीवारों के साथ अवसाद या कटोरा की भांति संरचना बनाता है।
    • ये काल्डेरा हैं और दसियों मील की दूरी पर हो सकते हैं।

kaldera

भारत में ज्वालामुखी:

  • बैरन द्वीप, अंडमान द्वीप समूह (भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी)
  • नार्कोंडम, अंडमान द्वीप समूह
  • बारातांग, अंडमान द्वीप समूह
  • डेक्कन ट्रैप्स, महाराष्ट्र
  • ढिनोधर पहाड़ी, गुजरात
  • ढोसी पहाड़ी, हरियाणा

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs):

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. बैेरन द्वीप ज्वालामुखी भारतीय क्षेत्र में स्थित एक सक्रिय ज्वालामुखी है।
  2. बैेरन द्वीप ग्रेट निकोबार से लगभग 140 किमी पूर्व में स्थित है।
  3. पिछली बार वर्ष 1991 में बैरेन द्वीप ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ था और तब से यह निष्क्रिय है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3 
(d) केवल 1 और 3

उत्तर: (a)

  • बैेरन द्वीप भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित है। अत: कथन 1 सही है।
  • यह अंडमान सागर में अंडमान द्वीप के दक्षिणी भाग पोर्ट ब्लेयर से लगभग 140 किमी. की दूरी पर स्थित है। बैेरन द्वीप से ग्रेट निकोबार के बीच की दूरी दी गई दूरी से अधिक है। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • ज्वालामुखी का पहला रिकॉर्डेड विस्फोट वर्ष 1787 में हुआ था। पिछले 100 वर्षों में इसमें कम-से-कम पाँच बार विस्फोट हो चुका है। फिर अगले 100 वर्षों तक यह शांत रहा। वर्ष 1991 में बड़े पैमाने पर फिर से इसमें विस्फोट हुआ तथा तब से हर दो-तीन वर्षों में इसमें विस्फोट दर्ज किया गया है, इस शृंखला में नवीनतम विस्फोट फरवरी 2016 में हुआ था। अत: कथन 3 सही है।

प्रश्न. वर्ष 2021 में घटित ज्वालामुखी विस्फोटों की वैश्विक घटनाओं का उल्लेख करते हुए क्षेत्रीय पर्यावरण पर उनके द्वारा पड़े प्रभाव को बताइये। (2021)

स्रोत : द हिंदू


जैव विविधता और पर्यावरण

जलवायु वित्त

प्रिलिम्स के लिये:

जलवायु वित्त, CoP 26, क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी), हरित जलवायु कोष (जीसीएफ)

मेन्स के लिये:

जलवायु वित्त और इसका महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में UNFCCC COP26 के अध्यक्ष, आलोक शर्मा ने भारत की COP 26 प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन पर चर्चा करने के लिये भारत का दौरा किया।

  • उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2023 तक 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर के जलवायु वित्तपोषण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये एक तंत्र स्थापित किया जा रहा है।

जलवायु वित्त:

  • परिचय:
    • जलवायु वित्त ऐसे स्थानीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण को संदर्भित करता है, जो सार्वजनिक, निजी और वैकल्पिक वित्तपोषण स्रोतों से प्राप्त किया गया हो।
    • UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता के तहत अधिक वित्तीय संसाधनों वाले देशों से ऐसे देशों के लिये वित्तीय सहायता की मांग की जाती है, जिनके पास कम वित्तीय संसाधन हैं और जो अधिक असुरक्षित हैं।
      • यह ‘समान लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारी और संबंधित क्षमताओं’ (CBDR-RC) के सिद्धांत के अनुसार है।
    • COP26 में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल वैश्विक लक्ष्य को प्राप्त करने में विकासशील देशों का समर्थन करने के लिये नई वित्तीय प्रतिज्ञाएँ की गईं।
      • COP26 में सहमत अंतर्राष्ट्रीय कार्बन व्यापार तंत्र के लिये नए नियम अनुकूलन निधि का समर्थन करेंगे।
  • महत्त्व:
    • न्यूनीकरण के लिये जलवायु वित्त की आवश्यकता है क्योंकि उत्सर्जन को उल्लेखनीय रूप से कम करने के लिये बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है।
    • अनुकूलन के लिये जलवायु वित्त भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रतिकूल प्रभावों के अनुकूल होने और बदलती जलवायु के प्रभावों को कम करने के लिये महत्त्वपूर्ण वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
    • जलवायु वित्तपोषण इस बात को स्वीकार करता है कि जलवायु परिवर्तन में देशों का योगदान और इसे रोकने तथा इसके परिणामों से निपटने की उनकी क्षमता में काफी अंतर है।
      • इसलिये विकसित देशों को भी देश-संचालित रणनीतियों का समर्थन करने और विकासशील देशों की पार्टियों की ज़रूरतों एवं प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न कार्यों के माध्यम से जलवायु वित्त जुटाने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिये।
    • जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न मुद्दों से निपटने और पूर्व-औद्योगिक स्तरों पर पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे तक सीमित करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये जलवायु वित्त महत्त्वपूर्ण है, जैसा कि वर्ष 2018 की आईपीसीसी की रिपोर्ट में इसकी भविष्यवाणी की गई है।

100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का लक्ष्य और इसका महत्त्व:

वर्ष  2009 में UNFCCC COP15 (कोपेनहेगन में आयोजित) में विकासशील देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये विकसित देशों की पार्टियों ने सार्थक न्यूनीकरण कार्यों और कार्यान्वयन में पारदर्शिता हासिल करने के लिये संयुक्त रूप से वर्ष 2020 तक 100 बिलियन अमेरिकी डाॅलर का लक्ष्य निर्धारित किया है।

जलवायु वित्त लक्ष्य को औपचारिक रूप से कानकुन में COP16 में पार्टियों के UNFCCC सम्मेलन द्वारा मान्यता दी गई थी।

पेरिस COP21 में पार्टियों ने  $100 बिलियन के लक्ष्य को वर्ष 2025 तक बढ़ाया।

  • COP26 के बाद इस बात पर आम सहमति बनी कि विकसित राष्ट्र अनुकूलन और शमन के बीच संतुलन के लिये 2025 तक वित्तीय अनुकूलन के अपने सामूहिक प्रावधान को वर्ष 2019 के स्तर से दोगुना कर देंगे।

हरित वित्तपोषण:

  • जलवायु वित्त के प्रावधान को सुविधाजनक बनाने हेतु UNFCCC ने विकासशील देशों को वित्तीय संसाधन प्रदान करने के लिये वित्तीय तंत्र की स्थापना की है।
    • वित्त संरचना क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते का भी समर्थन करती है।
  • यह निर्दिष्ट करता है कि वित्तीय तंत्र के संचालन को एक या अधिक मौज़ूदा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को सौंपा जा सकता है, वर्ष 1994 में कन्वेंशन के प्रवेश के बाद से वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) ने वित्तीय तंत्र के संचालन संस्थान के रूप में काम किया है।
    • पार्टियों ने वर्ष 2010 में COP16 में ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) की स्थापना की और इसे वर्ष 2011 में वित्तीय तंत्र की एक परिचालन इकाई के रूप में नामित किया।
    • वित्तीय तंत्र COP को रिपोर्ट करता है, जो इसकी नीतियों, कार्यक्रम की प्राथमिकताओं और वित्तपोषण पात्रता मानदंड को निर्धारित करता है।
  • अन्य वित्त:
    • GEF और GCF को मार्गदर्शन प्रदान करने के अलावा पार्टियों ने दो विशेष फंड स्थापित किये हैं-
      • विशेष जलवायु परिवर्तन कोष (SCCF)
      • अल्प विकसित देश कोष (LDCF)
      • दोनों का प्रबंधन GEF और वर्ष 2001 में क्योटो प्रोटोकॉल के तहत स्थापित अनुकूलन कोष (AF) द्वारा किया जाता है।
    • 2015 में पेरिस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में पार्टियों ने सहमति व्यक्त की कि वित्तीय तंत्र की संचालन संस्थाएँ- GCD, GEF, SCCF और LDCF पेरिस समझौते के तहत सेवा करेंगे।

जलवायु वित्त के संबंध में भारत की पहल:

  • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन कोष (NAFCC):
    • इसकी स्थापना वर्ष 2015 में भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिये जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की लागत को पूरा करने के लिये की गई थी, जो विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील है।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष (NCEF):
    • उद्योगों द्वारा कोयले के उपयोग पर प्रारंभिक कार्बन टैक्स के माध्यम से वित्तपोषित स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये इस कोष का निर्माण किया गया था।
    • यह वित्त सचिव (अध्यक्ष के रूप में) के साथ एक अंतर-मंत्रालयी समूह द्वारा शासित किया जाएगा।
    • इसका प्रमुख उद्देश्य जीवाश्म और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षेत्रों में नवीन स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी के अनुसंधान एवं विकास के लिये कोष प्रदान करना है।
  • राष्ट्रीय अनुकूलन कोष:
    • इस कोष की स्थापना वर्ष 2014 में 100 करोड़ रुपए की धनराशि के साथ की गई थी, इसका उद्देश्य आवश्यकता और उपलब्ध धन के बीच के अंतराल की पूर्ति करना था।
    • यह कोष पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के तहत संचालित है।

आगे की राह

  • विकसित देशों को विकासशील देशों की सहायता करनी चाहिये और उन्हें स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में मदद हेतु काम करना चाहिये इस प्रकार जलवायु लचीला बुनियादी ढाँचे के लिये वित्तपोषण प्राप्त करना चाहिये, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि पूर्व में निर्धारित 100 अरब डॉलर का लक्ष्य पूरा हो।
  • इसके अलावा नया वित्त जुटाने के लिये एक राजनीतिक प्रतिबद्धता बनाए रखने की आवश्यकता है।
    • यह सुनिश्चित करना कि उत्सर्जन और भेद्यता को कम करने के लिये वित्त का लक्षित जगह पर निवेश किया जा रहा है।
    • हाल के अनुभवों से सीखना और सुधार करना विशेष रूप से ग्रीन क्लाइमेट फंड को कम करना।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:

वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)

  1. समझौते पर संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों द्वारा हस्ताक्षर किये गए थे और यह वर्ष 2017 में लागू हुआ था।
  2. समझौते का उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करना है ताकि इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2ºC या 1.5ºC से अधिक न हो।
  3. विकसित देशों ने ग्लोबल वार्मिंग में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकार किया और विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करने हेतु वर्ष 2020 से सालाना 1000 अरब डॉलर की मदद के लिये प्रतिबद्ध हैं।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: b

व्याख्या:

  • पेरिस समझौते को दिसंबर 2015 में पेरिस, फ्राँस में COP21 में पार्टियों के सम्मेलन (COP) द्वारा संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के माध्यम से अपनाया गया था।
  • समझौते का उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करना है ताकि इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस या 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न हो। अत: कथन 2 सही है।
  • पेरिस समझौता 4 नवंबर, 2016 को लागू हुआ, जिसमें वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को अनुमानित 55% तक कम करने के लिये अभिसमय हेतु कम-से-कम 55 पार्टियों ने अनुसमर्थन, , अनुमोदन या परिग्रहण स्वीकृति प्रदान की थी। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • इसके अतिरिक्त समझौते का उद्देश्य अपने स्वयं के राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिये देशों की क्षमता को मज़बूत करना है।
  • पेरिस समझौते के लिये सभी पक्षों को राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के माध्यम से अपने सर्वोत्तम प्रयासों को आगे बढ़ाने और आने वाले वर्षों में इन प्रयासों को मज़बूत करने की आवश्यकता है। इसमें यह भी शामिल है कि सभी पक्ष अपने उत्सर्जन और उनके कार्यान्वयन प्रयासों पर नियमित रूप से रिपोर्ट करें।
  • समझौते के उद्देश्य को प्राप्त करने की दिशा में सामूहिक प्रगति का आकलन करने और पार्टियों द्वारा आगे की व्यक्तिगत कार्रवाइयों को सूचित करने के लिये प्रत्येक 5 साल में एक वैश्विक समालोचना भी होगा।
  • वर्ष 2010 में कानकुन समझौतों के माध्यम से विकसित देशों को विकासशील देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष संयुक्त रूप से 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने के लक्ष्य हेतु प्रतिबद्ध किया।
  • इसके अलावा वे इस बात पर भी सहमत हुए कि वर्ष 2025 से पहले पेरिस समझौते के लिये पार्टियों की बैठक के रूप में सेवारत पार्टियों का सम्मेलन प्रतिवर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से एक नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य निर्धारित करेगा। अत: कथन 3 सही नहीं है।

अतः विकल्प (b) सही है।


प्रश्न. जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के पार्टियों के सम्मेलन (COP) के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गई वचनबद्धताएँ क्या हैं? (2021, मुख्य परीक्षा)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी)

प्रिलिम्स के लिये:

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC), वन बेल्ट वन रोड (OBOR), ब्लू डॉट नेटवर्क।

मेन्स के लिये:

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और भारत पर इसके प्रभाव।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में पाकिस्तान और चीन ने मल्टी-मिलियन डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) में शामिल होने वाले किसी तीसरे देश का स्वागत करने का निर्णय लिया है।

  • अफगानिस्तान के संदर्भ में इसने अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संपर्क को मज़बूत करने में नवीन आयामों को नज़रअंदाज किया है।
  • इससे पहले पाकिस्तान ने 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के दूसरे चरण की शुरुआत के लिये चीन के साथ एक नए समझौते पर हस्ताक्षर किये।

Gwadar

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC):

  • CPEC चीन के उत्तर-पश्चिमी झिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र और पाकिस्तान के पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह को जोड़ने वाली बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का 3,000 किलोमीटर लंबा मार्ग है।
  • यह पाकिस्तान और चीन के बीच एक द्विपक्षीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा, औद्योगिक और अन्य बुनियादी ढाँचा विकास परियोजनाओं के साथ राजमार्गों, रेलवे एवं पाइपलाइन्स के नेटवर्क द्वारा पूरे पाकिस्तान में कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना है।
  • यह चीन के लिये ग्वादर बंदरगाह से मध्य-पूर्व और अफ्रीका तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करेगा ताकि चीन हिंद महासागर तक पहुँच प्राप्त कर सके तथा चीन बदले में पाकिस्तान के ऊर्जा संकट को दूर करने और लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिये पाकिस्तान में विकास परियोजनाओं का समर्थन करेगा।
  • CPEC, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का एक हिस्सा है।
    • वर्ष 2013 में शुरू किये गए ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ का उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप को भूमि एवं समुद्री मार्गों के नेटवर्क से जोड़ना है।

CPEC का भारत हेतु निहितार्थ:

  • भारत की संप्रभुता: भारत CPEC की लगातार आलोचना करता रहा है, क्योंकि यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुज़रता है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच एक विवादित क्षेत्र है।
    • कॉरिडोर को भारत की सीमा पर स्थित कश्मीर घाटी के लिये वैकल्पिक आर्थिक सड़क संपर्क के रूप में भी माना जाता है।
    • भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के अधिकांश प्रमुख अभिकर्त्ताओं ने परियोजना को लेकर आशा व्यक्त की है।
    • स्थानीय व्यापारियों और राजनेताओं द्वारा नियंत्रण रेखा (LoC) के दोनों ओर कश्मीर को 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' घोषित करने का आह्वान किया गया है।
    • हालाँकि गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र, जो औद्योगिक विकास और विदेशी निवेश को आकर्षित करता है, अगर CPEC सफल साबित होता है, तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त पाकिस्तानी क्षेत्र के रूप में क्षेत्र की धारणा को और मज़बूत करेगा, जिससे 73,000 वर्ग किमी. भूमि पर भारत का दावा कम हो जाएगा जो 1.8 मिलियन से अधिक लोगों का घर है।
  • सागर के माध्यम से व्यापार पर चीनी नियंत्रण: पूर्वी तट पर प्रमुख अमेरिकी बंदरगाह चीन के साथ व्यापार करने के लिये पनामा नहर पर निर्भर हैं।
    • एक बार CPEC के पूरी तरह कार्यात्मक हो जाने के बाद चीन अधिकांश उत्तरी और लैटिन अमेरिकी उद्यमों के लिये एक 'छोटा और अधिक किफायती' व्यापार मार्ग की पेशकश करने की स्थिति में होगा।
    • यह चीन को उन शर्तों को निर्धारित करने की शक्ति देगा जिनके द्वारा अटलांटिक और प्रशांत महासागरों के बीच माल की अंतर्राष्ट्रीय आवाजाही होगी।
  • स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स: चीन ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की नीति द्वारा हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ अमेरिका द्वारा गढ़ा गया एक शब्द  है जो अक्सर भारतीय रक्षा विश्लेषकों द्वारा हवाई क्षेत्रों और बंदरगाहों के नेटवर्क के माध्यम से भारत को घेरने की चीनी रणनीति का उल्लेख करने के लिये उपयोग किया जाता है।
    • चटगांव (बांग्लादेश), हंबनटोटा (श्रीलंका) और सूडान बंदरगाह, मालदीव, सोमालिया तथा सेशेल्स में उपस्थिति के साथ ग्वादर बंदरगाह का चीन द्वारा नियंत्रण करना हिंद महासागर पर उसके पूर्ण प्रभुत्व की महत्त्वाकांक्षा को व्यक्त करता है।
  • एक आउटसोर्सिंग गंतव्य के रूप में पाकिस्तान का उदय: यह पाकिस्तान की आर्थिक प्रगति को गति देने के लिये तैयार है।
    • मुख्य रूप से कपड़ा और निर्माण सामग्री उद्योग में पाकिस्तानी निर्यात, दोनों देशों के शीर्ष तीन व्यापारिक भागीदारों में से दो (अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात) भारत के साथ सीधे प्रतिस्पर्द्धा करते हैं।
    • चीन से कच्चे माल की आपूर्ति आसान होने के साथ पाकिस्तान को इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से भारतीय निर्यात मात्रा की कीमत पर एक क्षेत्रीय बाज़ार का अग्रणी बनने के लिये उपयुक्त रूप से देखा जा सकता है।
  • BRI द्वारा मज़बूत व्यापार और चीन का प्रभुत्व: चीन की बीआरआई परियोजना जो बंदरगाहों, सड़कों और रेलवे के नेटवर्क के माध्यम से चीन तथा शेष यूरेशिया के बीच व्यापार संपर्क पर केंद्रित है, को अक्सर इस क्षेत्र में राजनीतिक रूप से हावी होने की चीन की योजना के रूप में देखा जाता है। CPEC इसी दिशा में एक और बड़ा कदम है।
    • चीन जो कि बाकी वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं द्वारा समर्थित और अधिक एकीकृत है, संयुक्त राष्ट्र एवं अलग-अलग राष्ट्रों के साथ बेहतर स्थिति में होगा, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट हासिल करने की योजना को प्रभावित कर सकता है।

वन बेल्ट वन रोड (OBOR):

  • परिचय:
    • यह 2013 में शुरू की गई एक मल्टी-मिलियन डॉलर की पहल है।
    • इसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप को भूमि एवं समुद्री मार्गों के नेटवर्क से जोड़ना है।
    • इसका उद्देश्य विश्व में बड़ी बुनियादी ढांँचा परियोजनाओं को शुरू करना है जो बदले में चीन के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाएगी।
  • संरचना:
    • इनमें निम्नलिखित छह आर्थिक गलियारे शामिल हैं:
      • न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज, जो पश्चिमी चीन को पश्चिमी रूस से जोड़ता है
      • चीन-मंगोलिया-रूस गलियारा, जो मंगोलिया के माध्यम से उत्तरी चीन को पूर्वी रूस से जोड़ता है
      • चीन-मध्य एशिया-पश्चिम एशिया गलियारा, जो मध्य और पश्चिम एशिया के माध्यम से पश्चिमी चीन को तुर्की से जोड़ता है
      • चीन-इंडोचीन प्रायद्वीप गलियारा, जो भारत-चीन के माध्यम से दक्षिणी चीन को सिंगापुर से जोड़ता है
      • चीन-पाकिस्तान गलियारा, जो दक्षिण-पश्चिमी चीन को पाकिस्तान के माध्यम से अरब सागर के मार्गों से जोड़ता है
      • बांग्लादेश-चीन-भारत-म्याँमार गलियारा, जो बांग्लादेश और म्याँमार के रास्ते दक्षिणी चीन को भारत से जोड़ता है
    • इसके अतिरिक्त समुद्री सिल्क रोड सिंगापुर-मलेशिया, हिंद महासागर, अरब सागर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से तटीय चीन को भूमध्य सागर से जोड़ता है।

One-belt-one-road

आगे की राह

  • भारत को अपनी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाना चाहिये और बहुपक्षीय पहलों में भाग लेने के लिये समान विचारधारा वाले देशों के साथ आगे काम करना चाहिये, जैसे,
    • एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा तथा भारत-जापान आर्थिक सहयोग समझौता भारत को बड़ा रणनीतिक लाभ प्रदान कर सकता है और चीन का मुकाबला कर सकता है।
    • ब्लू डॉट नेटवर्क, जिसे USA द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है।
      • यह वैश्विक अवसंरचना विकास हेतु उच्च-गुणवत्ता एवं विश्वसनीय मानकों को बढ़ावा देने के लिये सरकारों, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज को एक साथ लाने की एक बहु-हितधारक पहल है।
      • यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर ध्यान देने के साथ-साथ विश्व स्तर पर सड़क, बंदरगाह एवं पुलों के लिये मान्यता प्राप्त मूल्यांकन एवं प्रमाणन प्रणाली के रूप में काम करेगा।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:

प्रिलिम्स:

Q कभी-कभी समाचारों में देखा जाने वाला बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (2016) का उल्लेख किसके संदर्भ में किया जाता है?

(a) अफ्रीकी संघ
(b) ब्राज़ील
(c) यूरोपीय संघ
(d) चीन

उत्तर: D

व्याख्या:

  • वर्ष 2013 में प्रस्तावित 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) भूमि और समुद्री नेटवर्क के माध्यम से एशिया को अफ्रीका तथा यूरोप से जोड़ने के लिये चीन का एक महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम है।
  • BRI को 'सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट’ और 21वीं सदी की सामुद्रिक सिल्क रोड के रूप में भी जाना जाता है। BRI एक अंतर-महाद्वीपीय मार्ग है जो चीन को दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, रूस और यूरोप से भूमि के माध्यम से जोड़ता है, यह चीन के तटीय क्षेत्रों को दक्षिण-पूर्व तथा दक्षिण एशिया, दक्षिण प्रशांत, मध्य-पूर्व और पूर्वी अफ्रीका से जोड़ने वाला एक समुद्री मार्ग है जो पूरे यूरोप तक जाता है। अतः विकल्प (d) सही उत्तर है

मेन्स:

Q चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) को चीन की बड़ी 'वन बेल्ट वन रोड' पहल के मुख्य उपसमुच्चय के रूप में देखा जाता है। CPEC का संक्षिप्त विवरण दीजिये और उन कारणों का उल्लेख कीजिये जिनकी वजह से भारत ने खुद को इससे दूर किया है। (2018)

Q चीन और पाकिस्तान ने आर्थिक गलियारे के विकास हेतु एक समझौता किया है। यह भारत की सुरक्षा के लिये क्या खतरा है? समालोचनात्मक चर्चा कीजिये। (2014)

Q "चीन एशिया में संभावित सैन्य शक्ति की स्थिति विकसित करने के लिये अपने आर्थिक संबंधों और सकारात्मक व्यापार अधिशेष का उपयोग उपकरण के रूप में कर रहा है"। इस कथन के आलोक में भारत पर पड़ोसी देश के रूप में इसके प्रभाव की चर्चा कीजिये। (2017)

स्रोत: द हिंदू


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