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जलवायु वित्त

  • 19 Oct 2021
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

जलवायु वित्त, UNFCCC,  क्लाइमेट एक्शन एंड फाइनेंस मोबिलाइज़ेशन डायलॉग

मेन्स के लिये:

भारत में जलवायु वित्तपोषण संबंधित पहल

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत-अमेरिका आर्थिक एवं वित्तीय भागीदारी वार्ता की आठवीं मंत्रिस्तरीय बैठक का आयोजन किया गया। भारत के वित्त मंत्री और उनके अमेरिकी समकक्ष ने इस बैठक में हिस्सा लिया। 

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • जलवायु वित्त ऐसे स्थानीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण को संदर्भित करता है, जो सार्वजनिक, निजी और वैकल्पिक वित्तपोषण स्रोतों से प्राप्त किया गया हो। यह ऐसे शमन एवं अनुकूलन कार्यों का समर्थन करता है जो जलवायु परिवर्तन संबंधी समस्याओं का निराकरण करेंगे।
      • न्यूनीकरण के लिये जलवायु वित्त की आवश्यकता है, क्योंकि उत्सर्जन को उल्लेखनीय रूप से कम करने हेतु बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।
      • यह अनुकूलन के लिये भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रतिकूल प्रभावों के अनुकूल होने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने हेतु महत्त्वपूर्ण वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
  • जलवायु वित्त और यूएनएफसीसीसी (UNFCCC):
    • जलवायु वित्त के प्रावधान को सुविधाजनक बनाने के लिये, संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) ने विकासशील सदस्य देशों को वित्तीय संसाधन प्रदान करने के लिये वित्तीय तंत्र की स्थापना की है।
      • क्योटो प्रोटोकॉल के तहत अनुकूलन कोष: इसका उद्देश्य उन ठोस परियोजनाओं और कार्यक्रमों को वित्तपोषण करना है जो विकासशील देशों में कमज़ोर समुदायों की मदद करते हैं और साथ ही जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन हेतु क्योटो प्रोटोकॉल के पक्षकार हैं।
      • ग्रीन क्लाइमेट फंड: यह वर्ष 2010 में स्थापित UNFCCC का वित्तीय तंत्र है। 
        • पेरिस समझौते की जलवायु वित्त प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिये भारत प्रतिवर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता राशि प्राप्त करने हेतु अमीर/विकसित देशों पर जोर दे रहा है।
      • वैश्विक पर्यावरण कोष (GEF): वर्ष 1994 में कन्वेंशन के लागू होने के बाद से वैश्विक पर्यावरण कोष वित्तीय तंत्र की एक परिचालन इकाई के रूप में कार्यरत है।
        • यह एक निजी इक्विटी फंड है जो जलवायु परिवर्तन समझौतों के तहत स्वच्छ ऊर्जा में निवेश द्वारा दीर्घकालिक वित्तीय रिटर्न प्राप्त करने पर केंद्रित है।
      • GEF  दो अतिरिक्त फंड [विशेष जलवायु परिवर्तन कोष (SCCF) और सबसे कम विकसित देशों का कोष (LDCF)] को भी नियंत्रित करता है।

UNFCCC

  • भारत में जलवायु वित्तपोषण:
    • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन कोष (NAFCC): 
      • जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों हेतु जलवायु परिवर्तन अनुकूलन की लागत को पूरा करने के लिये वर्ष 2015 में इस कोष की स्थापना की गई थी।
    • राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष (NCEF): 
      • उद्योगों द्वारा कोयले के उपयोग पर प्रारंभिक कार्बन टैक्स के माध्यम से वित्तपोषित स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये इस कोष का निर्माण किया गया था।
      • यह वित्त सचिव (अध्यक्ष के रूप में) के साथ एक अंतर-मंत्रालयी समूह (Inter-Ministerial Group) द्वारा शासित किया जाएगा।
      • इसका प्रमुख उद्देश्य जीवाश्म और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षेत्रों में नवीन स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी के अनुसंधान एवं विकास के लिये कोष प्रदान करना है। 
    • राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (NAF): 
      • इस कोष की स्थापना वर्ष 2014 में 100 करोड़ रुपए की धनराशि के साथ की गई थी, इसका उद्देश्य आवश्यकता और उपलब्ध धन के बीच के अंतराल की पूर्ति करना था।
      • यह कोष पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के तहत संचालित है।

जलवायु वित्त के सिद्धांत: 

  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत:
    • 'प्रदूषक भुगतान सिद्धांत' का आशय आमतौर पर एक स्वीकृत प्रथा है, जिसके अनुसार प्रदूषण उत्पन्न करने वालों को मानव स्वास्थ्य या पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने हेतु इसे प्रबंधित करने की लागत वहन करनी चाहिये।
    • यह सिद्धांत भूमि, जल और वायु को प्रभावित करने वाले प्रदूषण के अधिकांश विनियमन को मज़बूती प्रदान करता है जिसे औपचारिक रूप से वर्ष 1992 के रियो घोषणा के रूप में जाना जाता है।
    • इसे विशेष रूप से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिये भी लागू किया गया है जो जलवायु परिवर्तन का कारण बनते हैं।
  • समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्त्व तथा संबंधित क्षमताएँ (CBDR–RC):
    • ‘समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व’ (CBDR) ‘जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन’ (UNFCCC) के अंतर्गत एक सिद्धांत है। यह जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने में अलग-अलग देशों की विभिन्न क्षमताओं और उत्तरयित्वों को स्वीकार करता है।
  • अतिरिक्त जलवायु वित्त आवश्यक:
    • जलवायु परिवर्तन गतिविधियों के लिये विकास की ज़रूरतों हेतु धन के विचलन से बचने के लिये मौजूदा प्रतिबद्धताओं के लिये अतिरिक्त जलवायु वित्त होना चाहिये।
    • इसमें सार्वजनिक जलवायु वित्त का उपयोग और निजी क्षेत्र द्वारा निवेश शामिल हैं।
  • पर्याप्तता और सावधानी: 
    • UNFCCC के तहत घोषित लक्ष्य के रूप में जलवायु परिवर्तन के कारणों को रोकने या कम करने हेतु एहतियाती उपाय करने, वैश्विक तापमान को यथासंभव सीमा के भीतर रखने हेतु पर्याप्त कोष का होना ज़रूरी है।
    • आवश्यक जलवायु निधियों से राष्ट्रीय अनुमानों में पर्याप्तता का एक बेहतर स्तर प्राप्त किया जा सकता है, इससे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (INDC) के संबंध में नियोजित निवेश में मदद मिलेगी।
  • पूर्वानुमान:
    • जलवायु वित्त के निरंतर प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिये जलवायु वित्त पूर्वानुमान योग्य होना चाहिये।
    • यह कार्य बहु-वर्षीय, मध्यम अवधि के वित्तपोषण चक्र (3-5 वर्ष) के माध्यम से किया जा सकता है।
    • यह देश के राष्ट्रीय अनुकूलन और शमन प्राथमिकताओं को बढ़ाने के लिये पर्याप्त निवेश कार्यक्रम की अनुमति देता है।

स्रोत: द हिंदू

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