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डेली न्यूज़

  • 20 Nov, 2021
  • 41 min read
आंतरिक सुरक्षा

स्मार्ट पुलिसिंग इंडेक्स 2021

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प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ वाद, स्मार्ट पुलिसिंग इंडेक्स

मेन्स के लिये:

स्मार्ट पुलिसिंग इंडेक्स की प्रमुख विशेषताएँ, पुलिस सुधार की आवश्यकता और इससे संबंधित पहल

चर्चा में क्यों?

इंडियन पुलिस फाउंडेशन (IPF) द्वारा किये गए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने सभी राज्यों की तुलना में सबसे कम स्कोर किया, जिन्हें "संवेदनशीलता" की श्रेणी में रखा गया है।

प्रमुख बिंदु

  • स्मार्ट पुलिसिंग:
    • वर्ष 2014 में गुवाहाटी में आयोजित राज्य और केंद्रीय पुलिस संगठनों के डीजीपी के सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा स्मार्ट पुलिसिंग विचार की परिकल्पना प्रस्तुत की गई थी।
    • इसने भारतीय पुलिस बल को ‘स्मार्ट’ (SMART), सेंसिटिव एंड स्ट्रिक्ट; मॉडर्न विद मोबिलिटी; अलर्ट एंड एकॉउंटेबल; रिलायबल एंड रिस्पॉन्सिव; ट्रेंड एंड टेक्नो-सेवी और प्रशिक्षित बनाने के लिये प्रणालीगत परिवर्तनों की परिकल्पना की।
    • रणनीति में भौतिक बुनियादी ढाँचे के विकास, प्रौद्योगिकी को अपनाने, महत्त्वपूर्ण सहज कौशल और दृष्टिकोण पर ध्यान देने के साथ-साथ पेशेवर उत्कृष्टता एवं लोगों की सेवा के मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को जोड़ा जाएगा, इसे भारतीय पुलिस को अगले स्तर तक ले जाने के लिये आवश्यक माना जाता है।
  • स्मार्ट पुलिसिंग इंडेक्स:
    • इंडियन पुलिस फाउंडेशन (IPF) के सर्वेक्षण का उद्देश्य स्मार्ट पुलिसिंग पहल के प्रभाव के प्रति नागरिकों की धारणाओं के बारे में जानकारी एकत्र करना था।
      • इंडियन पुलिस फाउंडेशन (IPF) दिल्ली स्थित एक थिंक टैंक है, जिसकी स्थापना प्रत्येक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के सेवारत और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों, सिविल सेवकों, शिक्षाविदों और वकीलों आदि सहित प्रतिष्ठित नागरिकों द्वारा की गई है।
    • सर्वेक्षण में प्रश्नावली के 10 सेट थे, जिनमें शामिल थे:
      • "सक्षमता-आधारित संकेतक" के छह सूचकांक जैसे- पुलिस संवेदनशीलता, पहुँच, जवाबदेही और प्रौद्योगिकी से जुड़े मामले;
      • पुलिस की सत्यनिष्ठा से संबंधित "मूल्य-आधारित संकेतक" के तीन सूचकांक तथा
      • "ट्रस्ट" का एक सूचकांक।
    • स्मार्ट स्कोर 1 से 10 के पैमाने पर निर्धारित किये जाते हैं और नागरिक की धारणा के स्तर का संकेत देते हैं, 10 का स्कोर उच्चतम प्रदर्शक स्तर है।
  • स्मार्ट पुलिसिंग इंडेक्स 2021 के महत्त्वपूर्ण बिंदु:
    • अपर्याप्त संवेदनशीलता, जनता का पुलिस के प्रति गिरता विश्वास का स्तर और पुलिसिंग की गुणवत्ता के बारे में बढ़ती चिंताओं के बावजूद अधिकांश नागरिकों (66.93%) का मानना है कि पुलिस अपना कार्य सही प्रकार से कर रही है जो पुलिस का पुरजोर समर्थन करती है।
    • उत्तर के राज्यों की तुलना में अधिकांश पुलिसिंग सूचकांकों पर दक्षिणी राज्यों और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया।
    • समग्र पुलिसिंग पर उच्चतम स्कोर वाले शीर्ष पांँच राज्य आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असम, केरल और सिक्किम हैं।
    • नीचे से ऊपर की ओर बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और पंजाब शामिल हैं।

संबंधित सरकारी पहलें 

  • देश भर के पुलिस स्टेशनों की रैंकिंग गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs- MHA) का एक वार्षिक अभ्यास है, जिसे अन्य सुविधाओं के अलावा स्टेशनों की अपराध दर, मामलों की जांँच और निपटान, बुनियादी ढांँचे और सार्वजनिक सेवा के वितरण जैसे मापदंडों के आधार पर आंँका जाता है।
    • रिपोर्ट में लगभग कुल अंकों का 20% नागरिकों से पुलिस स्टेशन के बारे में प्राप्त फीडबैक पर भी आधारित है।
  • वर्ष 2021 के लिये राजधानी (दिल्ली) का सदर बाज़ार थाना देश भर में सबसे अच्छा थाना था।
  • दो अन्य पुलिस थानों- ओडिशा का गंगापुर गंजम थाना और हरियाणा के भट्टू कलां को सूची में दूसरे और तीसरे स्थान पर रखा गया।
  • पुलिस सुधार
    • पुलिस सुधारों का उद्देश्य पुलिस संगठनों के मूल्यों, संस्कृति, नीतियों और प्रथाओं में बदलाव लाना है।
    • यह पुलिस द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और कानून के शासन के सम्मान के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करने की परिकल्पना करता है।
    • इसका उद्देश्य यह भी सुनिश्चित करना है कि पुलिस सुरक्षा क्षेत्र के अन्य पहलुओं जैसे- अदालतों और कार्यकारी, संसदीय या स्वतंत्र अधिकारियों के साथ प्रबंधन या निरीक्षण ज़िम्मेदारियों के मामले में किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करती है।
    • पुलिस भारतीय संविधान की अनुसूची 7 की राज्य सूची के अंतर्गत आती है।

Index-2021

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

अमेरिका द्वारा अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार का दोहन

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प्रिलिम्स के लिये:

ओपेक+, सामरिक पेट्रोलियम भंडार, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी

मेन्स के लिये:

अमेरिका द्वारा अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार का दोहन करने के निहितार्थ एवं भारत पर इसके प्रभाव

चर्चा में क्यों?

अमेरिका में वर्ष 2022 के मध्यावधि चुनाव के मद्देनज़र, बाइडेन प्रशासन तेल की बढ़ती कीमतों को रोकने के लिये ‘यूएस स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व’ (SPR) का दोहन करने पर विचार कर रहा है।

  • अमेरिका में तेल की कीमतों में गिरावट पर इस तरह के कदम का दीर्घकालिक प्रभाव नहीं हो सकता है, जो 85 डॉलर प्रति बैरल के साथ सात वर्ष के उच्च स्तर पर पहुँच गया है।
  • सऊदी अरब और रूस के बाद ओपेक+ उत्पादन समूह के सदस्यों द्वारा वैश्विक बाज़ारों में अधिक तेल की आपूर्ति से इनकार करने के बाद चीन और भारत द्वारा भी ऐसा ही किये जाने की उम्मीद है।

प्रमुख बिंदु

  • सामरिक पेट्रोलियम भंडार:
    • प्राकृतिक आपदाओं, युद्ध या अन्य आपदाओं से आपूर्ति में व्यवधान के जोखिम जैसे किसी भी कच्चे तेल से संबंधित संकट से निपटने के लिये सामरिक पेट्रोलियम भंडार कच्चे तेल के विशाल भंडार हैं।
    • ओपेक (पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन) तेल संकट के बाद समर्पित रणनीतिक भंडार की अवधारणा को पहली बार वर्ष 1973 में अमेरिका में लाया गया था।
    • एक अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा कार्यक्रम (I.E.P.) के समझौते के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रत्येक देश के पास कम-से-कम 90 दिनों के शुद्ध तेल आयात के बराबर आपातकालीन तेल स्टॉक रखने का दायित्व है।
      • गंभीर तेल आपूर्ति व्यवधान के मामले में  IEA सदस्य सामूहिक कार्रवाई के हिस्से के रूप में इन शेयरों को बाज़ार में जारी करने का निर्णय ले सकते हैं।
      • 3 सबसे बड़े सामरिक पेट्रोलियम भंडार जापान, अमेरिका, चीन के पास हैं।

राष्ट्रीय SPRs में IEA की भूमिका

  • IEA के अनुसार, 90 दिन की आवश्यकता को पूरा करने के लिये SPR स्तरों को बनाए रखने के आमतौर पर तीन तरीके हैं।
    • रिफाइनरों के पास वाणिज्यिक स्टॉक,
    • सरकार और एजेंसी के शेयर,
    • देशों को संतुलन के अनुसार चुनना।
  • IEA सदस्य देशों को ऊर्जा की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने तथा ऊर्जा की कमी को खत्म करने के लिये मुक्त बाज़ारों को बढ़ावा देना।
  • IEA मांग को नियंत्रित करने या आपूर्ति में मदद के उपायों का भी सुझाव देता है।
    • इनमें स्वैच्छिक ईंधन बचत, ईंधन-स्विचिंग जैसे उत्पादन में तीव्र वृद्धि के लिये बिजली उत्पादन हेतु तेल, गैस या भूमिगत भंडार को शामिल करना हो सकता है।
  • भारत में सामरिक पेट्रोलियम भंडार:
    • भारत में सामरिक क्रूड ऑयल स्टोरेज सुविधाओं के निर्माण का प्रबंधन ‘इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व्स लिमिटेड’ (ISPRL) द्वारा किया जा रहा है।
    • चरण-I के तहत सामरिक क्रूड ऑयल के भंडार मैंगलोर (कर्नाटक), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) और पादुर (कर्नाटक) में स्थित हैं। इनमें कुल 5.33 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) ईंधन मौजूद है।
    • भारत सरकार सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से दूसरे चरण के तहत चंडीखोल (ओडिशा) और उडुपी (कर्नाटक) में ऐसी दो और भंडार स्थापित करने की योजना बना रही है। इससे अतिरिक्त 6.5 मिलियन टन तेल भंडार की सुविधा प्राप्त हो सकेगी।
    • नई सुविधाओं के चालू होने के बाद कुल 22 दिन (10+12) तेल की खपत उपलब्ध कराई जाएगी।
    • सामरिक सुविधाओं के साथ भारतीय रिफाइनर 65 दिनों के कच्चे तेल के भंडारण (औद्योगिक स्टॉक) को भी बनाए रखते हैं।
    • इस प्रकार ‘सामरिक पेट्रोलियम भंडार’ कार्यक्रम के दूसरे चरण के पूरा होने के बाद भारत में कुल 87 दिनों (रणनीतिक भंडार द्वारा 22 +, भारतीय रिफाइनर द्वारा 65) के लिये तेल की मांग को पूरा करने में सक्षम होगा।
    • भारत वर्ष 2017 में ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ का सहयोगी सदस्य बना और हाल ही में ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ ने भारत को पूर्णकालिक सदस्य बनने के लिये आमंत्रित किया है।

Petroleum-Reserves

  • भारत में ‘सामरिक पेट्रोलियम भंडार’ की आवश्यकता:
    • पर्याप्त क्षमता का निर्माण:
      • अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल के बाज़ार में होने वाली किसी भी अप्रत्याशित घटना से निपटने के लिये इसकी वर्तमान क्षमता पर्याप्त नहीं है।
      • एक दिन में लगभग 5 मिलियन बैरल तेल की खपत के साथ देश का 86% हिस्सा तेल पर निर्भर है।
    • ऊर्जा सुरक्षा:
      • अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत में उतार-चढ़ाव से भारत को देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और मौद्रिक नुकसान से बचने के लिये पेट्रोलियम भंडार बनाने की सख्त ज़रूरत है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

कुलभूषण जाधव केस

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प्रिलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय 

मेन्स के लिये:

कुलभूषण जाधव केस एवं वियना कन्वेंशन

चर्चा में क्यों?   

हाल ही में पाकिस्तानी संसद ने मृत्युदंड प्राप्त भारतीय कैदी कुलभूषण जाधव को सैन्य अदालत द्वारा उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ समीक्षा अपील दायर करने का अधिकार देने के लिये एक कानून बनाया है।

  • इस बिल को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice- ICJ) के एक आदेश को कानून करने हेतु बनाया गया था।
  • हालाँकि भारत का मानना है कि इस कानून में कई "कमियाँ" हैं तथा ICJ के आदेश को ‘अक्षरत: और उसकी भावना के साथ’ लागू करने के लिये आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रमुख बिंदु 

  • कुलभूषण जाधव केस:
    • गिरफ्तारी: 51 वर्षीय सेवानिवृत्त भारतीय नौसेना अधिकारी, जाधव को अप्रैल 2017 में एक पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने जासूसी करने और आतंकवाद के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई थी।
      • दिसंबर 2017 में जाधव की पत्नी और मां को एक काँच के अवरोधक के माध्यम से उनसे मिलने की अनुमति दी गई, भारत ने पाकिस्तान के इस दावे का विरोध किया कि यह ICJ में एक ‘कॉन्सुलर एक्सेस’ था।
      • कॉन्सुलर एक्सेस से इनकार: भारत ने जाधव को कॉन्सुलर एक्सेस (वियना कन्वेंशन) न मिल पाने और मौत की सज़ा को चुनौती देने के लिये पाकिस्तान के खिलाफ ICJ का दरवाज़ा खटखटाया।
    • ICJ रूलिंग: वर्ष 2019 में ICJ ने फैसला सुनाया कि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत जाधव की सज़ा की "प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार" करने के लिये बाध्य था।
    • पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: ICJ के आदेश के मद्देनज़र, पाकिस्तान सरकार ने जाधव को अपील दायर करने की अनुमति देने के लिये एक विशेष अध्यादेश जारी किया था।
      • पाकिस्तान की संसद ने ICJ के फैसले के तहत अपने दायित्व को पूरा करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (समीक्षा और पुनर्विचार) विधेयक, 2021 पारित किया है।

कानून में कमियाँ:

  • स्पष्ट रोड मैप का अभाव: भारत का मानना ​​है कि कुलभूषण जाधव के मामले में प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार हेतु कोई तंत्र बनाए बिना पाकिस्तान द्वारा पारित बिल वर्ष 2019 के अध्यादेश को ही दोहराता है।
  • म्युनिसिपल कोर्ट को असाधारण शक्ति: यह पाकिस्तान में नगरपालिका अदालतों को यह तय करने का अधिकार प्रदान करता है कि क्या जाधव को कॉन्सुलर एक्सेस प्रदान करने में विफलता का कारण किसी प्रकार का पूर्वाग्रह है या नहीं।
    • यह स्पष्ट रूप से मूल सिद्धांत का उल्लंघन है, नगरपालिका अदालतें इस बात के लिये मध्यस्थ नहीं हो सकतीं कि किसी राज्य ने अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत अपने दायित्वों को पूरा किया है या नहीं।
    •  यह भविष्य में नगरपालिका अदालत को अपील करने के लिये भी आमंत्रित करता है।
  • ‘प्रभावी समीक्षा तथा पुनर्विचार’ का भारत के लिये निहितार्थ:
    • प्रभावी समीक्षा तथा पुनर्विचार (Effective Review and Reconsideration) एक वाक्यांश है, जो कि घरेलू संदर्भो में प्रचलित ‘समीक्षा’ (Review) से भिन्न होता है।
    • इसमें कुलभूषण जाधव को ‘वकील/कॉन्सुलर उपलब्ध कराने’ और अपने बचाव हेतु तैयारी में मदद करना अंतर्निहित है।
    • इसका मतलब है कि पाकिस्तान को जाधव पर लगाए सभी आरोपों और उन सबूतों का भी खुलासा करना होगा जिनके बारे में वह अब तक पूरी तरह से अपारदर्शी रहा है।
    • पाकिस्तान को उन परिस्थितियों का भी खुलासा करना होगा, जिनमें सेना ने जाधव से अपराध का कबूलनामा हासिल किया था।
    • इसका तात्पर्य है कि जाधव को मामले की सुनवाई करने वाले किसी भी मंच या अदालत में अपना बचाव करने का अधिकार होगा।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)

  • ICJ संयुक्त राष्ट्र (UN) का एक प्रमुख न्यायिक अंग है।
  • इसकी स्थापना वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र के चार्टर द्वारा की गई और वर्ष 1946 में इसने अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थायी न्यायालय (Permanent Court of International Justice-PCIJ) के उत्तराधिकारी के रूप में काम करना शुरू किया।
  • यह राष्ट्रों के बीच कानूनी विवादों को सुलझाता है और अधिकृत संयुक्त राष्ट्र के अंगों तथा विशेष एजेंसियों द्वारा निर्दिष्ट कानूनी प्रश्नों पर अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार सलाह देता है।
  • यह हेग (नीदरलैंड्स) के पीस पैलेस में स्थित है।

वियना संधि (Vienna Convention)

  • ‘वियना कन्वेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस’ (Vienna Convention on Consular Relations) एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसके तहत स्वतंत्र राष्ट्रों के बीच ‘कॉन्सुलर संबंधों’ को परिभाषित किया गया है।
    • एक कॉन्सुलर (जो राजनयिक नहीं है), एक मेज़बान देश में एक विदेशी राज्य का प्रतिनिधि है, जो अपने देशवासियों के हितों के लिये काम करता है।
  • ‘वियना संधि’ के अनुच्छेद 36 के अनुसार, मेज़बान देश में गिरफ्तार या हिरासत में लिये गए विदेशी नागरिकों को उनके ‘दूतावास या वाणिज्य दूतावास को गिरफ्तारी के बारे में सूचित करने संबंधी उनके अधिकार’ के बारे में तत्काल नोटिस/सूचना दी जानी चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय राजनीति

समान नागरिक संहिता पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय

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प्रिलिम्स के लिये:

समान नागरिक संहिता, अनुच्छेद-21, राज्य के नीति निदेशक तत्त्व

मेन्स के लिये: 

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता और संबंधित चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से समान नागरिक संहिता (UCC) के कार्यान्वयन की प्रक्रिया शुरू करने का आह्वान किया है।

  • न्यायालय का निर्देश अंतर-धार्मिक जोड़ों द्वारा दायर 17 याचिकाओं के एक समूह के संदर्भ में आया है, जिन्होंने धर्मांतरण के पश्चात् विवाह किया और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत अपने जीवन, स्वतंत्रता और गोपनीयता की गारंटी की सुरक्षा की मांग की।

प्रमुख बिंदु

  • पृष्ठभूमि:
    • धर्मांतरण विरोधी नया कानून: उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में एक धर्मांतरण विरोधी कानून पारित किया है, जिसे ‘उत्तर प्रदेश धर्म गैरकानूनी धर्मांतरण की रोकथाम अधिनियम, 2021’ कहा जाता है।
    • इसके मुताबिक, ज़िला प्राधिकरण द्वारा यह जाँच किये बिना शादी को पंजीकृत नहीं किया जा सकता है कि क्या धर्मांतरण स्वैच्छिक है और ज़बरदस्ती, प्रलोभन व धमकी से प्रेरित नहीं है।
    • अधिनियम में कहा गया है कि धर्म परिवर्तन या विवाह से पहले ज़िला मजिस्ट्रेट (डीएम) की मंज़ूरी आवश्यक है।
    • यह अधिनियम विवाह के लिये धर्म परिवर्तन को गैर-जमानती अपराध बनाता है।
  • न्यायालय द्वारा अवलोकन:
    • विवाह पंजीयक के पास केवल इस कारण विवाह के पंजीकरण को रोकने की शक्ति नहीं है कि विवाह पक्षों ने ज़िला प्राधिकरण से धर्मांतरण की आवश्यक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है।
      • न्यायालय ने ‘मैरिज रजिस्ट्रार’ को ऐसे जोड़ों के विवाह का तत्काल पंजीकरण करने का निर्देश दिया है।
    • न्यायालय ने कहा कि इस तरह की मंज़ूरी निर्देशिका है और अनिवार्य नहीं है।
      • यह अधिनियम तर्कसंगतता और निष्पक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा तथा अनुच्छेद-14 (कानून के समक्ष समानता) एवं अनुच्छेद-21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) का उल्लंघन करता है।
    • यह देखा गया कि परिवार या समुदाय या कबीले या राज्य या कार्यपालिका की सहमति आवश्यक नहीं है, एक बार जब दो वयस्क व्यक्ति विवाह करने के लिये सहमत होते हैं, तो यह वैध या कानूनी होगा।
    • न्यायालय ने संबंधित ज़िलों की पुलिस को इन जोड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
    • इसके अलावा न्यायालय ने केंद्र सरकार से ‘समान नागरिक संहिता’ को लागू करने हेतु एक कानून बनाने का आग्रह किया, ताकि इस तरह के अत्याचारों की पुनरावृत्ति न हो।
      • क्योंकि इसके लागू होने के बाद धर्मांतरण विरोधी कानूनों की आवश्यकता नहीं होगी।

समान नागरिक संहिता:

  • पृष्ठभूमि:
    • ब्रिटिश शासन के अंतिम काल में व्यक्तिगत मुद्दों से निपटने वाले कानूनों में वृद्धि ने सरकार को वर्ष 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने हेतु ‘बी.एन. राव’ समिति बनाने को मजबूर किया।
    • ‘समान नागरिक संहिता’ का आशय पूरे देश में एक ही प्रकार के कानून के प्रचलन से है, जो सभी धार्मिक समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों जैसे- शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि में लागू होगा।
    • संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि राज्य, भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिये ‘समान नागरिक संहिता’ सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।
    • एकरूपता लाने के लिये न्यायालयों ने अक्सर अपने निर्णयों में कहा है कि सरकार को UCC की ओर बढ़ना चाहिये।
      • शाह बानो मामले (1985) का फैसला सर्वविदित है।
      • शायरा बानो मामले (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तालक (तलाक-ए-बिद्दत) की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया था।
  • UCC की आवश्यकता:
    • राष्ट्रीय एकता: एक समान नागरिक संहिता परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले कानूनों के प्रति असमान निष्ठाओं को दूर करके राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य में मदद करेगी।
    • बदलते समय के अनुरूप: हाल के दिनों में अंतर-समुदाय, अंतर-जाति और अंतर-धार्मिक विवाह व संबंधों में भारी वृद्धि हुई है।
      • साथ ही एकल महिलाओं की संख्या में वृद्धि के साथ एक व्यापक UCC बदलते समय के अनुरूप होगा।
    • समाज के कमज़ोर वर्गों को संरक्षण: UCC का उद्देश्य महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित कमज़ोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है।
    • धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का पालन करना: धर्मनिरपेक्षता, प्रस्तावना में निहित उद्देश्य है, एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य को धार्मिक प्रथाओं के आधार पर विभेदित नियमों के बजाय सभी नागरिकों के लिये एक सामान्य कानून की आवश्यकता होती है।
    • कानूनों का सरलीकरण: यह संहिता विवाह, विरासत, उत्तराधिकार, गोद लेने संबंधी जटिल कानूनों को सभी के लिये एक समान बना देगा। फिर वही नागरिक कानून सभी नागरिकों पर लागू होगा चाहे उनकी आस्था कुछ भी हो।
  • संबद्ध चुनौतियाँ:
    • सांप्रदायिक राजनीति: समान नागरिक संहिता की मांग को सांप्रदायिक राजनीति के संदर्भ में तैयार किया गया है।
      • समाज का एक बड़ा वर्ग इसे सामाजिक सुधार की आड़ में बहुसंख्यकवाद के रूप में देखता है।
    • संवैधानिक बाधा: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25, जो किसी भी धर्म को मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता को संरक्षित करने का प्रयास करता है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत निहित समानता की अवधारणाओं के साथ संघर्ष करता है।

आगे की राह

  • सरकार और समाज को इसके प्रति विश्वास को बनाए रखने के लिये कड़ी मेहनत करनी होगी, लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि धार्मिक रूढ़िवादियों के बजाय समाज सुधारक मिलकर काम करें।
  • एक सर्वव्यापी दृष्टिकोण के बजाय सरकार अलग-अलग पहलुओं जैसे- विवाह, गोद लेने, उत्तराधिकार और रखरखाव को चरणों में एक UCC में ला सकती है।
  • समय की मांग है कि सभी व्यक्तिगत कानूनों को संहिताबद्ध किया जाए ताकि प्रत्येक समुदाय में मौजूद पूर्वाग्रह और रूढ़िवादियों को स्पष्ट किया जा सके और उनके आधार पर संविधान के मौलिक अधिकारों का परीक्षण किया जा सके।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय राजनीति

विधेयकों पर निर्णय लेने का राज्यपाल का अधिकार: वीटो पावर

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प्रिलिम्स के लिये:

वीटो पावर , लोकसभा अध्यक्ष, सर्वोच्च न्यायालय, धन विधेयक

मेन्स के लिये:

राष्ट्रपति और राज्यपाल की वीटो शक्ति एवं संबंधित विवाद

चर्चा में क्यों?

हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष ने विधेयकों पर निर्णय लेने के लिये एक बाध्यकारी समयसीमा निर्धारित करने का आह्वान किया, जिसके भीतर विधेयकों को राज्यपाल द्वारा भारत के राष्ट्रपति के विचार के लिये सहमति या वापस या आरक्षित किया जाना चाहिये।

प्रमुख बिंदु

  • अध्यक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दे:
    • राज्यपाल से संबंधित:
      • राज्यपाल कभी-कभी बिना अनुमति दिये या अनिश्चित काल के लिये विधेयक को पुनर्विचार के लिये वापस किये बिना सुरक्षित रख लेता है, जबकि संविधान में इस प्रक्रिया को जल्द-से-जल्द करने की आवश्यकता है।
      • राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की सहमति के लिये विधेयकों को आरक्षित रखा जाता है जिसमें कई महीने लग जाते थे, जबकि इसे तुरंत किया जाना था।
      • इससे विधायिकाओं और राज्यपालों के अधिकार समाप्त हो जाते हैं, हालाँकि राज्य कार्यकारिणी के प्रमुखों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। 
    • राष्ट्रपति से संबंधित:
      • भारत के राष्ट्रपति को भी स्वीकृति रोकने और विधेयक को वापस करने का कारण बताना चाहिये।
      • इससे सदन को उन कमियों को दूर करके एक अन्य विधेयक बनाने में मदद मिलेगी जिसके कारण विधेयक को खारिज कर दिया गया था।
  • संबंधित उदाहरण:
    • सितंबर 2021 में तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित एक विधेयक के आलोक में अध्यक्ष का वक्तव्य महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जिसमें राज्य के छात्रों को स्नातक मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिये आवश्यक राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) में छूट देने की मांग की गई है।
    • राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी ठहराए गए सात कैदियों की रिहाई के संबंध में तमिलनाडु विधानसभा ने वर्ष 2018 में एक प्रस्ताव पारित किया था।
      • प्रस्ताव तत्कालीन राज्यपाल को भेजा गया था लेकिन उन्होंने दो साल से अधिक समय तक कोई कार्रवाई नहीं की।
      • जनवरी 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान हुई देरी के लिये नाराज़गी व्यक्त की।
      • फरवरी में राज्यपाल ने इस पर बिना कोई विचार किये निर्णय लेने का उत्तरदायित्व राष्ट्रपति पर छोड़ दिया और कहा कि राष्ट्रपति विधेयक पर निर्णय लेने के लिये सक्षम प्राधिकारी है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल की वीटो शक्ति

  • परिचय:
    • भारत के राष्ट्रपति की वीटो पावर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 111 द्वारा निर्देशित है।  
    • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 200 राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को दी गई सहमति के संबंध में राज्यपाल की शक्तियों और राज्यपाल की अन्य शक्तियों जैसे राष्ट्रपति के विचार के लिये विधेयक को आरक्षित करने से संबंधित है।
    • अनुच्छेद 201 'विचार के लिये आरक्षित विधेयक' (Bills Reserved for Consideration) से संबंधित है।
    • भारत के राज्यपाल को पूर्ण वीटो, निलंबन वीटो (धन विधेयकों को छोड़कर) का अधिकार प्राप्त है, लेकिन पॉकेट वीटो का नहीं।
  • वीटो पावर के तीन प्रकार: पूर्ण वीटो, निरोधात्मक वीटो और पॉकेट वीटो।
    • अपवाद: जब संवैधानिक संशोधन विधेयकों की बात आती है तो राष्ट्रपति के पास कोई वीटो शक्ति नहीं होती है।
      • संविधान संशोधन विधेयक को राज्य विधानमंडल में पेश नहीं किया जा सकता है।
  • पूर्ण वीटो: यह संसद द्वारा पारित किसी विधेयक पर राष्ट्रपति को अपनी सहमति को रोकने की शक्ति को संदर्भित करता है। इसके बाद बिल समाप्त हो जाता है और अधिनियम नहीं बनता है।
  • निलंबित वीटो: जब राष्ट्रपति भारतीय संसद में पुनर्विचार के लिये विधेयक को लौटाता है तो वह इसके लिये निलंबन वीटो का उपयोग करता है।
    • यदि संसद राष्ट्रपति को संशोधन के साथ या बिना संशोधन के विधेयक को फिर से भेजती है, तो उसे अपनी किसी भी वीटो शक्ति का उपयोग किये बिना विधेयक को मंज़ूरी देनी होगी।
    • अपवाद: राष्ट्रपति धन विधेयक के संबंध में अपने निलंबन वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता।
  • पॉकेट वीटो: राष्ट्रपति द्वारा पॉकेट वीटो का प्रयोग कर विधेयक को अनिश्चित काल के लिये लंबित रखा जाता है।
    • वह न तो विधेयक को अस्वीकार करता है और न ही विधेयक को पुनर्विचार के लिये लौटाता है।
    • अमेरिकी राष्ट्रपति के विपरीत, जिसे 10 दिनों के भीतर बिल को फिर से भेजना होता है, भारतीय राष्ट्रपति के पास ऐसा कोई समय की बाध्यता नहीं है।
  • राज्य के विधेयकों पर वीटो:
    • राज्यपाल को राष्ट्रपति के विचार के लिये राज्य विधायिका द्वारा पारित कुछ प्रकार के विधेयकों को आरक्षित करने का अधिकार है।
      • फिर विधेयक के अधिनियमन में राज्यपाल की कोई और भूमिका नहीं होगी।
    • राष्ट्रपति ऐसे विधेयकों पर न केवल पहली बार बल्कि दूसरी बार आने पर भी अपनी सहमति को स्थगित कर सकता है। 
      • इस प्रकार राष्ट्रपति को राज्य के बिलों पर पूर्ण वीटो (और निलंबन वीटो नहीं) प्राप्त है।
    • इसके अलावा राष्ट्रपति राज्य विधान के संबंध में भी पॉकेट वीटो का प्रयोग कर सकता है।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय राजनीति

एक कानून को निरस्त करना

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प्रिलिम्स के लिये:

कृषि कानून, अध्यादेश, आतंकवाद विरोधी कानून, आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम 1987

मेन्स के लिये:

कानून को निरस्त करने की प्रक्रिया

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि 2020 में पारित किये गए तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में निरस्त कर दिया जाएगा।

प्रमुख बिंदु

  • संविधान का अनुच्छेद 245 संसद को पूरे या भारत के किसी भी हिस्से के लिये कानून बनाने की शक्ति देता है और राज्य विधानसभाओं को राज्य के लिये कानून बनाने की शक्ति देता है।
    • संसद को उसी प्रावधान से कानून को निरस्त करने की शक्ति भी प्राप्त है।
    • निरसन हेतु संसद की शक्ति संविधान के तहत कानून बनाने के समान है।
    • एक कानून को या तो पूरी तरह से या आंशिक रूप से या यहाँ तक ​​कि उस हद तक निरस्त किया जा सकता है जहाँ तक यह अन्य कानूनों का उल्लंघन करता है।
  • सनसेट क्लॉज़: इस विधान में एक सनसेट क्लॉज़ भी हो सकता है, अर्थात् एक विशेष तिथि जिसके बाद उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
    • उदाहरण के लिये आतंकवाद विरोधी कानून आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम 1987, जिसे आमतौर पर टाडा के रूप में जाना जाता है, में एक सनसेट क्लॉज़ था, वर्ष 1995 में इसे समाप्त करने की अनुमति दी गई थी।
  • निरसन: उन कानूनों के लिये जिनमें ‘सनसेट क्लॉज़’ शामिल नहीं है, संसद को कानून को निरस्त करने के लिये एक और कानून पारित करना होगा।
    • कानूनों को दो तरीकों से निरस्त किया जा सकता है- या तो एक अध्यादेश के माध्यम से या कानून के माध्यम से।
    • अध्यादेश: यदि किसी अध्यादेश का उपयोग किया जाता है, तो उसे छह महीने के भीतर संसद द्वारा पारित कानून से प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता होगी।
      • यदि अध्यादेश संसद द्वारा अनुमोदित नहीं होने के कारण व्यपगत हो जाता है, तो निरसित कानून को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
    • कानून के माध्यम से निरसन: सरकार को संसद के दोनों सदनों में कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिये कानून पारित करना होगा और इसके लागू होने से पूर्व राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त करनी होगी।
      • सभी तीन कृषि कानूनों को एक ही कानून के माध्यम से निरस्त किया जा सकता है।
      • प्रायः इस उद्देश्य के लिये ‘निरसन और संशोधन’ शीर्षक से विधेयक पेश किये जाते हैं। इसे अन्य विधेयकों की तरह ही पूर्ण प्रक्रिया से पारित किया जाता है।
      • इससे पूर्व ‘निरसन और संशोधन’ प्रावधान वर्ष 2019 में लागू किया गया था, जब केंद्र सरकार ने 58 अप्रचलित कानूनों को निरस्त करने और आयकर अधिनियम, 1961 तथा भारतीय प्रबंधन संस्थान अधिनियम, 2017 में मामूली संशोधन किया था।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


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