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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

कुलभूषण जाधव केस

  • 20 Nov 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय 

मेन्स के लिये:

कुलभूषण जाधव केस एवं वियना कन्वेंशन

चर्चा में क्यों?   

हाल ही में पाकिस्तानी संसद ने मृत्युदंड प्राप्त भारतीय कैदी कुलभूषण जाधव को सैन्य अदालत द्वारा उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ समीक्षा अपील दायर करने का अधिकार देने के लिये एक कानून बनाया है।

  • इस बिल को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice- ICJ) के एक आदेश को कानून करने हेतु बनाया गया था।
  • हालाँकि भारत का मानना है कि इस कानून में कई "कमियाँ" हैं तथा ICJ के आदेश को ‘अक्षरत: और उसकी भावना के साथ’ लागू करने के लिये आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रमुख बिंदु 

  • कुलभूषण जाधव केस:
    • गिरफ्तारी: 51 वर्षीय सेवानिवृत्त भारतीय नौसेना अधिकारी, जाधव को अप्रैल 2017 में एक पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने जासूसी करने और आतंकवाद के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई थी।
      • दिसंबर 2017 में जाधव की पत्नी और मां को एक काँच के अवरोधक के माध्यम से उनसे मिलने की अनुमति दी गई, भारत ने पाकिस्तान के इस दावे का विरोध किया कि यह ICJ में एक ‘कॉन्सुलर एक्सेस’ था।
      • कॉन्सुलर एक्सेस से इनकार: भारत ने जाधव को कॉन्सुलर एक्सेस (वियना कन्वेंशन) न मिल पाने और मौत की सज़ा को चुनौती देने के लिये पाकिस्तान के खिलाफ ICJ का दरवाज़ा खटखटाया।
    • ICJ रूलिंग: वर्ष 2019 में ICJ ने फैसला सुनाया कि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत जाधव की सज़ा की "प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार" करने के लिये बाध्य था।
    • पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: ICJ के आदेश के मद्देनज़र, पाकिस्तान सरकार ने जाधव को अपील दायर करने की अनुमति देने के लिये एक विशेष अध्यादेश जारी किया था।
      • पाकिस्तान की संसद ने ICJ के फैसले के तहत अपने दायित्व को पूरा करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (समीक्षा और पुनर्विचार) विधेयक, 2021 पारित किया है।

कानून में कमियाँ:

  • स्पष्ट रोड मैप का अभाव: भारत का मानना ​​है कि कुलभूषण जाधव के मामले में प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार हेतु कोई तंत्र बनाए बिना पाकिस्तान द्वारा पारित बिल वर्ष 2019 के अध्यादेश को ही दोहराता है।
  • म्युनिसिपल कोर्ट को असाधारण शक्ति: यह पाकिस्तान में नगरपालिका अदालतों को यह तय करने का अधिकार प्रदान करता है कि क्या जाधव को कॉन्सुलर एक्सेस प्रदान करने में विफलता का कारण किसी प्रकार का पूर्वाग्रह है या नहीं।
    • यह स्पष्ट रूप से मूल सिद्धांत का उल्लंघन है, नगरपालिका अदालतें इस बात के लिये मध्यस्थ नहीं हो सकतीं कि किसी राज्य ने अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत अपने दायित्वों को पूरा किया है या नहीं।
    •  यह भविष्य में नगरपालिका अदालत को अपील करने के लिये भी आमंत्रित करता है।
  • ‘प्रभावी समीक्षा तथा पुनर्विचार’ का भारत के लिये निहितार्थ:
    • प्रभावी समीक्षा तथा पुनर्विचार (Effective Review and Reconsideration) एक वाक्यांश है, जो कि घरेलू संदर्भो में प्रचलित ‘समीक्षा’ (Review) से भिन्न होता है।
    • इसमें कुलभूषण जाधव को ‘वकील/कॉन्सुलर उपलब्ध कराने’ और अपने बचाव हेतु तैयारी में मदद करना अंतर्निहित है।
    • इसका मतलब है कि पाकिस्तान को जाधव पर लगाए सभी आरोपों और उन सबूतों का भी खुलासा करना होगा जिनके बारे में वह अब तक पूरी तरह से अपारदर्शी रहा है।
    • पाकिस्तान को उन परिस्थितियों का भी खुलासा करना होगा, जिनमें सेना ने जाधव से अपराध का कबूलनामा हासिल किया था।
    • इसका तात्पर्य है कि जाधव को मामले की सुनवाई करने वाले किसी भी मंच या अदालत में अपना बचाव करने का अधिकार होगा।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)

  • ICJ संयुक्त राष्ट्र (UN) का एक प्रमुख न्यायिक अंग है।
  • इसकी स्थापना वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र के चार्टर द्वारा की गई और वर्ष 1946 में इसने अंतर्राष्ट्रीय न्याय के स्थायी न्यायालय (Permanent Court of International Justice-PCIJ) के उत्तराधिकारी के रूप में काम करना शुरू किया।
  • यह राष्ट्रों के बीच कानूनी विवादों को सुलझाता है और अधिकृत संयुक्त राष्ट्र के अंगों तथा विशेष एजेंसियों द्वारा निर्दिष्ट कानूनी प्रश्नों पर अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार सलाह देता है।
  • यह हेग (नीदरलैंड्स) के पीस पैलेस में स्थित है।

वियना संधि (Vienna Convention)

  • ‘वियना कन्वेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस’ (Vienna Convention on Consular Relations) एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसके तहत स्वतंत्र राष्ट्रों के बीच ‘कॉन्सुलर संबंधों’ को परिभाषित किया गया है।
    • एक कॉन्सुलर (जो राजनयिक नहीं है), एक मेज़बान देश में एक विदेशी राज्य का प्रतिनिधि है, जो अपने देशवासियों के हितों के लिये काम करता है।
  • ‘वियना संधि’ के अनुच्छेद 36 के अनुसार, मेज़बान देश में गिरफ्तार या हिरासत में लिये गए विदेशी नागरिकों को उनके ‘दूतावास या वाणिज्य दूतावास को गिरफ्तारी के बारे में सूचित करने संबंधी उनके अधिकार’ के बारे में तत्काल नोटिस/सूचना दी जानी चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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