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शासन व्यवस्था

सभी संस्थानों में NEET के माध्यम से प्रवेश

  • 09 May 2020
  • 16 min read

संदर्भ:

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने ‘क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर बनाम भारत संघ' शीर्षक वाली रिट याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में कहा है कि सभी संस्थानों में एमबीबीएस (MBBS), एमडी (MD) या डेंटल कोर्स के लिये ‘राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा’ (National Eligibility Cum Entrance Test- NEET) के माध्यम से प्रवेश दिया जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मेडिकल और दंत चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए NEET की एक समान परीक्षा निर्धारित करने से अनुच्छेद-19 (1)(g) के साथ 30 संविधान के 25, 26 और 29 (1) के तहत गैर सहायता प्राप्त/सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। 

पृष्ठभूमि:

  • वर्ष 2010 में भारतीय चिकित्सा परिषद (Medical Council of India- MCI) पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद इसमें सुधार करने के लिये एक शासक मंडल (Board of Governors) की नियुक्ति की गई। 
  • इस बोर्ड ने देश के सभी मेडिकल संस्थानों में स्नातक और परास्नातक कक्षाओं में दाखिले के लिये NEET की अवधारणा प्रस्तुत की थी। 
  • वर्ष 2013 में एक सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने NEET को ‘राज्य और मेडिकल कॉलेजों के प्रबंधन के अधिकारों में हस्तक्षेप’ के आधार पर इस व्यवस्था को असंवैधानिक बताया था। 
  • हालाँकि वर्ष 2016 में एक पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने NEET को पुनः मान्यता प्रदान कर दी थी।  
  • परंतु इसके बाद भी उच्चतम न्यायलय में इस संदर्भ में कई याचिकाएँ लंबित थी, जिनमें NEET की व्यवस्था को चुनौती दी गई थी।  
  • इनमें से अधिकांश याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद-30 (धर्म और भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के अनुसार शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित और प्रबंधन करने का अधिकार), अनुच्छेद-19 (1)(g) जो लोगों को किसी भी प्रकार का पेशा, उद्यम या व्यापार करने का अधिकार देता है और अनुच्छेद-14, 25 तथा 26 के आधार पर आपत्ति ज़ाहिर की गई थी।

न्यायालय का आदेश: 

  • उच्चतम न्यायलय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि-
    1. NEET से किसी भी अल्पसंख्यक संस्थान (भाषाई अथवा धार्मिक) के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता है।
    2. NEET की व्यवस्था सभी संस्थानों (गैर सहायता प्राप्त/सहायता प्राप्त, अल्पसंख्यक और अन्य सभी) पर लागू होगी।
    3. उच्चतम न्यायालय ने कहा कि NEET जैसी पहलों का लक्ष्य नियमों में पारदर्शिता, मेरिट और शिक्षण संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया में विद्यमान कमियों को दूर कर सामाजिक व्यवस्था में सुधार करना है।

संस्थानों की आपत्ति:

  • देश के कई शिक्षण संस्थानों द्वारा उच्चतम न्यायलय में दी गई याचिका में यह आरोप लगाया गया था कि NEET की बाध्यता लागू होने से ऐसे संस्थानों को संविधान के अनुच्छेद 29(1) और 30 के तहत प्राप्त अधिकारों का हनन होता है।
  • क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़े संस्थानों ने अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषाओं के अनुवाद से जुड़ी समस्याएँ रखी थी। 
  • क्षेत्रीय भाषाओं से से जुड़े संस्थानों के अनुसार, NEET शहरों और आर्थिक रूप से मज़बूत परिवारों से आने वाले बच्चों को बढ़त प्रदान करती है तथा कोचिंग संस्थानों पर बच्चों की निर्भरता की मानसिकता को बढ़ावा देती है।   
  • मेडिकल संस्थानों में MBBS सीटों के लिये एकीकृत काउंसिलिंग की प्रक्रिया लागू करने के बाद अल्पसंख्यक संस्थानों ने इसका विरोध किया था।     

भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियाँ: 

  • चिकित्सकों की कमी: भारत में जनसंख्या में वृद्धि के साथ ही कुशल चिकित्सकों की उपलब्धता एक चुनौती बन गई है, वर्ष 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रति 11,802 लोगों पर मात्र 1 डॉक्टर उपलब्ध है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) के सुझाव के अनुसार, यह अनुपात 1:1000 होना चाहिये।
    • प्राथमिक स्तर पर चिकित्सकों की कमी भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र के लिये एक बड़ी समस्या है, इससे न सिर्फ द्वितीयक और तृतीयक स्तरों के चिकित्सा केंद्रों पर दबाव बढ़ता है बल्कि यह बड़ी मात्रा में आर्थिक क्षति और कई मामलों में इलाज़ के अभाव में मृत्यु का कारण बनता है।
    • वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित चिकित्सा केंद्रों में विशेषज्ञ (Specialist) चिकित्सकों के 83% पद खाली थे। 
  • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (Primary Health Centers- PHCs) की अव्यवस्था: स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधारों के उद्देश्य से बनी ‘मुदलियार समिति’ (1959) ने देश के स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रगति की समीक्षा की। 
    • इस समिति ने PHCs की अव्यवस्था को देखते हुए नए स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना से पूर्व पहले से बने स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति में सुधार (एक PHC पर 40,000 से अधिक आबादी का दबाव न हो) करने का प्रस्ताव किया और इस समिति ने ‘आल इंडिया हेल्थ सर्विस’ (All India Health service) की स्थापना की सिफारिश भी की थी।   
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण:    
    • निजी संस्थानों ने देश में डॉक्टरों की कमी को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है परंतु ऐसे संस्थानों में स्वायत्तता के नाम पर शुल्क में अनियमित वृद्धि से मेडिकल शिक्षा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग की पहुँच से बाहर हुई है और इसके व्यवसायीकरण को बढ़ावा मिला है।
    • साथ ही कई संस्थानों में अनियमितताओं के मामलों के सामने आने से स्वास्थ्य क्षेत्र में शिक्षा की गुणवत्ता और इसके मानकों पर भी प्रश्न उठाने लगे हैं।   
    • अन्य क्षेत्रों की तरह ही स्वास्थ्य क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। 

NEET की आवश्यकता क्यों?  

  • NEET के लागू होने से पहले अलग-अलग संस्थानों (केंद्र अथवा राज्य सरकारों के अधीन, निजी व अन्य) में अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करना पड़ता था।
  • अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं से छात्रों को होने वाली समस्याओं के साथ, सभी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में भिन्नता और प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ी या भ्रष्टाचार आदि समस्याएँ बनी रहती थीं।
  • पिछले कुछ वर्षों में देश में निजी मेडिकल कॉलेजों और मानद विश्वविद्यालयों (Deemed University)  की संख्या में वृद्धि हुई है, इन संस्थानों ने देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान भी दिया है, परंतु बहुत से ऐसे संस्थानों में प्रवेश परीक्षाओं में भारी अनियमितताओं तथा भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं।
  • देश अलग-अलग भागों में मेडिकल संस्थानों में प्रवेश के भिन्न मानक का होना मेडिकल क्षेत्र के विकास में एक बड़ी बाधा रही है।
  • प्रवेश परीक्षा और इसके पाठ्यक्रम के अलग होने के साथ अन्य नियमों के संदर्भ में भी मतभेद उत्पन्न होने लगे थे, जिससे संस्थानों की निगरानी प्रक्रिया बहुत ही जटिल हो गई थी।
    • उदाहरण के लिये हाल ही में एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायलय ने स्पष्ट किया है कि मानद विश्वविद्यालयों से जुड़े हुए व्यक्ति, अधिकारी आदि ‘लोक सेवक' (Public Servant) की परिभाषा के तहत आते हैं और ‘मानद विश्वविद्यालय’ में रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार के मामलों ऐसे लोगों पर भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत सुनवाई कर सजा दी जा सकती है।                          

NEET के तहत प्रवेश प्रणाली को एकीकृत करने के लाभ:

  • उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के बाद अब छात्र अलग-अलग परीक्षाएँ देने के बजाय NEET परीक्षा के माध्यम से अपनी पसंद के संस्थान में प्रवेश ले सकेंगे।
  • इस निर्णय के माध्यम से देश के सभी मेडिकल संस्थानों के पाठ्यक्रमों में एक समानता लाने में सफलता मिलेगी।

पारदर्शिता:

  • NEET के माध्यम से निजी संस्थानों में भ्रष्टाचार के मामलों और छात्रों के दाखिले की प्रक्रिया पर बेहतर निगरानी की जा सकेगी।
  • इसके माध्यम से संस्थानों की स्वायत्तता को  बनाए रखते हुए उनके विनियमन की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने में सहायता मिलेगी।

मानकीकरण: 

  • निजी संस्थानों की अनियमितताओं के कारण भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र और मेडिकल शिक्षा पर प्रश्न उठने लगे थे, NEET के माध्यम से पूरे देश में शिक्षा के मानक में सुधार लाने में सहायता प्राप्त होगी।
  • NEET के लागू होने से छात्र संस्थान द्वारा दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता और अन्य पहलुओं की जाँच करने के बाद ही उसका चुनाव करेंगे, ऐसे में इस व्यवस्था के लागू होने से संस्थान भी अपनी गुणवत्ता में सुधार लाने को विवश होंगे।

व्यवसायीकरण पर नियंत्रण: 

  • ऐतिहासिक रूप से भारतीय सामाजिक व्यवस्था में शिक्षा का स्थान सबसे ऊंचा रहा है, देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित सभी निजी संस्थान स्वयं को गैर-लाभकारी और जनहित के उद्देश्य से प्रेरित बताकर स्थापित किए गए हैं। परंतु अध्ययनों से पता चलता है कि वर्तमान में इनमें से कई संस्थानों का उद्देश्य मात्र व्यावसायिक ही रह गया है।
  • NEET के माध्यम से दाखिले की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाकर तथा संस्थानों द्वारा लिये जाने वाले शुल्क को कुछ सीमा तक नियंत्रित कर शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोकने में सहायता प्राप्त होगी।        

आगे की राह:

  • बदलते समय के साथ सरकार और नियामकों को शिक्षा के मानकीकरण, गुणवत्ता और इस भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने के लिये आवश्यक कदम उठाने चाहिये।
  • शिक्षा के संदर्भ में बलपूर्वक सुधार लाना और लंबे समय तक इसे बनाए रखना संभव नहीं होगा अतः निजी संस्थानों को व्यावसायिक हितों के साथ ही अपने सामाजिक दायित्त्वों पर भी ध्यान देना चाहिये।
  • शुल्क पर अनावश्यक नियंत्रण से निजी संस्थानों के हित प्रभावित हो सकते हैं, ऐसे में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और निजी संस्थानों द्वारा संस्थानों आर्थिक ज़रूरतों और छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक समन्वित नीति का निर्माण  किया जाना चाहिये।
  • विश्व के अन्य देशों में वे छात्र जो जीवन में आगे चलकर आर्थिक रूप से मज़बूत होते हैं, अपने विद्यालय या कॉलेज को आर्थिक सहयोग देते हैं। भारत में भी ऐसी पहल को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।  
  • राज्यों द्वारा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (National Medical Commission- NMC) की स्थापना और शक्तियों के संदर्भ में प्रश्न उठाए जाते रहे हैं, अतः सरकार को राष्ट्रीय स्तर की नीतियों में राज्यों के सभी मुद्दों पर विचार करना चाहिये तथा NMC को किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाना चाहिये।   
  • हाल के वर्षों में केंद्र सरकार के आयुष्मान भारत और दिल्ली सरकार द्वारा मोहल्ला क्लीनिक जैसे प्रयासों के माध्यम से ज़मीनी स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के सफल प्रयास किये गए हैं। सरकार को अधिक-से-अधिक लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच सुनिश्चित करने के लिये सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को बढ़ावा देना चाहिये।   

अभ्यास प्रश्न:  ‘राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा’ (National Eligibility Cum Entrance Test- NEET) केंद्र सरकार द्वारा निजी संस्थानों की स्वायत्तता और राज्यों के अधिकारों को सीमित करने का एक विकल्प है। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं। 

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