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राजीव गांधी की हत्या के मामले में राज्यपाल की क्षमादान की शक्तियों पर सवाल

  • 15 Sep 2018
  • 5 min read

संदर्भ

हाल ही में राजीव गांधी हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे 7 दोषियों को तमिलनाडु सरकार ने रिहा करने की बात कही है। साथ ही, तमिलनाडु सरकार ने इस संबंध में संभावित संवैधानिक उपाय यानी अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति का उपयोग करने का भी आह्वान किया है। अब मूल प्रश्न यह है कि अनुच्छेद 161 में निहित क्षमादान के संदर्भ में राज्यपाल की शक्तियाँ क्या है और इनका प्रयोग राज्यपाल कैसे करता है? इस लेख के माध्यम से इन सभी प्रश्नों का जवाब ढूँढने का प्रयास करेंगे।

राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति 

  • अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति प्राप्त है।
  • इस शक्ति के तहत दोष सिद्ध कैदी दया-याचिका प्रस्तुत करके अपनी सज़ा को माफ़ करने के लिये गुहा राष्ट्रपति या राज्यपाल से गुहार लगा सकते हैं।

दया-याचिका

  • प्रत्येक दोष सिद्ध कैदी को दयायाचिका प्रस्तुत करने का संवैधानिक अधिकार है।
  • दयायाचिका पर उचित प्रक्रिया के तहत विचार किया जाना कैदी को अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्राप्त मूल अधिकार है।
  • उल्लेखनीय है कि ‘टाडा’ के अंतर्गत मृत्युदंड की सज़ा प्राप्त कैदी भी दयायाचिका प्रस्तुत कर सकता है।
  • अनुच्छेद 161 के तहत किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय संबंधी, जिस विषय पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है।

clemency-question-the-rajiv-gandhi-assassination-case

राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति में निम्नलिखित तत्त्व शामिल हैं-

  • क्षमा: इसमें दंडादेश और दोषसिद्धि दोनों से मुक्ति देना शामिल है। ध्यातव्य है कि राज्यपाल मृत्युदंड को माफ़ नहीं सकता है, यह शक्ति केवल ‘राष्ट्रपति’ को ही प्राप्त है हालाँकि, राज्यपाल उक्त अपराध के फलस्वरूप अल्प सज़ा का प्रावधान कर सकता है।
  • लघुकरण: इसमें दंड के स्वरुप को बदलकर कम करना शामिल है, उदाहरण के लिये मृत्युदंड को आजीवन कारावास और कठोर कारावास को साधारण कारावास में बदलना।
  • परिहार: इसमें दंड की प्रकृति में परिवर्तन  किया जाना शामिल है, उदाहरण के लिये दो वर्ष के कारावास को एक वर्ष के कारावास में परिवर्तित करना।
  • विराम: इसके अंतर्गत किसी दोषी को प्राप्त मूल सज़ा के प्रावधान को किन्हीं विशेष परिस्थितियों में बदलना शामिल है। उदाहरण के लिये महिला की गर्भावस्था की अवधि के कारण सज़ा को परिवर्तित करना।
  • प्रविलंबन: इसके अंतर्गत क्षमा या लघुकरण की कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान दंड के प्रारंभ की अवधि को आगे बढ़ाना या किसी दंड पर अस्थायी रोक लगाना शामिल है।
  • क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा से परे है, हालाँकि अनुच्छेद 161 के अंतर्गत शक्तियों के प्रयोग के तरीके की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
  • अतः इस प्रकार राज्यपाल किसी भी दंड को क्षमा कर सकता, अस्थायी रूप से उन पर रोक लगा सकता है या सज़ा की अवधि को कम कर सकता है।

निष्कर्ष

तमिलनाडु सरकार का मानना ​​है कि अभियुक्तों को अनुच्छेद 161 का लाभ प्राप्त करने पर कोई कानूनी बार नहीं है, भले ही उनमें से कुछ की दया याचिका दोनों राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दी गई हो। दागी जीवन से आज़ादी की आशा करना वास्तव में आधुनिक समाज के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए नहीं है। हालाँकि, मौत की सज़ा पर इस तरह के फैसले के प्रभाव को नजरअंदाज करना असंभव है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल में निहित यह सार्वभौमिक शक्ति काफी व्यापक है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अतीत में इसके राजनीतिक विचारधाराओं के उपयोग के खिलाफ चेतावनी दी थी। यह सर्विदित है कि अभियुक्तों को रिहा करने के कदम के पीछे कई राजनीतिक विचार विद्यमान हैं, लेकिन यह ज़रूरी है कि इस मामले को अकेले कानूनी सिद्धांतों के आधार पर ही तय किया जाना चाहिये।

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