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भारतीय अर्थव्यवस्था

सकल घरेलू उत्पाद एवं निवल घरेलू उत्पाद

प्रिलिम्स के लिये: सकल घरेलू उत्पाद, GDP डिफ्लेटर, प्रति व्यक्ति GDP, सकल स्थिर पूंजी निर्माण, निवल घरेलू उत्पाद (NDP)

मेन्स के लिये: GDP बनाम NDP: वैचारिक अंतर और नीतिगत प्रभाव; कल्याण एवं सततता के संकेतक के रूप में GDP की सीमाएँ

स्रोत:TOI

चर्चा में क्यों?

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के माध्यम से वित्त वर्ष 2025–26 के लिये सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रथम अग्रिम अनुमान (First Advance Estimates) जारी किये हैं, जिनमें वास्तविक GDP में 7.4% की सुदृढ़ वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है।

  • इसके साथ ही, भारत आर्थिक गतिविधि के प्राथमिक मापदंड के रूप में GDP से निवल घरेलू उत्पाद (NDP) की ओर स्थानांतरण की योजना बना रहा है, जो संयुक्त राष्ट्र की राष्ट्रीय लेखा प्रणाली (SNA) 2025 के अनुरूप है। इसका कार्यान्वयन वर्ष 2029-30 से अपेक्षित है, ताकि उत्पादन की वास्तविक लागत को अधिक सटीक रूप से प्रतिबिंबित किया जा सके।

सारांश

  • वित्त वर्ष 2025-26 के लिये प्रथम अग्रिम अनुमान में वास्तविक GDP में 7.4% की सुदृढ़ वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, जो मुख्यतः सेवा क्षेत्र द्वारा संचालित है तथा इसमें निजी उपभोग और निवेश की गति प्रबल बनी हुई है।
  • भारत SNA 2025 के अनुरूप GDP से निवल घरेलू उत्पाद (NDP) की ओर संक्रमण की योजना बना रहा है, ताकि निवल एवं सततता-समायोजित (Net and Continuity-Adjusted) आर्थिक वृद्धि को बेहतर ढंग से मापा जा सके और GDP की सीमाओं, जैसे– पूंजी अपक्षय, पर्यावरणीय लागत और असमानता को संबोधित किया जा सके।

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) क्या है?

  • परिचय: GDP किसी निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वर्ष या तिमाही) में देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को दर्शाता है।
  • GDP के प्रकार:
    • मौद्रिक GDP (Nominal GDP): वर्तमान बाज़ार मूल्यों पर मापा जाता है, जिसमें मुद्रास्फीति का समायोजन नहीं किया जाता। यह एक ही वर्ष के भीतर तुलना हेतु उपयोगी है, लेकिन वर्षों के बीच तुलना के लिये विश्वसनीय नहीं होता।
    • वास्तविक GDP (Real GDP): GDP डिफ्लेटर का उपयोग कर मुद्रास्फीति के प्रभाव को समायोजित किया जाता है। यह उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की वास्तविक मात्रा को प्रतिबिंबित करता है तथा समय के साथ आर्थिक वृद्धि की तुलना को संभव बनाता है।
  • भारत में GDP की गणना की पद्धति:
    • वर्ष 2015 से पूर्व: भारत में GDP की गणना 2004-05 को आधार वर्ष मानकर की जाती थी और इसे कारक लागत (Factor Cost) पर मापा जाता था, जिसमें अप्रत्यक्ष कर और सब्सिडी शामिल नहीं होते थे।
      • क्षेत्रीय कवरेज अपेक्षाकृत सीमित थी तथा श्रम आय का आकलन श्रमिकों के प्रकारों में भेद किये बिना समान रूप से किया जाता था।
    • वर्ष 2015 के पश्चात: GDP की गणना में 2011-12 को आधार वर्ष अपनाया गया और इसे बाज़ार मूल्य (Market Prices) पर मापा जाने लगा, जिसमें कर और सब्सिडी शामिल हैं। प्रभावी श्रम आगत (Effective Labour Input) के माध्यम से श्रम आय के आकलन में सुधार किया गया तथा कृषि तथा वित्तीय सेवाओं में कवरेज का विस्तार किया गया।
  • संभावित GDP (Potential GDP): यह वह अधिकतम सतत उत्पादन है, जो एक अर्थव्यवस्था अपने सभी संसाधनों श्रम, पूंजी, प्रौद्योगिकी का कुशलतापूर्वक उपयोग करके उत्पन्न कर सकती है, बढ़ती मुद्रास्फीति को उत्पन्न किये बिना।
  • महत्त्व: संभावित GDP अर्थव्यवस्था के आकार, उत्पादकता, वृद्धि और व्यापक आर्थिक प्रदर्शन का प्रमुख संकेतक है। GDP वृद्धि दर अर्थव्यवस्था के विस्तार या संकुचन की गति को दर्शाती है।
  • आधार वर्ष संशोधन: भारत GDP आधार वर्ष को 2011-12 से 2022-23 में संशोधित कर रहा है, ताकि वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित किया जा सके। संशोधित GDP शृंखला फरवरी 2027 में जारी होने की योजना है।
    • संशोधित GDP शृंखला SNA 2008 के अनुरूप जारी रहेगी, जबकि NDP की ओर परिवर्तन SNA 2025 के अनुरूप होगा।

GDP की सीमाएँ

  • पूंजी अपक्षय के लिये समायोजन का अभाव: GDP सकल उत्पादन (Gross Output) को मापता है और भौतिक पूंजी, जैसे– मशीनरी, अवसंरचना और भवनों के अपक्षय को कम नहीं करता है, जिससे अर्थव्यवस्था द्वारा उत्पन्न शुद्ध/निवल आय (Net Income) का आकलन अधिक दिखता है।
  • पर्यावरणीय लागत का अपवर्जन: GDP संसाधनों के उत्खनन और प्रदूषण-प्रधान गतिविधियों को मूल्य संवर्द्धन के रूप में मानता है, लेकिन प्राकृतिक पूंजी के क्षरण या पर्यावरणीय क्षति को शामिल नहीं करता, जबकि इनका दीर्घकालीन आर्थिक कल्याण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
    • GDP केवल लघु-कालिक आर्थिक उत्पादन पर केंद्रित है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाली लागत (Intergenerational Costs) की अनदेखी करता है, जिससे यह सतत और समावेशी दीर्घकालिक विकास का मूल्यांकन करने के लिये अपर्याप्त मापदंड बन जाता है।
  • अवैतनिक श्रम का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व: घरेलू श्रम, देखभाल कार्य (Care Work) और असंगठित अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से जैसी बाज़ार के बाहर की गतिविधियाँ या तो कम मूल्यांकित की जाती हैं या पूरी तरह से शामिल नहीं की जातीं, जिससे कुल आर्थिक गतिविधि का आकलन अधूरा रह जाता है।
  • आय वितरण के प्रति असंवेदनशीलता: सकल घरेलू उत्पाद (GDP) केवल देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य दर्शाता है, लेकिन यह नहीं दर्शाता कि यह आय समाज के विभिन्न वर्गों में कैसे वितरित की गई है। इसलिये GDP में वृद्धि के बावजूद समाज में आय तथा संपत्ति की असमानता बढ़ सकती है।
  • विकास की गुणवत्ता के बजाय उत्पादन की मात्रा पर बल: GDP केवल उत्पादन की मात्रा को मापता है, लेकिन यह विकास के गुणात्मक आयामों जैसे कि स्वास्थ्य परिणाम, शैक्षिक उपलब्धि, सामाजिक कल्याण और पर्यावरणीय स्थिरता को मापने में असमर्थ रहता है।
    • वर्ष 2025 में भारत 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की GDP के साथ जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। हालाँकि प्रति व्यक्ति आय के मामले में जापान अब भी भारत से बहुत आगे है। वर्ष 2024 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP जहाँ 2,694 अमेरिकी डॉलर थी, वहीं जापान की 32,487 अमेरिकी डॉलर थी, जो औसत आय के स्तर में एक बड़े अंतर को दर्शाती है।
  • रक्षा और सुधारात्मक खर्चों को शामिल करना: आपदा पुनर्प्राप्ति, प्रदूषण नियंत्रण, दुर्घटनाओं के कारण स्वास्थ्य देखभाल या अपराध रोकथाम पर होने वाले खर्च GDP को बढ़ा देते हैं, भले ही ये खर्च सामाजिक या पर्यावरणीय नुकसान को कम करने के लिये किये गए हों और वास्तविक कल्याण में वृद्धि को दर्शाते न हों।


GDP

वित्त वर्ष 2025-26 के लिये GDP के पहले एडवांस अनुमानों के मुख्य तथ्य क्या हैं?

  • वास्तविक GDP वृद्धि दर: वित्त वर्ष 2025–26 में 7.4% अनुमानित है, जो वित्त वर्ष 2024–25 की 6.5% वृद्धि दर से अधिक है।
  • मौद्रिक GDP वृद्धि दर: वित्त वर्ष 2025–26 में 8.0% अनुमानित है।
  • वास्तविक GVA वृद्धि दर: 7.3% अनुमानित है, जो मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र में तेज़ वृद्धि के कारण है।
  • उच्च वृद्धि वाले तृतीयक (सेवा) क्षेत्र:
    • वित्तीय, रियल एस्टेट एवं व्यावसायिक सेवाएँ तथा लोक प्रशासन, रक्षा एवं अन्य सेवाएँ: स्थिर कीमतों पर 9.9% की अनुमानित वृद्धि।
    • व्यापार, होटल, परिवहन, संचार एवं प्रसारण क्षेत्र: स्थिर कीमतों पर 7.5% की अनुमानित वृद्धि।
  • द्वितीयक क्षेत्र का प्रदर्शन:
    • विनिर्माण एवं निर्माण क्षेत्र: स्थिर कीमतों पर 7.0% की अनुमानित वृद्धि।
  • प्राथमिक और उपयोगिता क्षेत्र:
    • कृषि एवं संबद्ध गतिविधियाँ: 3.1% की अनुमानित वृद्धि।
    • विद्युत, गैस, जल आपूर्ति एवं अन्य उपयोगिता सेवाएँ: 2.1% की अनुमानित वृद्धि, जो मध्यम स्तर के विस्तार को दर्शाती है।
  • निजी उपभोग: निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) में 7.0% की अनुमानित वृद्धि, जो घरेलू मांग के निरंतर बने रहने को दर्शाती है।
  • निवेश: वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान स्थिर कीमतों पर सकल स्थायी पूंजी निर्माण (GFCF) में 7.8% की अनुमानित वृद्धि, जो पिछले वित्त वर्ष की 7.1% वृद्धि दर से अधिक है।

निवल घरेलू उत्पाद (NDP) क्या है?

  • परिचय: निवल घरेलू उत्पाद (NDP) किसी देश की आर्थिक उत्पादन क्षमता का एक माप है। यह एक निश्चित अवधि में देश की सीमाओं के भीतर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य से पूंजीगत परिसंपत्तियों के मूल्यह्रास (Depreciation) को घटाने के बाद प्राप्त होता है।
    • SNA 2025 के अंतर्गत, NDP = GDP – (स्थिर पूंजी का मूल्यह्रास + प्राकृतिक संसाधनों का क्षय) माना गया है, जिससे यह एक अधिक सततता-संवेदनशील (Sustainability-Aware) आर्थिक संकेतक बन जाता है।
  • महत्त्व: यह सकल उत्पादन के बजाय अर्थव्यवस्था द्वारा उत्पन्न वास्तविक निवल आय को दर्शाता है।
    • यह भौतिक पूंजी की क्षति और प्राकृतिक संसाधनों के क्षय को भी ध्यान में रखता है।
    • यह आकलन करने में मदद करता है कि आर्थिक वृद्धि वास्तविक है या केवल संपत्तियों को घटाकर प्राप्त की गई है।
    • यह दीर्घकालीन योजना, वित्तीय स्थिरता और पीढ़ियों के बीच समानता को सुनिश्चित करने में सहायक है।
  • GDP की तुलना में NDP की श्रेष्ठता: NDP मूल्यह्रास को समायोजित करता है, जबकि GDP पूंजी की खपत को नज़रअंदाज़ करता है।
    • SNA 2025 के तहत, NDP प्राकृतिक संसाधनों के क्षय को घटाकर पर्यावरणीय लागत को शामिल करता है।
    • यह आर्थिक कल्याण और उत्पादन क्षमता का अधिक यथार्थपूर्ण माप प्रदान करता है।
    • यह केवल उत्पादन के विस्तार के बजाय निवल मूल्य वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करके वृद्धि का अधिक अनुमान लगाने से रोकता है।

संयुक्त राष्ट्र की राष्ट्रीय लेखांकन प्रणाली (SNA) 2025

  • SNA 2025 एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय ढाँचा है, जो राष्ट्रीय खातों को संकलित करने के लिये बनाया गया है। यह SNA 2008 की जगह लेता है और GDP से आगे बढ़कर सततता, आय का वितरण और गैर-बाज़ार गतिविधियों को बेहतर तरीके से मापने की क्षमता प्रदान करता है।
    • SNA 2025 के तहत, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का उत्पादन गैर-बाज़ार गतिविधि के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा और बैंकों द्वारा किये जाने वाले नियामक भुगतान को सेवा शुल्क नहीं बल्कि स्थानांतरण के रूप में माना जाएगा।
    • यह प्राकृतिक पूंजी लेखांकन (Natural Capital Accounting) को शामिल करता है, जिसमें खनिज, कोयला, तेल और गैस के क्षय को उत्पादन लागत माना जाएगा, जबकि नवीकरणीय संसाधनों को संपत्ति के रूप में मान्यता दी जाएगी। इसके साथ ही यह वितरणीय खाते (Distributional Accounts) भी जोड़ता है, जो विभिन्न घरेलू समूहों में आय, संपत्ति, उपभोग और बचत को दर्शाते हैं।
    • SNA 2025 अपने विस्तारित खातों (Extended Accounts) में अवैतनिक घरेलू और देखभाल कार्य को शामिल करके नीति प्रासंगिकता को बढ़ाता है, जिससे आर्थिक वृद्धि को समानता, पारिस्थितिक संतुलन और समावेशिता के साथ जोड़ा जा सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  भारतीय संदर्भ में आर्थिक कल्याण के माप के रूप में GDP की सीमाओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. निवल घरेलू उत्पाद (NDP) क्या है?
यह GDP में से पूंजीगत मूल्यह्रास और प्राकृतिक संसाधनों की कमी को घटाकर शुद्ध उत्पादन को मापता है, जो वास्तविक आय सृजन को दर्शाता है।

2. एडवांस अनुमानों के अनुसार, FY 2025-26 में भारत की अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन कैसा रहा?
वास्तविक GDP में 7.4% की वृद्धि हुई, जिसका नेतृत्व सेवा क्षेत्र ने किया, वास्तविक GVA में 7.3% की वृद्धि हुई, जिसमें मज़बूत निजी उपभोग और निवेश योगदानकर्त्ता रहे।

3. GDP की मुख्य कमियाँ क्या हैं?
GDP मूल्यह्रास, पर्यावरणीय लागत, अवैतनिक काम, आय वितरण की असमानता को नज़रअंदाज़ करता है और सुधारात्मक खर्चों को भी वृद्धि के रूप में गिनता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रिलिम्स

प्रश्न 1. भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)

  1. पिछले दशक में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में लगातार वृद्धि हुई है।  
  2. बाज़ार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद (रुपए में) में पिछले एक दशक में लगातार वृद्धि हुई है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b)


प्रश्न 2. किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में कर में कमी निम्नलिखित में से किसको दर्शाती है? (2015))

  1. धीमी आर्थिक विकास दर  
  2. राष्ट्रीय आय का कम न्यायसंगत वितरण

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर का चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a)


मेन्स

प्रश्न 1. संभावित सकल घरेलू उत्पाद को परिभाषित करते हुए इसके निर्धारकों की व्याख्या कीजिये। वे कौन-से कारक हैं जो भारत को अपनी संभावित GDP को साकार करने से रोक रहे हैं? (2020)

प्रश्न 2. वर्ष 2015 से पहले और वर्ष 2015 के बाद भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की कंप्यूटिंग पद्धति के बीच अंतर को स्पष्ट कीजिये। (2021)


शासन व्यवस्था

भारत में उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण: संभावनाएँ, क्षमता और नीतिगत अनुशंसाएँ

प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क, भारत विद्या कोष

मेन्स के लिये: उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण और राष्ट्रीय विकास, ब्रेन ड्रेन बनाम ब्रेन सर्कुलेशन, शिक्षा और आर्थिक वृद्धि के बीच संबंध, मृदु शक्ति (सॉफ्ट पावर) और कूटनीति में उच्च शिक्षा की भूमिका

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

नीति आयोग ने ‘भारत में उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण: संभावनाएँ, क्षमता और नीतिगत अनुशंसाएँ (Internationalisation of Higher Education in India: Prospects, Potential, and Policy Recommendations)’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें भारत को उच्च शिक्षा का वैश्विक गंतव्य बनाने हेतु एक समग्र रोडमैप प्रस्तुत किया गया है।

सारांश

  • नीति आयोग की रिपोर्ट में उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण को भारत के ब्रेन ड्रेन, छात्र गतिशीलता के असंतुलन और विदेशी मुद्रा के बड़े बहिर्वाह जैसी चुनौतियों से निपटने तथा अनुसंधान, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करने हेतु एक णनीतिक आवश्यकता के रूप में रेखांकित किया गया है।
  • प्रस्तावित रोडमैप में छात्रवृत्तियाँ, USD 10 अरब का अनुसंधान कोष, नियामक एवं वीज़ा सुधार, तथा वैश्विक शैक्षणिक साझेदारियाँ शामिल हैं, जिनका उद्देश्य NEP 2020 और SDGs के अनुरूप भारत को छात्रों का शुद्ध निर्यातक से बदलकर वैश्विक शिक्षा केंद्र में परिवर्तित करना है।

भारत के लिये उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन) की समस्या का समाधान: भारत में आवक-जावक (Inbound-Outbound) छात्रों का अनुपात 1:28 है, जो विदेशों की ओर छात्र पलायन की ओर एक गंभीर प्रवृत्ति को दर्शाता है।
    • यह स्थिति उल्लेखनीय ब्रेन ड्रेन तथा घरेलू शैक्षणिक क्षमता में कमी को परिलक्षित करती है।
    • वर्ष 2011 से अब तक 16 लाख से अधिक भारतीयों ने नागरिकता का परित्याग किया है, जिसका एक कारण विदेशों में शैक्षणिक–आप्रवासन रहा है। उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण ब्रेन ड्रेन को ब्रेन सर्कुलेशन में परिवर्तित कर सकता है।
  • आर्थिक तथा विदेशी मुद्रा बहिर्गमन में कमी: भारतीय छात्रों द्वारा विदेशों में शिक्षा पर किया जाने वाला व्यय वर्ष 2025 तक लगभग ₹6.2 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। 
    • यह राशि लगभग GDP के 2% के बराबर तथा भारत के व्यापार घाटे (वित्त वर्ष 2024–25) के लगभग 75% के समकक्ष है। घरेलू स्तर पर गुणवत्तापूर्ण अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराकर विदेशी मुद्रा बहिर्गमन की इस स्थिति को सीमित किया जा सकता है।
  • भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता का सुदृढ़ीकरण: भारतीय छात्रों का अमेरिका, ब्रिटेन तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे उच्च-आय एवं रणनीतिक देशों में अत्यधिक संकेन्द्रण (लगभग 8.5 लाख से अधिक छात्र) दीर्घकाल में भारत की ज्ञान-अर्थव्यवस्था और नवाचार आधार को कमज़ोर कर सकता है। 
    • इसके विपरीत, वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करना शोध गुणवत्ता में सुधार करता है तथा संस्थागत रैंकिंग को सुदृढ़ बनाता है।
  • शोध एवं सॉफ्ट पावर का विस्तार: वर्तमान में भारत में लगभग 47,000 अंतर्राष्ट्रीय छात्र (2022) अध्ययनरत हैं, किंतु सशक्त नीतिगत समर्थन के साथ 2047 तक यह संख्या 7.89–11 लाख तक पहुँच सकती है। 
    • वर्ष 2001 से, अंतर्राष्ट्रीय छात्र प्रवाह में 518% की वृद्धि हुई है, जो भारत की एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में महत्त्वपूर्ण लेकिन यह अभी तक पूरी तरह से विकसित या सक्रिय नहीं हुई है, जो भारत की क्षमता को उजागर करता है।
      • अंतर्राष्ट्रीय छात्रों और शिक्षकों का आगमन शोध उत्पादन, अंतर-सांस्कृतिक अधिगम और वैश्विक सहयोगों को प्रोत्साहन प्रदान करता है।
    • यह भारत को एक वैश्विक ज्ञान केंद्र (Global Knowledge Hub) के रूप में स्थापित करता है और शैक्षिक कूटनीति को सशक्त बनाता है।
  • राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों का समर्थन: अंतर्राष्ट्रीयकरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और भारत की 2047 विकास दृष्टि के विकास दृष्टि के अनुरूप है।
    • यह आर्थिक विकास और तकनीकी नेतृत्व के लिये आवश्यक उच्च-कुशल कार्यबल के निर्माण में सहायता करता है।

भारत में उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की प्रमुख चुनौतियाँ

  • सीमित छात्रवृत्तियाँ एवं वित्तीय सहायता: नीति आयोग द्वारा सर्वेक्षण किये गए भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में से लगभग 41% ने अपर्याप्त छात्रवृत्तियों को सबसे बड़ी बाधा बताया है। 
    • जर्मनी तथा फ्राँस जैसे देशों में वहनीय शिक्षा के साथ छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है, जिससे भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता अपेक्षाकृत कमज़ोर हो जाती है।
  • शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कमज़ोर वैश्विक धारणा: भारतीय विश्वविद्यालयों के प्रति वैश्विक स्तर पर गुणवत्ता संबंधी धारणा अब भी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है।
    •  हालाँकि IITs एवं IISc जैसे संस्थानों ने कई क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, तथापि QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स: एशिया 2026 में किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय का शीर्ष 50 में स्थान न बना पाना वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा तथा अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड विश्वसनीयता में विद्यमान अंतराल को स्पष्ट करता है।
  • वीज़ा की प्रदायगी और जटिल नियामकीय ढाँचा: नियामक संस्थाओं, वीज़ा स्वीकृति में विलंब तथा सिंगल-विंडो प्रणाली के अभाव के कारण विदेशी छात्र एवं संकाय भारत आने से हतोत्साहित होते हैं। 
    • ऑस्ट्रेलिया की छात्र-अनुकूल वीज़ा व्यवस्था के विपरीत, भारत में अब तक त्वरित शैक्षणिक वीज़ा तंत्र विकसित नहीं हो पाया है।
  • अपर्याप्त अंतर्राष्ट्रीय परिसर अवसंरचना: अनेक उच्च शिक्षण संस्थानों में अंतर्राष्ट्रीय छात्रावास, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, समृद्ध पुस्तकालय तथा समर्पित छात्र-सेवाओं का अभाव है। 
    • केवल कुछ ही परिसर, जैसे– IIT मद्रास वैश्विक मानकों के अनुरूप सुविधाएँ उपलब्ध करा पाते हैं।
  • विदेशी संकाय को आकर्षित करने में कठिनाई: कठोर भर्ती नियम, वेतन-सीमाएँ तथा स्थायी पद-सुरक्षा (टेन्योर) के अभाव के कारण अंतर्राष्ट्रीय शिक्षाविद् भारत में कार्य करने से परहेज़ करते हैं: 
    • परिणामस्वरूप, भारतीय विश्वविद्यालय अमेरिका एवं यूरोप के उन संस्थानों से प्रतिस्पर्द्धा करने में पिछड़ जाते हैं, जहाँ अनुकूलित अनुबंध एवं उच्च पारिश्रमिक उपलब्ध हैं।
    • अंतरविषयक एवं शोध-प्रधान पाठ्यक्रमों की कमी: वैश्विक मानकों पर आधारित, शोध-केंद्रित तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रारूपों में संचालित अंतरविषयक पाठ्यक्रमों की संख्या सीमित है। 
      • यूरोप में सामान्य रूप से प्रचलित जॉइंट डिग्री एवं डुअल कैंपस प्रोग्राम्स भारत में अब भी अपवाद बने हुए हैं।
  • कमज़ोर अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडिंग एवं आउटरीच: भारत में समन्वित वैश्विक विपणन रणनीति तथा सुदृढ़ एलुमनाई नेटवर्क का अभाव है।
    •  इसके विपरीत, कनाडा जैसे देश दूतावासों एवं डिजिटल अभियानों के माध्यम से स्वयं को प्रभावी ढंग से वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
  • सांस्कृतिक एवं सामाजिक समायोजन की चुनौतियाँ: अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को भाषा संबंधी बाधाओं, सांस्कृतिक अलगाव तथा सीमित सहायक पारिस्थितिक तंत्र का सामना करना पड़ता है, जिससे भारत अपेक्षाकृत अधिक छात्र-अनुकूल गंतव्यों की तुलना में कम आकर्षक प्रतीत होता है।

उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिये नीति आयोग ने क्या सुझाव दिये हैं?

  • वैश्विक प्रतिभा के लिये छात्रवृत्ति और फेलोशिप: नीति आयोग अंतर्राष्ट्रीय छात्रों हेतु विश्वबंधु छात्रवृत्ति और विदेशी शिक्षकों व शोधकर्त्ताओं के लिये विश्वबंधु फेलोशिप शुरू करने की सिफारिश करता है, ताकि भारत का वैश्विक शैक्षणिक आकर्षण  बढ़ सके।
  • राष्ट्रीय अनुसंधान कोष का निर्माण: प्रस्तावित भारत विद्या कोष  एक 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर का संप्रभु अनुसंधान कोष होगा, जिसमें आधा कोष प्रवासी भारतीयों और दानदाताओं से जुटाया जाएगा तथा शेष आधा भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाएगा।
  • बहुपक्षीय शैक्षणिक गतिशीलता ढाँचा: नीति आयोग ने टैगोर फ्रेमवर्क (Tagore Framework) नामक एक Erasmus+-शैली का गतिशीलता कार्यक्रम प्रस्तावित किया है, जो भारत और ASEAN, BRICS, BIMSTEC आदि समूहों के पक्षकार देशों के मध्य छात्रों और शिक्षकों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा।
    • Erasmus+ कार्यक्रम यूरोपीय संघ की एक व्यापक पहल है, जो व्यक्तियों और संस्थानों के लिये शिक्षा, प्रशिक्षण, युवा और खेल क्षेत्र में गतिशीलता (Mobility) के विभिन्न अवसर प्रदान करती है।
  • वीज़ा की प्रदायगी और नियामकीय सुधार: रिपोर्ट में सरल प्रवेश-निर्गमन नियम, विदेशी शिक्षकों के लिये तेज़ नियुक्ति मार्ग, प्रतिस्पर्द्धी वेतन और वीज़ा, कर पहचान संख्या, बैंकिंग तथा आवास के लिये एक एकीकृत प्रणाली की सिफारिश की गई है।
    • नीति आयोग अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस स्थापित करने की अनुमति देने के लिये नियमों में ढील देने की सिफारिश करता है, जिसमें कैंपस के अंदर कैंपस जैसे नवाचारी मॉडल भी शामिल हैं।
  • रैंकिंग और गुणवत्ता मापदंडों में सुधार: इसमें राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) के मापदंडों को विस्तारित करने का सुझाव दिया गया है, ताकि आउटरीच और समावेशिता तथा वैश्वीकरण एवं  साझेदारियाँ जैसे संकेतकों को शामिल कर अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता को बेहतर ढंग से मापा जा सके।
  • ब्रांडिंग, आउटरीच और एलमनाई सहभागिता: इसमें भारत की आन (Bharat ki AAN – Alumni Ambassador Network) बनाने का प्रस्ताव है, ताकि भारतीय उच्च शिक्षा की  वैश्विक ब्रांडिंग के लिये भारतीय प्रवासी समुदाय का वैश्विक दूत के रूप में उपयोग किया जा सके।
  • संस्थागत और सांस्कृतिक तैयारी: अंतर्राष्ट्रीय छात्र सहायता प्रणाली, सांस्कृतिक समन्वय और दीर्घकालीन अंतर्राष्ट्रीयकरण के माध्यम से संस्थागत क्षमता के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

निष्कर्ष

भारत की उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण अब रणनीतिक रूप ले चुका है, जो GDP, नवाचार और वैश्विक प्रभाव पर असर डालता है और SDG 4 (गुणवत्ता शिक्षा) तथा SDG 17 (वैश्विक साझेदारी) के साथ संरेखित है। नीति आयोग का रोडमैप भारत को छात्रों के शुद्ध निर्यातक से वैश्विक शिक्षा केंद्र में बदलने के लिये व्यवस्थित सुधार  एवं वैश्विक सहभागिता के माध्यम से इसे आकार देने का प्रयास करता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  भारत के लिये उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण एक रणनीतिक आवश्यकता क्यों बन गया है? आर्थिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. नीति आयोग को उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण पर रिपोर्ट जारी करने के लिये किस बात ने प्रेरित किया?
भारत में विदेशी छात्रों और भारतीय छात्रों का अनुपात 1:28 है, विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह बढ़ रहा है और ब्रेन ड्रेन भी बढ़ रहा है, जिससे एक रणनीतिक नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता उत्पन्न हो गई है।

2. भारतीय उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ क्या हैं?
मुख्य बाधाओं में सीमित छात्रवृत्तियाँ, कमज़ोर वैश्विक स्तर, जटिल वीज़ा प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा और विदेशी शिक्षकों को नियुक्त करने में कठिनाई शामिल हैं।

3. नीति आयोग की मुख्य सिफारिशें क्या हैं?
मुख्य प्रस्तावों में विश्वबंधु छात्रवृत्तियाँ, भारत विद्या कोष ($10 बिलियन अनुसंधान कोष), Erasmus+- जैसा टैगोर फ्रेमवर्क और विदेशी कैंपस के लिये नियमों को आसान बनाना शामिल हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. संविधान के निम्नलिखित प्रावधानों में से भारत का शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ता है? (वर्ष 2012)

  1. राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत 
  2. ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय 
  3. पाँचवीं अनुसूची
  4. छठी अनुसूची 
  5. सातवीं अनुसूची

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

 (a) केवल 1 और 2

 (b) केवल 3, 4 और 5

 (c) केवल 1, 2 और 5

 (d) 1, 2, 3, 4 और 5

 उत्तर:(d)


मेन्स

प्रश्न 1. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना कीजिये तथा भारत में उन्हें प्राप्त करने के उपायों का विस्तार से उल्लेख कीजिये।  (2021)

प्रश्न 2. भारत में डिजिटल पहल ने किस प्रकार से देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन में योगदान किया है? विस्तृत उत्तर दीजिये। (2020)

प्रश्न 3. भारत में उच्च शिक्षा की गुणता के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी बनाने के लिये उसमें भारी सुधारों की आवश्यकता है। क्या आपके विचार में विदेशी शैक्षिक संस्थाओं का प्रवेश देश में उच्च और तकनीकी शिक्षा की गुणता की प्रोन्नति में सहायक होगा? चर्चा कीजिये। (2015)


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