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डेली न्यूज़

  • 04 May, 2020
  • 59 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

बीसीजी वैक्सीन के प्रयोग पर WHO की चिंता

प्रीलिम्स के लिये

बीसीजी वैक्सीन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, COVID-19 

मेन्स के लिये

COVID-19 से निपटने हेतु वैश्विक प्रयास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (World Health Organisation- WHO) महानिदेशक और कुछ अन्य विशेषज्ञों ने COVID-19 से बचाव हेतु स्वास्थ्य कर्मियों को बीसीजी वैक्सीन (BCG Vaccine) देने से पहले वैक्सीन पर चल रहे ‘यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण’ (Randomized Controlled Trial- RCT) के परिणामों के आने का इंतजार करने का सुझाव दिया है।

मुख्य बिंदु:

  • गौरतलब है कि 28 मार्च, 2020 को ‘medRxiv’ नामक ऑनलाइन मेडिकल वेबसाइट पर प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि ‘सार्वभौमिक बीसीजी टीकाकरण’ (Universal BCG Vaccination) वाले देशों में COVID-19 संक्रमण और यहाँ तक मृत्युदर भी ‘गैर-सार्वभौमिक बीसीजी टीकाकरण’ वाले देशों की तुलना में काफी कम थी। 
  • हालाँकि अभी इस अध्ययन की वैधता की समीक्षा की जानी बाकी है और अभी यह किसी वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित नहीं किया गया है।    
  • 30 अप्रैल, 2020 को ‘लैसेंट’ (Lacent) नामक एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक लेख के माध्यम से WHO महानिदेशक और कुछ अन्य विशेषज्ञों ने COVID-19 से बचाव हेतु स्वास्थ्य कर्मियों को बीसीजी वैक्सीन देने से पहले COVID-19 के संदर्भ में इसकी सुरक्षा और प्रभाव को जाँचने हेतु इस वैक्सीन पर चल रहे RCT परीक्षण के परिणामों के आने का इंतजार करने का सुझाव दिया है।
  • हालाँकि इस लेख में विशेषज्ञों ने यह संभावना व्यक्त की है कि बीसीजी वैक्सीन, जो भविष्य के संक्रमणों के लिये जन्मजात/प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाती है, संभवतः कोरोनावायरस संक्रमण की तीव्रता, शरीर पर COVID-19 के प्रभावों को कम करने और इस बीमारी से जल्दी ठीक होने में सहायक हो सकती है।
  • वर्तमान में स्वास्थ्य कर्मियों में कोरोनावायरस संक्रमण के मामलों और COVID-19 की गंभीरता को कम करने में बीसीजी वैक्सीन की भूमिका के संदर्भ में ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड में  यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षणों का संचालन किया जा रहा है।

बड़े पैमाने पर बीसीजी वैक्सीन में उपयोग को रोकने के कारण: 

  • RCT परीक्षण के परिणामों के आने तक बीसीजी वैक्सीन के उपयोग को बढ़ावा न दिये जाने के लिये विशेषज्ञों ने निम्नलिखित कारण बताए हैं:
    1. विशेषज्ञों के अनुसार, COVID-19 संक्रमण के कम मामलों वाले देशों में इसे सार्वभौमिक बीसीजी टीकाकरण से जोड़कर प्रस्तुत करने वाले आँकड़े व्यक्तिगत संख्या की बजाय आबादी के आधार पर लिये गए हैं।
    2. जन्म के समय हुए बीसीजी टीकाकरण के लाभकारी प्रभावों से दशकों बाद COVID-19 की गंभीरता को कम करने की संभावना बहुत ही कम है।
    3. यदि यह वैक्सीन सभी मरीज़ों में COVID-19 के खिलाफ प्रभावी नहीं होती तो टीकाकरण लोगों में झूठी/काल्पनिक सुरक्षा की भावना पैदा कर सकता है जो इस महामारी के समय काफी खतरनाक हो सकती है।
    4. बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के बड़े पैमाने पर वैक्सीन के प्रयोग से पहले से ही कम वैक्सीन की आपूर्ति और अधिक प्रभावित हो सकती है, जिससे तपेदिक की अधिकता वाले देशों में बच्चों के टीकाकरण में चुनौती उत्पन्न हो सकती है।

बीसीजी वैक्सीन: 

  • बीसीजी अर्थात् ‘बैसिल कैल्मेट-गुएरिन’ (Bacille Calmette-Guérin'-BCG) वैक्सीन के आविष्कार का श्रेय दो फ्राँसीसी वैज्ञानिकों अल्बर्ट कैल्मेट (Albert Calmette) और  ‘कैमिल गुएरिन’(Camille Guérin) को जाता है। 
  • बीसीजी वैक्सीन का पहला मानव परीक्षण वर्ष 1921 में शुरू हुआ। 
  • बहुत से विकसित देशों के तपेदिक मुक्त होने के कारण इन देशों में नियमित रूप से बच्चों को बीसीजी वैक्सीन का टीका नहीं दिया जाता। परंतु विकासशील देशों में, जहाँ तपेदिक का प्रसार आज भी जारी है, यह वैक्सीन बड़े पैमाने पर प्रयोग की जाती है।    
  • बीसीजी वैक्सीन तपेदिक रोग में कुछ सीमित सुरक्षा प्रदान करती है, हालाँकि यह बीमारी पैदा करने वाले जीवाणुओं को संक्रमण स्थापित करने से नहीं रोक सकती परंतु शिशुओं और छोटे बच्चों में तपेदिक के गंभीर मामलों को रोकने में सहायता करती है।       
  • हालाँकि बीसीजी वैक्सीन के सुरक्षात्मक प्रभावों के लाभ तपेदिक के अतिरिक्त कुछ अन्य रोगों के संदर्भ में भी देखने को मिले हैं।  
  • उदाहरण के लिये जब वर्ष 1927 में स्वीडन के उत्तरी प्रांत में इस वैक्सीन का टीकाकरण शुरू किया गया तो एक चिकित्सक ने पाया कि जन्म के समय बीसीजी वैक्सीन प्राप्त करने वाले बच्चों की मृत्युदर, गैर-टीकाकरण वाले बच्चों की तुलना में एक -तिहाई (⅓)  थी। 
  • साथ ही 1940-50 के दशक के दौरान अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम (UK) में बच्चों और किशोरों में इस वैक्सीन के नियंत्रित परीक्षण के दौरान बीसीजी के कारण तपेदिक के अतिरिक्त अन्य गैर-दुर्घटना से जुड़ी मौतों में 25% की गिरावट देखी गई।
  • कुछ वर्षों पहले पश्चिमी अफ्रीका में हुए परीक्षणों में देखा गया कि बीसीजी टीकाकरण से बच्चों में सेप्सिस (Sepsis) और श्वसन संक्रमण (Respiratory Infection) के मामलों में कमी हुई जिससे जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों में मृत्युदर में 40% तक की गिरावट देखी गई। 

बीसीजी बैक्सीन के सकारात्मक परिणाम का कारण: 

  • विशेषज्ञों के अनुसार, प्रतिरक्षा विज्ञान के क्षेत्र में सामान्य अवधारणा यह है कि अनुकूल प्रतिरक्षा के विपरीत जन्मजात प्रतिरक्षा स्थिर रहती है और किसी बढ़ी हुई कार्यात्मक स्थिति के अनुरूप इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है।
  • यह देखा गया है कि जब किसी व्यक्ति को बीसीजी वैक्सीन दी जाती है तो यह जन्मजात प्रतिरक्षा प्रणाली के कुछ हिस्सों का निर्माण करने वाले ‘मोनोसाइट्स’ (Monocytes) नामक कोशिकाओं को रिप्रोग्राम (Reprogram) कर प्रतिरक्षा क्षमता में वृद्धि करती है। 
  • इसके कारण इन मोनोसाइट्स में कई तरह के रोगजनकों के समक्ष प्रतिक्रिया में वृद्धि देखी गई, इस प्रक्रिया में ‘साइटोकाइंस’ (Cytokines) नामक रसायन का उत्सर्जन होता है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को हानिकारक रोगाणुओं से लड़ने के लिये प्रेरित करते हैं। 

आगे की राह:  

  • हालाँकि अलग-अलग-रोगों के मामले में बीसीजी वैक्सीन के कई सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं परंतु वर्तमान में बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के इसके प्रयोग को बढ़ावा नहीं न दिया जाना चाहिये। 
  • विश्व के कई विकासशील देशों की ही तरह भारत भी अभी तक तपेदिक को समाप्त करने में सफल नहीं रहा है, अतः बड़े पैमाने पर बीसीजी वैक्सीन की कमी से यह समस्या और भी बढ़ सकती है।
  • COVID-19 के मामले में बीसीजी के साथ ही पहले से उपस्थित अन्य संभावित दवाओं पर शोध को बढ़ावा दिया जाना चाहिये जिससे शीघ्र ही इस बीमारी का इलाज़ संभव हो सके।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

‘लघु वनोत्पाद’ की खरीद

प्रीलिम्स के लिये:

लघु वनोत्पाद, भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास

मेन्स के लिये:

लघु वनोत्पाद की खरीद प्रक्रिया को बढ़ावा देने हेतु केंद्र सरकार द्वारा किये गए प्रयास  

चर्चा में क्यों:

हाल ही में केंद्र सरकार ने COVID-19 के मद्देनज़र राज्य सरकारों को लघु वनोत्पाद (Minor Forest Produce) की खरीद प्रक्रिया में तेज़ी लाने का आग्रह किया है।

लघु वनोत्पाद (Minor Forest Produce-MFP):

  • जनजातीय लोगों की आजीविका का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत गैर-काष्ठ वनोत्पाद है, जिसे सामान्यतः लघु वनोत्पाद कहा जाता है। इसमें पौधीय मूल के सभी गैर-काष्ठ उत्पाद जैसे- बाँस, बेंत, चारा, पत्तियाँ, गम, वेक्स, डाई, रेज़िन और कई प्रकार के खाद्य जैसे मेवे, जंगली फल, शहद, लाख, रेशम आदि शामिल हैं।
  • ये लघु वनोत्पाद जंगलों में या जंगलों के नज़दीक रहने वाले लोगों को जीविका और नकद आय दोनों उपलब्ध कराते हैं। ये उनके खाद्य, फल, दवा और अन्य उपभोग वस्तुओं का एक बड़ा भाग है और बिक्री से उन्हें नकद आय भी प्रदान करता है।
  • वन अधिकार अधिनियम, 2011 पर राष्ट्रीय समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार, वनवासियों के लिये लघु वनोत्पाद का आर्थिक और सामाजिक महत्त्व है क्योंकि अनुमानतः 100 मिलियन लोग अपनी आजीविका का स्रोत लघु वनोत्पाद के संग्रह और विपणन से प्राप्त करते हैं।
  • वनों में रहने वाले लगभग 100 मिलियन लोग खाद्य, आश्रय, औषधि और नकद आय के लिये लघु वन उत्पादों पर निर्भर हैं। जनजातीय लोग अपनी वार्षिक आय का 20-40% लघु वनोत्पाद से प्राप्त करते हैं जिस पर वे अपने समय का एक बड़ा भाग खर्च करते हैं।

प्रमुख बिंदु:

  • गौरतलब है कि 10 राज्यों में लघु वनोत्पाद की खरीद की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, साथ ही वित्त वर्ष 2020-21 के लिये अब तक कुल 20.30 करोड़ रुपए की खरीद की जा चुकी है।
  • उल्लेखनीय है कि जनजातीय कार्य मंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs) द्वारा 1 मई, 2020 को 49 उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Prices-MSP) में संशोधन की घोषणा की गई है।  
    • इसके माध्यम से आदिवासियों की आय बढ़ेगी साथ ही उनको उद्यमशीलता हेतु प्रोत्साहित भी किया जाएगा।
  • राज्यों ने वन धन केंद्रों को बाज़ारों से लघु वनोत्पाद की खरीद हेतु ‘प्राथमिक खरीद एजेंट’ के रूप में नियुक्त किया है। 
    • वर्तमान में वन धन केंद्रों ने 1.11 करोड़ रुपए के 31.35 टन लघु वनोत्पाद की खरीद की है।
    • ध्यातव्य है कि प्रधानमंत्री वन धन कार्यक्रम के अंतर्गत 3.6 करोड़ जनजातीय लाभार्थियों हेतु 21 राज्यों और 1 केंद्रशासित प्रदेश में 1126 वन धन विकास केंद्रों (Van Dhan Vikas Kendra- VDVK) को स्वीकृति दी गई है।
  • गिलॉय, महुआ के फूलों, हिल ग्रास और लाक के मूल्य में सबसे ज़्यादा बदलाव किया गया है, जबकि साल के बीज, बहेदा और हरड़ में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ की पहल:

  • भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ (TRIFED) ने लघु वनोत्पाद की खरीद प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिये एक वन धन मॉनिट डैशबोर्ड (Van Dhan Monit Dashboard) तैयार किया है। यह डैशबोर्ड “ट्राइफेड ई-संपर्क सेतु” (TRIFED E- Sampark Setu) का हिस्सा है।
    • इस डैशबोर्ड के माध्यम से राज्य स्तर पर लघु वनोत्पादों की खरीद प्रक्रिया की सूचना दी जाएगी।
    • प्रत्येक पंचायत और वन धन केंद्र से ई-मेल या मोबाइल के माध्यम से सूचनाओं का आदान प्रदान भी किया जाएगा।
    • TRIFED ने इस डैशबोर्ड के माध्यम से 10 लाख गाँवों, ज़िलों और राज्य स्तर के भागीदारों, एजेंसियों तथा स्वयं सहायता समूह (Self-help Group-SHG) को जोड़ने का प्रस्ताव किया है। 

स्रोत: पीआईबी


जीव विज्ञान और पर्यावरण

लद्दाख हिमालय की नदियाँ

प्रीलिम्स के लिये: 

हिमालयी क्षेत्र में बहने वाली प्रमुख नदियाँ 

मेन्स के लिये:

WIHG द्वारा किये गये शोध का महत्त्व 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी’ (Wadia Institute of Himalayan Geology- WIHG) के वैज्ञानिकों द्वारा लद्दाख हिमालय क्षेत्र की नदियों में होने वाले 35000 वर्ष पुराने नदियों के कटाव/क्षरण (River Erosion) का अध्ययन किया गया। 

Ladhakh

मुख्य बिंदु:

  • अध्ययन के दौरान, उन चौड़ी घाटियों एवं हॉटस्पॉट की पहचान की गई जो बफर ज़ोन के रूप में कार्य करते हैं। 
  • अध्ययन में बताया गया कि किस तरह, शुष्क लद्दाख हिमालय क्षेत्र में बहने वाली नदियों द्वारा विभिन्न जलवायु परिवर्तनों के बाद भी स्वयं को लंबे समय तक  संचालित किया है।
  • वैज्ञानिकों द्वारा नदियों के पानी एवं गाद/अवसाद/तलछट के मार्ग पर भी विचार किया गया जो एक महत्त्वपूर्ण खोज है क्योंकि वर्तमान समय में बुनियादी ढाँचे एवं स्मार्ट शहरों को विकसित करते समय इन सभी बातों पर ज़ोर दिया जा रहा है।
  • अध्ययन में हिमालय से निकलने वाली नदियों की पहचान कर इन नदियों के अपवाह क्षेत्रों में उन स्थानों को चिह्नित किया गया जो सर्वाधिक क्षरित होने के साथ-साथ गाद/तलछट से भर रहे हैं।
  • अधिकांश तलछट/गाद उच्च हिमालयी क्रिस्टलाइन से प्राप्त किये गए है जो ज़ास्कर के उद्गम क्षेत्र (Headwater Region) में स्थित हैं।
  • नदी के ऊपरी और निचले जलग्रहणों क्षेत्रों के बीच भू-आकृति अवरोध की उपस्थिति के बावजूद इन तलछट के क्षरण के लिये ज़िम्मेदार प्रमुख कारणों में पहला कारण था- डीग्लेसिएशन यानी अहिमाच्छादन तथा दूसरा, उद्गम स्थल में भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की वर्षा।
  • शोध में बताया गया कि, ऊपरी ज़ास्कर में 48 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैली पदम घाटी (Valley of Padam) की भू-आकृतियों यथा- घाटी के किनारों, जलोढ़ पंखों इत्यादि में विशाल मात्रा में अवसाद संग्रहित है।
  • जहाँ वर्तमान में, 0.96±0.10 घन किमी. तलछट घाटी के किनारों में संग्रहीत है और पिछले 32 हज़ार वर्षों से 2.29±0.11 घन किमी. तलछट पदम घाटी से नदियों द्वारा अपवाहित किया जा चुका है।

लद्दाख हिमालय: 

  • लद्दाख हिमालय, ग्रेटर हिमालय पर्वतमाला और काराकोरम पर्वतमाला के बीच एक अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित रेगिस्तान (High Altitude Desert) का निर्माण करता है।
  • लद्दाख हिमालय से होकर बहने वाली प्रमुख नदियों में  सिंधु और उसकी सहायक नदियाँ शामिल हैं।
  • ज़ास्कर नदी ऊपरी सिंधु अपवाह क्षेत्र की सबसे बड़ी सहायक नदियों में से एक है,जो अत्यधिक विकृत ज़ास्कर श्रेणियों के माध्यम से लंबवत बहती है। 
  • ज़ास्कर नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ डोडा (Doda) और त्सरापलिंगती चु (TsrapLingti Chu) हैं, जो ऊपरी घाटी में पदम गाँव में मिलती हैं। इनके मिलने के बाद ही ज़ास्कर नदी का निर्माण होता है। 

महत्त्व:

  • इस शोध के द्वारा परिवर्ती जलवायु क्षेत्र में भू-आकृतिक विकास को समझने में मदद मिलेगी। 
  • यह अध्ययन उन समस्याओं का समाधान करने में मददगार साबित होगा जो नदी-जनित क्षरण और तलछट जमाव से संबंधित है। ये नदी के मैदानों और डेल्टाओं को बनाने वाले मुख्य कारक भी हैं और जो विकसित सभ्यताओं के लिये एक उर्वरक भूमि प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं।  

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी’

(Wadia Institute of Himalayan Geology- WIHG) 

  • वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, ‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग’ (Department of the Science & Technology) के अंतर्गत हिमालय के भू-विज्ञान (Geology of the Himalaya) के अध्ययन से संबंधित एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान है।
  • इसकी स्थापना वर्ष1968 में उत्तराखंड, देहरादून में की गई।
  • यह हिमालय के भू-आवेग संबंधी विकास के संबंध में नई अवधारणाओं और मॉडलों के विकास के लिये अनुसंधान कार्यों को संपन्न करता है।
  • हिमालयी भू-विज्ञान और संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले देश के विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों के बीच अनुसंधान गतिविधियों हेतु समन्वय स्थापित करना।

स्रोत: पी.आई.बी


आंतरिक सुरक्षा

ब्रू शरणार्थी संकट और समझौते का विरोध

प्रीलिम्स के लिये

ब्रू शरणार्थी संकट, ब्रू समुदाय की भौगोलिक स्थिति

मेन्स के लिये 

नृजातीय संघर्ष से उत्पन्न आतंरिक सुरक्षा की समस्या

चर्चा में क्यों?

त्रिपुरा के कुछ समूहों ने उत्तर त्रिपुरा ज़िले के कंचनपुर उपखंड में विस्थापित ब्रू जनजाति के लोगों को स्थाई रूप से बसाने के निर्णय पर आपत्ति जताई जताते हुए उन्हें त्रिपुरा से बाहर करने की मांग की है। 

प्रमुख बिंदु

  • इस संबंध में क्षेत्र के दो प्रमुख संगठनों नागरिक सुरक्षा मंच (Nagarik Suraksha Mancha) और मिज़ो कन्वेंशन (Mizo Convention) ने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव कुमार देब को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें कंचनपुर उपखंड में विस्थापितों को स्थाई रूप से बसाने का विरोध किया गया है।
    • नागरिक सुरक्षा मंच वर्ष 1947 में विभाजन के पश्चात् पूर्वी-पाकिस्तान से विस्थापित बंगालियों का प्रतिनिधित्व करता है और मिज़ो कन्वेंशन उत्तरी त्रिपुरा की जामपुई पहाड़ी में रहने वाली मिज़ो आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।
  • ध्यातव्य है कि लगभग 40,000 से अधिक ब्रू जनजाति के लोग उत्तरी त्रिपुरा के कंचनपुर और पनीसागर उपखंडों में रह रहे थे। हालाँकि 30 नवंबर, 2019 तक प्रत्यावर्तन (Repatriation) के नौ चरणों के बाद लगभग 7,000 ब्रू शरणार्थी मिज़ोरम लौट गए, किंतु शेष ब्रू शरणार्थी अभी भी त्रिपुरा में मौजूदा हैं।
  • 16 जनवरी, 2020 को केंद्र सरकार ने ब्रू शरणार्थी संकट (Bru Refugee Crisis) को सदैव के लिये समाप्त करने के उद्देश्य से त्रिपुरा सरकार, मिज़ोरम सरकार तथा ब्रू जनजाति के प्रतिनिधियों के साथ एक चतुर्पक्षीय समझौता किया, जिसमें मिज़ोरम वापस न जाने वाले ब्रू शरणार्थियों को त्रिपुरा में ही बसाने की बात की गई थी।

संगठनों की मांग

  • संगठनों द्वारा दिये गए ज्ञापन के अनुसार, कंचनपुर उपखंड में ब्रू जनजाति के लोगों के आगमन के बाद से इस क्षेत्र विशिष्ट में असामाजिक गतिविधियों में काफी तेज़ी से वृद्धि हुई है, जिसके कारण इस उपखंड में उनकी स्थाई बसावट उनकी चिंता का विषय है।
  • संगठनों के अनुसार, यदि सरकार अपनी पुनर्वास योजना के साथ आगे बढ़ती है तो उपखंड में लॉकडाउन ख़त्म होते ही अनिश्चितकालीन हड़ताल का आयोजन किया जाएगा।
  • हालाँकि, दोनों संगठनों ने स्पष्ट किया कि उन्हें त्रिपुरा के 22 अन्य उपखंडों में ब्रू लोगों के पुनर्वास पर कोई आपत्ति नहीं है। 
  • संगठन का कहना है कि वे केवल कंचनपुर उपखंड के तहत पाँच स्थानों पर बड़ी संख्या में ब्रू लोगों को बसाने का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में भूमि और वन संसाधनों की कमी है।

कैसे उत्पन्न हुआ ब्रू शरणार्थी संकट?

  • ध्यातव्य है कि मिज़ो समुदाय के लोग ब्रू जनजाति के लोगों को बाहरी अथवा विदेशी मानते हैं, उनका मानना है कि ब्रू जनजाति के लोगों उनके क्षेत्र में आकर अवैध रूप से बस गए हैं। इन दोनों समुदायों के बीच संघर्ष का पुराना इतिहास रहा है।
  • वर्ष 1995 में मिज़ोरम राज्य में ब्रू समुदाय द्वारा स्वायत्त ज़िला परिषद की मांग और चुनावों में भागीदारी से संबंधित कुछ अन्य मुद्दों पर ब्रू और मिज़ो समुदाय के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई।
    • इस तनावपूर्ण स्थिति के पश्चात् ‘यंग मिज़ो एसोसिएशन’ (Young Mizo Association) और ‘मिज़ो स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (Mizo Students’ Association) जैसे संगठनों ने यह मांग की कि ब्रू लोगों के नाम राज्य की मतदाता सूची से हटाए जाए क्योंकि वे मूल रूप से मिज़ोरम के निवासी नहीं हैं।
  • इसके पश्चात् ब्रू समुदाय द्वारा समर्थित उग्रवादी समूह ‘ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ (Bru National Liberation Front-BNLF) तथा एक राजनीतिक संगठन ‘ब्रू नेशनल यूनियन’ (Bru National Union-BNU) के नेतृत्व में वर्ष 1997 में मिज़ो जनजातियों के समूह से हिंसक नृजातीय संघर्ष शुरू हुआ।
    • हिंसा तब और अधिक तेज़ हो गई जब ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट (Bru National Liberation Front) के सदस्यों ने एक मिज़ो अधिकारी की हत्या कर दी।
  • इस घटना के बाद दोनों समुदायों के बीच दंगे भड़क गए और अल्पसंख्यक होने के कारण ब्रू समुदाय को मिज़ोरम में अपना घर-बार छोड़कर त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में आश्रय लेना पड़ा।

ब्रू समुदाय के लिये चतुर्पक्षीय समझौता

  • इसी वर्ष 16 जनवरी को केंद्र सरकार, त्रिपुरा सरकार, मिज़ोरम सरकार और ब्रू प्रतिनिधियों के मध्य ब्रू शरणार्थियों को लेकर एक चतुर्पक्षीय समझौता किया गया, जिसमें त्रिपुरा में रह रहे शेष ब्रू शरणार्थियों को त्रिपुरा में ही बसाने की बात की गई थी।
  • केंद्र सरकार ने इस संबंध में 600 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की थी।
  • इस समझौते के तहत विस्थापित ब्रू परिवारों के लिये निम्नलिखित व्यवस्था की गई है-
    • वे सभी ब्रू परिवार जो त्रिपुरा में ही बसना चाहते हैं, उनके लिये त्रिपुरा में स्थाई तौर पर रहने की व्यवस्था के साथ उन्हें त्रिपुरा राज्य के नागरिकों के सभी अधिकार दिये जाएंगे। और ये लोग केंद्र सरकार व त्रिपुरा राज्य की सभी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे।
    • समझौते के तहत विस्थापित परिवारों को 1200 वर्ग फीट (40X30 फीट) का आवासीय प्लाॅट दिया जाएगा। साथ ही प्रत्येक विस्थापित परिवार को घर बनाने के लिये 1.5 लाख रुपए की नकद सहायता भी जाएगी।
    • पुनर्वास सहायता के रूप में परिवारों को दो वर्षों तक प्रतिमाह 5 हज़ार रुपए और निःशुल्क राशन प्रदान किया जाएगा।
    • त्रिपुरा राज्य सरकार विस्थापित परिवारों के बैंक खाते, आधार कार्ड, जाति व निवास प्रमाण पत्र तथा मतदाता पहचान पत्र आदि जरूरी प्रमाण-पत्रों की व्यवस्था करेगी।

ब्रू जनजाति

  • ब्रू या रेयांग (Bru or Reang) समुदाय पूर्वोत्तर भारत के मूल निवासी हैं जो मुख्यतः त्रिपुरा, मिज़ोरम तथा असम में रहते हैं।
  • ब्रू जनजाति के लोग पूर्वोत्तर के कई राज्यों में रहते हैं परंतु इस समुदाय की सबसे बड़ी आबादी मिज़ोरम के मामित और कोलासिब ज़िलों में पाई जाती है। इस समुदाय के अंतर्गत लगभग 12 उपजातियाँ शामिल हैं।
  • इस समुदाय के लोग ब्रू भाषा बोलते हैं।

आगे की राह

  • ब्रू शरणार्थी संकट को हल करने हेतु विभिन्न पक्षों ने कई प्रयास किये हैं। केंद्र सरकार द्वारा किया गया यह चतुर्पक्षीय समझौता भी इन्हीं प्रयासों में से एक है।
  • हालाँकि इस समझौते की एक कमी यह है कि इसमें कंचनपुर उपखंड में रहने वाली अन्य जनजातियों (ब्रू के अतिरिक्त) को एक पक्ष के रूप में शामिल नहीं किया गया है, जिसके कारण समझौते के विरुद्ध विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं।
  • आवश्यक है कि सरकार इस समझौते पर एक बार पुनः विचार करे और इसमें विभिन्न संगठनों द्वारा की जा रही मांगों को भी शामिल किया जाए।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

विदेशी मुद्रा भंडार

प्रीलिम्स के लिये:

विदेशी मुद्रा भंडार, विशेष आहरण अधिकार, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष

मेन्स के लिये:

भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) द्वारा जारी नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 479.45 बिलियन डॉलर (113 मिलियन डॉलर की कमी) हो गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति (Foreign Currency Assets- FCAs) घटकर 441.56 बिलियन डॉलर (321 मिलियन डॉलर की कमी) हो गई है।
  • स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) में 221 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी के कारण अब यह 32.901 बिलियन डॉलर हो गया है।
  • विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights) घटकर 1.42 बिलियन डॉलर (6 मिलियन डॉलर की कमी) हो गया है। 
  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) में आरक्षित निधि घटकर 3.57 बिलियन डॉलर (8 मिलियन डॉलर की गिरावट) हो गई है।
  • ध्यातव्य है कि 6, मार्च 2020 तक विदेशी मुद्रा भंडार अपने उच्चतम स्तर 487.23 बिलियन डॉलर पर था।
  • वर्ष 2019-20 के दौरान देश के विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 62 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी ।

विदेशी मुद्रा भंडार

(Foreign Exchange Reserves):

  • किसी देश/अर्थव्यवस्था के पास उपलब्ध कुल विदेशी मुद्रा उसकी विदेशी मुद्रा संपत्ति/भंडार कहलाती है। 
  • किसी भी देश के विदेशी मुद्रा भंडार में निम्नलिखित 4 तत्त्व शामिल होते हैं-
    • विदेशी परिसंपत्तियाँ (विदेशी कंपनियों के शेयर, डिबेंचर, बाॅण्ड इत्यादि विदेशी मुद्रा में)
    • स्वर्ण भंडार
    • IMF के पास रिज़र्व कोष (Reserve Trench)
    • विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights-SDR)

विशेष आहरण अधिकार

(Special Drawing Rights- SDRs):

  • विशेष आहरण अधिकार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund-IMF) द्वारा 1969 में अपने सदस्य देशों के लिये अंतर्राष्ट्रीय आरक्षित संपत्ति के रूप में बनाया गया था।
  • SDR न तो एक मुद्रा है और न ही IMF पर इसका दावा किया जा सकता है।
  • SDR का मूल्य, बास्केट ऑफ करेंसी में शामिल मुद्राओं के औसत भार के आधार पर किया जाता है। इस बास्केट में पाँच देशों की मुद्राएँ शामिल हैं- अमेरिकी डॉलर (Dollar), यूरोप का यूरो (Euro), चीन की मुद्रा रॅन्मिन्बी (Renminbi), जापानी येन (Yen), ब्रिटेन का पाउंड (Pound)।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


जीव विज्ञान और पर्यावरण

अफ्रीकन स्वाइन फीवर

प्रीलिम्स के लिये:

अफ्रीकन स्वाइन फीवर, क्लासिकल स्वाइन फीवर

मेन्स के लिये:

अफ्रीकन स्वाइन फीवर

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने असम राज्य सरकार को 'अफ्रीकीन स्वाइन फीवर' (African Swine Fever- ASF) से प्रभावित सूअरों का इलाज करने की सलाह दी है।

मुख्य बिंदु:

  • ASF पूर्वी असम में नवंबर-दिसंबर 2019 में अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगे चीन के इलाकों में रिपोर्ट किया गया था। ASF के कारण भारत में अप्रैल के मध्य में सूअरों की मौत होना शुरू हो गई थी तथा अब तक लगभग 2,500 सूअरों की मौत हो चुकी है। 
  • असम में ASF के कारण स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है क्योंकि असम में किसानों द्वारा सूअरों का पालन किया जाता है तथा इस क्षेत्र के किसानों के पास 20 लाख से अधिक सूअर हैं।

अफ्रीकीन स्वाइन फीवर

(African Swine Fever):

  • ASF घरेलू और जंगली सूअरों में होने वाली एक अत्यधिक संक्रामक रक्तस्रावी वायरल (Haemorrhagic Viral) बीमारी है।
  • यह एसफेरविरिडे (Asfarviridae) परिवार के DNA वायरस के कारण होता है। हालाँकि ASF और ‘क्लासिकल स्वाइन फीवर’ (Classical Swine Fever- CSF) के लक्षण समान हो सकते हैं लेकिन ASF तथा CSF के वायरस बिल्कुल भिन्न प्रकार के तथा दूसरे से असंबंधित है।

DNA वायरस:

  • DNA वायरस में DNA जीनोम होते हैं तथा ये मेजबान (Host) में DNA पॉलिमरेज़ की प्रक्रिया द्वारा वृद्धि करते हैं।
    • DNA पोलीमरेज़ एक विशेष प्रकार का प्रोटीन अणु होता है, जिसे एंजाइम कहा जाता है, यह एकल-स्ट्रैंड DNA श्रृंखला में पूरक क्षारों को जोड़ने का काम करता है।
  • इस वायरस को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है: 
    • एकल-स्ट्रैंड DNA वायरस (Single-Strand DNA Viruses) जैसे-परवो वायरस (Parvo Viruses)
    •  द्वि-स्ट्रैंड DNA वायरस (Double-Strand DNA Viruses)
    • डबल-स्ट्रैंड DNA वायरस को तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है:
      • छोटे आकार वाले DNA जीनोम जैसे कि पॉलीओमा वायरस;  (Polyomaviruses) और पेपिलोमा वायरस (Papilloma viruses)
      • मध्यम आकार के DNA जीनोम जैसे कि एडेनो वायरस (Adenoviruses);
      • बड़े आकार के DNA जीनोम; 
  • ASF महामारी का संचरण और प्रसार प्रक्रिया जटिल है तथा ASF का संचरण निम्न प्रकार का हो सकता है:
    • प्रत्यक्ष संक्रमण; घरेलू या जंगली सूअरों के साथ संपर्क में आने पर।
    • अप्रत्यक्ष संपर्क; यथा दूषित सामग्री के उपयोग करने से जैसे कि खाद्य अपशिष्ट, कचरा आदि के माध्यम से।
    •  संदूषित फाइटाइट्स (Fomites) या जैविक जीवाणुओं के माध्यम से।
      • संदूषित फाइटाइट्स ऐसी वस्तुएँ या सामग्री होती हैं जिनसे संक्रमण की संभावना है, जैसे कपड़े, बर्तन और फर्नीचर आदि।

ASF और मानव स्वास्थ्य:

  • ASF मानव स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करता है क्योंकि इसका मानव में इसका प्रसार नहीं होता है। 

नैदानिक संकेत (Clinical Signs):

  • ASF बीमारी के लक्षण तथा मृत्यु दर वायरस की क्षमता तथा सुअर की प्रजातियों के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। 
  • ASF के लक्षणों में उच्च बुखार का आना, अवसाद, भूख में कमी होना, त्वचा में रक्तस्राव (कान, पेट और पैरों पर आदि की त्वचा का लाल होना), गर्भपात होना आदि है।

रोकथाम और नियंत्रण:

  • वर्तमान में ASF के लिये कोई अनुमोदित टीका नहीं है।

भौगोलिक वितरण (Geographical Distribution):

  • ASF एशिया, यूरोप और अफ्रीका के जंगली और घरेलू सूअरों में मौजूद है।

ASF तथा CSF में में समानता और अंतर:

ASF

CSF

दोनों में 

वायरस 

बड़े DNA वायरस

छोटे RNA वायरस 

-

संचरण 

-

-

दोनों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से संचरण एवं प्रसार 

निवारक एवं नियंत्रण मानक 

कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं 

प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध 

-

स्रोत: द हिंदू


जीव विज्ञान और पर्यावरण

‘नदी प्रबंधन का भविष्य’ पर आइडियाथॉन का आयोजन

प्रीलिम्स के लिये:

आइडियाथॉन, स्वच्छ गंगा के लिये राष्ट्रीय मिशन, गंगा क्वेस्ट पुरस्कार, अर्थ-गंगा परियोजना

मेन्स के लिये:

बेहतर नदी प्रबंधन के सुझाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘जल शक्ति मंत्रालय’ (Ministry of Jal Shakti) के ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ (National Mission for Clean Ganga- NMCG) और ‘नगरीय मामलों पर राष्ट्रीय संस्थान’ (National Institute of Urban Affairs- NIUA) द्वारा ‘नदी प्रबंधन का भविष्य’ (Future of River Management) विषय पर ‘आइडियाथॉन वेबिनार’ का आयोजन किया।

मुख्य बिंदु:

  • इस अंतर्राष्ट्रीय ‘वेबिनार’ में विभिन्न देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के लगभग 500 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
  • आइडियाथॉन (IDEAthon) में COVID-19 महामारी के तहत लगाए गए लॉकडाउन तथा नदी प्रबंधन पर इसके प्रभाव से सीखी गई बातों पर मंथन किया गया।

आइडियाथॉन (IDEAthon):

  • आइडियाथॉन में विशेषज्ञ आपस में किसी माध्यम (यथा डिजिटल) से जुड़कर आपस में विचार-विमर्श करके किसी समस्या का समाधान निकालने की कोशिश करते हैं।

लॉकडाउन का नदियों पर सकारात्मक प्रभाव:  

  • COVID-19 महामारी ने जहाँ एक तरफ विश्व के सभी देशों को बुरी तरह प्रभावित किया है वहीं इस महामारी के कुछ सकारात्मक परिणाम भी नजर आ रहे हैं। इन्हीं में से एक है प्राकृतिक पर्यावरण में सुधार का दिखाई देना।
  • भारत में पिछले कुछ सप्ताह में गंगा और यमुना नदी की जल गुणवत्ता में उल्लेखनीय रूप से सुधार हुआ है। गंगा डॉल्फिन को गंगा नदी के कई हिस्सों में देखा जाने लगा है। 
  • वेनिस की नहरों के प्रदूषण स्तर में काफी गिरावट देखी गई है तथा इटली के जल मार्गों में नेविगेशन बंद होने के कारण डॉल्फिन इन जलमार्गों में वापस लौट आई हैं।

आइडियाथॉन आयोजन का उद्देश्य:

  • आइडियाथॉन वेबीनार के माध्यम से निम्नलिखित प्रश्नों का हल निकालने की कोशिश की गई:
    • लॉकडाउन के दौरान नदी गुणवत्ता में देखे गए सुधार को लंबे समय तक कैसे बनाए रखा जाए?
    • नदियों के प्रबंधन में सामाजिक दृष्टिकोण का लाभ कैसे उठाया जा सकता है?
    • COVID-19 महामारी से नदी प्रबंधन की दिशा में क्या-क्या सीखा जा सकता है?
    • नदी संकट की स्थिति में किस अनुक्रिया तंत्र की आवश्यकता है?

बेहतर नदी प्रबंधन: 

  • बेहतर नगर नियोजन मॉडल: 
    • नगरीय नियोजन के नवीन मापदंडों को अपनाने की आवश्यकता है। नगरीय नियोजन को केवल भूमि नियोजन पर आधारित नहीं होना चाहिये अपितु इसे मानवीय नियोजन तथा पारिस्थितिकी नियोजन पर आधारित होना चाहिये। 
  • लोगों के व्यवहार में परिवर्तन की आवश्यकता:
    • नदियों के प्रबंधन में लोगों की भागीदारी आवश्यक है। 'नागरिक सहभागिता कार्यक्रमों' को इस प्रकार तैयार करना चाहिये ताकि लोगों के व्यवहार में स्थायी परिवर्तन हो सके।
  • बेहतर कचरा प्रबंधन:
    • नदियों में फेंके जाने वाले ठोस कचरे की समस्या को समाप्त करने के लिये उद्योगों और अन्य वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों से होने वाले बहिस्त्राव को रोकने के साथ ही सीवेज उत्पादों का प्रशोधन करना अनिवार्य होना चाहिये।
  • बहु आयामी दृष्टिकोण:
    • नदी बेसिन प्रबंधन की दिशा में बहु-हितधारकों के मध्य 'एकीकृत सूचना प्रणालियों' की आवश्यकता है।
    • नदी प्रबंधन योजना को बहु-स्तरीय, बहु-क्षेत्रीय या क्रॉस-लेवल वर्किंग ग्रुप पर आधारित होना चाहिये। 
  • वाटर गवर्नेंस (Water Governance): 
    • गुड वाटर गवर्नेंस' के लिये सरकार के अलावा सभी समुदायों, समाजों, गैर सरकारी संगठनों, कार्रवाई समूहों, स्टार्टअप तथा व्यक्तिगत प्रयासों को भी एकीकृत करना होगा।
  • पारिस्थितिक मूल्यांकन:
    • ‘पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं’ का आर्थिक मूल्यांकन किया जाना चाहिये ताकि प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सके।

गंगा नदी के प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख पहल:

  • स्वच्छ गंगा के लिये राष्ट्रीय मिशन (NMCG):
    • NMCG को 12 अगस्त, 2011 को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम (Society Registration Act), 1860 के तहत एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत किया गया था।
    • इसका कार्यान्वयन जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय (जल शक्ति मंत्रालय) के अंतर्गत किया जाता है।

  • गंगा क्वेस्ट पुरस्कार (Ganga Quest Awards):
    • यह गंगा नदी पर पहली राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन क्विज़ है। गंगा नदी के बारे में जागरूकता और ज्ञान प्रसार के लिये एक महीने तक ऑनलाइन क्विज़ आयोजित की गई।
  • अर्थ-गंगा परियोजना:
    • प्रधानमंत्री ने गंगा नदी से संबंधित आर्थिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही ‘नमामि गंगे’ परियोजना को ‘अर्थ-गंगा’ जैसे एक सतत् विकास मॉडल में परिवर्तित करने का आग्रह किया था।
    • सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, बांध, जैविक खेती को बढ़ावा, मत्स्य पालन, औषध वृक्षारोपण, पर्यटन, परिवहन आदि ‘अर्थ गंगा’ के कुछ प्रमाणिक मॉडल हैं।

निष्कर्ष:

  • आइडियाथॉन में विभिन्न विशेषज्ञों की भागीदारी से प्राप्त जानकारी का उपयोग विभिन्न विषयगत क्षेत्रों में सहयोग करने तथा भविष्य में नदियों के बेहतर प्रबंधन में किया जाएगा।

स्रोत: पीआईबी


भारतीय अर्थव्यवस्था

सीकेपी सहकारी बैंक का लाइसेंस रद्द

प्रीलिम्स के लिये

न्यूनतम पूंजी, नियामक पूंजी, जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम

मेन्स के लिये

बैंकों के विनियमन में RBI की भूमिका

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) ने अस्थिर वित्तीय स्थिति के मद्देनज़र मुंबई स्थित सीकेपी सहकारी बैंक (CKP Co-operative Bank) के लाइसेंस को रद्द कर दिया है। 

प्रमुख बिंदु

  • RBI के अनुसार, महाराष्ट्र के सहकारी समिति पंजीयक (Registrar of Co-operative Societies) से भी सीकेपी सहकारी बैंक के मामले को निपटाने और एक लिक्वीडेटर (Liquidator) नियुक्त करने का आदेश जारी करने हेतु अनुरोध किया गया है।
    • किसी कंपनी या बैंक से संबंधित मामलों के निपटना हेतु नियुक्त किये गए व्यक्ति को लिक्वीडेटर (Liquidator) कहते हैं।
  • लिक्वीडेशन (Liquidation) पर प्रत्येक जमाकर्त्ता जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम (Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation- DICGC) से 5 लाख रुपए की सीमा तक उसकी जमा राशि के पुनर्भुगतान का हकदार होगा।
    • वित्तीय क्षेत्र में लिक्वीडेशन (Liquidation) का अभिप्राय किसी एक व्यवसाय को समाप्त करने और दावेदारों को संपत्ति वितरित करने की प्रक्रिया से होता है।

कारण

  • सीकेपी सहकारी बैंक (CKP Co-operative Bank) का लाइसेंस रद्द करते हुए RBI ने कहा कि बैंक की वित्तीय स्थिति अभी काफी चिंताजनक और अस्थिर है। 
  • इसके अतिरिक्त किसी अन्य बैंक के साथ सीकेपी सहकारी बैंक के विलय के लिये कोई ठोस पुनरुद्धार योजना या प्रस्ताव भी नहीं आया है। 
  • RBI के अनुसार, सीकेपी सहकारी बैंक न्यूनतम पूंजी (Minimum Capital) और न्यूनतम संचय (Minimum Reserves) जैसी आवश्यकताओं के अतिरिक्त यह 9 प्रतिशत की न्यूनतम नियामक पूंजी (Regulatory Capital) की आवश्यकता को भी पूरा नहीं करता है।
  • सीकेपी सहकारी बैंक अपने वर्तमान और भविष्य के जमाकर्त्ताओं को भुगतान करने की स्थिति में नहीं है।

सीकेपी सहकारी बैंक 

(CKP Co-operative Bank)

  • सीकेपी सहकारी बैंक (CKP Co-operative Bank) मुंबई का एक सहकारी बैंक है, जिसका मुख्यालय मुंबई के माटुंगा (Matunga) में स्थित है।
    • बैंक की मुंबई और ठाणे में कुल 8 शाखाएँ है।
  • ध्यातव्य है कि बैंक का घाटा बढ़ने और नेट वर्थ (Net worth) में बड़ी गिरावट आने के कारण बैंक के लेन-देन पर वर्ष 2014 में प्रतिबंध लगाया गया था, जिसके पश्चात् कई बार बैंक का घाटा कम करने का प्रयत्न किया गया, किंतु बैंक की स्थिति में सुधार नहीं आया है।

न्यूनतम पूंजी (Minimum Capital)

  • न्यूनतम पूंजी (Minimum Capital) एक अवधारणा है जिसका उपयोग कंपनी कानूनों और बैंकिंग विनियमनों में यह निर्धारित करने के लिये किया जाता है कि संगठन को न्यूनतम आवश्यकता के रूप में कितनी संपत्ति रखनी चाहिये।

नियामक पूंजी (Regulatory Capital)

  • पूंजी-पर्याप्तता (Capital Adequacy) का अभिप्राय पूंजी के उस वैधानिक न्यूनतम भंडार से होता है जो एक बैंक या अन्य वित्तीय संस्थान के पास किसी भी समय उपलब्ध होना अनिवार्य है।

जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम

(Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation-DICGC)

  • जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम वर्ष 1978 में जमा बीमा निगम (Deposit Insurance Corporation-DIC) तथा क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (Credit Guarantee Corporation of India-CGCI) के विलय के बाद अस्तित्व में आया था।
  • यह भारत में बैंकों के लिये जमा बीमा और ऋण गारंटी के रूप में कार्य करता है। यह भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा संचालित और पूर्ण स्वामित्त्व वाली सहायक कंपनी है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 04 मई, 2020

कोयला मंत्रालय की ‘परियोजना निगरानी इकाई’

हाल ही में कोयला मंत्रालय ने केंद्र सरकार द्वारा आवंटित की गई कोयला खानों के परिचालन को सुगम बनाने की सुविधा हेतु एक परियोजना निगरानी इकाई शुरू की है। कोयला मंत्रालय की यह ‘परियोजना निगरानी इकाई’ ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (Ease of Doing Business) की सुविधा प्रदान करेगी क्योंकि इससे खानों को संचालित करने के लिये समय पर स्वीकृति प्रदान की जाएगी। यह इकाई खदानों को राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों से उनके संचालन के लिये मंज़ूरी लेने में भी मदद करेगी। यह इकाई देश में कारोबारी माहौल और कोयले के उत्पादन को बेहतर बनाने में भी मददगार साबित होगी। भारत में कोयले को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ईंधन के रूप में देखा जाता है और यह देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भी है। वर्ष 2019 के आँकड़ों के अनुसार, कोयला देश की ऊर्जा ज़रूरतों का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है। ध्यातव्य है कि देश की औद्योगिक विरासत स्वदेशी कोयले की नींव पर ही बनाई गई है। भारत में दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा कोयला भंडार मौजूद है। भारत में कोयले का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों में शामिल हैं-ओडिशा, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और तेलंगाना।

के.एस. निसार अहमद

कन्नड़ के मशहूर कवि और प्रोफेसर के.एस. निसार अहमद (K. S. Nissar Ahmed) का 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। के.एस. निसार अहमद का जन्म 5 फरवरी, 1936 को बंगलुरु के ग्रामीण ज़िले के देवनहल्ली नामक शहर में हुआ था, और उनका पूरा नाम कोकरे होसहल्ली शेख हैदर निसार अहमद (Kokkare Hosahalli Shekh Haider Nissar Ahmed) था। के.एस. निसार अहमद अपनी नित्योत्सव कविता के कारण कर्नाटक सहित में काफी प्रसिद्ध थे। उनकी रचना बाद में एक लोकप्रिय भी गीत बन गई थी। प्रोफेसर अहमद पेशे से एक भूगर्भशास्त्री थे और उन्होंने भूगर्भशास्त्र के व्याख्याता (Lecturer) के तौर पर अध्यापन भी किया था। वे वर्ष 2007 में शिवमोगा में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन के 73वें अध्यक्ष भी थे। के.एस. निसार अहमद को वर्ष 1981 में राज्योत्सव पुरस्कार और वर्ष 2008 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। राज्योत्सव पुरस्कार कर्नाटक राज्य का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जिसे कर्नाटक सरकार द्वारा 1 नवंबर को कर्नाटक राज्य के गठन के अवसर पर कन्नड़ राज्योत्सव में प्रदान किया जाता है।

शहरी रोज़गार गारंटी योजना 

हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल की बैठक में निर्णय लिया गया कि कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी के मद्देनज़र राज्य में अर्थव्यवस्था को पुनः सृदृढ़ करने के उद्देश्य से शहरी जनता को मुख्यमंत्री शहरी रोज़गार गारंटी योजना के तहत 120 दिन का रोज़गार प्रदान किया जाएगा। यदि आवश्यक हो तो इस संबंध में लोगों के कौशल उन्नयन हेतु अनिवार्य प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाएगा। ध्यातव्य है कि कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी के फलस्वरूप प्रदेश में बाहरी राज्यों से कई लोग वापस आएँ हैं, जिन्हें जीवनयापन के पर्याप्त रोज़गार उपलब्ध कराना सरकार का दायित्त्व हो गया है। राज्य में लौटे ये लोगो विभिन्न क्षेत्रों में कुशल हैं और सरकार के निर्देशानुसार, उनकी कार्यकुशलता के अनुरूप ही उन्हें रोज़गार और स्वरोज़गार मुहैया कराने हेतु प्रशिक्षण दिया जाएगा। ध्यातव्य है कि  राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश भवन और अन्य सन्निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (Himachal Pradesh Building and Other Construction Workers Welfare Board) के तहत पंजीकृत लगभग एक लाख श्रमिकों को 2000 रुपए प्रदान किये हैं, जिस पर अब तक 20 करोड़ रुपए खर्च किये जा चुके हैं। राज्य के मंत्रिमंडल ने इन श्रमिकों को और 2000 रुपए प्रदान करने का निर्णय लिया है। 

सत्‍यजीत रे

02 मई, 2020 को सारे देश में मशहूर फिल्‍म निर्माता सत्‍यजीत रे (Satyajit Ray) की जन्‍मशती मनाई गई। 02 मई, 1921 को कलकत्ता में जन्मे सत्‍यजीत रे 20वीं शताब्दी के कुछ चुनिंदा प्रसिद्ध लोगों में से एक थे, जिन्होंने फिल्मों की यथार्थवादी शैली को एक नई दिशा देने के साथ-साथ साहित्य, चित्रकला जैसी अन्य विधाओं में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। सत्‍यजीत रे प्रमुख रूप से फिल्म निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं और उन्होंने अपने कैरियर में तकरीबन 36 फिल्‍मों का निर्देशन किया। सत्‍यजीत रे को वर्ष 1991 में ऑस्‍कर से सम्‍मानि‍त किया गया था। अपनी जीवनकाल में सत्‍यजीत रे को दादा साहेब फाल्‍के, भारत रत्न और कई अन्‍य अंतर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी प्राप्‍त हुए थे। सत्यजीत रे की कुछ चर्चित फिल्मों में पाथेर पांचाली, अपुर संसार, अपराजितो, जलसा घर, अभियान आदि का नाम शामिल है। फ्रांँस सरकार ने फिल्‍म जगत में असाधारण योगदान के लिये सत्‍यजीत रे को वर्ष 1992 में अपने देश के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान ‘लिजिएन ऑफ ऑनर’ (Legion of Honour) से पुरस्‍कृत किया था।  सत्‍यजीत रे का निधन अप्रैल 1992 में हुआ था।


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