मध्य प्रदेश Switch to English
मध्य प्रदेश में बाघों की उच्चतम मृत्यु दर
चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश में वर्ष 2025 में 55 बाघों की मृत्यु हुई, जो प्रोजेक्ट टाइगर 1973 की शुरुआत के बाद से एक वर्ष में सबसे अधिक है। यह स्थिति बाघ संरक्षण के लिये गंभीर चिंता उत्पन्न करती है।
मुख्य बिंदु
- मृत्यु के कारण: बाघों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में क्षेत्रीय संघर्ष, पर्यावास पर बढ़ता दबाव तथा प्राकृतिक कारण शामिल रहे। इसके अतिरिक्त, कुछ मामलों में अवैध शिकार और विद्युत प्रवाह से मृत्यु की घटनाएँ भी सामने आईं।
- संरक्षित क्षेत्रों के बाहर मृत्यु: विशेष रूप से चिंताजनक तथ्य यह है कि 23 बाघों की मृत्यु अधिसूचित टाइगर रिज़र्वों के बाहर हुई, जो वन्यजीव गलियारों एवं बफर क्षेत्रों में बढ़ते जोखिमों की ओर संकेत करता है।
- राष्ट्रीय परिदृश्य: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अनुसार, वर्ष 2025 में संपूर्ण देश में कुल 166 बाघों की मृत्यु दर्ज की गई।
- राज्यवार स्थिति: बाघों की मृत्यु के मामलों में मध्य प्रदेश (55) शीर्ष पर रहा, इसके पश्चात महाराष्ट्र (38), केरल (13) तथा असम (12) का स्थान रहा।
- ‘बाघ राज्य’ की पहचान: मध्य प्रदेश को प्रायः “भारत का बाघ राज्य” कहा जाता है, क्योंकि यहाँ देश की सर्वाधिक बाघ आबादी पाई जाती है तथा कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और सतपुड़ा जैसे प्रमुख टाइगर रिज़र्व स्थित हैं।
प्रोजेक्ट टाइगर
- परिचय: यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जो अधिकांश राज्यों को गैर-आवर्ती व्यय के लिये 60% केंद्रीय सहायता तथा आवर्ती लागत हेतु 50% सहायता प्रदान करती है तथा शेष राशि राज्यों द्वारा वहन की जाती है।
- प्राथमिक उद्देश्य: प्राकृतिक आवासों में बंगाल बाघों की व्यवहार्य आबादी सुनिश्चित करना।
- महत्त्वपूर्ण कदम: कोर-बफर रणनीति के तहत टाइगर रिज़र्व की स्थापना, जिसमें कोर जोन में बाघों के आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई, जबकि बफर क्षेत्रों में सतत् मानव गतिविधियों की अनुमति दी गई।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत स्थापित राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) प्रोजेक्ट टाइगर की देखरेख करता है और प्रति चार वर्ष में राष्ट्रीय बाघ गणना आयोजित करता है।
.png)

%20(1).gif)





.jpg)






.png)