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विविध

फरवरी 2021

  • 27 Mar 2021
  • 58 min read

PRS के प्रमुख हाइलाइट्स

केंद्रीय बजट 2021-22

केंद्रीय बजट 2021-22

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 का केंद्रीय बजट पेश किया। 

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15वाँ वित्त आयोग 

वित्त आयोग एक ऐसी संवैधानिक संस्था है जिसे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संबंधों पर सुझाव देने के लिये राष्ट्रपति द्वारा गठित किया जाता है। 

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समष्टि आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) विकास

GDP में  0.4% की वृद्धि

वर्ष 2019-20 की तीसरी तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर 2020) के मुकाबले वर्ष 2020-21 में इसी अवधि के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product- GDP) में 0.4% प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 

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रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्रमशः 4% और 3.35% पर अपरिवर्तनीय

मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee- MPC) ने वर्ष 2020-21 का छठा द्विमासिक मौद्रिक नीतिगत वक्तव्य जारी किया। पॉलिसी रेपो रेट (जिस दर पर RBI बैंकों को ऋण देता है) 4% पर बरकरार है। 

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विधि एवं न्याय

ट्रिब्यूनल सुधार (सुव्यवस्थीकरण और सेवा की शर्तें) विधेयक, 2021

ट्रिब्यूनल सुधार (सुव्यवस्थीकरण और सेवा की शर्तें) विधेयक [Tribunals Reforms (Rationalisation and Conditions of Service) Bill], 2021 को लोकसभा में पेश किया गया था। यह विधेयक कुछ मौजूदा अपीलीय ट्रिब्यूनल्स को भंग करने और उनके कार्यों (जैसे- अपीलों पर न्यायिक निर्णय लेना) को दूसरे मौजूदा न्यायिक निकायों (मुख्य रूप से उच्च न्यायालय) को ट्रांसफर करने का प्रयास करता है। इन अपीलीय निकायों में निम्नलिखित शामिल हैं: 

(i) चलचित्र अधिनियम (Cinematograph Act), 1952 के अंतर्गत अपीलीय ट्रिब्यूनल। 
(ii) व्यापार चिह्न अधिनियम (Trademark Act) 1999 के अंतर्गत अपीलीय बोर्ड। 
(iii) पेटेंट्स एक्ट, 1970 के अंतर्गत अपीलीय बोर्ड। 

वित्त अधिनियम, 2017 केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह 19 ट्रिब्यूनल्स (जैसे- सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय ट्रिब्यूनल) के सदस्यों की योग्यता, उनकी सेवा की अवधि और शर्तों तथा खोज-सह-चयन समितियों (Search-Cum-Selection Committees) के संयोजन से संबंधित नियमों को अधिसूचित कर सकती है। विधेयक 2017 के अधिनियम में संशोधन करता है ताकि खोज-सह-चयन समितियों के संयोजन और सदस्यों के कार्यकाल की अवधि के प्रावधानों को उसमें शामिल किया जा सके। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • खोज-सह-चयन समितियों का संयोजन: खोज-सह-चयन समितियों में निम्नलिखित सदस्य शामिल होंगे: 
    (i) भारत का मुख्य न्यायाधीश या उसके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश जो कि समिति का चेयरपर्सन होगा (कास्टिंग वोट के साथ)।
    (ii) केंद्र सरकार द्वारा नामित दो सचिव।
    (iii) वर्तमान या निवर्तमान चेयरपर्सन या सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्ति मुख्य न्यायाधीश।
    (iv) जिस मंत्रालय के अंतर्गत ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है, उसका सचिव (वोटिंग अधिकार के बिना)। 

विधेयक में निर्दिष्ट है कि केंद्र सरकार को समिति के सुझाव की तारीख से तीन महीने के भीतर ट्रिब्यूनल्स में नियुक्तियाँ करनी होगी।  

  • कार्यकाल: विधेयक में निर्दिष्ट किया गया है कि ट्रिब्यूनल के चेयरपर्सन का कार्यकाल चार वर्ष का होगा, या उसकी आयु 70 वर्ष होने तक (इसमें से जो भी पहले हो)। ट्रिब्यूनल के सदस्यों के लिये यह कार्यकाल चार वर्ष का या उनकी आयु 67 वर्ष होने तक (इनमें से जो भी पहले हो) होगी।

मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2021

मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक [Arbitration and Conciliation (Amendment) Bill], 2021 लोकसभा में पारित किया गया। यह मध्यस्थता और सुलह अधिनियम (Arbitration and Conciliation Act), 1996 में संशोधन करता है।

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परिवहन

मुख्य बंदरगाह प्राधिकरण विधेयक, 2020 

प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण विधेयक (Major Port Authorities Bill), 2020 को संसद में पारित किया गया। यह विधेयक प्रमुख बंदरगाह ट्रस्ट अधिनियम (Major Port Trusts Act), 1963 का स्थान लेता है। 

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केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act), 1988 के अंतर्गत केंद्रीय मोटर वाहन नियम (Central Motor Vehicles Rules) 1989 में मसौदा संशोधन जारी किये हैं। अधिनियम मोटर वाहन के मानक, ड्राइविंग लाइसेंस प्रदान करने तथा इन प्रावधानों का उल्लंघन करने पर सज़ा का प्रावधान करता है। मसौदा संशोधन सड़क सुरक्षा संबंधी नियमों के इलेक्ट्रॉनिक निरीक्षण और प्रवर्तन को विनियमित करने का प्रयास करता है। मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन उपकरण (EED): मसौदा नियम ऐसे उपकरणों में स्पीड कैमरा, CCTV और बॉडी वियरेबल कैमरा शामिल करते हैं। इन उपकरणों को पुलिस के अनुमोदन प्रमाण पत्र के बाद चालान जारी के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रमाण पत्र को प्रतिवर्ष संबंधित पुलिस अधिकारियों या निर्दिष्ट प्राधिकरण द्वारा नवीनीकृत किया जाना चाहिये।
  • प्लेसमेंट: राज्य सरकारों को सुनिश्चित करना चाहिये कि EED को निम्नलिखित स्थानों पर लगाया जाए: 
    (i) राष्ट्रीय राजमार्ग, जहाँ बहुत अधिक जोखिम और घनत्व होता है।
    (ii) राज्यों की राजधानियों में महत्त्वपूर्ण स्थानों पर।
    (iii) 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में। 

राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि EED की निगरानी वाले क्षेत्रों में पहले चेतावनी वाले चिह्न लगाए जाएँ।

  • अपराध: EED को किन नियमों के उल्लंघन पर चालान करने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है, इसकी एक सूची मसौदा नियमों में दी गई है। इन उल्लंघनों में निम्नलिखित शामिल हैं: 
    (i) स्पीड लिमिट से अधिक पर ड्राइव करना।
    (ii) अनाधिकृत स्थान पर रुकना या पार्किंग करना।
    (iii) निर्दिष्ट सुरक्षा उपायों का पालन न करना, जैसे- सीटबेल्ट्स न लगाना, हेलमेट न पहनना।
    (iv) रेड लाइट पार करना या स्टॉप के संकेत पर न रुकना। 

अपराध का नोटिस घटना के 15 दिनों के अंदर भेजा जाना चाहिये। अपराध को रजिस्टर करने के लिये इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को न्यूनतम 30 दिनों तक संग्रहीत किया जाना चाहिये।


विज्ञान और टेक्नोलॉजी

DNA प्रौद्योगिकी (उपयोग एवं अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक–2019

विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी स्थायी समिति (अध्यक्ष: जयराम रमेश) ने DNA प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक, 2019 पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

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विदेशी मामले

समुद्री जलदस्युता रोधी विधेयक, 2019

विदेशी मामलों से संबंधित समुद्री जलदस्युता रोधी विधेयक (Anti-Maritime Piracy Bill), 2019 पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। विधेयक मैरीटाइम पायरेसी को रोकने और पायरेसी के अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान करता है। यह संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UN Convention on the Law of the Sea-UNCLOS), 1982 के पायरेसी से संबंधित प्रावधानों को लागू करने का प्रयास करता है। समिति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं: 

  • विधेयक की प्रयोज्यता: विधेयक में प्रावधान है कि यह भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone- EEZ) की सीमाओं और उससे परे के सभी समुद्री भागों यानी समुद्री तट के 200 समुद्री मील के परे सभी हिस्सों पर लागू होगा। समिति ने कहा है कि UNCLOS के अंतर्गत विभिन्न देशों को अपने EEZ में एंटी पायरेसी संबंधी गतिविधियाँ संचालित करने का अधिकार है। उसने सुझाव दिया कि विधेयक की प्रयोज्यता में EEZ को भी शामिल किया जाए। 
  • पायरेसी के लिये सज़ा: विधेयक में प्रावधान है कि पायरेसी के मामले में निम्नलिखित सज़ा हो सकती है:
    (i) आजीवन कारावास।
    (ii) मृत्यु, अगर पायरेसी में हत्या की कोशिश शामिल है और उसके कारण किसी की मृत्यु हो जाती है। 
  • समिति ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान मनमाना और अनुचित है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। इसके अतिरिक्त उसने कहा कि अन्य कानूनों के प्रावधान जो कि अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान करते थे, उन्हें अदालतों ने रद्द कर दिया है। हालाँकि समिति ने सुझाव दिया है कि पायरेसी के दौरान अगर नतीजा किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसके लिये अनिवार्य मृत्यु दंड का प्रावधान किया जा सकता है। उसने यह भी कहा कि अगर पायरेसी की कोशिश में किसी की मृत्यु नहीं होती तो मृत्युदंड नहीं दिया जाना चाहिये। 
  • न्यायालयों का क्षेत्राधिकार: विधेयक में प्रावधान है कि किसी विदेशी जहाज़ पर किये गए अपराध निर्दिष्ट न्यायालय के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत नहीं आते, जब तक निम्नलिखित द्वारा हस्तक्षेप का अनुरोध नहीं किया जाता: 
    (i) जहाज़ का मूल देश। 
    (ii) जहाज़ का मालिक।
    (iii) जहाज़ पर मौजूद कोई अन्य व्यक्ति। 
    समिति ने सुझाव दिया कि इस प्रावधान को हटा दिया जाए। 
  • इसके अतिरिक्त विधेयक में प्रावधान है कि न्यायालय किसी व्यक्ति पर तब भी विचार कर सकती है, जब वह न्यायालय में उपस्थिति न हो। समिति ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। समिति ने गैर-मौज़ूदगी की स्थिति में मुकदमा चलाए जाने पर कुछ सुरक्षात्मक कदम उठाने के सुझाव दिये, जैसे:
    (i) अगर आरोपी को मुकदमे की जानकारी है।
    (ii) आरोपी तय समय में अपील का अनुरोध नहीं करता।

गृह मामले

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2021 

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक [Jammu and Kashmir Reorganisation (Amendment) Bill], 2021 को संसद में पारित कर दिया गया। यह विधेयक जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 में संशोधन करता है। अधिनियम जम्मू-कश्मीर राज्य को जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश और लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश में पुनर्गठित करने का प्रावधान करता है। विधेयक की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • निर्वाचित विधायिका संबंधी प्रावधानों को लागू करना: अधिनियम में प्रावधान है कि संविधान का अनुच्छेद 239 A, जो कि पुद्दुचेरी केंद्रशासित प्रदेश पर लागू है, जम्मू एवं कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश पर भी लागू होगा। अनुच्छेद 239 A में पुद्दुचेरी केंद्रशासित प्रदेश की स्थापना का प्रावधान है, जिसमें : 
    (i) एक विधायिका होगी, जो कि चयनित या आंशिक रूप से नामित और आंशिक रूप से निर्वाचित हो सकती है। 
    (ii) एक मंत्रिपरिषद होगी। 
    विधेयक में कहा गया है कि अनुच्छेद 239 A के अतिरिक्त संविधान के ऐसे कोई भी प्रावधान, जिनमें राज्य विधानसभा के चयनित सदस्यों का संदर्भ हो और जो पुद्दुचेरी केंद्रशासित प्रदेश पर लागू होते हैं, भी जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश पर लागू होंगे।
  • प्रशासनिक कैडर्स का विलय: अधिनियम निर्दिष्ट करता है कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा के सदस्य केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियोजन के आधार पर दोनों केंद्रशासित प्रदेशों में कार्य करना जारी रखेंगे। इसके अतिरिक्त भविष्य में दोनों केंद्रशासित प्रदेशों में अधिकारियों की तैनातियाँ अरुणाचल, गोवा, मिज़ोरम केंद्रशासित (Arunachal Goa Mizoram Union Territory- AGMUT) कैडर से की जाएगी। AGMUT कैडर में अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और गोवा के तीन राज्य तथा सभी केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं। विधेयक इन खंडों  (Clause) में संशोधन करता है और जम्मू-कश्मीर के मौजूदा कैडर के अधिकारियों का विलय AGMUT कैडर में करता है।

राष्ट्रीय आपदा शमन कोष 

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपदा शमन कोष को अधिसूचित किया गया था। अधिनियम केंद्र सरकार को इस बात की अनुमति देता है कि वह आपदाओं के शमन के लिये खास तौर से परियोजनाएँ चलाने हेतु एक कोष की स्थापना करे। इस कोष का प्रबंधन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority) करेगी जो कि भारत में आपदा प्रबंधन और शमन के लिये ज़िम्मेदार मुख्य प्राधिकरण है।


शहरी मामले

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली कानून (संशोधन) विधेयक

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली कानून (विशेष प्रावधान) दूसरा (संशोधन) विधेयक, 2021 को राज्यसभा में पारित कर दिया गया है। विधेयक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली कानून (विशेष प्रावधान) दूसरा अधिनियम, 2011 में संशोधन करता है।

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राष्ट्रीय शहरी डिजिटल मिशन

आवासन एवं शहरी मामलों के मंत्रालय (Ministry of Housing and Urban Affairs- MoHUA) तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MEITY) द्वारा संयुक्त रूप से राष्ट्रीय शहरी डिजिटल मिशन (National Urban Digital Mission- NUDM) की शुरुआत की गई है।

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वित्त

फैक्टरिंग विनियमन विधेयक, 2020 

वित्त संबंधी स्थायी समिति (अध्यक्ष: जयंत सिन्हा) ने फैक्टरिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक [Factoring Regulation (Amendment) Bill], 2020 पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। यह विधेयक फैक्टरिंग विनियमन विधेयक अधिनियम [Factoring Regulation Act], 2011 में संशोधन करता है और फैक्टरिंग बिज़नेस करने वाली एंटिटीज़ के दायरे को बढ़ाता है।  फैक्टरिंग एक ऐसा लेन-देन होता है जिसमें एक एंटिटी (फैक्टर) तुरंत फंड्स हासिल करने के लिये अपने ग्राहकों का पूरा प्राप्य (Receivable) या उसके एक हिस्से को तीसरे पक्ष को बेच देती है। हालाँकि फैक्टरिंग सभी उद्यमों के लिये उपलब्ध है, समिति ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (Micro- Small and Medium Enterprises- MSME) के भुगतानों में देरी की समस्या को देखते हुए विधेयक के महत्त्व का उल्लेख किया है। समिति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • TReDS को GSTN के साथ जोड़ना: व्यापार प्राप्य बट्टाकरण/छूट प्रणाली (Trade Receivable Discounting System-TReDS) MSME के व्यापार प्राप्य के वित्त पोषण का एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म है। वस्तु और सेवा कर नेटवर्क (Goods and Services Tax Network- GSTN) सरकार और करदाताओं को वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax- GST) को लागू करने के लिये IT अवसंरचना प्रदान करता है। वर्ष 2019 में यह अनिवार्य किया गया कि एक अधिसूचित सीमा से अधिक टर्नओवर वाले टैक्सपेयर्स को GSTN ई-चालान पोर्टल पर GST संबंधी कुछ दस्तावेजों को अपलोड करना होगा। इन दस्तावेज़ों में GST चालान, व्यापार से लेन-देन के लिये क्रेडिट और डेबिट नोट शामिल हैं। 
  • समिति ने सुझाव दिया कि GSTN ई-चालान पोर्टल के साथ TReDS को जोड़ा जाए। इससे TReDS प्लेटफॉर्म पर सभी GST चालानों की स्वचालित अपलोडिंग हो जाएगी और चालान का वास्तविक समय एक्सेस हो सकेगा। समिति ने कहा कि इससे पूरी प्रक्रिया और प्रामाणिक होगी तथा फैक्टर्स के लिये TReDS प्लेटफॉर्म आकर्षक बनेगा, MSME के ऋण के प्रवाह में सुधार होगा। 
  • TReDS पर सरकारी बकाए की अनिवार्य सूची: समिति के अनुसार, विधेयक में यह संशोधन किया जाए कि TReDS प्लेटफॉर्म पर केंद्र और राज्य सरकारों के प्राप्य की सूची अनिवार्य हो। इससे यह सुनिश्चित होगा कि MSME को बकाया सरकारी भुगतान समय रहते उपलब्ध हो।

नई विनिवेश नीति

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (Public Sector Enterprises- PSE) के विनिवेश के लिये नई नीति को मंज़ूरी दी जो कि केंद्र सरकार द्वारा PSE के स्वामित्व और नियंत्रण को अभिशासित करेगा। नीति के अंतर्गत सरकार विभिन्न क्षेत्रों में PSE की मौजूदगी को कम करेगी और निजी क्षेत्र के निवेश के लिये जगह बनाएगी। यह नीति सभी क्षेत्रों को रणनीतिक और गैर-रणनीतिक आधार पर वर्गीकृत करेगी जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा, महत्त्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा की उपलब्धता, वित्तीय सेवाओं और महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के मानदंडों पर आधारित होगी। 

रणनीतिक क्षेत्र हैं, 

(i) परमाणु ऊर्जा, रक्षा और अंतरिक्ष। 
(ii) परिवहन और दूरसंचार। 
(iii) ऊर्जा, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज। 
(iv) बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाएँ। 

यह नीति रणनीतिक क्षेत्रों में मौजूदा PSE की न्यूनतम मौजूदगी का प्रावधान करती है, चूँकि सरकार का लक्ष्य होल्डिंग कंपनियों (यानी कारोबार करने वाली कंपनी में शेयर्स रखने वाली कंपनी) के जरिये नियंत्रण बरकरार रखना है। रणनीतिक क्षेत्रों के सभी अन्य मौजूदा PSE का या तो निजीकरण कर दिया जाएगा या उन्हें बंद कर दिया जाएगा या दूसरे PSE में उसका विलय कर दिया जाएगा या उसकी सहायक बना दी जाएगी। रणनीतिक क्षेत्रों के अतिरिक्त दूसरे क्षेत्रों के मौजूदा PSE का निजीकरण कर दिया जाएगा या अगर व्यावहारिक हुआ, तो उन्हें बंद कर दिया जाएगा।

नई नीति केंद्रीय PSE और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तथा बीमा कंपनियों पर लागू होगी। यह बिना लाभ के कंपनियों (Not-For-Profit Companies) के रूप में काम करने वाले, कमज़ोर वर्गों को मदद देने वाले, विकासपरक या नियामक भूमिका निभाने वाले या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले महत्त्वपूर्ण डेटा का रखरखाव करने वाले जैसे कुछ PSE पर लागू नहीं होगी। 


इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिये दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता), 2021 

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिये दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) 2021 को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT अधिनियम) के अंतर्गत अधिसूचित किया गया है।

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उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology- IT) हार्डवेयर के लिये उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (Production Linked Incentive- PLI) योजना को मंज़ूरी दी।  इसका उद्देश्य IT हार्डवेयर की वैल्यू चेन में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना और उसमें व्यापक निवेश को आकर्षित करना है। इस योजना में IT हार्डवेयर से निम्नलिखित शामिल होंगे:

(i) लैपटॉप्स। 
(ii) टैबलेट्स। 
(iii) ऑल इन वन पर्सनल कंप्यूटिंग डिवाइस। 
(iv) सर्वर। PLI योजना के अंतर्गत कंपनियों को घरेलू स्तर पर उत्पादों की वृद्धिशील बिक्री पर प्रोत्साहन प्राप्त होता है। 

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इस बात पर गौर किया कि भारत में लैपटॉप और टैबलेट्स की मांग व्यापक रूप से आयात के ज़रिये पूरी की जाती है। लैपटॉप और टैबलेट्स के निर्यात की लागत वर्ष 2019-20 में क्रमशः 4.21 बिलियन अमेरिकी डॉलर और 0.41 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी।  चार वर्षों के दौरान प्रस्तावित योजना की कुल लागत लगभग 7,350 करोड़ रुपए है। 

ब्लॉकचेन पर मसौदा राष्ट्रीय रणनीति 

इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ब्लॉकचेन पर मसौदा राष्ट्रीय रणनीति जारी की है। ब्लॉकचेन एक वितरित खाता-बही तकनीक (Ledger Technology) होती है जो कि कारोबारी लेन-देन के सभी पक्षों के बीच साझा खाता-बही पर आधारित होती है। ब्लॉकचेन में उपयोग होने वाली डेटा संरचना एक निश्चित समय में हुए लेन-देन का अपरिवर्तनीय रिकॉर्ड रखती है। यह लेन-देन को सत्यापित करने के लिये किसी केंद्रीय संस्था की आवश्यकता को समाप्त करती है। 

मंत्रालय ने कहा कि प्रौद्योगिकी लेन-देन में पारदर्शिता, अपरिवर्तनीयता और उसके प्रबंधन की कुशलता बढ़ाती है। इसे विभिन्न डोमेन में उपयोग किया जा सकता है, जैसे- संपत्ति रिकॉर्ड प्रबंधन, पहचान प्रबंधन, आपूर्ति शृंखला और ई-वोटिंग। मंत्रालय ने यह भी कहा कि ब्लॉकचेन ई-गवर्नेंस में मूल्य को जोड़ सकती है। उसने ब्लॉकचेन के उपयोग में निम्नलिखित चुनौतियों को स्पष्ट किया: 

(i) मापन और लेन-देन की गति। 
(ii) डेटा सुरक्षा और गोपनीयता। 
(iii) मानकीकरण और अंतर। 
(iv) कुशल जनशक्ति। 

मसौदा रणनीति की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • राष्ट्रीय स्तर पर ब्लॉकचेन फ्रेमवर्क: रणनीति में यह प्रस्तावित है कि राष्ट्रीय स्तर पर ब्लॉकचेन फ्रेमवर्क बनाया जाए। फ्रेमवर्क के अंतर्गत देश के अनेक ज़ोन्स में ब्लॉकचैन प्लेटफार्मों की मेज़बानी के लिये बुनियादी ढाँचे बनाए जाएंगे। रणनीति राष्ट्रीय संसाधन के तौर पर ब्लॉकचेन के लिये बुनियादी ढाँचे बनाने का प्रस्ताव रखती है और ब्लॉकचेन एज़ अ सर्विस (Blockchain as a Service- BaaS) की पेशकश का सुझाव देती है। BaaS का अर्थ है, ब्लॉकचेन अनुप्रयोगों के निर्माण और होस्टिंग के लिये क्लाउड आधारित सेवाओं की पेशकश।
  • रणनीति प्रस्ताव रखती है कि ओपन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (Application Programming Interface- API) के साथ स्वदेशी प्रौद्योगिकी स्टैक को विकसित किया जाए। API में दो सॉफ्टवेयर सिस्टम्स को एक-दूसरे के साथ इंटरएक्ट कर सकते हैं। ओपन API का मतलब है, सॉफ्टवेयर के प्रोग्रामैटिक एक्सेस के लिये सार्वजनिक रूप से उपलब्ध इंटरफेस। राष्ट्रीय ढाँचे की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिये उत्कृष्टता का एक बहु-संस्थागत केंद्र बनाया जाएगा। 
  • राष्ट्रीय स्तर की सेवाओं का एकीकरण: राष्ट्रीय स्तर की निम्नलिखित सेवाओं को ब्लॉकचेन फ्रेमवर्क से एकीकृत किया जा सकता है: 
    (i) दस्तावेज़ों की इंस्टेंट साइनिंग के लिये ऑनलाइन सेवा ई-साइन (eSign)। 
    (ii) विभिन्न सरकारी एप्लीकेशन के एक्सेस के लिये इस्तेमाल होने वाली सत्यापन सेवा ई-प्रमाण (ePramaan)। 
    (iii) सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी किये जाने वाले दस्तावेजों को एक्सेस करने की ऑनलाइन सेवा डिजीलॉकर (DigiLocker)।  
  • क्षमता निर्माण: रणनीति में कहा गया है कि ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी को अल्पावधि के पाठ्यक्रमों में बढ़ावा किया जाना चाहिये। रणनीति अनुप्रयोगों के विकास और परीक्षण तथा वर्चुअल प्रशिक्षण के लिये सैंडबॉक्स वातावरण बनाने की पेशकश करती है। सैंडबॉक्स वह वातावरण प्रदान करता है जिसमें बाज़ार भागीदार एक नियंत्रित माहौल में ग्राहकों के साथ नए उत्पादों, सेवाओं या बिजनेस मॉडल्स की जाँच कर सकते हैं।  

संचार

5जी के लिये भारत की तैयारी 

सूचना प्रौद्योगिकी पर स्थायी समिति (अध्यक्ष: डॉ. शशि थरूर) ने 5जी के लिये भारत की तैयारी पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। समिति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • 5जी नेटवर्क की स्थिति: समिति ने कहा कि 59 देशों (USA, चीन और UK सहित) में 118 ऑपरेटर्स ने 5जी नेटवर्क को शुरू किया है। अब तक इसे ज़्यादातर सीमित स्तर पर शुरू किया गया है। भारत में कमर्शियल स्तर पर 5जी को शुरू किया जाना बाकी है। जनवरी 2021 तक दूरसंचार विभाग ने दूरसंचार सेवा प्रदाताओं (Telecom Service Providers- TSP) को 5जी के परीक्षणों के लिये मंज़ूरी नहीं दी। सीमित ने कहा कि भारत में 5जी सेवा को शुरू करने के लिये पर्याप्त तैयारी नहीं की गई है। उसने 5जी सेवा के इस्तेमाल से जुड़ी निम्नलिखित चुनौतियों का उल्लेख किया: 
    (i) स्पेक्ट्रम की अपर्याप्त उपलब्धता। 
    (ii) स्पेक्ट्रम की उच्च कीमत। 
    (iii) विभिन्न क्षेत्रों में 5जी की उपयोगिता का आकलन न करना। 
    (iv) फाइब्रेशन कम होना (ऑप्टिकल फाइबर के साथ कनेक्टिविटी)। 
    (v) बैकहॉल क्षमता का कम होना। 
  • 5जी के लिये स्पेक्ट्रम का आवंटन: 5जी को शुरू करने के लिये स्पेक्ट्रम के नए बैंड्स का आवंटन महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी अभी भी लंबित है। समिति ने टेलीकॉम कंपनियों की इस चिंता पर गौर किया कि 5जी स्पेक्ट्रम के लिये भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने जो आरक्षित मूल्य तय किया है (492 करोड़ रुपए प्रति मेगाहर्ट्ज़ (MHz), वह काफी ज़्यादा है। समिति ने कहा कि क्षेत्र के वित्तीय दबाव और यह देखते हुए कि 5जी पारिस्थितिकी तंत्र अभी विकसित किया जाना है, अधिक आरक्षित मूल्य से 5जी को शुरू करने की सेवा प्रदाताओं की क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है। 
  • सीमित ने यह भी कहा कि स्पेक्ट्रम की मौजूदा उपलब्धता के आधार पर प्रति ऑपरेटर के लिये लगभग 50 मेगाहर्ट्ज़ सुनिश्चित किया जा सकता है। यह 100 मेगाहर्ट्ज़ प्रति ऑपरेटर के विश्व औसत से काफी कम है। समिति ने कहा कि 4जी के मामले में भी भारत में औसत स्पेक्ट्रम प्रति ऑपरेटर विश्व औसत का लगभग एक चौथाई है। समिति ने कहा कि कम उपयोग का पता लगाने के लिये सभी आवंटित स्पेक्ट्रम का तत्काल ऑडिट किये जाने की आवश्यकता है और इस प्रकार स्पेक्ट्रम के आवंटन को रेशनलाइज़ किया जा सकता है।

वाणिज्य एवं उद्योग

भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश 

वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति ने कोविड के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश को आकर्षित करने, चुनौतियाँ और अवसर पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। समिति ने लॉजिस्टिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्टील जैसे क्षेत्रों की समस्याओं पर गौर किया। समिति के मुख्य निष्कर्षों और सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं: 

  • लॉजिस्टिक्स: निम्नलिखित कारणों से लॉजिस्टिक्स की लागत बहुत अधिक है: 
    (i) सड़क परिवहन पर अधिक निर्भरता, 
    (ii) सड़कों और बंदरगाहों के बुनियादी ढाँचे की खराब गुणवत्ता, 
    (iii) स्टोरेज बुनियादी ढाँचे में टूट-फूट 
    (iv) अनेक हितधारकों की मौजूदगी। 

समिति ने निम्नलिखित सुझाव दिये: 

(i) लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को मज़बूत करने और उसे औपचारिक बनाने के उपायों को लागू करना। 
(ii) रेलवे और आंतरिक जलमार्ग संबंधी अवसंरचना में सुधार। 
(iii) क्षेत्र में प्रभावी विकास के लिये राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति को अंतिम रूप देना। 

  • ऑटोमोबाइल: समिति ने ऑटोमोबाइल क्षेत्र में मांग को प्रोत्साहित करने, निर्यात को बढ़ावा देने और ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस में सुधार करने की आवश्यकता पर बल दिया है। उसने निम्नलिखित सुझाव दिये: 
    (i) वाहनों के लिये GST दर को 28% से घटाकर 18% किया जाए। 
    (ii) अफ्रीकी और एशियाई देशों जैसे नए बाज़ारों में निर्यात को बढ़ावा देने के लिये समझौतों पर हस्ताक्षर करना।
    (iii) विनिर्माण शुरू करने से संबंधित मंजूरियों के लिये एकल-खिड़की सुविधा प्रदान करना।  
  • चिकित्सा उपकरण: कुछ चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य नियंत्रण है जो कि बिक्री कीमत तय करता है या निर्माता पर इस बात की पाबंदी लगाता है कि वह कीमत को एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ा सकते। समिति ने सुझाव दिया कि चिकित्सा उपकरण का मूल्य दवाओं के मूल्य से अलग होना चाहिये और उसकी निगरानी के लिये एक अलग नियामक संस्था बनाई जानी चाहिये। इसके अतिरिक्त उसने सुझाव दिया कि चिकित्सा उपकरण नियामक अधिनियम लागू किया जाना चाहिये। वर्तमान में ड्रग्स (मूल्य) नियंत्रण आदेश [Drug (Prices) Control Order], 2013 दवाओं और चिकित्सा उपकारणों के मूल्य का निर्धारण करता है। 
  • इलेक्ट्रॉनिक्स: भारत मोबाइल फोन का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। हालाँकि अधिकतर मोबाइल फोन भारत में असेंबल होते हैं, पर उनके हिस्से दूसरी जगहों से आयात किये जाते हैं। समिति ने सुझाव दिया कि इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में निवेश करने वाली किसी भी विदेशी कंपनी से इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की अपेक्षा की जानी चाहिये और उससे  प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण करने को कहा जाना चाहिये। उसने यह सुझाव भी दिया कि सरकार को सस्ते आयात से घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण उद्योग को बचाने के लिये आयात शुल्क लगाने पर विचार करना चाहिये।

श्रम

प्रवासी श्रमिकों के लिये सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी उपाय

श्रम संबंधी स्थायी समिति ने अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिकों के लिये सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी उपाय पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। 

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स्वास्थ्य

चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 में मसौदा संशोधन जारी किये। 2017 के नियम चिकित्सा उपकरण के मानकों और लाइसेंसिंग का प्रावधान करते हैं। नियमों में कहा गया है कि चिकित्सा उपकरणों को भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards- BIS) या समय-समय पर मंत्रालय द्वारा निर्दिष्ट मानदंडों का पालन करना चाहिये। यदि BIS या मंत्रालय के कोई मानदंड उपलब्ध न हों तो उपकरण को अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन या अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रो-तकनीकी आयोग (International Organisation for Standardisation or International Electro-Technical Commission) के मानदंडों का पालन करना चाहिये। 

मसौदा संशोधनों में यह भी कहा गया है कि BIS और मंत्रालय के मानकों के अभाव में चिकित्सा उपकरणों के परीक्षण के लिये अमेरिकी मानक परीक्षण विधि के मानक भी स्वीकार्य होंगे।


रक्षा

रक्षा अधिग्रहण परिषद 

रक्षा अधिग्रहण परिषद ने सशस्त्र बलों के लिये 13,700 करोड़ रुपए मूल्य के उपकरणों की खरीद को मंज़ूरी दी है। यह खरीद रक्षा अधिग्रहण खरीद, [भारतीय-IDDM (देसी स्तर पर डिज़ाइन के विकास और निर्माण)] श्रेणी के अंतर्गत की गई है। 

इस खरीद में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन द्वारा डिज़ाइन और विकसित प्लेटफॉर्म तथा सिस्टम्स भी शामिल हैं। खरीद (भारतीय-IDDM) का अर्थ है, भारतीय विक्रेता से उत्पादों की खरीद, जो न्यूनतम 50% स्वदेशी सामग्री (Indigenous Content) के साथ देसी स्तर पर डिज़ाइन, विकसित और निर्मित है। स्वदेशी सामग्री आधार अनुबंध मूल्य में स्वदेशी सामग्री की लागत का प्रतिशत होता है। खरीद (भारतीय-IDDM) रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया, 2020 के अंतर्गत खरीद की एक श्रेणी है।


महिला एवं बाल विकास

किशोर न्याय (बच्चों की देख रेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 में संशोधनों को मंज़ूरी दी। अधिनियम में कानून से संघर्षरत बच्चों और देख रेख तथा संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों से संबंधित प्रावधान है। संशोधनों में बाल संरक्षण को मज़बूत करने के उपायों को पेश किया गया है। मुख्य संशोधनों में निम्नलिखित शामिल हैं: 

  • अधिनियम का कवरेज: अधिनियम में 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे को परिभाषित किया गया है। हालाँकि इसमें जघन्य अपराध करने वाले 16-18 वर्ष के बच्चों पर वयस्क के तौर पर मुकदमा चलाने का विशेष प्रावधान है। जघन्य अपराध वह है, जिसके लिये भारतीय दंड संहिता में सात वर्ष की न्यूनतम सज़ा है। प्रस्तावित संशोधनों में पहले अपरिभाषित अपराधों को ‘गंभीर अपराध’ के तौर पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया गया है।  
  • एडॉप्शन के आदेश: अधिनियम न्यायालय को इस बात का अधिकार देता है कि वह कुछ स्थितियों में एडॉप्शन के आदेश जारी कर सकता है, जैसे- अगर यह बच्चे के हित में है। इसके लिये न्यायालय को संतुष्ट होना चाहिये। संशोधनों में प्रस्तावित है कि मामलों के समय पर निपटान के लिये ज़िला मेजिस्ट्रेट और अतिरिक्त ज़िला मेजिस्ट्रेट एडॉप्शन के आदेश जारी कर सकते हैं।  
  • बाल कल्याण समिति (CWC): अधिनियम में प्रावधान है कि देखरेख एवं संरक्षण की ज़रूरत वाले बच्चों के हित के लिये राज्य हर ज़िले में एक या एक से अधिक बाल कल्याण समितियाँ (Child Welfare Committees- CWC) बना सकते हैं। यह CWC के सदस्यों को नियुक्त करने के लिये कुछ मानदंड तय किये गए हैं, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    (i) वह व्यक्ति कम-से-कम सात वर्षों तक बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा या कल्याण के कार्यों से जुड़ा रहा हो, या (ii) वह व्यक्ति बाल मनोविज्ञान, मनोचिकित्सक, कानून या सामाजिक कार्य की डिग्री प्राप्त अभ्यास करने वाला पेशेवर हो। प्रस्तावित संशोधन CWC सदस्यों की नियुक्ति के पात्रता मानदंडों में संशोधन करेगा।  

कॉरपोरेट मामले

छोटी कंपनियों की कैपिटल और टर्नओवर की सीमा बढ़ाई 

कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs- MCA) ने कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत छोटी कंपनियों के तौर पर वर्गीकृत होने के लिये कैपिटल और टर्नओवर की सीमा बढ़ा दी है।  पेड-अप कैपिटल की सीमा 50 लाख रुपए से बढ़ाकर दो करोड़ रुपए कर दी गई है। टर्नओवर की सीमा दो करोड़ रुपए से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपए की गई है। वर्ष 2021-22 के बजट भाषण में घोषित ये बदलाव 1 अप्रैल, 2021 से लागू होंगे।

इस परिवर्तन से दो लाख से ज़्यादा कंपनियों के अब छोटी कंपनियों के तौर पर वर्गीकृत होने की उम्मीद है। इससे इनके लिये प्रकटीकरण की कम आवश्यकता होगी और फीस और जुर्माने भी कम भरना पड़ेगा। 


ऊर्जा

बिजली की खरीद के लिये प्रतिस्पर्द्धी बिडिंग प्रक्रिया 

ऊर्जा मंत्रालय ने मिश्रित स्रोतों (अक्षय ऊर्जा स्रोतों तथा अन्य ऊर्जा स्रोतों से ऊर्जा सम्मिश्रण) से राउंड द क्लॉक (Round-The-Clock- RTC) बिजली की खरीद के लिये टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्द्धी बिडिंग प्रक्रिया के दिशा-निर्देशों में संशोधन किया है। इन दिशा-निर्देशों को जुलाई 2020 में जारी किया गया था ताकि अक्षय ऊर्जा तथा दूसरे स्रोतों (जो अक्षय ऊर्जा स्रोत नहीं हैं) की बंडलिंग की जा सके। इससे अक्षय ऊर्जा की अनिरंतर प्रकृति की चुनौतियों से निपटा जा सकता है। संशोधनों की मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • नॉन शेड्यूल बिजली से प्राप्त राशि को साझा करने की सीमा: बिजली उत्पादकों और खरीदारों को बिजली की बिक्री के लिये एक पूर्वानुमान और निर्धारण प्रक्रिया का पालन करना होता है। अगर निर्धारित समय के अनुसार खरीदार बिजली की खरीद नहीं करता है तो खरीदार को उत्पादक को हर्जाना देना होता है। इसके अतिरिक्त उत्पादक तीसरे पक्ष को नॉन-शेड्यूल बिजली बेच सकता है और मुआवज़े से प्राप्त राशि को समायोजित कर सकता है। बिजली उत्पादकों को खरीदार के साथ नॉन शेड्यूल बिजली (शेड्यूल के बिना बिजली देना) की बिक्री से प्राप्त राशि का कुछ हिस्सा साझा करना होगा। 
  • अक्षय ऊर्जा के लिये संशोधनों में 90% शुद्ध प्राप्ति की शेयरेबल मात्रा को बढ़ाकर 95% किया गया है। गैर-अक्षय ऊर्जा के लिये 50% शुद्ध प्राप्ति (परिवर्तनशील शुल्क को छोड़कर) को बढ़ाकर 95% किया गया है।  
  • अप्रत्याशित घटना पर फैसले की अवधि: संशोधन में बिजली उत्पादों की अप्रत्याशित घटना के दावों पर खरीदार की फैसला लेने की अवधि को 30 दिन से घटाकर 15 दिन कर दिया गया है। अप्रत्याशित घटना के दावे का अर्थ है, अनियंत्रित घटनाओं जैसे- भूकंप और बाढ़ की स्थिति में राहत के लिये दावा करना (जैसे- प्रदर्शन संबंधी बाध्यताओं से छूट)। 

रसायन एवं उर्वरक

उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2020-21 से वर्ष 2028-29 की अवधि में फार्मास्यूटिकल्स के लिये उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (Production Linked Incentive Scheme-PLI) को मंज़ूर कर लिया है। योजना फार्मास्यूटिकल उद्योग के विकास के लिये अंब्रेला योजना (Umbrella Scheme) का हिस्सा है। योजना का उद्देश्य निवेश और उत्पादन बढ़ाकर तथा उत्पाद विविधीकरण में योगदान देकर फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भारत की विनिर्माण क्षमता को बढ़ाना है। मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित शामिल हैं: 

  • लक्षित समूह: फार्मास्यूटिकल गुड्स के निर्माताओं को विश्वस्तरीय विनिर्माण राजस्व (Global Manufacturing Revenue- GMR) के आधार पर दोबारा से समूह में बाँटा जाएगा। ये समूह फार्मास्यूटिकल गुड्स के GMR (2019-20) के आवेदक होंगे:
    (i) समूह  A: 5,000 करोड़ रुपए या उससे अधिक।
    (ii) समूह B: 500 करोड़ रुपए और 5,000 करोड़ रुपए के बीच। 
    (iii) समूह C: 500 करोड़ रुपए से कम। 

MSME उद्योग के लिये एक उप समूह इस समूह के भीतर बनाया जाएगा।  

  • प्रोत्साहन: योजना के अंतर्गत कुल 15,000 करोड़ रुपए का प्रोत्साहन (प्रशासनिक व्यय सहित) है। लक्ष्य समूहों में प्रोत्साहन का आवंटन इस प्रकार है: 
    (i) समूह A: 11,000 करोड़ रुपए।
    (ii) समूह B: 2,250 करोड़ रुपए। 
    (iii) समूह C: 1,750 करोड़ रुपए।
  • समूह A और समूह C के लिये प्रोत्साहन को किसी दूसरी श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया जाएगा। समूह B के आवेदकों को मिले प्रोत्साहन का अगर इस्तेमाल नहीं किया जाता है तो यह समूह A के आवेदकों को मिल जाएगा। 
  • कवर किये गए गुड्स: योजना के अंतर्गत कवर किये गए गुड्स को निम्नलिखित में श्रेणीबद्ध किया जाएगा: 
    (i) श्रेणी 1: इसमें जटिल जेनेरिक ड्रग्स, पेटेंट ड्रग्स और सेल आधारित या जीन थेरेपी ड्रग्स शामिल हैं।
    (ii) श्रेणी 2: इसमें सक्रिय फार्मास्यूटिकल सामग्री और मुख्य प्रारंभिक सामग्री शामिल हैं। 
    (iii) श्रेणी 3: श्रेणी 1 और श्रेणी 2 में न आने वाली ड्रग्स, जैसे पुनर्खरीद ड्रग्स, एंटी कैंसर ड्रग्स और एंटी डायबिटिक ड्रग्स। 
  • प्रोत्साहन की दर: योजना के अंतर्गत श्रेणी 1 और श्रेणी 2 के लिये प्रोत्साहन की दर उत्पादन के पहले चार वर्षों के लिये 10% (उत्पादों की बिक्री मूल्य का),  पाँचवें वर्ष 8% और छठे वर्ष 6% होगी। श्रेणी 3 के लिये प्रोत्साहन की दर उत्पादन के पहले चार वर्षों के लिये 5% (उत्पादों की बिक्री मूल्य का) पाँचवें वर्ष 4% और छठे वर्ष 3% होगी।

पृथ्वी विज्ञान

नीली अर्थव्यवस्था   

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने भारत की ब्लू इकॉनमी यानी नीली अर्थव्यवस्था के लिये मसौदा नीतिगत रूपरेखा जारी की। नीली अर्थव्यवस्था में समुद्री संसाधन और समुद्री तथा तटवर्ती तटीय क्षेत्रों में मानव निर्मित आर्थिक अवसंरचनाएँ शामिल होती हैं। इस नीति में ऐसी रणनीति प्रस्तुत की गई है, जिसे अपनाकर सरकार सतत् विकास के लिये समुद्री संसाधनों का उपयोग कर सकती है। रणनीति निम्नलिखित का प्रयास करती है: 

(i) GDP में नीली अर्थव्यवस्था के योगदान को बढ़ाना। 
(ii) तटीय समुदायों के जीवन में सुधार। 
(iii) समुद्री जैव विविधता का संरक्षण। 
(iv) समुद्री क्षेत्रों और संसाधनों की सुरक्षा को बरकरार रखना। 

मसौदा नीति के मुख्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल हैं:    

  • नीली अर्थव्यवस्था का योगदान: भारत में नीली अर्थव्यवस्था का आकार GDP का लगभग 4% अनुमानित है लेकिन अगर अधिक भरोसेमंद तरीका अपनाया जाए तो यह और बढ़ सकता है। नीली अर्थव्यवस्था से संबंधित भरोसेमंद डेटा जमा करने के लिये एक नए ठोस प्रणाली को तैयार किया जाना चाहिये। क्षेत्र और उन गतिविधियों को चिह्नित करने के लिये एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाना चाहिये जो कि इस अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। 
  • तटीय समुद्री स्थानिक योजना और पर्यटन: समुद्री संसाधनों के प्रबंधन के लिये पर्यावरणीय विशेषताओं, भूगोल और उपलब्ध संसाधनों के मौजूदा उपयोग पर नक्शे और डेटा के ज़रिये तटीय समुद्री स्थानिक योजना बनाई जानी चाहिये। उसके विस्तार और प्रकृति को स्पष्ट करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर एक प्राधिकरण बनाया जाना चाहिये।  
  • सतत् समुद्री मत्स्योद्योग: नीति निम्नलिखित का सुझाव देती है: (i) क्षेत्र के लिये एक नई राष्ट्रीय नीति और समुद्री मत्स्योद्योग के प्रभावी प्रबंधन के लिये कानूनी एवं संस्थागत संरचना स्थापित करना और (ii) मत्स्योद्योग और संबंधित गतिविधियों के प्रबंधन और विनियमन के लिये समर्पित उपग्रह प्रणाली की तैनाती की संभावना तलाशना।  
  • कानूनी और नियामक सुधार: इन सुधारों में निम्नलिखित शामिल हैं: 
    (i) नीली अर्थव्यवस्था के विकास और विनियमन के लिये कानूनी संरचना को लागू करना।
    (ii)  समुद्री मत्स्य पालन विनियमन अधिनियम के दायरे में संशोधन करके, मत्स्योद्योग और संबंधित गतिविधियों के प्रबंधन और विनियमन के लिये केंद्रीय कानून बनाना।
    (iii) क्वारंटाइन और प्रमाणीकरण सेवाओं सहित समुद्री रोगों के प्रबंधन के लिये केंद्रीय कानून को पेश करना।
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