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भारतीय राजनीति

वित्त अधिनियम, 2017

  • 18 Nov 2019
  • 4 min read

प्रीलिम्स के लिये-

वित्त अधिनियम 2017

मेन्स के लिये-

भारतीय संसद की कार्यप्रणाली

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने संशोधित वित्त अधिनियम 2017 (Finance Act 2017) में सरकार को न्यायाधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति के संबंध में वर्णित नियमों को रद्द कर, नए मानक तय करने का निर्देश दिया।

प्रमुख बिंदु-

  • उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में वित्त अधिनियम की धारा 184 की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी जो केंद्र सरकार को न्यायाधिकरणों के सदस्यों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से संबंधित नियमों को फ्रेम करने का अधिकार देता है।
  • न्यायालय ने न्यायाधिकरणों के सदस्यों की नियुक्ति से संबंधित केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों को रद्द करते हुए नए नियम बनाने का निर्देश दिया है।
  • इसके अलावा न्यायालय ने वित्त अधिनियम, 2017 को धन विधेयक के रूप में पारित करने के मामले को उच्च पीठ के पास भेजने का आदेश दिया।

विवादास्पद बिंदु-

  • इस विधेयक में 40 से अधिक अति महत्त्वपूर्ण संशोधन प्रस्तुत किये गए थे।
  • इन संशोधनों के लिये दोनों सदनों में व्यापक और सार्थक बहस तथा सहमति आवश्यक थी।
  • परंतु अंतिम समय में सरकार ने इस विधेयक को धन विधेयक का दर्जा दिलवा कर बिना बहस के ही पारित करवा दिया।

धन विधेयक (Money Bill)-

संविधान के अनुच्छेद 110 में किसी विधेयक के धन विधेयक होने की निम्नलिखित शर्तें हैं-

  • करारोपण, कर के उन्मूलन, परिवर्तन और विनियमन संबंधी प्रावधान।
  • सरकार द्वारा ऋण लेने से संबंधित विनियमन।
  • भारत की संचित निधि, आकस्मिक निधि से धन निकालना या जमा करना।
  • भारत की संचित निधि से धन का विनियोग।
  • भारत की संचित निधि या लोक लेखा में कोई धन प्राप्त करना।

अनुच्छेद 117 के अनुसार धन विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश से केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।

वित्त विधेयक (Finance Bill)-

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 117(1) और 117(2) में वित्त विधेयक का उल्लेख किया गया है।
  • ऐसे सभी विधेयक जिनका संबंध वित्तीय मामलों से होता है वित्त विधेयक कहलाते हैं।
  • इस विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति के बाद लोकसभा में पेश किया जाता है।
  • इसमें राज्यसभा को भी पर्याप्त शक्ति प्राप्त होती है।

पृष्ठभूमि

  • वर्ष 2017 में सरकार द्वारा वित्त विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया. सरकार ने इस विधेयक में चुनावी बाॅण्ड के प्रावधान होने के कारण इसे धन विधेयक के रूप में पारित करने का अनुमोदन किया।
  • जिस पर विपक्ष ने विरोध जताया लेकिन केंद्र सरकार ने वित्त विधेयक को धन विधेयक के रूप में पेश करके पारित करवा लिया।
  • केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में इस प्रक्रिया को न्यायोचित ठहराते हुए कहा था कि न्यायाधिकरण के अधिकारियों को भुगतान किए जाने वाले वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि से आते हैं, अतः इसे धन विधेयक की श्रेणी में रख सकते हैं।
  • लेकिन उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि राष्ट्र की बहुलता और शक्ति के संतुलन के लिये राज्य सभा को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

स्रोत- द हिन्दू

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