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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    कश्मीर से कन्याकुमारी तथा असम से कच्छ तक असम्मित भू-आकृतिक लक्षणों के कारण भारत में बाढ़ के स्वरूप एवं कारकों में अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्नता होती है, जिसका समाधान वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण अपनाने में निहित है। टिप्पणी करें।

    07 Apr, 2018 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आपदा प्रबंधन

    उत्तर :

    उत्तर की रूपरेखा:

    • बाढ़ को परिभाषित करें।
    • विभिन्न बाढ़ प्रवण क्षेत्रों तथा इसके लिये उत्तरदायी अलग-अलग भू-संरचनात्मक कारकों की चर्चा करें।
    • इसके बाद क्षेत्र तथा प्रकृति को ध्यान में रखते हुए बाढ़ की समस्या के निदान की रणनीति पर चर्चा करें।
    • अपने उत्तर के अंत में संतुलित निष्कर्ष लिखें।

    भारत में घटित होने वाली सभी प्राकृतिक आपदाओं में सबसे अधिक बाढ़ की घटनाएँ हैं। यद्यपि इसका मुख्य कारण भारतीय मानसून की अनिश्चितता तथा वर्षा ऋतु के चार महीनों में भारी जलप्रवाह है, परंतु भारत की असम्मित भू-आकृतिक विशेषताएँ विभिन्न क्षेत्रों में बाढ़ की प्रकृति तथा तीव्रता के निर्धारण में अहम भूमिका निभाती हैं। 

    बाढ़ किसी नदी या जलधारा के लिये एक प्राकृतिक तथा बार-बार घटित होने वाली घटना है। यह भारी तथा लगातार वर्षा के कारण होती है, जो कि भूमि की अवशोषण क्षमता तथा नदियों, जलधाराओं एवं तटीय क्षेत्रों की जलनिकास क्षमता से अधिक जल का जमाव हो जाने के कारण घटित होती है। इसके कारण जलधारा तटों से ऊपर बहने लगती है तथा आसपास के क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं। परंतु हाल के बाढ़ की घटनाएँ मानवीय गतिविधियों, जैसे कि जल स्रोतों का कुप्रबंधन, बाढ़ के मैदानों तथा तटीय क्षेत्रों का अतिक्रमण, अनियोजित नगरीय विकास इत्यादि के कारण भी घटित हुई हैं। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण) के अनुसार, प्रमुख बाढ़ सुभेद्य क्षेत्र देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 12.5% है। 

    हाल ही में मध्य भारत, मुंबई, तमिलनाडु, कश्मीर इत्यादि क्षेत्रों में मूसलाधार वर्षा हुई थी तथा भीषण बाढ़ का सामना करना पड़ा था, जिसका कारण जलवायु परिवर्तन तथा अनियोजित शहरी अवसंरचना है। 

    भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बाढ़ आने के अलग-अलग कारण हैं जो कि मुख्यतः भू-आकृतिक विशेषताओं पर निर्भर करते हैं। इसके प्रमुख कारक हैं:

    भारी वर्षाः उदाहरणतः पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल, असम तथा पश्चिमी बंगाल का उप हिमालय क्षेत्र और सिंधु-गंगा का मैदान।

    नदी तल के स्तर में वृद्धिः हिमालय से निकलने वाली नदियों में भारी मात्र में अवसाद होता है, जिसके कारण नदी-तल ऊपर उठ जाता है और जलप्रवाह क्षमता कम हो जाती है जो निकटवर्ती क्षेत्रों को जलमग्न कर देता है। 

    नदियों का विसर्पनः यह हिमालय से निकलने वाली नदियों में अधिक देखने को मिलता है। 

    चक्रवातः उष्णकटिबंधीय चक्रवात के साथ तटीय क्षेत्रों में बहने वाली तेज हवा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा तथा पश्चिम बंगाल राज्यों में बाढ़ के लिये उत्तरदायी है। 

    डेल्टाई क्षेत्रों में अवसादनः ज्वारीय अवसाद नदी के मुहाने पर जमा हो जाते हैं तथा नदी के जल निस्तारण की क्षमता को कम करते हैं, जिसके कारण डेल्टाई क्षेत्र जलमग्न हो जाता है। 

    नदियों के सतत् प्रवाह में बाधाः तटबंध, रेलमार्ग, बांध इत्यादि नदी के प्राकृतिक बहाव में बाधा पहुँचाते हैं तथा बाढ़ के कारक हैं। 

    अपर्याप्त जलनिकास व्यवस्थाः कुछ क्षेत्रों में नहरों द्वारा सिंचाई के कारण अधोभूमि जलस्तर में वृद्धि हुई है जिसके कारण जलनिकास व्यवस्था अपर्याप्त सिद्ध हुई है तथा बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हुई है। उदाहरणतः पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि।

    भूकंप तथा भू-स्खलनः ये प्राकृतिक आपदाएँ नदी की दिशा को परिवर्तित कर देते हैं, जिसके कारण बाढ़ आती है। 

    निर्वनीकरणः यह कटाव की गति को बढ़ा देता है तथा जल के अवशोषण की दर घटा देता है। उदाहरणतः पश्चिमी घाट, शिवालिक तथा छोटानागपुर पठार क्षेत्र।

    बादल फटनाः इसके कारण काफी कम समय में बहुत अधिक वर्षा होती है जिसके कारण अचानक बाढ़ आ जाती है। ऐसी घटना सामान्यतः हिमालय क्षेत्र में होती है। 

    हिमनद का टूटनाः हिमालय क्षेत्र में घटित होती है। 

    चूँकि विभिन्न क्षेत्रों में बाढ़ की प्रकृति तथा कारक भिन्न-भिन्न हैं, अतः कोई एक रणनीति सभी क्षेत्रों में कारगर नहीं साबित हो सकती है। इसलिये हमें इसके निदान के लिये क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति अपनानी होगी। 

    मौजूदा बाढ़ प्रबंधन तंत्रः 
    द्विस्तरीय प्रणालीः

    1. राज्य स्तर तंत्रः इसमें जल संसाधन विभाग, तकनीकी सलाहकार समिति, लोकनिर्माण विभाग, सिंचाई विभाग इत्यादि शामिल हैं। 
    2. राष्ट्रीय स्तर तंत्रः इसमें केंद्रीय जल आयोग, ब्रह्मपुत्र बोर्ड, गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण शामिल हैं। आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का मुख्य कार्य आपदा को रोकना तथा शमन करना है और किसी भी प्रकार की आपात स्थिति में  समग्र, समन्वित एवं शीघ्र कार्रवाई करना है। 

    सुझावः

    • राज्य स्तर पर बाढ़ नियंत्रण एवं शमन के लिये प्रशिक्षण संस्थान खोलना तथा स्थानीय स्तर पर लोगों को बाढ़ के समय किये जाने वाले उपायों के बारे में प्रशिक्षित करना। 
    • जनता के बीच शीघ्र तथा आवश्यक सूचना जारी करना। 
    • एक ऐसे संचार नेटवर्क का निर्माण करना जो कि बाढ़ के दौरान भी कार्य कर सके। 
    • बाढ़ की प्रकृति के अनुसार आपदा मोचन बल को प्रशिक्षित करना तथा आवश्यकता पड़ने पर तुरंत तैनात करना। 
    • बाढ़ के पूर्वानुमान तथा चेतावनी नेटवर्क को रिमोट सेंसिंग टेक्नोलॉजी तथा अन्य संस्थानों के सहयोग से मजबूत करना। 
    • संरचनात्मक उपाय, जैसे कि तटबंध, कटाव रोकने के उपाय, जलनिकास तंत्र का सुदृढ़ीकरण, तटीय सुरक्षा के लिये दीवार जैसे उपाय जो कि उस खास भू-आकृतिक क्षेत्र के लिये सर्वश्रेष्ठ हों। 
    • गैर-संरचनागत उपाय, जैसे कि आश्रय ग्रह का निर्माण, सार्वजनिक उपयोग की जगहों को बाढ़ सुरक्षित बनाना, अंतर्राज्यीय नदी बेसिन का प्रबंधन, बाढ़ के मैदानों का क्षेत्रीकरण इत्यादि।
    • पुनर्वनीकरण, जलनिकास तंत्र में सुधार, वाटर-शेड प्रबंधन, मृदा संरक्षण जैसे उपाय।
    • रियल टाइम डाटा का एकत्रीकरण तथा हस्तांतरण।

    निष्कर्षः बाढ़ जैसी प्रलयकारी घटनाओं के लिये केन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा पालन किये जाने वाले प्रोटोकॉल तथा नीतियों की समीक्षा की जानी चाहिये। अल्प आय वाले व्यक्तियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे प्राकृतिक आपदाओं से हुई क्षति की प्रतिपूर्ति कर सकें। सरकार को बाढ़ की प्रकृति का ध्यान रखते हुए प्रत्येक मोर्चे पर इसके परिणामों से निपटने हेतु तैयार रहना चाहिये।

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