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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    निबंध विषय

    1. “किसी समाज की गुणवत्ता उसकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके द्वारा किये गए चुनावों में प्रतिबिंबित होती है।”
    2. “जब बुद्धिमत्ता नवाचार के साथ संतुलन बनाए रखती है, तभी सभ्यताएँ स्थायी बनती हैं।”

    14 Mar, 2026 निबंध लेखन निबंध

    उत्तर :

    1. “किसी समाज की गुणवत्ता उसकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके द्वारा किये गए चुनावों में प्रतिबिंबित होती है।”

    निबंध को समृद्ध बनाने हेतु उद्धरण:

    • एडविन मार्कहम: “चुनाव ही वह आधार हैं, जिन पर भाग्य निर्मित होता है।”
    • जॉन रॉल्स: “न्याय सामाजिक संस्थाओं का प्रथम गुण है।”
    • फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट: “हमारी प्रगति की कसौटी यह नहीं है कि हम उन लोगों की समृद्धि में कितना जोड़ते हैं जिनके पास पहले से बहुत है; बल्कि यह है कि हम उन लोगों को कितना प्रदान करते हैं जिनके पास बहुत कम है।”

    प्रस्तावना: कथन की व्याख्या

    • समाज का आकलन प्रायः दिखाई देने वाली उपलब्धियों जैसे आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, सैन्य शक्ति या अवसंरचना के आधार पर किया जाता है।
    • हालाँकि, ये उपलब्धियाँ केवल क्षमता को दर्शाती हैं, चरित्र को नहीं।
    • यह कथन संकेत करता है कि किसी समाज का वास्तविक आकलन उसके द्वारा किये गए निर्णयों में निहित होता है—वह कमज़ोर वर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है, संसाधनों का वितरण कैसे करता है, संघर्षों का समाधान किस प्रकार करता है और प्रगति तथा न्याय के बीच कैसे संतुलन स्थापित करता है।
    • नैतिक निर्णय यह निर्धारित करते हैं कि उपलब्धियाँ मानवीय विकास में परिवर्तित होंगी या नहीं।

    दार्शनिक आधार

    • नैतिक संकेतक के रूप में विकल्प
      • उपलब्धियाँ क्षमता को दर्शाती हैं, जबकि विकल्प मूल्यों को प्रकट करते हैं।
      • अरस्तू के अनुसार नैतिकता सद्गुणों द्वारा निर्देशित सुविचारित चुनाव का विषय है।
    • भारतीय नैतिक चिंतन
      • धर्म की अवधारणा केवल सफलता के बजाय सही निर्णय लेने पर बल देती है।
      • महात्मा गांधी ने कहा कि साधन उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं, जितने कि साध्य।
    • सामाजिक अनुबंध का दृष्टिकोण
      • जॉन रॉल्स जैसे दार्शनिकों ने माना कि न्यायपूर्ण समाज वही है, जिसकी संस्थाएँ सबसे कमज़ोर वर्गों की रक्षा करती हैं।
      • इस प्रकार सामूहिक निर्णय ही समाज के नैतिक चरित्र को आकार देते हैं।

    समाज की गुणवत्ता को निर्धारित करने वाले विकल्प

    • कमज़ोर वर्गों के प्रति व्यवहार
      • किसी समाज की गरिमा इस तर्क से परिलक्षित होती है कि वह गरीबों, बुज़ुर्गों, दिव्यांगों और हाशिये पर रह रहे लोगों का किस प्रकार समर्थन करता है।
      • कल्याणकारी नीतियाँ, समावेशी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ नैतिक विकल्पों की अभिव्यक्ति हैं।
    • विकास और समानता के बीच संतुलन
      • तीव्र आर्थिक विकास के साथ असमानता भी बनी रह सकती है।
      • वैश्विक आँकड़े दर्शाते हैं कि सबसे धनी 10% लोगों के पास विश्व की तीन-चौथाई से अधिक संपत्ति है, जो यह दिखाता है कि आर्थिक नीतियों में किये गए विकल्प निष्पक्षता को कैसे प्रभावित करते हैं।
    • पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी
      • उपभोग और संसाधनों के उपयोग से जुड़े निर्णय स्थिरता को निर्धारित करते हैं।
      • जलवायु परिवर्तन यह दर्शाता है कि अल्पकालिक विकल्प किस प्रकार दीर्घकालिक अस्तित्व को खतरे में डाल सकते हैं।

    ऐतिहासिक एवं समकालीन उदाहरण

    • सामाजिक सुधार आंदोलन
      • दास प्रथा या जातिगत भेदभाव जैसी प्रथाओं के उन्मूलन के लिये समाज को परंपरा के स्थान पर न्याय को चुनना पड़ा।
    • लोकतांत्रिक शासन
      • संविधान, अधिकारों की रूपरेखा और स्वतंत्र संस्थाएँ नैतिक विकल्पों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।
    • वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य
      • महामारी जैसी स्थितियों में, जिन समाजों ने सामूहिक सुरक्षा और एकजुटता को प्राथमिकता दी, उन्होंने उच्च सामाजिक विश्वास का प्रदर्शन किया।

    समकालीन प्रासंगिकता

    • प्रौद्योगिकी और नैतिक विकल्प
      • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और जैव-प्रौद्योगिकी अभूतपूर्व क्षमताएँ प्रस्तुत करती हैं।
      • समाज को यह तय करना होगा कि ये तकनीकें मानव कल्याण को बढ़ावा देंगी या असमानता को और गहरा करेंगी।
    • आर्थिक मॉडल
      • कल्याण, कराधान और श्रम अधिकारों से संबंधित नीतिगत निर्णय यह निर्धारित करते हैं कि समृद्धि समावेशी होगी या नहीं।
    • सार्वजनिक विमर्श
      • सहिष्णुता, संवाद और बहुलवाद से जुड़े विकल्प विविध समाजों में सामाजिक सद्भाव को आकार देते हैं।

    नैतिक समन्वय

    • उपलब्धियाँ शक्ति को मापती हैं, जबकि विकल्प अंतरात्मा को दर्शाते हैं।
    • समाज अपनी क्षमता से समृद्ध तो बन सकते हैं, परंतु सम्मान उन्हें नैतिक निर्णयों से ही मिलता है।
    • सतत प्रगति तब संभव होती है, जब उपलब्धियाँ नैतिक विकल्पों द्वारा निर्देशित हों।

    निष्कर्ष

    किसी समाज की महानता केवल इस तर्क में नहीं निहित होती कि वह क्या निर्माण करता है या क्या आविष्कार करता है, बल्कि इस तर्क में होती है कि उसके निर्णय किन मूल्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। उपलब्धियाँ विश्व को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन विकल्प यह तय करते हैं कि प्रगति मानवीय और न्यायपूर्ण बनी रहे या नहीं। अंततः, समाज को उनके कार्यों से अधिक उनके निर्णयों में निहित बुद्धिमत्ता और करुणा के लिये याद किया जाता है।


    2. “जब बुद्धिमत्ता नवाचार के साथ संतुलन बनाए रखती है, तभी सभ्यताएँ स्थायी बनती हैं।”

    निबंध को समृद्ध बनाने हेतु उद्धरण:

    • अल्बर्ट आइंस्टीन: “मनुष्य और उसके भाग्य के प्रति चिंता हमेशा सभी तकनीकी प्रयासों का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिये।”
    • महात्मा गांधी: “पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पर्याप्त प्रदान करती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।”
    • युवाल नोआह हरारी: “प्रौद्योगिकी कभी भी नियतात्मक नहीं होती और यह तथ्य कि कुछ किया जा सकता है, इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे अवश्य किया जाना चाहिये।” 

    प्रस्तावना: कथन की व्याख्या

    • मानव सभ्यता निरंतर नवाचार, वैज्ञानिक खोजों, तकनीकी क्रांतियों और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से आगे बढ़ी है।
    • हालाँकि, केवल नवाचार ही स्थिरता या अस्तित्व की गारंटी नहीं दे सकता।
    • यह कथन इस तर्क पर बल देता है कि सभ्यता को बनाए रखने के लिये ज्ञान का नैतिक और ज़िम्मेदार उपयोग करने की क्षमता अर्थात बुद्धिमत्ता को नवाचार का मार्गदर्शन करना चाहिये।

    दार्शनिक एवं नैतिक आधार

    • ज्ञान बनाम बुद्धिमत्ता
      • ज्ञान क्षमता को बढ़ाता है, जबकि बुद्धिमत्ता उसके ज़िम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करती है।
      • बर्ट्रेंड रसेल ने चेतावनी दी थी कि बुद्धिमत्ता के बिना तकनीकी शक्ति मानवता के लिये खतरा बन सकती है।
    • भारतीय चिंतन
      • प्राचीन भारतीय दर्शन ज्ञान (विद्या) और नैतिक विवेक (विवेक) के बीच सामंजस्य पर बल देता है।
      • नवाचार को तभी महत्त्व दिया गया जब वह धर्म के अनुरूप हो।
    • प्रगति की नैतिकता
      • तकनीकी क्षमता प्रकृति और समाज पर मानव के नियंत्रण का विस्तार करती है।
      • बुद्धिमत्ता के अभाव में, ऐसी शक्ति संघर्ष, असमानता और पर्यावरणीय क्षति का कारण बन सकती है।

    सभ्यतागत प्रगति के प्रेरक के रूप में नवाचार

    • वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांतियाँ
      • बिजली, टीकों एवं डिजिटल संचार जैसे नवाचारों ने मानव जीवन प्रत्याशा और उत्पादकता में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है।
    • आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन
      • औद्योगिक और डिजिटल क्रांतियों ने वैश्विक GDP को बढ़ाया है तथा करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है।
    • ज्ञान-आधारित समाज
      • शिक्षा और अनुसंधान संस्थान नवाचार एवं रचनात्मकता को गति प्रदान करते हैं।

    जब नवाचार बुद्धिमत्ता से आगे निकल जाता है

    • पर्यावरणीय संकट
      • औद्योगिक नवाचार ने समृद्धि तो बढ़ाई, लेकिन साथ ही जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के ह्रास को भी जन्म दिया।
      • पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता के बिना वैज्ञानिक प्रगति ने दीर्घकालिक जोखिम उत्पन्न किये।
    • हथियार और संघर्ष
      • परमाणु तकनीक यह दर्शाती है कि यदि वैज्ञानिक क्षमता का विवेकपूर्ण नियमन न हो तो वह सभ्यता के लिये खतरा बन सकती है।
    • डिजिटल युग की चुनौतियाँ
      • सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता दक्षता तो लाते हैं, लेकिन साथ ही गलत सूचना, निगरानी तथा नैतिक दुविधाओं को भी जन्म देते हैं।

    नवाचार के संरक्षक के रूप में बुद्धिमत्ता

    • नैतिक शासन
      • नियम, वैश्विक संधियाँ और नैतिक ढाँचे तकनीक के उत्तरदायी उपयोग को दिशा प्रदान करते हैं।
    • सततता
      • सतत विकास की अवधारणा नवाचार को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ती है।
    • मानव-केंद्रित तकनीक
      • मानव कल्याण को केंद्र में रखकर किये गए नवाचार समावेशी प्रगति को बढ़ावा देते हैं।

    समकालीन प्रासंगिकता

    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
      • AI आर्थिक परिवर्तन का वादा करता है, लेकिन गोपनीयता, रोज़गार और निर्णय-निर्माण से जुड़े नैतिक प्रश्न भी उठाता है।
    • जैव-प्रौद्योगिकी
      • आनुवंशिक अभियांत्रिकी बीमारियों का उपचार कर सकती है, लेकिन मानव संवर्द्धन से संबंधित नैतिक दुविधाएँ भी उत्पन्न करती है।
    • जलवायु प्रौद्योगिकी
      • नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़े नवाचारों को वैश्विक सहयोग और पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता द्वारा निर्देशित होना चाहिये।

    नैतिक समन्वय

    • नवाचार संभावनाओं का विस्तार करता है, जबकि बुद्धिमत्ता उनकी सीमाएँ निर्धारित करती है।
    • जब तकनीकी क्षमता नैतिक विवेक से आगे निकल जाती है तो सभ्यताएँ पतन की ओर बढ़ती हैं।
    • सतत प्रगति के लिये रचनात्मकता और ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन आवश्यक है। 

    निष्कर्ष

    सभ्यता का अस्तित्व केवल इस तर्क पर निर्भर नहीं करता कि मानव कितनी तेज़ी से नवाचार करता है, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि वह उन नवाचारों का कितनी बुद्धिमत्ता से संचालन करता है। जब बुद्धिमत्ता प्रगति का मार्गदर्शन करती है तो नवाचार मानव उत्कर्ष का साधन बन जाता है। लेकिन जब नवाचार नैतिक चिंतन के बिना आगे बढ़ता है तो सभ्यता अपनी ही नींव को कमज़ोर करने का जोखिम उठाती है।

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