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प्रश्न :
प्रश्न. “भारत में सतत आपदा जोखिम न्यूनीकरण में सामुदायिक भागीदारी किस प्रकार योगदान देती है?” उपयुक्त उदाहरणों सहित चर्चा कीजिये। (150 शब्द)
18 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आपदा प्रबंधनउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की भूमिका में सतत आपदा जोखिम न्यूनीकरण के सिद्धांतों का संक्षेप में उल्लेख कीजिये।
- मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि भारत में सामुदायिक भागीदारी किस प्रकार सतत आपदा जोखिम न्यूनीकरण में योगदान देती है।
- इसके बाद यह व्याख्या कीजिये कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद भारत में सामुदायिक भागीदारी क्यों अभी भी अपर्याप्त बनी हुई है।
- अंत में, सामुदायिक भागीदारी को सुदृढ़ करने हेतु उपयुक्त उपाय सुझाइये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
भारत में सतत आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) का आधार अनुकूलन, समावेशिता और उपसहायकता के सिद्धांत हैं। यह केवल तात्कालिक और प्रतिक्रियात्मक राहत पर निर्भर रहने की बजाय दीर्घकालिक जोखिम न्यूनीकरण तथा स्थानीय आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देता है। साथ ही, यह वैश्विक सेंडाई फ्रेमवर्क के अनुरूप कार्य करते हुए यह सुनिश्चित करता है कि विकास की प्रक्रिया नई संवेदनशीलताओं को जन्म न दे।
मुख्य भाग:
सतत आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) में सामुदायिक भागीदारी का योगदान
- पारंपरिक ज्ञान का उपयोग: स्थानीय समुदायों के पास जीवनरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्वदेशी ज्ञान होता है।
- उदाहरण के लिये, उत्तराखंड की कोटी बनाल वास्तुकला और कच्छ के भुंगा घर समय-परीक्षित, भूकंप-रोधी संरचनाएँ हैं, जिन्हें अब आधुनिक DRR रणनीतियों में भी सम्मिलित किया जा रहा है।
- अति-स्थानीय प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ: समुदाय ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ की अंतिम कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।
- आपदा मित्र योजना जैसे कार्यक्रम स्वयंसेवकों को वैज्ञानिक चेतावनियों (जैसे- तड़ित या आकाशीय बिजली गिरने की सूचना देने वाला दामिनी ऐप) को समझने और उन्हें स्थानीय बोलियों में प्रसारित करने के लिये प्रशिक्षित करते हैं, जिससे त्वरित निकासी सुनिश्चित हो पाती है।
- प्रथम प्रतिक्रिया और जीवन-रक्षा क्षमता: अध्ययनों से पता चलता है कि अधिकांश आपदा-पीड़ितों को आधिकारिक NDRF टीमों के पहुँचने से पहले पड़ोसियों द्वारा ही बचा लिया जाता है।
- समुदाय-नेतृत्व वाले अभ्यास और ‘मॉक ड्रिल्स’ (DMEx) खोज एवं बचाव कार्यों के लिये आवश्यक व्यावहारिक तैयारी तथा त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता विकसित करते हैं।
- स्थानीय खतरा और संसाधन मानचित्रण: पार्टिसिपेटरी रूरल एप्रेज़ल (PRA) के माध्यम से ग्रामीण समुदाय ग्राम आपदा प्रबंधन योजनाएँ (VDMPs) तैयार करते हैं।
- इस प्रक्रिया में वे विशिष्ट स्थानीय जोखिमों जैसे किसी विशेष कमज़ोर तटबंध या बाढ़-प्रवण विद्यालय भवन की पहचान करते हैं, जिन्हें व्यापक स्तर की योजना प्राय: नज़रअंदाज कर देती है।
- आपदा-पश्चात पुनर्बहाली और सामाजिक पूंजी: सतत पुनर्प्राप्ति सामाजिक नेटवर्क पर निर्भर करती है।
- सामुदायिक भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि पुनर्वास सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त हो और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से बुजुर्गों एवं महिलाओं जैसे सबसे संवेदनशील वर्गों तक प्रभावी रूप से पहुँचे।
आपदा जोखिम न्यूनीकरण में सार्थक सामुदायिक भागीदारी को कमज़ोर करने वाली चुनौतियाँ:
- संस्थागत शीर्ष-से-नीचे (Top-Down) पूर्वाग्रह: ऐतिहासिक रूप से भारत में आपदा प्रबंधन ‘आदेश-और-नियंत्रण’ केंद्रित रहा है।
- यद्यपि वर्ष 2025 के आपदा प्रबंधन (संशोधन) अधिनियम के बाद सुधार हुए हैं, फिर भी व्यवहार में ‘सामुदायिक सशक्तीकरण’ की अपेक्षा ‘निगरानी’ और ‘दिशानिर्देशों’ की भाषा अधिक प्रमुख रहती है।
- ‘निर्भरता सिंड्रोम’: आपदा के बाद बार-बार दी जाने वाली लोकलुभावन राहत योजनाएँ अनजाने में राज्य की अनुग्रह राशि पर निर्भरता की संस्कृति विकसित कर सकती हैं, जिससे समुदाय की स्वयं-वित्तपोषित जोखिम न्यूनीकरण या बीमा में निवेश की प्रेरणा कम हो जाती है।
- सामाजिक-आर्थिक विखंडन: जाति, लैंगिक और वर्ग आधारित पदानुक्रम प्राय: ग्रामसभाओं की निर्णय-प्रक्रिया से वंचित वर्गों को बाहर कर देते हैं, जिससे ‘बहिष्करणात्मक अनुकूलन’ की स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ केवल प्रभावशाली वर्गों को ही संरक्षण मिलता है।
- वित्तीय विकेंद्रीकरण का अभाव: यद्यपि 16वें वित्त आयोग ने अनुदानों में वृद्धि की है, फिर भी अनेक स्थानीय निकायों (PRIs और ULBs) के पास ऐसे ‘अनटाइड फंड्स’ (अप्रतिबंधित निधियों) का अभाव है, जिनसे वे समुदाय द्वारा पहचानी गई विशिष्ट जोखिम न्यूनीकरण परियोजनाओं को लागू कर सकें।
- सूचना विषमता: जलवायु जोखिमों (जैसे- GLOF या हीटवेव) से संबंधित वैज्ञानिक आँकड़े प्राय: स्थानीय भाषा और व्यावहारिक प्रारूप में उपलब्ध नहीं होते, जिससे समुदाय खतरे से अवगत तो होते हैं, परंतु उसके तकनीकी समाधान के संबंध में अनिश्चित रहते हैं।
सामुदायिक भागीदारी को सुदृढ़ करने के उपाय
- ‘युवा आपदा मित्र’ योजना को मुख्यधारा में लाना: सभी आपदा-प्रवण ज़िलों में युवाओं (NCC, NSS, NYKS) को प्रमाणित ‘आपदा मित्र’ के रूप में प्रशिक्षित करने के कार्यक्रम का विस्तार करना, ताकि एक स्थायी और प्रशिक्षित स्थानीय कैडर तैयार हो सके।
- GPDP के साथ अनिवार्य एकीकरण: यह सुनिश्चित करना कि ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (GPDP) में एक समर्पित ‘आपदा अनुकूलन’ घटक अनिवार्य रूप से शामिल हो, जिसकी सामाजिक अंकेक्षण के माध्यम से समुदाय द्वारा समीक्षा की जाए।
- DPI के माध्यम से डिजिटल सशक्तीकरण: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का उपयोग करते हुए एक एकीकृत राष्ट्रीय स्वयंसेवक पोर्टल विकसित करना, जो स्थानीय प्रथम प्रतिक्रियाकर्त्ताओं को रियल-टाइम AI-आधारित निगरानी और संसाधन आवंटन से जोड़े।
- बीमा और पारस्परिक सहायता को प्रोत्साहन: ‘माइक्रो-इंश्योरेंस’ और समुदाय-शासित जोखिम-साझाकरण कोषों को बढ़ावा देना, ताकि त्वरित वित्तीय तरलता उपलब्ध हो सके और धीमी सरकारी राहत पर निर्भरता कम हो।
- समावेशी एवं लैंगिक-केंद्रित शासन: आपदा प्रबंधन समितियों में महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भूमिका को औपचारिक रूप देना, क्योंकि संकट के समय वे प्रायः घरेलू खाद्य और जल सुरक्षा की प्रमुख प्रबंधक होती हैं।
निष्कर्ष
सामुदायिक भागीदारी सतत आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) की ‘मुख्य कड़ी’ है, जो संवेदनशील आबादी को अनुकूल और सक्षम हितधारकों में परिवर्तित करती है। वैज्ञानिक विशेषज्ञता और स्थानीय सहभागिता के बीच अंतर को कम करते हुए भारत ‘शून्य जनहानि’ के अपने लक्ष्य के और निकट पहुँच सकता है तथा सतत विकास लक्ष्यों (SDG 11 एवं 13), अनुकूल मानव बस्तियों और जलवायु कार्रवाई को प्रभावी रूप से प्राप्त कर सकता है।
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