दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. “भारत की विकास प्राथमिकताओं के परिप्रेक्ष्य में जलवायु कार्रवाई तथा पारिस्थितिक स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करने से जुड़ी चुनौतियों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।” (250 शब्द)

    18 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरण

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • उत्तर की शुरुआत विकास और स्थिरता के बीच मौजूद द्वंद्व को उजागर करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि भारत विकास की प्राथमिकताओं को बनाए रखते हुए जलवायु कार्रवाई और पारिस्थितिक स्थिरता के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित कर रहा है।
    • इसके बाद यह बताइये कि अभी कौन-कौन सी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
    • अंत में, इन चुनौतियों से निपटने के लिये उपयुक्त उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, भारत ‘गोल्डीलॉक्स विरोधाभास’ (Goldilocks Paradox) का सामना कर रहा है। इसका अर्थ है कि भारत को करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिये तेज़ी से आर्थिक विकास हासिल करना होगा। साथ-ही-साथ एक ऐसे कम-कार्बन विकास मार्ग का नेतृत्व करना होगा, जो पारिस्थितिक अखंडता सुनिश्चित करे।

    • यह सूक्ष्म संतुलन अब कोई पर्यावरणीय ‘ऐड-ऑन’ नहीं रहा, बल्कि वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र (विकसित भारत) बनने की भारत की यात्रा के लिये एक मूलभूत संरचनात्मक आवश्यकता बन चुका है।

    मुख्य भाग:

    रणनीति: विकास के साथ जलवायु कार्रवाई का एकीकरण

    • ‘पंचामृत’ ढाँचे का संस्थानीकरण: भारत ने अपने वर्ष 2070 के नेट ज़ीरो लक्ष्य और वर्ष 2030 के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को क्रियान्वयन योग्य नीतियों में संहिताबद्ध किया है।
      • भारत ने वर्ष 2030 की समय-सीमा से काफी पहले अपनी स्थापित विद्युत क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है।
    • आर्थिक विकास से उत्सर्जन का विच्छेदन: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और उच्च-दक्षता सौर मॉड्यूल के लिये उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) के माध्यम से भारत एक ‘हरित औद्योगिक क्रांति’ को बढ़ावा दे रहा है।
      • यह सुनिश्चित करता है कि नए विनिर्माण केंद्र नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित हों, जिससे पश्चिमी औद्योगीकरण में देखे गए कार्बन-लॉक-इन से बचा जा सके।
    • मिशन LiFE के माध्यम से व्यावहारिक अर्थशास्त्र: मिशन LiFE के ज़रिये भारत ने जलवायु विमर्श का केंद्र व्यापक नीतियों से बदलकर व्यक्तिगत प्रयासों को बना दिया है।
      • यह परिपत्रता (पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और सचेत उपभोग) पर केंद्रित है, ताकि उच्च विकास का लक्ष्य साधते हुए प्रति व्यक्ति पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जा सके।
    • जलवायु-अनुकूलन अवसंरचना और शहरीकरण: अर्बन चैलेंज फंड और AMRUT 2.0 के माध्यम से भारत अपने अवसंरचना विस्तार में प्रकृति-आधारित समाधानों (जैसे- ‘स्पंज सिटी’ और शहरी वन) को एकीकृत कर रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वर्ष 2025-26 के लिये भारत के पूंजीगत व्यय में जलवायु जोखिम का दृष्टिकोण शामिल हो।
    • सतत कृषि और खाद्य सुरक्षा: पीएम-कुसुम (सिंचाई का सौरकरण) और राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन जैसे कार्यक्रम किसानों को जलवायु जोखिमों को कम करने में सहायता करते हैं।
      • ‘ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग’ (शून्य बजट प्राकृतिक कृषि) और जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों पर ध्यान केंद्रित करना यह सुनिश्चित करता है कि पैदावार बढ़ाने के लिये पारिस्थितिक स्वास्थ्य (मृदा और जल) से समझौता न किया जाए।

    निरंतर बनी हुई चुनौतियाँ:

    • नवीकरणीय ऊर्जा की पहुँच में कमी: सौर ऊर्जा उत्पादन केवल दिन के उजाले तक सीमित है, जबकि पवन ऊर्जा का उत्पादन मौसमी तथा भौगोलिक रूप से असमान है।
      • लागत-प्रभावी, ग्रिड-स्तरीय बैटरी भंडारण प्रणालियों के अभाव में यह परिवर्तनशीलता विद्युत आपूर्ति और चौबीसों घंटे औद्योगिक मांग के बीच एक संरचनात्मक असंतुलन उत्पन्न करती है।
    • राजकोषीय और वित्तीय बाधाएँ: हरित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण के लिये खरबों डॉलर के निवेश की आवश्यकता है।
      • नीति आयोग के अनुसार, वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिये भारत को लगभग 21 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी।
      • वर्तमान वैश्विक पूंजी प्रवाह ‘अपर्याप्त’ हैं और घरेलू संसाधन प्राय: स्वास्थ्य, आवास तथा सामाजिक सुरक्षा जाल जैसी तात्कालिक विकासात्मक आवश्यकताओं की ओर परिवर्तित कर दिये जाते हैं।
    • स्थानिक और क्षेत्रगत असमानताएँ: कोयला अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक निर्भर राज्य (कोल बेल्ट) एक स्पष्ट 'जस्ट ट्रांज़िशन' (न्यायसंगत संक्रमण) ढाँचे के बिना आर्थिक पतन के जोखिम का सामना कर रहे हैं, जो लाखों श्रमिकों के लिये वैकल्पिक आजीविका सुनिश्चित कर सके।
    • पारिस्थितिक क्षरण बनाम अवसंरचना आवश्यकताएँ: ग्रेट निकोबार विकास परियोजना या हिमालयी राजमार्ग विस्तार जैसी उच्च-प्राथमिकता वाली विकास परियोजनाएँ प्राय: ‘पारिस्थितिक समझौते’ को जन्म देती हैं, जहाँ रणनीतिक विकास के नाम पर जैव-विविधता की हानि और वनों का विखंडन होता है।
    • संघवाद में ‘रेस टू द बॉटम’ की प्रवृत्ति: जब राज्य निवेश आकर्षित करने के लिये प्रतिस्पर्द्धा (प्रतिस्पर्द्धी संघवाद) करते हैं, तो पर्यावरणीय नियमों को शिथिल करने या ‘सनराइज़’ उद्योगों को आकर्षित करने के लिये अस्थिर सब्सिडी देने का जोखिम उत्पन्न होता है, जो दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्वास्थ्य को कमज़ोर कर सकता है।

    चुनौतियों से निपटने के उपाय:

    • हरित वित्त वर्गीकरण को अंतिम रूप देना: भारत को हरित वित्त के लिये एक स्पष्ट एवं सुदृढ़ नियामक ढाँचे को शीघ्र अंतिम रूप देना चाहिये, ताकि ‘ग्रीनवॉशिंग’ को रोका जा सके और हरित हाइड्रोजन तथा दीर्घ-अवधि ऊर्जा भंडारण (LDES) जैसी उच्च-जोखिम जलवायु प्रौद्योगिकियों के लिये आवश्यक विशिष्ट निजी पूंजी को आकर्षित किया जा सके।
    • राष्ट्रीय कार्बन बाज़ार को क्रियाशील बनाना: वर्ष 2026 के मध्य तक कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को पूर्णतः लागू किया जाना चाहिये, जिससे उच्च-कार्बन उत्पादन को हतोत्साहित करने और औद्योगिक क्षेत्र में पारिस्थितिक दक्षता को प्रोत्साहित करने वाला मूल्य प्रेरक संकेत उपलब्ध हो सके।
    • ‘जस्ट ट्रांज़िशन’ तंत्र को सुदृढ़ करना: कोयला-आधारित क्षेत्रों के पुनर्वास के लिये ‘ग्रीन स्किल’ विकास और विशेषीकृत आर्थिक क्षेत्रों के माध्यम से एक राष्ट्रीय नीति विकसित करना आवश्यक है, ताकि संवेदनशील समुदायों का सामाजिक-आर्थिक विस्थापन रोका जा सके।
    • प्रकृति-आधारित समाधानों (NBS) को मुख्यधारा में लाना: MISHTI (मैंग्रोव पहल) और अमृत धरोहर (आर्द्रभूमि संरक्षण) जैसी पहलों को राष्ट्रीय अवसंरचना योजना में विस्तारित करने से कम लागत पर अनुकूलन एवं कार्बन अवशोषण संभव होगा, साथ ही जैव-विविधता की रक्षा भी सुनिश्चित होगी।
    • संघीय जलवायु शासन को सशक्त बनाना: राज्यों को राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (SAPCC) लागू करने के लिये समर्पित वित्तपोषण और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों के साथ सशक्त करने से यह सुनिश्चित होगा कि जलवायु कार्रवाई स्थानीय स्तर पर, स्थानीय भागीदारी के साथ प्रभावी रूप से लागू हो सके।

    निष्कर्ष:

    भारत की विकास गाथा विशिष्ट रूप से उसकी इस क्षमता से जुड़ी हुई है कि वह ‘विकास के अधिकार’ को ‘संरक्षण के कर्त्तव्य’ के साथ किस हद तक समन्वित कर पाता है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) और परिपत्र अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए भारत, SDG-13 (जलवायु कार्रवाई) को प्राप्त कर सकता है, वह भी SDG-1 (गरीबी उन्मूलन) से समझौता किये बिना। अंततः, सफलता एक ‘मानव-केंद्रित’ संक्रमण में निहित है, जो भावी पीढ़ियों के लिये पारिस्थितिक साझा संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ अनुकूलन, समानता और समावेशन को प्राथमिकता देता है।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
Share Page
images-2
images-2