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प्रश्न :
प्रश्न: भारत में पर्यावरणीय क्षरण का मुद्दा आजीविका, स्वास्थ्य और सामाजिक समानता के मुद्दों से गहराई से जुड़ा हुआ है। सतत तथा समावेशी विकास को प्रोत्साहित करने में पर्यावरण संरक्षण उपायों की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
29 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरणउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत पर्यावरणीय स्थिरता और सतत जीवन को उजागर करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में समझाएँ कि पर्यावरणीय क्षरण किस प्रकार आजीविका, स्वास्थ्य और सामाजिक समानता से जुड़ा हुआ है।
- भारत में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुख्य मुद्दों को उजागर कीजिये।
- सतत और समावेशी विकास के साधन के रूप में मज़बूत पर्यावरण संरक्षण उपायों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
भारत में पर्यावरणीय स्थिरता को अब अधिकतर सतत जीवन के दृष्टिकोण से देखा जाता है, जहाँ पारिस्थितिक संरक्षण, आर्थिक आजीविका और सामाजिक न्याय गहरे रूप से परस्पर जुड़े हुए हैं।
तीव्र विकास, संसाधनों का अति-उपयोग और जलवायु दबाव ने यह दिखाया है कि पर्यावरणीय क्षरण सीधे तौर पर गरीबों, अनौपचारिक कर्मचारियों, महिलाओं और कमज़ोर समुदायों को प्रभावित करता है।
इसलिये पर्यावरण संरक्षण केवल एक पारिस्थितिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि समावेशी और सतत विकास की दिशा में एक मार्ग भी है।
मुख्य भाग:
पर्यावरणीय क्षरण और आजीविका के बीच संबंध
- संसाधन क्षरण और आजीविका असुरक्षा: वन, जलाशय और मृदा का क्षरण प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर आजीविकाओं को कमज़ोर करता है। जब पारितंत्र का क्षरण होता है तो किसानों, मछुआरों और वनवासियों की आय सबसे पहले प्रभावित होती है।
- उदाहरण के लिये, पंजाब और हरियाणा में भूजल का अत्यधिक दोहन सिंचाई लागत बढ़ा चुका है तथा कृषि की स्थिरता को कम कर दिया है, जिससे छोटे किसानों पर असमान प्रभाव पड़ा है।
- जलवायु परिवर्तन और अनौपचारिक रोज़गार: असमान वर्षा, सूखा और बाढ़ कृषि, निर्माण तथा संबंधित क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं, जहाँ अनौपचारिक रोज़गार अधिक हैं।
- मराठवाड़ा में लगातार सूखे के कारण फसलें नष्ट हुई हैं और कृषि मज़दूरों का मौसमी पलायन बढ़ गया है।
- पारंपरिक और स्वदेशी आजीविकाओं का नुकसान: पर्यावरणीय क्षरण पारंपरिक ज्ञान प्रणाली और व्यवसायों को कमज़ोर करता है।
- केंद्रीय भारत में खनन और वनों की कटाई के कारण अल्प वन उत्पादों की उपलब्धता घट गई है, जिससे जनजातीय समुदायों की आजीविकाएँ प्रभावित हुई हैं।
पर्यावरणीय क्षरण और स्वास्थ्य के बीच संबंध
- वायु प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बोझ: खराब वायु गुणवत्ता श्वसन और हृदय रोगों को बढ़ाता है, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों में।
- दिल्ली जैसे शहरों में हर सर्दी के मौसम में गंभीर वायु प्रदूषण की घटनाएँ दर्ज की जाती हैं, जिससे अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ जाती है और उत्पादकता पर असर पड़ता है।
- जल प्रदूषण और रोग प्रसार: दूषित जल स्रोत जलजनित रोग फैलाते हैं, जिससे पोषण और श्रम उत्पादकता प्रभावित होती है।
- गंगा बेसिन में औद्योगिक अपशिष्ट ने तटीय और डाउनस्ट्रीम समुदायों में अतिसार जैसे रोगों के फैलाव में योगदान दिया है।
- इसके अलावा, इंदौर में हाल ही में पेयजल संदूषण संकट ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर किया है।
- जलवायु चरम स्थितियाँ और स्वास्थ्य संवेदनशीलता: हीटवेव, बाढ़ और चक्रवात मृत्यु दर बढ़ाते हैं तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव डालते हैं।
- उत्तर भारत में वर्ष 2024 की हीटवेव ने कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (शीतलन बुनियादी ढाँचे) की कमी के कारण बाहर कार्य करने वाले मज़दूरों को 'हीट स्ट्रेस' (गर्मी के तनाव) के जोखिम में डाल दिया।
पर्यावरणीय क्षरण और सामाजिक समानता के बीच संबंध
- संवेदनशील समूहों पर असमान प्रभाव: पर्यावरणीय क्षति गरीबों को अधिक प्रभावित करती है, क्योंकि उनकी सहनशीलता सीमित होती है और वे असुरक्षित आवासीय परिस्थितियों में रहते हैं।
- शहरी झुग्गी-झोंपड़ी के निवासी, जो अपशिष्ट ढेर या नालों के पास रहते हैं, प्रदूषण और बाढ़ के उच्च जोखिम के संपर्क में रहते हैं।
- पर्यावरणीय तनाव के लैंगिक-विशिष्ट प्रभाव: जल की कमी, ईंधन लकड़ी एकत्र करने और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण महिलाओं पर देखभाल का अतिरिक्त भार पड़ता है।
- राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में महिलाएँ जल के लिये लंबी दूरी तय करती हैं, जिससे उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- पर्यावरणीय अन्याय और हाशिये पर रहने वाले समुदाय: औद्योगिक और अपशिष्ट निपटान स्थल प्राय: हाशिये पर रहने वाले समुदायों के पास स्थित होते हैं।
- उदाहरण के लिये, सिंगरौली औद्योगिक क्षेत्र के आसपास के समुदाय आज भी प्रदूषण-संबंधी स्वास्थ्य और आजीविका हानि का सामना कर रहे हैं।
भारत के पर्यावरण संरक्षण उपायों से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ
- पर्यावरणीय कानूनों का कमज़ोर प्रवर्तन: मज़बूत कानून होने के बावजूद, क्षमता की कमी और नियामकीय प्रभाव के कारण उनका क्रियान्वयन असंगत बना हुआ है।
- उदाहरण के लिये, न्यायालयी आदेशों के बावजूद यमुना जैसी नदियों के किनारे अवैध रेत खनन जारी है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुँच रही है।
- स्थानीय प्राधिकरणों के पास उल्लंघनों की प्रभावी निगरानी के लिये प्राय: पर्याप्त जनशक्ति नहीं होती।
- उदाहरण के लिये, न्यायालयी आदेशों के बावजूद यमुना जैसी नदियों के किनारे अवैध रेत खनन जारी है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र को क्षति पहुँच रही है।
- विकास–पर्यावरण संतुलन की चुनौती: आर्थिक प्राथमिकताएँ कभी-कभी पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों पर भारी पड़ जाती हैं।
- हिमालयी क्षेत्रों जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील ज़ोन में सड़क विस्तार जैसी अवसंरचना परियोजनाओं से भूस्खलन के जोखिम बढ़े हैं।
- प्राय: पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ पर्याप्त समग्र प्रभाव आकलन के बिना ही शीघ्रता से प्रदान कर दी जाती हैं।
- संस्थागत विखंडन: एक जैसे अधिकार क्षेत्र वाली कई एजेंसियाँ होने से समन्वय और जवाबदेही कमज़ोर पड़ती है।
- शहरी वायु प्रदूषण प्रबंधन में परिवहन, उद्योग और नगर निकायों के बीच समुचित तालमेल न होने से एकीकृत समाधान में देरी होती है।
- सीमित सामुदायिक भागीदारी: ऊपर से नीचे (Top-down) बनाई गई पर्यावरणीय नीतियाँ स्थानीय ज्ञान और आवश्यकताओं की अनदेखी कर सकती हैं।
- संरक्षण के नाम पर वन समुदायों का पर्याप्त परामर्श के बिना पुनर्वास आजीविका संकट उत्पन्न करता है, जिससे जनता का विश्वास और अनुपालन कम होता है।
समावेशी विकास के साधन के रूप में सशक्त पर्यावरण संरक्षण उपाय
- पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण के माध्यम से आजीविकाओं को सुरक्षित करना: वनों, आर्द्रभूमियों और तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर आजीविकाओं को बनाए रखती है तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करती है।
- संरक्षण-आधारित दृष्टिकोण संसाधन क्षरण को कम करते हैं और संवेदनशील समुदायों के लिये आय की स्थिरता बढ़ाते हैं।
- उदाहरण के लिये, कुछ राज्यों में संयुक्त वन प्रबंधन ने वन आवरण में सुधार किया है और जनजातीय परिवारों के लिये अल्प वन उत्पादों से आय बढ़ाई है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य और उत्पादकता में सुधार: प्रदूषण नियंत्रण और स्वच्छ ऊर्जा पहलें रोग-भार तथा स्वास्थ्य-देखभाल लागत को घटाती हैं, जिससे श्रमशक्ति की उत्पादकता एवं जीवन-गुणवत्ता बेहतर होती है।
- इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण सामाजिक और आर्थिक दोनों प्रकार के लाभ प्रदान करता है।
- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने गरीब परिवारों में स्वच्छ रसोई ईंधन को बढ़ावा देकर घर के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण को कम किया है, जिससे विशेष रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य को लाभ पहुँचा है।
- प्राकृतिक संसाधनों तक समान पहुँच को बढ़ावा देना: पर्यावरणीय विनियमन वायु, जल और वनों जैसे साझा संसाधनों तक न्यायसंगत पहुँच सुनिश्चित करता है, जिससे अभिजात वर्ग के एकाधिकार तथा पर्यावरणीय अन्याय को रोका जा सके।
- समावेशी शासन हाशिये पर रहने वाले समुदायों को असमान पारिस्थितिक क्षति से बचाता है।
- उदाहरण के लिये, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) के मानदंड संवेदनशील तटरेखाओं पर व्यावसायिक अतिक्रमण को सीमित करके पारंपरिक मछुआरा समुदायों की रक्षा करते हैं।
- जलवायु-सहिष्णु और समावेशी विकास को सक्षम बनाना: जलवायु शमन और अनुकूलन उपाय गरीब व जलवायु-संवेदनशील आबादी की असुरक्षा को कम करते हैं तथा सतत विकास के मार्गों का समर्थन करते हैं।
- प्रकृति-आधारित समाधान अनुकूलन बढ़ाते हुए हरित रोज़गार सृजित करते हैं।
- उदाहरण के लिये, ओडिशा के केंद्रापाड़ा में मैंग्रोव पुनर्स्थापन ने स्थानीय आजीविकाओं को सहारा दिया है।
निष्कर्ष
पर्यावरण संरक्षण उपाय भारत की आजीविका, स्वास्थ्य और सामाजिक समानता से जुड़ी परस्पर गुंथी हुई चुनौतियों से निपटने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। पारिस्थितिक स्थिरता को मानव कल्याण के साथ जोड़कर भारत ऐसा विकास मार्ग अपना सकता है जो समावेशी भी हो और अनुकूल भी। ऐसे उपायों को सुदृढ़ करना सतत विकास लक्ष्य—SDG 1 (गरीबी उन्मूलन), SDG 3 (अच्छा स्वास्थ्य) और SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) की दिशा में प्रगति को तीव्र करता है तथा सभी के लिये एक सतत भविष्य सुनिश्चित करता है।
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