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प्रश्न :
प्रश्न: भारत ने व्यापक नागरिक अनुप्रयोगों के साथ एक सुदृढ़ और लागत प्रभावी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारितंत्र विकसित किया है। इस संदर्भ में, सामाजिक-आर्थिक विकास में भारत के अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों के योगदान का आकलन कीजिये। (250 शब्द)
29 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 विज्ञान-प्रौद्योगिकीउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत भारत के अंतरिक्ष पारितंत्र को उजागर करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में भारत के अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारितंत्र पर विस्तार से चर्चा कीजिये।
- इसके बाद बताइये कि ये भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में किस प्रकार योगदान देते हैं।
- इनके अनुकूलन और उपयोग में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
- इनके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को बढ़ाने हेतु उपाय सुझाइये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
भारत ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नेतृत्व में स्वदेशी, सुदृढ़ और किफायती अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारितंत्र विकसित किया है, जिसमें मितव्ययी नवाचार को सामाजिक उद्देश्यों के साथ जोड़ा गया है।
- कई देशों के अंतरिक्ष कार्यक्रम जहाँ मुख्यतः रणनीतिक या अन्वेषणात्मक लक्ष्यों पर केंद्रित रहे हैं, वहीं भारत के अंतरिक्ष प्रयासों को जानबूझकर नागरिक उपयोग, विकासात्मक योजना और सार्वजनिक सेवा वितरण के लिये अभिकल्पित किया गया है, जिससे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी सामाजिक-आर्थिक विकास को सक्षम बनाने वाला एक महत्त्वपूर्ण साधन बन गई है।
मुख्य भाग:
भारत का अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारितंत्र
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है, जो सीधे नागरिक आबादी की सेवा करते हैं—
- INSAT/GSAT शृंखला: यह संचार और प्रसारण सेवाओं पर केंद्रित है।
- IRS (इंडियन रिमोट सेंसिंग) शृंखला: यह प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन हेतु विश्व के सबसे बड़े उपग्रह समूहों में से एक है।
- NavIC (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन): स्वतंत्र क्षेत्रीय स्थिति निर्धारण सेवाएँ प्रदान करता है।
सामाजिक-आर्थिक योगदान
- कृषि और खाद्य सुरक्षा
- फसल पूर्वानुमान: FASAL (अंतरिक्ष, कृषि-मौसम विज्ञान और भूमि आधारित प्रेक्षणों का उपयोग करके कृषि उत्पादन का पूर्वानुमान) परियोजना कटाई से पहले फसल उत्पादन का अनुमान प्रदान करती है, जिससे सरकार को निर्यात-आयात संबंधी निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
- सटीक कृषि (Precision Farming): अंतरिक्ष आँकड़ों की सहायता से मृदा के स्वास्थ्य का मानचित्रण तथा सूखा निगरानी की जाती है (राष्ट्रीय कृषि सूखा आकलन एवं निगरानी प्रणाली के माध्यम से)।
- मत्स्य पालन: संभाव्य मत्स्यन क्षेत्र (PFZ) की सलाह, जो समुद्र के रंग और तापमान के डेटा पर आधारित होती है, मछुआरों को उनके 'खोज समय' को कम करने में सहायता करती है, जिससे ईंधन की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।
- आपदा प्रबंधन और अनुकूलन
- भारत की अंतरिक्ष संपत्तियों ने ‘प्रतिक्रियात्मक राहत’ से आगे बढ़कर ‘पूर्व-निवारक शमन’ की दिशा में दृष्टिकोण बदल दिया है।
- प्रारंभिक चेतावनी: SCATSAT-1 जैसे उपग्रह चक्रवातों की वास्तविक-समय निगरानी प्रदान करते हैं। हाल ही में चक्रवात रेमल (2024) के दौरान सटीक ट्रैकिंग से लाखों लोगों को सफलतापूर्वक सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया, जिससे जनहानि न्यूनतम रही।
- बाढ़ मानचित्रण: मानसून के समय भुवन (Bhuvan) पोर्टल राज्य प्राधिकारियों को उच्च-रिज़ॉल्यूशन जलमग्नता मानचित्र उपलब्ध कराता है, जिससे लक्षित बचाव अभियानों में सहायता मिलती है।
- सामाजिक अवसंरचना: शिक्षा और स्वास्थ्य
- दूरस्थ शिक्षा (टेली-एजुकेशन): EDUSAT कार्यक्रम ने प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों को ग्रामीण विद्यालयों और ‘वर्चुअल कक्षाओं’ से जोड़कर दूरस्थ शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन किया, जिससे शहरी-ग्रामीण शैक्षणिक अंतर को कम करने में सहायता मिली।
- दूरस्थ चिकित्सा (टेली-मेडिसिन): ISRO ने दूरदराज़ के अस्पतालों (जैसे लेह-लद्दाख या अंडमान-निकोबार) को महानगरों के सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों से जोड़ने वाला एक नेटवर्क स्थापित किया है, जिससे वंचित आबादी को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित हुई है।
- शासन और ग्रामीण विकास
- संपत्ति मानचित्रण: पारदर्शिता सुनिश्चित करने और धन की हेराफेरी रोकने के लिये Geo-MGNREGA जियोपोर्टल पर 6.24 करोड़ से अधिक परिसंपत्तियों/गतिविधियों को जियो-टैग किया गया है।
- SVAMITVA योजना: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और ड्रोन का उपयोग ग्रामीण आबादी वाली भूमि के मानचित्रण हेतु किया जाता है, जिससे गाँव के परिवारों को ‘अधिकार अभिलेख’ प्रदान किये जाते हैं तथा भूमि विवादों में कमी आती है।
- आर्थिक वृद्धि और ‘न्यू स्पेस’ युग
- IN-SPACe और NSIL की स्थापना के साथ भारत वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी 2% हिस्सेदारी से बढ़कर वर्ष 2030 तक 10% के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, जिससे स्टार्टअप पारितंत्र (जैसे स्काईरूट, अग्निकुल) को बढ़ावा मिल रहा है तथा उच्च-कौशल रोज़गार के अवसर सृजित हो रहे हैं।
अनुकूलन और उपयोग में प्रमुख चुनौतियाँ
- शासन प्रणालियों के साथ अंतिम-छोर एकीकरण की कमी: उच्च-गुणवत्ता उपग्रह आँकड़ों की उपलब्धता के बावजूद, संस्थागत अलगाव के कारण ज़िला और नगरपालिका स्तर पर नियमित निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में उनका समुचित समावेश अब भी कमज़ोर बना हुआ है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2015 की चेन्नई बाढ़ के बाद उपग्रह-आधारित बाढ़-मैदान और जल-निकासी मानचित्र उपलब्ध थे, फिर भी अतिक्रमित आर्द्रभूमियों पर शहरी नियोजन की स्वीकृतियाँ जारी रहीं, जिससे बार-बार बाढ़ की स्थिति बनी रही। यह प्रशासनिक स्तर पर अंतरिक्ष-आधारित सूचनाओं के कमज़ोर उपयोग को दर्शाता है।
- डेटा की पहुँच और किसानों के स्तर पर जागरूकता की कमी: अंतरिक्ष-आधारित परामर्श प्राय: अंतिम उपभोक्ताओं तक व्यावहारिक (कार्यान्वयन योग्य) रूप में नहीं पहुँच पाते, जिससे उनका विकासात्मक प्रभाव सीमित हो जाता है।
- हालाँकि ISRO का FASAL कार्यक्रम फसल और सूखा आकलन प्रदान करता है, फिर भी अनेक छोटे किसान उपग्रह-आधारित परामर्शों से अनभिज्ञ रहते हैं तथा पारंपरिक वर्षा-अनुमानों पर ही निर्भर रहते हैं।
- स्थानीय स्तर पर कौशल और क्षमता की सीमाएँ: राज्य और ज़िला स्तर पर उपग्रह आँकड़ों की व्याख्या तथा उन्हें व्यवहार में लाने के लिये प्रशिक्षित कर्मियों की कमी है।
- उदाहरण के लिये, पूर्वोत्तर भारत के कई ज़िला नियोजन कार्यालयों में प्रशिक्षित GIS विश्लेषकों का अभाव है, जिसके कारण बार-बार आपदाएँ आने के बावजूद भूस्खलन जोखिम मानचित्रण में उपग्रह-आधारित सूचनाओं का समुचित उपयोग नहीं हो पाता।
- डिजिटल और अवसंरचना विभाजन: उपग्रह-सक्षम सेवाओं के लिये सहायक डिजिटल अवसंरचना की आवश्यकता होती है, जो विभिन्न क्षेत्रों में अभी भी असमान रूप से विकसित है।
- ओडिशा एवं छत्तीसगढ़ के जनजातीय ज़िलों में उपग्रह-आधारित दूरस्थ शिक्षा तथा दूरस्थ चिकित्सा पहलों का समुदाय स्तर पर सीमित उपयोग हुआ, क्योंकि बिजली विद्युत आपूर्ति और इंटरनेट पहुँच असंगत थी।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव बढ़ाने के उपाय
- शासन में अंतरिक्ष डेटा को मुख्यधारा में लाना: राज्य और ज़िला स्तर पर नियमित योजना, बजट तथा निगरानी प्रक्रियाओं में उपग्रह विश्लेषण को समेकित करना।
- क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करना: अधिकारियों, किसानों और उद्यमियों के लिये भौगोलिक सूचना तथा उपग्रह अनुप्रयोगों में प्रशिक्षण का विस्तार करना।
- सार्वजनिक-निजी सहयोग को प्रोत्साहित करना: निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को उपयोगकर्त्ता-अनुकूल, क्षेत्र-विशिष्ट अंतरिक्ष समाधान विकसित करने के लिये प्रोत्साहित करना।
- डेटा पहुँच और अनुकूलन में सुधार: कृषि, स्वास्थ्य और शहरी शासन के लिये अनुकूलित आउटपुट वाले खुले तथा इंटरऑपरेबल प्लेटफॉर्म बनाना।
- अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को डिजिटल इंडिया लक्ष्यों से जोड़ना: उपग्रह सेवाओं को ब्रॉडबैंड, मोबाइल प्लेटफॉर्म और AI के साथ संयोजित करके अंतिम-छोर सेवा वितरण को अधिकतम करना।
निष्कर्ष
भारत के अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों ने कृषि उत्पादन, आपदा अनुकूलन, डिजिटल समावेशन और नवाचार को बढ़ावा देकर सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। यद्यपि एकीकरण और क्षमता से जुड़ी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन शासन एवं बाज़ारों में अंतरिक्ष अनुप्रयोगों को गहराई से मुख्यधारा में लाने से भारत का अंतरिक्ष पारितंत्र समावेशी व सतत विकास के एक शक्तिशाली संचालक में बदल सकता है।
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