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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    निबंध विषय

    प्रश्न 1. यदि प्रौद्योगिकी सशक्तीकरण प्रदान करती है, लेकिन संस्थाएँ शासन को मानवीय रूप देती हैं।
    प्रश्न 2. उद्देश्यहीन प्रगति अर्थहीन गति के समान है।

    10 Jan, 2026 निबंध लेखन निबंध

    उत्तर :

    1. यदि प्रौद्योगिकी सशक्तीकरण प्रदान करती है, लेकिन संस्थाएँ शासन को मानवीय रूप देती हैं।

    निबंध को समृद्ध करने हेतु उद्धरण

    • मैक्स वेबर: “हमारे समय का भाग्य तर्कसंगतीकरण और बौद्धिकरण द्वारा चिह्नित है।”
    • अमर्त्य सेन: “विकास का अर्थ उन वास्तविक स्वतंत्रताओं का विस्तार करना है जिनका लोग आनंद लेते हैं।”
    • पीटर ड्रकर: “भविष्य की भविष्यवाणी करने का सबसे अच्छा तरीका इसे बनाना है।”
    • हैना अरेंट: “नौकरशाही किसी का भी शासन नहीं होती।”

    भूमिका: कथन की व्याख्या

    • डिजिटल युग ने प्रौद्योगिकी के माध्यम से गति, व्यापकता और सटीकता को बढ़ाकर शासन व्यवस्था को रूपांतरित किया है।
      • हालाँकि शासन केवल प्रभावी सेवा-प्रदान तक सीमित नहीं होता; यह निष्पक्षता, विश्वास, जवाबदेही और मानवीय गरिमा से भी जुड़ा होता है।
    • यह कथन एक महत्त्वपूर्ण संतुलन को रेखांकित करता है जहाँ प्रौद्योगिकी शासन को यांत्रिक रूप से सशक्त बनाती है, वहीं संस्थाएँ उसे नैतिक रूप से मानवीय बनाती हैं।
      • जैसा कि मैक्स वेबर ने चेताया था, मूल्यों के बिना दक्षता शासन को जनसेवा के बजाय मात्र प्रशासन तक सीमित कर देने का जोखिम उत्पन्न करती है।

    शासन में सशक्तीकरण की शक्ति के रूप में प्रौद्योगिकी

    • दक्षता, व्यापकता और पहुँच
      • डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने एक साथ करोड़ों लोगों तक पहुँच बनाने की राज्य की क्षमता को विस्तार दिया है।
      • भारत की JAM ट्रिनिटी (जनधन-आधार-मोबाइल) ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) को संभव बनाया है, जिससे रिसाव में उल्लेखनीय कमी आई है।
        • विश्व बैंक के अनुसार, वर्ष 2014 से अब तक दोहराव और फर्जी लाभार्थियों में कमी के माध्यम से भारत में DBT से लगभग ₹3.48 लाख करोड़ की बचत हुई है।
    • पारदर्शिता और डेटा-आधारित निर्णय-निर्माण
      • ई-गवर्नेंस पोर्टल, रियल-टाइम डैशबोर्ड और GIS मैपिंग निगरानी तथा लक्ष्य निर्धारण को बेहतर बनाते हैं।
      • CoWIN जैसे प्लेटफॉर्म ने 2.2 बिलियन से अधिक कोविड-19 वैक्सीन खुराकों के वितरण को सुगम बनाया, जो व्यापक स्तर पर प्रौद्योगिकीय सशक्तीकरण का उदाहरण है।
    • नागरिक सुविधा
      • ऑनलाइन सेवाएँ लेन-देन की लागत, समय की देरी और नौकरशाही विवेकाधिकार को कम करती है।
      • डिजिटल भूमि अभिलेख, कर-फाइलिंग पोर्टल और शिकायत निवारण मंच राज्य के साथ नागरिकों की सहभागिता को सरल बनाते हैं।
      • उदाहरणस्वरूप, DILRMP एवं SVAMITVA के अंतर्गत 6.26 लाख गाँवों को शामिल करते हुए 95% से अधिक ग्रामीण भूमि अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण किया जा चुका है।

    प्रौद्योगिकी-आधारित शासन की सीमाएँ

    • बहिष्करण और डिजिटल विभाजन
      • NFHS-5 के अनुसार, केवल 33.3% महिलाएँ ही इंटरनेट का उपयोग कर पाई हैं, जबकि पुरुषों में यह आँकड़ा 57.1% है।
      • डिजिटल प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता से बुज़ुर्गों, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और डिजिटल रूप से निरक्षर आबादी के बहिष्कृत होने का जोखिम बढ़ जाता है।
    • एल्गोरिदमिक कठोरता
      • स्वचालित कल्याण प्रणालियाँ मामूली डेटा असंगतियों के कारण भी लाभ से वंचित कर सकती हैं।
      • प्रौद्योगिकी में असाधारण परिस्थितियों में सहानुभूति और संदर्भ-आधारित समझ का अभाव होता है।
    • जवाबदेही में अंतराल
      • एल्गोरिदम के कारण ज़िम्मेदारी बँट जाती है, जिससे गलतियाँ होने पर जवाबदेह व्यक्ति को ढूँढना मुश्किल हो जाता है।
      • सुशासन का आधार केवल तकनीकी शुद्धता नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी भी है।

    शासन की मानवीय अभिव्यक्ति के रूप में संस्थाएँ

    • नियम-आधारित किंतु विवेकपूर्ण
      • सिविल सेवाएँ, न्यायपालिका तथा स्थानीय सरकारें जैसे संस्थान नियमों की व्याख्या संवेदनशीलता के साथ करते हैं।
      • मानवीय विवेक आपदा राहत, सामाजिक कल्याण और शिकायत निवारण जैसे क्षेत्रों में आवश्यक अनुकूलन प्रदान करता है।
    • विश्वास और वैधता
      • संस्थाएँ निरंतरता, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व के माध्यम से विश्वास का निर्माण करती हैं।
      • उदाहरणस्वरूप, पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम सभाएँ स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित सहभागी निर्णय-निर्माण को सक्षम बनाती हैं।
    • जवाबदेही और नैतिक पर्यवेक्षण
      • निर्वाचन आयोग और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) जैसी स्वतंत्र संस्थाएँ केवल तकनीकी उपकरणों से परे जाकर शासन की निष्पक्षता सुनिश्चित करती हैं।
      • सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम नागरिकों को केवल तकनीकी नियंत्रण के बजाय संस्थागत पारदर्शिता के माध्यम से सशक्त बनाता है।

    संस्थागत मूल्यों की सेवा में प्रौद्योगिकी : परस्पर पूरकता

    • सक्षम बनाने वाला माध्यम, विकल्प नहीं
      • संस्थाएँ वह नैतिक ढाँचा प्रदान करती हैं जिसके भीतर प्रौद्योगिकी कार्य करती है।
      • उदाहरणस्वरूप, डिजिटल कोर्ट न्याय तक पहुँच को सरल बनाती हैं, किंतु न्यायिक विवेक और अनुभव का कोई विकल्प नहीं हो सकता।
    • संकर (हाइब्रिड) शासन मॉडल
      • मिशन मोड प्रोजेक्ट प्रौद्योगिकी को संस्थागत पर्यवेक्षण के साथ एकीकृत करती हैं।
      • शिकायत निवारण पोर्टल तभी प्रभावी होते हैं जब उनके पीछे उत्तरदायी अधिकारी और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित हो।
    • संकट प्रबंधन
      • कोविड-19 के दौरान प्रौद्योगिकी ने निगरानी और आपूर्ति को संभव बनाया, किंतु संस्थागत संवेदनशीलता जैसे खाद्य वितरण और दस्तावेज़ी मानकों में छूट ने शासन को मानवीय स्वरूप प्रदान किया।

    वैश्विक एवं तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य

    • एस्टोनिया का डिजिटल राज्य
      • एस्टोनिया का ई-गवर्नेंस मॉडल उच्च स्तर की दक्षता का प्रदर्शन करता है, किंतु इसकी सफलता का आधार सशक्त संस्थागत विश्वास है।
      • संस्थागत अखंडता के अभाव में डिजिटल प्रणालियाँ सेवा के साधन के बजाय निगरानी के उपकरण बन जाने का जोखिम रखती हैं।
    • विकासशील विश्व का संदर्भ
      • कम संस्थागत क्षमता वाले राज्यों में संस्थाओं के बिना प्रौद्योगिकी का उपयोग प्रायः असमानता और बहिष्करण को और गहरा कर देता है।
      • UNDP इस तर्क पर ज़ोर देता है कि संस्थागत मज़बूती ही यह निर्धारित करती है कि डिजिटल शासन नागरिकों को सशक्त करेगा या उनसे विमुख कर देगा।

    नैतिक समन्वय

    • प्रौद्योगिकी ‘कितनी तेज़ी से’ और ‘कितना अधिक’ जैसे प्रश्नों का उत्तर देती है।
    • संस्थाएँ ‘कितना न्यायसंगत’ और ‘कितना मानवीय’ जैसे प्रश्नों का समाधान करती हैं।
    • जब दक्षता को सहानुभूति और जवाबदेही का मार्गदर्शन प्राप्त होता है, तभी शासन सफल होता है।

    निष्कर्ष

    प्रौद्योगिकी ने आधुनिक शासन की पहुँच और क्षमता का विस्तार किया है, किंतु उसकी मानवीय आत्मा को संरक्षित रखने का कार्य संस्थाएँ ही करती हैं। डेटा, एल्गोरिदम और प्लेटफॉर्म राज्य को सशक्त बना सकते हैं, परंतु न्याय, गरिमा तथा विश्वास सुनिश्चित करने का सामर्थ्य केवल विश्वसनीय संस्थाओं में निहित होता है। सतत शासन प्रौद्योगिकी एवं संस्थाओं में से किसी एक के चयन में नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकीय सशक्तीकरण और संस्थागत मानवीय मूल्यों के सामंजस्य में निहित है।


    2. उद्देश्यहीन प्रगति अर्थहीन गति के समान है।

    निबंध को समृद्ध करने हेतु उद्धरण

    • विक्टर फ्रैंकल: "जीवन कभी भी परिस्थितियों के कारण असहनीय नहीं होता, बल्कि केवल अर्थ और उद्देश्य की कमी के कारण असहनीय होता है।"
    • महात्मा गांधी: “पृथ्वी सभी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पर्याप्त संसाधन देती है, लेकिन सभी के लालच को संतुष्ट करने के लिये नहीं।”
    • अरस्तू: “सुख ही जीवन का अर्थ और उद्देश्य है—मानव अस्तित्व का समग्र लक्ष्य और अंतिम प्रयोजन।”

    भूमिका: कथन की व्याख्या

    • आधुनिक समाज प्रायः प्रगति को गति, आर्थिक वृद्धि और तकनीकी उन्नति के साथ समानार्थी मान लेते हैं।
    • हालाँकि, ऐसा विकास जिसमें नैतिक दिशा, सामाजिक लक्ष्यों या मानवीय उद्देश्यों का अभाव हो, वह केवल एक खोखली गति बनकर रह जाने का जोखिम उत्पन्न करता है।
    • यह कथन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक उन्नति वही है जिसे मूल्यों, दूरदृष्टि और ऐसे परिणामों द्वारा निर्देशित किया जाए जो मानव कल्याण को सुदृढ़ करें।

    दार्शनिक एवं नैतिक आधार

    • प्रगति का नैतिक दिशासूचक के रूप में उद्देश्य
      • अरस्तू ने मानव उत्कर्ष (यूडेमोनिया) को केवल गतिविधि से नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण कर्म से जोड़ा था।
      • मूल्यों के बिना प्रगति मात्र साधनात्मक बन जाती है, जिसमें मनुष्य स्वयं लक्ष्य न रहकर साधन बन जाते हैं।
    • भारतीय दार्शनिक दृष्टि
      • पुरुषार्थ की अवधारणा (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) भौतिक उन्नति को नैतिक और आध्यात्मिक उद्देश्य के साथ संतुलित करती है।
      • भगवद गीता का मुख्य संदेश फल की आसक्ति के बजाय धर्म सम्मत कर्म करना है; यह केवल परिणामों के पीछे भागने का निषेध करती है।
    • आधुनिक चिंतन
      • अमर्त्य सेन विकास को केवल आय या उत्पादन बढ़ाने तक सीमित न मानकर मानवीय स्वतंत्रताओं के विस्तार के रूप में देखते हैं।
      • उद्देश्य ही आर्थिक वृद्धि को वास्तविक विकास में रूपांतरित करता है।

    आर्थिक वृद्धि: मात्रा बनाम गुणवत्ता

    • उच्च वृद्धि, सीमित कल्याण
      • कई अर्थव्यवस्थाओं ने तीव्र GDP वृद्धि प्राप्त की है, किंतु उसके अनुरूप स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।
      • सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद, मानव विकास सूचकांक (HDI) 2023 में भारत का स्थान 134वाँ है, जो आर्थिक वृद्धि और मानवीय परिणामों के बीच अंतर को उजागर करता है।
    • रोज़गारविहीन और असमान वृद्धि
      • स्वचालन और पूंजी-प्रधान वृद्धि ने उत्पादकता तो बढ़ाई है, परंतु रोज़गार सृजन की क्षमता सीमित रही है।
      • विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर शीर्ष 10% वर्ग के पास कुल वैश्विक आय का 52% से अधिक हिस्सा है, जो उद्देश्यहीन वृद्धि को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
    • उद्देश्य-प्रेरित अर्थव्यवस्था
      • समावेशी वृद्धि की नीतियाँ जैसे शिक्षा, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा आर्थिक प्रगति को सामाजिक उद्देश्य के साथ संरेखित करती हैं।

    प्रौद्योगिकी और नवाचार

    • दिशा के बिना गति
      • तीव्र तकनीकी परिवर्तन ने दक्षता बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ निगरानी, गलत सूचना और रोज़गार में विस्थापन जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं।
      • AI सिस्टम परिणामों को अनुकूलित कर सकते हैं, पर वे नैतिक लक्ष्यों को परिभाषित नहीं कर सकते।
    • मानव-केंद्रित नवाचार
      • उद्देश्य-प्रेरित प्रौद्योगिकी वास्तविक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होती है जैसे स्वास्थ्य सेवा की पहुँच, जलवायु सहनशीलता, शिक्षा।
      • भारत में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (आधार, UPI) यह प्रदर्शित करती है कि समावेशन के साथ संरेखित प्रौद्योगिकी कैसे पहुँच और गरिमा का विस्तार कर सकती है।
    • पर्यावरणीय लागत
      • अनियंत्रित औद्योगिक प्रगति ने जलवायु परिवर्तन में योगदान दिया है तथा वैश्विक स्तर पर वर्ष 2023 अब तक के सबसे गर्म वर्षों में से एक दर्ज किया गया था।
      • पारिस्थितिक उद्देश्य के बिना प्रगति दीर्घकालिक अस्तित्व के लिये खतरा उत्पन्न करती है।

    सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम

    • शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव
      • बिना योजना के तीव्र शहरी विकास से भीड़भाड़, प्रदूषण और सामाजिक विमुखता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
      • वे शहर जो जीवन-योग्यता, सार्वजनिक स्थानों और समुदाय को प्राथमिकता देते हैं, सार्थक प्रगति को बढ़ावा देते हैं।
    • शिक्षा और कौशल निर्माण
      • केवल योग्यता-पत्रों पर केंद्रित शिक्षा केवल रोज़गार क्षमता प्रदान करती है, किंतु बुद्धिमत्ता नहीं।
      • उद्देश्यपूर्ण शिक्षा समालोचनात्मक सोच, नैतिकता और नागरिक ज़िम्मेदारी को विकसित करती है।
    • सांस्कृतिक निरंतरता
      • वे समाज जो बदलाव के साथ मूल्यों को संरक्षित रखते हैं, सामंजस्य और अनुकूल बनाए रखते हैं।
      • सांस्कृतिक जड़ें प्रगति को दिशा प्रदान करती हैं।

    शासन और सार्वजनिक नीति

    • नीति के परिणाम बनाम नीति का उद्देश्य
      • केवल लक्ष्यों को केंद्र में रखकर बनाई गई योजनाएँ मानवीय वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ कर सकती हैं, यदि उनमें निहित व्यापक उद्देश्यों की अनदेखी की जाए।
      • उदाहरण के लिये, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ने रिसाव कम किया, लेकिन शिकायत निवारण संस्थाएँ सुनिश्चित करती हैं कि लाभ मानवीय ढंग से पहुँचे।
    • वैश्विक लक्ष्य के रूप में उद्देश्य
      • संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDGs) एक उद्देश्य-प्रेरित ढाँचा प्रदान करते हैं, जो आर्थिक वृद्धि को समानता, स्थिरता और गरिमा से जोड़ता है।
      • SDGs के आधार पर मापी गई प्रगति आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों को एकीकृत करती है।

    नैतिक समन्वय

    • गतिशीलता परिवर्तन को दर्शाती है और उद्देश्य दिशा देता है।
    • प्रगति को ‘कैसे’ को अनुकूलित करने से पहले ‘क्यों’ का उत्तर देना चाहिये।
    • नैतिक आधार के बिना, उन्नति असमानता, सामाजिक विमुखता और पारिस्थितिक क्षति को गहरा कर सकती है।

    निष्कर्ष

    प्रगति तब अर्थपूर्ण होती है जब उसे ऐसे उद्देश्य द्वारा निर्देशित किया जाए जो मानव गरिमा, समानता और स्थिरता को बढ़ाए। बिना दिशा के वृद्धि केवल परिवर्तन को तीव्र कर सकती है, लेकिन कल्याण सुनिश्चित नहीं कर सकती। वे समाज जो नवाचार, अर्थव्यवस्था और शासन को नैतिक दृष्टि के साथ संरेखित करते हैं, केवल गति को सार्थक उन्नति में बदल सकते हैं।

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