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निबंध विषय
प्रश्न 1. प्रौद्योगिकी मानवीय क्षमता का विस्तार कर सकती है, किंतु यह मानवीय विवेक एवं निर्णय-क्षमता का स्थान नहीं ले सकती।
प्रश्न 2. सांस्कृतिक जड़ें तीव्र परिवर्तन के समय समाजों को अनुकूलनशीलता प्रदान करती हैं।
03 Jan, 2026 निबंध लेखन निबंधउत्तर :
1. प्रौद्योगिकी मानवीय क्षमता का विस्तार कर सकती है, किंतु यह मानवीय विवेक एवं निर्णय-क्षमता का स्थान नहीं ले सकती।
आपके निबंध को समृद्ध बनाने हेतु उद्धरण
- अल्बर्ट आइंस्टीन: "यह भयावह रूप से स्पष्ट हो चुका है कि हमारी तकनीक, हमारी मानवता की सीमाएँ पार कर चुकी है।"
- अरस्तू: “शिक्षित और अशिक्षित में उतना ही अंतर होता है, जितना जीवित और मृत में होता है।”
- हन्ना अरेंड्ट: "सबसे कट्टर क्रांतिकारी भी क्रांति के अगले ही दिन रूढ़िवादी बन जाता है।"
परिचय: कथन की व्याख्या
- प्रौद्योगिकी ने गति, व्यापकता, सटीकता और पहुँच को बढ़ाकर मानवीय क्षमताओं को पूरी तरह से बदल दिया है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर स्वचालन तक मशीनें विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेज़ी से सहायता कर रही हैं।
- हालाँकि, यह कथन एक महत्त्वपूर्ण अंतर की ओर संकेत करता है: प्रौद्योगिकी एक सक्षमकारी साधन है, नैतिक निर्णय लेने वाली सत्ता नहीं।
- मानवीय निर्णय जो मूल्यों, संदर्भ, सहानुभूति और ज़िम्मेदारी से आकार लेता है वह आज भी अपूरणीय बना हुआ है।
दार्शनिक और नैतिक आधार
- साधन बनाम एजेंट
- प्रौद्योगिकी डेटा, एल्गोरिदम और पूर्वनिर्धारित नियमों पर संचालित होती है।
- मानव निर्णय में विवेक, नैतिक तर्क और नैतिक उत्तरदायित्व शामिल होता है।
- अरस्तू के दृष्टिकोण में फ्रोनेसिस (व्यावहारिक बुद्धिमत्ता) जटिल परिस्थितियों में सूचित और सही निर्णय लेने की योग्यता है, जिसे मशीनें प्राप्त नहीं कर सकतीं।
- एल्गोरिदमिक तर्कशीलता की सीमाएँ
- एल्गोरिदम मात्र मापने योग्य परिणामों का अनुकूलन करते हैं, लेकिन नैतिक सूक्ष्मता को समझ नहीं सकते।
- मैक्स वेबर ने अत्यधिक तर्कसंगतकरण के प्रति चेतावनी दी, जो मानव मूल्यों को हाशिये पर डाल सकता है।
- भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोण
- भारतीय दर्शन विवेक (भेदात्मक बुद्धिमत्ता) को महत्त्व देता है—जो तर्क से परे सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता है।
मानव क्षमता को बढ़ाने के साधन के रूप में प्रौद्योगिकी
- कुशलता और पैमाना
- AI स्वास्थ्य सेवा में निदान, कृषि में सटीकता और शासन में कार्यकुशलता को बढ़ाता है।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षा, वित्त और सूचना तक पहुँच को व्यापक बनाते हैं।
- रचनात्मकता और नवाचार
- प्रौद्योगिकी डिज़ाइन टूल्स, सिमुलेशन और शोध सहायता के माध्यम से मानव रचनात्मकता को बढ़ाती है।
- हालाँकि, मौलिकता और उद्देश्य का स्रोत अभी भी मानव कल्पना ही है।
- निर्णय में समर्थन, निर्णय का अधिकार नहीं
- प्रौद्योगिकी विकल्पों की जानकारी प्रदान कर सकती है, लेकिन उन्हें तय नहीं कर सकती।
- डेटा मार्गदर्शन कर सकता है, लेकिन निर्णय मानव विवेक द्वारा लिया जाना चाहिये।
क्यों मानव निर्णय अपरिहार्य रहता है
- नैतिक निर्णय-निर्माण
- नैतिक दुविधाएँ सहानुभूति, करुणा और प्रसंगगत समझ की मांग करती हैं।
- मशीन अपने परिणामों के लिये ज़िम्मेदारी या अपराधबोध महसूस नहीं कर सकती।
- पूर्वाग्रह और उत्तरदायित्व
- एल्गोरिदम, डेटा और अपने निर्माताओं से पूर्वाग्रह प्राप्त करते हैं।
- मनुष्यों को सुधार करने, संदर्भ निर्धारित करने और ज़िम्मेदारी लेने के लिये अपने विवेक का उपयोग अवश्य करना चाहिये।
- अनिश्चितता और जटिलता
- वास्तविक विश्व की परिस्थितियाँ अस्पष्ट और गतिशील होती हैं।
- मानव अंतर्ज्ञान और अनुभव कूट बद्ध नियमों से परे अनिश्चितताओं को समझने में सहायता करता है।
समकालीन प्रासंगिकता
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता और शासन
- पूर्वानुमान आधारित पुलिसिंग, स्वचालित कल्याण निर्णय और निगरानी नैतिक चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
- बहिष्कार, अन्याय और मानवता की हानि को रोकने के लिये मानव निरीक्षण आवश्यक है।
- स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा
- AI रोगों के निदान और व्यक्तिगत शिक्षण में सहायता करता है।
- लेकिन अंतिम निर्णयों के लिये करुणा, नैतिक विवेक और मानवीय भावनाओं की समझ की आवश्यकता होती है।
- कार्यस्थल और समाज
- स्वचालन सामान्य कार्यों को प्रतिस्थापित करता है, लेकिन निर्णय, नेतृत्व और नैतिक तर्क की महत्त्वपूर्णता बढ़ाता है।
- कार्य (रोज़गार) का भविष्य उन मनुष्यों के पक्ष में है जो सोच सकते हैं, निर्णय ले सकते हैं और सहानुभूति रख सकते हैं।
प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम
- नैतिक ज़िम्मेदारी का परित्याग
- जटिल मानव समस्याओं को केवल प्रौद्योगिकी समस्याओं तक सीमित करना
- आलोचनात्मक सोच और नैतिक सक्रियता का क्षरण
अनियंत्रित प्रौद्योगिकी प्रभुत्व ऐसे प्रभावी प्रणाली उत्पन्न करने का जोखिम रखता है जिनमें विवेक की कमी हो।
नैतिक समन्वय
- प्रौद्योगिकी मानव क्षमता को बढ़ाती है और निर्णय मानव ज़िम्मेदारी को परिभाषित करता है।
- मशीन ‘कैसे’ का उत्तर देती है तथा मानव को ‘क्यों’ और ‘क्या’ तय करना होता है।
- प्रगति में नवाचार को विवेक और कुशलता को नैतिकता के साथ संतुलित करना आवश्यक है।
निष्कर्ष:
प्रौद्योगिकी मानवीय क्षमता को बढ़ाने वाला एक शक्तिशाली साधन है, लेकिन यह उस नैतिक दिशा-सूचक का विकल्प नहीं हो सकती जो मानव क्रियाओं का मार्गदर्शन करता है। मूल्य, सहानुभूति और ज़िम्मेदारी पर आधारित निर्णय क्षमता केवल मनुष्यों में ही पाई जाती है। भविष्य को आकार देते समय समाज को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि प्रौद्योगिकी मानव निर्णय की सेवा करे, न कि उसका स्थान ले। वास्तविक संकट कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उदय नहीं, बल्कि मानवीय चेतना का पतन है।
2. सांस्कृतिक जड़ें तीव्र परिवर्तन के समय समाजों को अनुकूलनशीलता प्रदान करती हैं।
आपके निबंध को समृद्ध बनाने हेतु उद्धरण
- महात्मा गांधी: “एक राष्ट्र की संस्कृति लोगों के हृदयों और आत्मा में निवास करती है।”
- रबींद्रनाथ टैगोर: “सर्वोच्च शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंजस्य बिठाती है।”
- जवाहरलाल नेहरू: “संस्कृति मन और आत्मा का विस्तार है।”
- अमर्त्य सेन: “संस्कृति के प्रभाव विकास का अभिन्न हिस्सा हैं।”
परिचय: कथन की व्याख्या
- वैश्वीकरण, प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक परिवर्तन द्वारा प्रेरित तीव्र परिवर्तन अस्थिरता तथा सामाजिक तनाव उत्पन्न करते हैं।
- सांस्कृतिक जड़ें, साझा मूल्य, परंपराएँ, सामूहिक स्मृति और पहचान समाज को व्यवधान के बीच निरंतरता तथा अर्थ प्रदान करती हैं।
- यह कथन दर्शाता है कि अनुकूलन केवल भौतिक शक्ति से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उस सांस्कृतिक गहराई से आता है जो अपनी पहचान खोए बिना अनुकूलन को संभव बनाती है।
- जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा है, “संस्कृति मन और आत्मा का विस्तार है।”
दार्शनिक और वैचारिक आधार
- सांस्कृतिक स्मृति के रूप में संस्कृति: संस्कृति पीढ़ियों के बीच संचित ज्ञान को संरक्षित करती है।
- जब संस्थाएँ या प्रौद्योगिकी नैतिकता की गति से आगे बढ़ती हैं तो यह एक नैतिक दिशा-सूचक के रूप में कार्य करती है
- निरंतरता और परिवर्तन: रवींद्रनाथ टैगोर संस्कृति को गतिशील मानते थे जो अपनी परंपराओं में गहराई से जुड़ी होने के साथ-साथ नवीनता और पुनरुद्धार के लिये सदैव तत्पर रहती है।
- परिवर्तन का स्थायित्व तभी सुनिश्चित होता है जब यह परिचित मूल्यों में निहित हो, न कि आकस्मिक अव्यवस्था या क्षरण में।
- भारतीय सभ्यतागत विचार: सनातन का विचार अनुकूलन के माध्यम से निरंतरता को दर्शाता है, कठोरता को नहीं।
- भारतीय सभ्यता ने आक्रमणों, उपनिवेशवाद और आधुनिकीकरण का सामना अपने सांस्कृतिक अनुकूलन के माध्यम से किया।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण: सहनशीलता का स्रोत के रूप में संस्कृति
- भारत की सभ्यतागत जीवितता: राजनीतिक विखंडन के बावजूद, भारत ने भाषायी, दार्शनिक और आध्यात्मिक निरंतरता बनाए रखी।
- बहुलता, सहिष्णुता और विवाद की परंपराओं ने बाह्य प्रभावों को आत्मसात करने में सहायता की।
- सामाजिक सुधार आंदोलन:
- राजा राम मोहन राय और स्वामी विवेकानंद जैसे सुधारकों ने सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरणा लेकर पुरानी रूढ़िवादी प्रथाओं को चुनौती दी।
- सुधार इसलिये सफल हुआ क्योंकि यह बाह्य दबाव के बजाय आंतरिक मूल्यों से प्रेरित था।
- वैश्विक अनुभव: जापान ने मेइजी सुधार के समय तेज़ी से आधुनिकरण किया, साथ ही अपनी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखा।
- ऐसे स्वदेशी समाज जिन्होंने परंपराओं को संरक्षित किया, उन्होंने सांस्कृतिक क्षरण के खिलाफ अनुकूलन दिखाया।
संस्कृति और सामाजिक एकता
- साझी पहचान: सांस्कृतिक प्रतीक, परंपराएँ तथा कथाएँ समुदाय में जुड़ाव और एकता की भावना को मज़बूत करती हैं।
- संकट के समय, साझा पहचान सामूहिक प्रतिक्रिया को मज़बूत करती है।
- नैतिक ढाँचा: सांस्कृतिक मान्यताएँ कर्त्तव्य, ज़िम्मेदारी और त्याग की अवधारणाओं को आकार देती हैं।
- महामारी या आपदाओं के दौरान, सामुदायिक मूल्य औपचारिक नियमों से आगे बढ़कर सहयोग को संभव बनाते हैं।
- पीढ़ीगत स्थिरता: सांस्कृतिक परंपराएँ बदलती परिस्थितियों के बावजूद मूल्यों की निरंतरता सुनिश्चित करती हैं।
- जो युवा अपने सांस्कृतिक आत्मविश्वास में आश्वस्त होते हैं, वे अंतर्राष्ट्रीय प्रभावों को अधिक संतुलित रूप से आत्मसात कर पाते हैं।
समकालीन प्रासंगिकता
- वैश्वीकरण और समरूपीकरण: तीव्र सांस्कृतिक समरूपीकरण सामाजिक एकजुटता को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है।
- सांस्कृतिक जड़ें समाज को वैश्विक स्तर पर जुड़ने में सहायता करती हैं, बिना अपनी विशिष्टता खोए।
- प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति: डिजिटल प्लेटफॉर्म ने संस्कृति को परिवर्तित किया है, लेकिन साथ ही भाषाओं, कलाओं और परंपराओं को पुनर्जीवित भी किया है।
- मूल्यों द्वारा निर्देशित होने पर प्रौद्योगिकी सांस्कृतिक संरक्षण का एक साधन बन जाती है।
- प्रवासन और बहुसांस्कृतिकता: सांस्कृतिक जड़ें प्रवासियों को पहचान और मनोवैज्ञानिक स्थिरता प्रदान करती हैं।
- जिस समाज में सांस्कृतिक आत्मविश्वास मज़बूत होता है, वे विविधता को अधिक सुगमता से अपनाते और समाहित करते हैं।
चुनौतियाँ और सावधानियाँ
- सांस्कृतिक जड़ें सांस्कृतिक कठोरता में नहीं बदलनी चाहिये।
- अंधपरंपरावाद आवश्यक सुधारों का विरोध कर सकता है।
- दृढ़ता का वास्तविक स्रोत चयनित और समझदारीपूर्ण संरक्षण है, न कि भावनात्मक रूप से अतीत में उलझे रहने में।
नैतिक समन्वय
- संस्कृति समाज को भावनात्मक शक्ति, नैतिक स्पष्टता और अनुकूलन क्षमता प्रदान करती है।
- जड़ें विकास को रोकती नहीं हैं तथा वे उसे स्थिरता देती हैं।
- सांस्कृतिक आधार के बिना परिवर्तन, अलगाव और विखंडन का जोखिम उत्पन्न करता है।
निष्कर्ष
तीव्र परिवर्तन के युग में सांस्कृतिक जड़ें एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती हैं, जो समाज को भ्रमित वैचारिक प्रवाह से संरक्षण देती हैं। ये जड़ें न केवल निरंतरता और सामूहिक विवेक का संचार करती हैं, बल्कि अपनी मौलिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए अनुकूलन की क्षमता भी विकसित करती हैं। जो समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत का पोषण करते हैं, वे परिवर्तन के विरोधी नहीं होते, बल्कि उसे अपने मूल्यों के अनुरूप ढालने का सामर्थ्य रखते हैं।
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