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प्रश्न 1. उठती हुई लहरें सभी नौकाओं को ऊपर उठाती हैं।
27 Dec, 2025 निबंध लेखन निबंध
प्रश्न 2. शिक्षा तथ्यों का केवल अधिग्रहण नहीं है, बल्कि यह मन को आत्मचिंतन हेतु प्रशिक्षित करने की सतत प्रक्रिया है।उत्तर :
1. उठती हुई लहरें सभी नौकाओं को ऊपर उठाती हैं।
निबंध को समृद्ध करने वाले उद्धरण
- महात्मा गांधी: "किसी भी समाज की वास्तविक कसौटी इस बात से आँकी जा सकती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करता है।"
- जॉन रॉल्स: "सामाजिक तथा आर्थिक असमानताएँ इस प्रकार व्यवस्थित की जानी चाहिये कि वे सबसे कम लाभान्वित लोगों के लिये अधिकतम लाभकारी हों।"
- अमर्त्य सेन: "विकास का अर्थ उन वास्तविक स्वतंत्रताओं का विस्तार है, जिनका लोग उपभोग करते हैं।"
परिचय: रूपक की समझ
- "उठती हुई ज्वार (लहर) सभी नौकाओं को ऊपर उठा देती है" यह कथन इस विचार को व्यक्त करता है कि जब समग्र प्रगति होती है, तो उससे सभी को लाभ होता है। यह धारणा इस विश्वास पर आधारित है कि सामूहिक विकास— चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो या नैतिक— समाज के विभिन्न वर्गों और समुदायों के व्यक्तियों को उन्नत कर सकता है।
- हालाँकि, यह आशावाद इस मान्यता पर आधारित है कि विकास समावेशी और सुलभ है। समानता के बिना, विकास की लहरें तो उठ सकती हैं, लेकिन कई नावें डूब जाएंगी या लंगर डाले ही रह जाएंगी। इस प्रकार, यह कथन विकास की प्रकृति तथा उसके वितरण पर गहन चिंतन के लिये प्रेरित करता है।
दार्शनिक और नैतिक आयाम
- सामूहिक प्रगति बनाम व्यक्तिगत उन्नति: दार्शनिक दृष्टि से यह विचार सामुदायिक नैतिकता (Communitarian Ethics) के अनुरूप है, जो समाज को परस्पर निर्भर इकाई के रूप में देखती है।
- अरस्तू के अनुसार, न्यायपूर्ण समाज के भीतर प्राप्त किया गया जीवन ही ‘उत्तम जीवन’ कहलाता है, जहाँ सामूहिक कल्याण व्यक्तिगत समृद्धि को संभव बनाता है।
- विकास की नैतिक ज़िम्मेदारी: न्याय के बिना विकास असमानताओं को और गहरा कर सकता है।
- जॉन रॉल्स का न्याय-सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि सामाजिक तथा आर्थिक असमानताएँ तभी स्वीकार्य हैं, जब वे सबसे कमज़ोर वर्ग के हित में हों।
- भारतीय नैतिक चिंतन: गांधी द्वारा प्रतिपादित ‘सर्वोदय’ (सभी का कल्याण) की भारतीय अवधारणा यह मानती है कि वास्तविक प्रगति वही है, जो सबसे दुर्बल व्यक्ति का उत्थान करे।
- करुणा से रहित आर्थिक या तकनीकी प्रगति में अपवर्जन का जोखिम निहित होता है।
ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य
- स्वतंत्रता-उपरांत विकास: भारत की आर्थिक योजना का उद्देश्य औद्योगीकरण और सामाजिक कल्याण के माध्यम से सामूहिक रूप से जीवन-स्तर का उत्थान करना था।
- परंतु क्षेत्रीय असमानताओं ने यह स्पष्ट किया कि केवल विकास से साझा समृद्धि सुनिश्चित नहीं होती।
- वैश्वीकरण और विकास: आर्थिक उदारीकरण ने अपार संपत्ति सृजित की, किंतु इसके साथ ही देशों के भीतर तथा उनके बीच असमानताओं को भी बढ़ाया।
- वैश्वीकरण के लाभ प्रायः कुशल वर्गों तक सीमित रहे, जबकि असंगठित श्रमिक अधिक असुरक्षित होते गये।
- इतिहास से सबक: औद्योगिक क्रांति ने कुल संपत्ति में वृद्धि की, परंतु इसके साथ शोषण भी बढ़ा, जब तक कि श्रम सुधारों और संस्थागत व्यवस्थाओं ने न्याय सुनिश्चित नहीं किया।
- यह दर्शाता है कि विकास को नैतिक और संस्थागत ढाँचों द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिये।
समकालीन प्रासंगिकता
- समावेशी विकास: वित्तीय समावेशन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और सामाजिक सुरक्षा जैसी नीतियाँ यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती हैं कि विकास के लाभ समाज के उपेक्षित वर्ग तक भी पहुँचें।
- सार्वभौमिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी पहलें व्यक्तियों को विकास में सार्थक भागीदारी हेतु सक्षम बनाती हैं।
- संधारणीयता और जलवायु न्याय: जलवायु परिवर्तन यह उजागर करता है कि अनियंत्रित विकास का दुष्प्रभाव सबसे अधिक कमज़ोर वर्गों पर पड़ता है।
- अतः ‘उठती हुई लहर’ को वास्तव में सभी नौकाओं को ऊपर उठाने के लिये पर्यावरणीय रूप से सतत होना आवश्यक है।
- प्रौद्योगिकी और अवसर: डिजिटल मंच अवसरों का लोकतंत्रीकरण कर सकते हैं, परंतु डिजिटल विभाजन अनेक लोगों को वंचित भी कर सकता है।
- समावेशिता यह निर्धारित करती है कि तकनीकी प्रगति सशक्तीकरण का माध्यम बनेगी या ध्रुवीकरण का।
समालोचनात्मक चिंतन
- विकास स्वाभाविक रूप से समतामूलक नहीं होता।
- नैतिक शासन के बिना विकास असमानताओं को कम करने के बजाय उन्हें और गहरा कर देता है तथा सबसे कमज़ोर लोगों का जीवन पहले से अधिक असुरक्षित तथा कठिन बना देता है।
- वास्तविक प्रगति ऐसे तंत्रों के निर्माण में निहित है, जो सभी के लिये अभिगम्यता, गरिमा और अवसर सुनिश्चित करें।
निष्कर्ष
"उठती हुई लहर सभी नौकाओं को ऊपर उठा सकती है" अर्थात् आर्थिक विकास से सभी को लाभ होता है— लेकिन यह तभी संभव है जब वह न्याय, समावेशन और उत्तरदायित्व से निर्देशित हो। आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय, नैतिक शासन और करुणापूर्ण नीति निर्माण भी आवश्यक है।
जैसा कि महात्मा गांधी ने हमें याद दिलाया था, “प्रगति का वास्तविक मापदंड यह नहीं है कि कोई राष्ट्र कितनी तेज़ी से विकास करता है, बल्कि यह है कि वह अपने सबसे कमज़ोर सदस्यों की कितनी अच्छी तरह देखभाल करता है।” केवल तभी समृद्धि चयनात्मक न होकर साझा बनती है।
2. शिक्षा तथ्यों का केवल अधिग्रहण नहीं है, बल्कि यह मन को आत्मचिंतन हेतु प्रशिक्षित करने की सतत प्रक्रिया है।
निबंध को समृद्ध करने वाले उद्धरण
- अल्बर्ट आइंस्टीन- “शिक्षा तथ्यों का केवल अधिग्रहण नहीं है, बल्कि यह मन को आत्मचिंतन हेतु प्रशिक्षित करने की सतत प्रक्रिया है।”
- जॉन डीवी- “शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं है; शिक्षा स्वयं जीवन है।”
- रवीन्द्रनाथ टैगोर- “सर्वोच्च शिक्षा वह है जो केवल हमें जानकारी ही नहीं देती, बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंजस्यपूर्ण बनाती है।”
परिचय: शिक्षा के सार का अध्ययन
शिक्षा को प्रायः सूचना संचय, परीक्षा अंकों और प्रमाण-पत्रों तक सीमित कर दिया जाता है। हालाँकि, वास्तविक शिक्षा रटने और यांत्रिक अधिगम से कहीं बढ़कर है। इसका उद्देश्य तर्कशक्ति, जिज्ञासा, विवेक और स्वतंत्र चिंतन को विकसित करना है।
- शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मन में तथ्यों का संग्रहण करना नहीं है, बल्कि ऐसे व्यक्तियों को आकार देना है जो समालोचनात्मक चिंतन, नैतिक तर्क और रचनात्मक समस्या-समाधान में सक्षम हों।
शिक्षा के दार्शनिक आधार
- प्राचीन भारतीय परिप्रेक्ष्य: गुरुकुल प्रणाली में रटंत विद्या के बजाय मनन (चिंतन) और निदिध्यासन (गहन आत्मचिंतन) पर बल दिया जाता था।
- शिक्षा का उद्देश्य सूचना-संग्रह नहीं, बल्कि ज्ञान (Wisdom) और चरित्र-निर्माण था।
- पश्चिमी दार्शनिक विचार: सुकरात ने सत्य के मार्ग के रूप में प्रश्न पूछने का समर्थन किया, यह दावा करते हुए कि ज्ञान संदेह से शुरू होता है।
- जॉन डीवी शिक्षा को तथ्यों के निष्क्रिय ग्रहण के बजाय चिंतन और पूछताछ की प्रक्रिया के रूप में देखते थे।
- अधिगम का उद्देश्य: वास्तविक शिक्षा केवल स्मरण करने की क्षमता विकसित करने के बजाय विश्लेषण करने, तर्क करने और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है।
- बिना समझ के ज्ञान से अनुरूपता उत्पन्न हो सकती है, जबकि चिंतन स्वतंत्रता को पोषित करता है।
शिक्षा और मानव विकास
- समालोचनात्मक सोच विकसित करना: एक विचारशील मन गलत सूचनाओं पर सवाल उठा सकता है, पूर्वाग्रहों को चुनौती दे सकता है और बदलाव के अनुकूल ढल सकता है।
- तेज़ी से हो रहे तकनीकी विकास की दुनिया में, स्थिर ज्ञान की तुलना में अनुकूलनशीलता अधिक महत्त्वपूर्ण है।
- नैतिक एवं आचार संबंधी गठन: शिक्षा समानुभूति, ज़िम्मेदारी और नैतिक तर्क को पोषित करके चरित्र का निर्माण करती है।
- जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था, "शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।"
- रचनात्मकता और नवाचार: नवाचार तब उभरता है जब व्यक्ति मान्यताओं पर प्रश्न उठाते हैं और विकल्पों की कल्पना करते हैं।
- जिज्ञासा और प्रयोग को प्रोत्साहित करने वाले समाज, अनुरूपता लागू करने वाले समाजों की तुलना में तेज़ी से प्रगति करते हैं।
समकालीन प्रासंगिकता
- सूचना अधिभार के युग में: तथ्य तुरंत उपलब्ध हैं; उन्हें मूल्यांकन, व्याख्या और लागू करने की क्षमता दुर्लभ है।
- समालोचनात्मक सोच व्यक्तियों को गलत सूचनाओं और डिजिटल हेरफेर से निपटने में सक्षम बनाती है।
- शिक्षा और लोकतंत्र: लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सार्थक भागीदारी के लिये विचारशील नागरिक होना आवश्यक है।
- जब शिक्षा में तर्क की बजाय आज्ञापालन को प्राथमिकता दी जाती है, तो लोकतंत्र अप्रभावी हो जाता है।
- कार्यस्थल और भविष्य के कौशल: स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने नियमित कार्यों के महत्त्व को कम कर दिया है।
- भविष्य उन व्यक्तियों का है जो रचनात्मक, नैतिक और स्वतंत्र रूप से सोच सकते हैं।
वास्तविक शिक्षा हेतु चुनौतियाँ
- परीक्षाओं और रटंत याददाश्त पर अत्यधिक ज़ोर देना
- मानकीकृत परीक्षण जो प्रश्न पूछने को हतोत्साहित करता है
- शिक्षा का व्यवसायीकरण, जो विकास के बजाय अंकों को प्राथमिकता देता है
- इन प्रवृत्तियों से ऐसे कुशल श्रमिक उत्पन्न होने का खतरा है जिनमें ज्ञान या नैतिक दिशा-निर्देश की कमी होगी।
नैतिक और सामाजिक महत्त्व
- चिंतन को बढ़ावा देने वाली शिक्षा निष्क्रिय अनुयायियों के बजाय ज़िम्मेदार नागरिकों का निर्माण करती है।
- यह व्यक्तियों को अन्याय पर प्रश्न करने, हेरफेर का विरोध करने और विवेक के साथ कार्य करने में सक्षम बनाता है।
- इसलिये, शिक्षा मूल रूप से एक जागृति की प्रक्रिया होनी चाहिये, मन का विस्तार करने, रचनात्मकता को पोषित करने और जीवन की गहन समझ विकसित करने का एक साधन होनी चाहिये।
निष्कर्ष
शिक्षा तथ्यों का संग्रहण नहीं, बल्कि बुद्धि और चरित्र का विकास है। जानकारी से भरे विश्व में, समालोचनात्मक, नैतिक और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता ही अधिगम का वास्तविक मापदंड है।
- शिक्षा का अंतिम लक्ष्य चलता-फिरता विश्वकोश बनाना नहीं है, बल्कि ऐसे विचारशील व्यक्ति तैयार करना है, जो न्यायपूर्ण, नवोन्मेषी और करुणामय समाज को आकार देने में सक्षम हों।
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