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प्रश्न 1. “जनता की इच्छा विधि को आकार दे सकती है, लेकिन यह न्याय की आधारशिला नहीं हो सकती।”
20 Dec, 2025 निबंध लेखन निबंध
प्रश्न 2. “ईमानदारी का वास्तविक आरंभ उसी क्षण होता है, जब सुविधा का मार्ग समाप्त हो जाता है।”उत्तर :
1. “जनता की इच्छा विधि को आकार दे सकती है, लेकिन यह न्याय की आधारशिला नहीं हो सकती।”
निबंध को समृद्ध करने वाले उद्धरण
- महात्मा गांधी: “अंतरात्मा के मामलों में, बहुमत की विधियों का कोई स्थान नहीं है।”
- प्लेटो: “न्याय का अर्थ है अपने कर्त्तव्य का पालन करना और दूसरों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करना।”
- जॉन रॉल्स: “न्याय, सामाजिक संस्थाओं का प्रथम गुण है, ठीक उसी प्रकार जैसे सत्य, विचार-प्रणालियों का।”
कथन का निर्वचन
- जनमत किसी निश्चित समय पर सामूहिक प्राथमिकताओं, भावनाओं और सामाजिक सहमति को दर्शाता है।
- हालाँकि, न्याय निष्पक्षता, गरिमा, समानता और सत्य जैसे स्थायी नैतिक सिद्धांतों में निहित है।
- यद्यपि लोकतांत्रिक समाजों में जनमत को विधि निर्माण करने की अनुमति होती है, तथापि न्याय को बदलते बहुमत के बजाय नैतिक सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित रहना चाहिये।
दार्शनिक और नैतिक आधार
- राय और सिद्धांत के बीच अंतर
- लोकमत वर्णनात्मक होता है—यह इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि समाज क्या सोचता है।
- न्याय एक मानक है—यह दर्शाता है कि समाज को किन मूल्यों को बनाए रखना चाहिये।
- प्लेटो ने चेतावनी दी थी कि सत्य और सद्गुण का निर्धारण संख्याओं से नहीं, बल्कि तर्क के माध्यम से किया जाना चाहिये।
- नैतिक सार्वभौमिकता
- इमैनुएल कांट का तर्क था कि नैतिक कर्मों का मार्गदर्शन सामाजिक स्वीकृति से नहीं, बल्कि सार्वभौमिक सिद्धांतों द्वारा होना चाहिये।
- यदि नैतिकता भीड़ पर निर्भर होती, तो काल और संस्कृतियों के पार नैतिक सुसंगतता का पूर्णतः पतन हो जाता।
- भारतीय नीतिपरक विचार
- भारतीय दर्शन में धर्म की संकल्पना सुविधा या सर्वसम्मति से परे नैतिक धर्मिता का द्योतक है।
- स्वामी विवेकानंद ने कहा था, "सत्य किसी भी समाज, चाहे वह प्राचीन हो या आधुनिक, के प्रति सम्मान नहीं दिखाता।"
समकालीन प्रासंगिकता
- मीडिया और त्वरित राय
- सोशल मीडिया आक्रोश और बहुसंख्यकवादी भावनाओं को और बढ़ा देता है।
- प्रचलित विचारों से निर्देशित न्याय प्रणाली के आवेगी और असंगत होने का जोखिम रहता है।
- हाशिये पर स्थित वर्गों की अभिव्यक्तियाँ
- लोकप्रियता प्रायः कमज़ोर समूहों को हाशिये पर स्थानांतरित कर देती है।
- न्याय का अस्तित्व ठीक उसी उद्देश्य के लिये है जिससे संख्यात्मक शक्ति के अभाव में लोगों की रक्षा की जा सके।
- शासन और नीति
- कल्याण, पुलिस व्यवस्था और सार्वजनिक नैतिकता पर होने वाले विमर्श समानुभूति-आधारित न्याय और लोकलुभावन मांगों के बीच तनाव को उज़ागर करती हैं।
- नैतिक शासन के लिए निष्पक्षता की कीमत पर भीड़ को संतुष्ट करने के दबाव का विरोध करना आवश्यक है।
नैतिक संश्लेषण
- विधि का विकास लोकतांत्रिक सहभागिता के माध्यम से हो सकता है।
- न्याय का विकास नैतिक चिंतन के माध्यम से होना चाहिये।
- लोकप्रिय इच्छा न्याय को प्रेरित कर सकती है, लेकिन इसे परिभाषित नहीं कर सकती।
- डॉ. अंबेडकर की दृष्टि में, संवैधानिक नैतिकता के बिना लोकतंत्र केवल बाह्य प्रकट रूप बनकर रह जाता है, जिसके भीतर वास्तविकता का अभाव होता है।
निष्कर्ष
- लोकमत क्षणभंगुर होता है; न्याय शाश्वत होना चाहिये। समाज तभी प्रगति करता है जब सिद्धांत शक्ति और लोकप्रियता को नियंत्रित करते हैं।
- अंतरात्मा में निहित न्याय मानव गरिमा की रक्षा पीढ़ियों तक करता है। साथ ही, सत्यनिष्ठ न्याय प्रायः विपरीत मत से आरंभ होता है।
2. “ सत्यनिष्ठा का वास्तविक आरंभ उसी क्षण होता है, जब सुविधा का मार्ग समाप्त हो जाता है।”
निबंध को समृद्ध करने वाले उद्धरण
- सी.एस. लुईस: "सत्यनिष्ठा का तात्पर्य है सही काम करना, भले ही कोई देख रहा हो या नहीं।"
- स्वामी विवेकानंद: “उठो, साहसी बनो, मज़बूत बनो।”
- वॉरेन बफेट: “लोगों को नियुक्त करने के लिए जब आप चयन करते हैं, तो तीन गुणों की तलाश करते हैं: सत्यनिष्ठा, बुद्धिमत्ता और ऊर्जा। और यदि उनमें पहला गुण नहीं है, तो बाकी दोनों आपको नष्ट कर देंगे।”
परिचय: विचार की समझ
- विशेषकर दबाव की स्थिति में सत्यनिष्ठा मूल्यों, शब्दों और कार्यों का सामंजस्य है।
- सुविधा शॉर्टकट, आराम और समझौता प्रदान करती है।
- इस कथन में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि सत्यनिष्ठा सहजता में नहीं, बल्कि नैतिक प्रतिरोध में प्रकट होती है।
- जैसा कि सी.एस. लुईस ने कहा था, "सत्यनिष्ठा का तात्पर्य है सही काम करना, भले ही कोई देख रहा हो या नहीं।"
दार्शनिक और नीतिपरक आयाम
- नैतिक स्थिरता के रूप में सत्यनिष्ठा: नैतिकता कार्रवाई की मांग करती है, भले ही इसमें व्यक्तिगत हानि शामिल हो।
- अरस्तू के अनुसार, सद्गुण परिस्थितियों के अनुरूप समायोजन नहीं, बल्कि आदत में परिणत सही कर्म है।
- भारतीय दार्शनिक अंतर्दृष्टि
- भगवद् गीता निष्काम कर्म पर ज़ोर देती है —परिणामों से आसक्ति रखे बिना अपने कर्त्तव्य का पालन करना।
- महात्मा गांधी ने सुविधाजनक समझौते के बजाय कष्ट सहना चुनकर सत्यनिष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत किया।
- नैतिक विकल्प का मनोविज्ञान
- सुविधा नैतिक दुविधाओं को केवल लागत-लाभ के हिसाब तक सीमित कर देती है।
- सत्यनिष्ठा से विवेक को मार्गदर्शक शक्ति के रूप में पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
विपरीत परिस्थितियों में सत्यनिष्ठा की परीक्षा
- व्यक्तिगत स्तर
- सामाजिक अलगाव के बावजूद सत्य बोलना।
- आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद भ्रष्टाचार को अस्वीकार करना।
- व्हिसलब्लोअर प्रायः भारी व्यक्तिगत कीमत पर ऐसा करते हैं।
- नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन
- नेतृत्वकर्त्ताओं पर सिद्धांतों के बजाय लोकप्रियता को प्राथमिकता देने का दबाव होता है।
- अब्राहम लिंकन ने कहा था, "लगभग सभी लोग विपरीत परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं, लेकिन यदि आप किसी व्यक्ति के चरित्र की परीक्षा लेना चाहते हैं, तो उसे शक्ति प्रदान करें।"
- संस्थागत सत्यनिष्ठा
- जब नैतिकता को दक्षता या लाभ के लिए त्याग दिया जाता है तो संगठनों की विश्वसनीयता कम हो जाती है।
- विश्वास जितनी तीव्रता से निर्मित होता है, उससे कहीं अधिक तेज़ी से क्षरित हो जाता है।
सामाजिक और समकालीन संदर्भ
- कार्यस्थल नैतिकता
- शॉर्टकट, डेटा में हेरफेर और नैतिक अनभिज्ञता का सामान्यीकरण।
- सत्यनिष्ठा पर आधारित संस्थाएँ दीर्घकालिक वैधता बनाए रखती हैं।
- प्रौद्योगिकी और आधुनिक जीवन
- गलत सूचना, साहित्यिक चोरी और डिजिटल गुमनामी की सुलभता नैतिक संयम की परीक्षा लेती है।
- कम जवाबदेही वाले क्षेत्रों में नैतिक आचरण कठिन हो जाता है—लेकिन साथ ही साथ अधिक आवश्यक भी हो जाता है।
- लोक विश्वास
- समाज विश्वास पर संचालित होते हैं, जो सुविधा पर नहीं बल्कि सत्यनिष्ठा पर आधारित होता है।
- एक बार जब यह भंग हो जाता है, तो विश्वास को पुनः स्थापित करना कठिन होता है।
नैतिक संश्लेषण
- सुविधा प्रश्न करती है, “सबसे आसान क्या है?”
- सत्यनिष्ठा प्रश्न करती है, "सही क्या है?"
- सत्यनिष्ठा के बिना प्रगति से नैतिकता के बिना दक्षता प्राप्त होती है।
निष्कर्ष
सत्यनिष्ठा परिस्थितिजन्य नहीं, बल्कि मूलभूत गुण है। नैतिक चरित्र दबाव में लिये गए निर्णयों से आकार लेता है। सभ्यताएँ सुविधा के कारण नहीं, बल्कि अंतरात्मा के कारण कायम रहती हैं। सत्यनिष्ठा, भले ही व्ययसाध्य हो, लेकिन शक्ति का सबसे सतत रूप बनी रहती है।
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