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प्रश्न 1. दक्षता की बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के इस युग में, मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता करुणा है, पूर्णता नहीं।
13 Dec, 2025 निबंध लेखन निबंध
प्रश्न 2. न्याय सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिये, न कि जनमत पर।उत्तर :
1. दक्षता की बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के इस युग में, मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता करुणा है, पूर्णता नहीं।
अपने निबंध को समृद्ध बनाने के लिये उद्धरण:
- स्वामी विवेकानंद: बस वही लोग जीते हैं, जो दूसरों के लिये जीते हैं। बाकी सब जीवित से अधिक मृत हैं।
- महात्मा गांधी: किसी भी समाज की सच्ची पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
परिचय:
- समकालीन विश्व में शासन, बाज़ार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में गति, सटीकता एवं अनुकूलन को प्राथमिकता दी जाती है।
- जैसे-जैसे प्रणालियाँ अधिक दक्ष बनती जाती हैं, उनमें मानवीय संवेदनशीलता का क्षरण होता चला जाता है।
- यह कथन एक गहन सत्य को रेखांकित करता है कि दक्षता जहाँ कार्यक्षमता को बढ़ाती है, वहीं करुणा ही मानवता के मूल स्वरूप को जीवित रखती है।
- जैसा कि अल्बर्ट श्वित्जर ने कहा था, "मानव जीवन का उद्देश्य सेवा करना, करुणा दिखाना और दूसरों की सहायता करने की इच्छा रखना है।"
दार्शनिक और सैद्धांतिक आयाम
- साधनिक तर्कसंगतता की सीमाएँ: मैक्स वेबर ने आगाह किया था कि जब समाज तर्क और नियम-कायदों में अत्यधिक उलझ जाता है, तो वह एक 'लौह पिंजरे' के समान हो जाता है, जहाँ व्यवस्था की कुशलता के चक्कर में मानवीय भावनाएँ एवं स्वतंत्रता दम तोड़ देती हैं”।
- प्रणालियों की पूर्णता त्रुटियों को घटा सकती है, परंतु वह नैतिक विवेक और मानवीय सहानुभूति का विकल्प नहीं बन सकती।
- करुणा की नैतिकता: बौद्ध धर्म नैतिक जीवन के केंद्र में करुणा (दया) को रखता है और कठोर नियमों का पालन करने की बजाय पीड़ा के प्रति संवेदनशीलता को प्राथमिकता देता है।
- अफ्रीकी दर्शन उबंटू, जिसका अर्थ है- “मैं हूँ, क्योंकि हम हैं।”, व्यक्तिगत उत्कृष्टता के बजाय संबंधपरक मानवता पर ज़ोर देता है।
- हन्ना एरेंड्ट ने तर्क दिया कि नैतिक पतन को तकनीकी दक्षता नहीं बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी रोकती है।
- नैतिक वास्तविकता के रूप में मानवीय अपूर्णता
- हम विश्व को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत दृष्टि और अनुभवों के रंग में देखते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि मानवीय चेतना और अनुभूतियों को किसी एक 'मानकीकृत साँचे' (Standardized Template) में नहीं ढाला जा सकता।
- करुणा त्रुटियों को स्वीकार करती है, जबकि पूर्णता एकरूपता की मांग करती है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:
- करुणा के बिना दक्षता
- 20वीं सदी की सर्वसत्तावादी (Totalitarian) सत्ताओं ने यह सिद्ध कर दिया कि जब प्रशासनिक कुशलता मानवीय संवेदनाओं से कट जाती है, तो वह विनाश का सबसे सटीक हथियार बन जाती है।
- होलोकॉस्ट ने यह उजागर किया कि तकनीकी रूप से अत्यंत दक्ष और त्रुटिरहित प्रणालियाँ भी गहरे नैतिक विवेकहीनता के साथ साथ चल सकती हैं।
- नैतिक प्रतिरोध के रूप में करुणा:
- महात्मा गांधी ने दक्ष हिंसा और दमन को अस्वीकार करते हुए यह प्रतिपादित किया कि मानवीय साधन न्यायपूर्ण उद्देश्यों से अविभाज्य होते हैं।
- नेल्सन मंडेला ने राजनीतिक शक्ति का प्रयोग प्रतिशोध के लिये नहीं, बल्कि मेल-मिलाप के लिये किया और प्रशासनिक त्वरितता से ऊपर उपचार और सुलह को महत्त्व दिया।
शासन और सार्वजनिक नीति
- कल्याण एवं प्रशासन
- नियमों से अत्यधिक बंधे कल्याणकारी तंत्र अक्सर प्रक्रियात्मक कठोरता के कारण सबसे कमज़ोर लोगों को बाहर कर देते हैं।
- करुणापूर्ण शासन यांत्रिक अनुपालन लागू करने के बजाय नीतियों को वास्तविकताओं के अनुरूप ढालता है।
- लोकतांत्रिक सशक्तीकरण
- सूचना का अधिकार अधिनियम सूचना को नियंत्रित करने के बजाय पारदर्शिता के साथ नागरिकों पर भरोसा करके करुणा को दर्शाता है।
- JAM ट्रिनिटी की पहल से पता चलता है कि जब प्रशासनिक शक्ति को समावेशिता द्वारा निर्देशित किया जाता है, तो यह दक्षता को मानवीय रूप दे सकती है।
- संकट प्रबंधन
- आपदा राहत कार्यों में केवल आँकड़ों और समय-सीमा पर ध्यान केंद्रित करने से आघात एवं गरिमा की अनदेखी का खतरा रहता है।
- मानवीय राहत कार्य में दक्षता के साथ-साथ देखभाल, संचार और सामुदायिक विश्वास को प्राथमिकता दी जाती है।
प्रौद्योगिकी और समकालीन समाज
- एल्गोरिदमिक निर्णय-निर्माण:
- AI और स्वचालन उच्च सटीकता प्रदान करने का दावा करते हैं, लेकिन उनमें मानवीय सहानुभूति निहित नहीं होती।
- संदर्भ और परिस्थितियों की समझ के अभाव में स्वचालित भर्ती, पुलिसिंग तथा ऋण प्रणालियाँ बहिष्करण की प्रवृत्तियों को और गहरा कर सकती हैं।
- स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा
- मानकीकृत प्रोटोकॉल परिणामों में सुधार करते हैं, परंतु रोगी देखभाल और शिक्षण में करुणापूर्ण विवेक अनिवार्य बना रहता है।
- पूर्णता-केंद्रित मापदंड अक्सर भावनात्मक श्रम और मानवीय जुड़ाव के महत्त्व को कम आँकते हैं।
- कॉर्पोरेट संस्कृति:
- अति-दक्षता और उद्देश्य का ह्रास अंततः मानसिक रिक्तता, अपनों से अलगाव एवं जीवन के मूल उद्देश्य के विस्मरण का कारण बनती है।
लाओ त्ज़ु के अनुसार, दयालुता केवल एक व्यवहार नहीं, बल्कि एक निर्माण प्रक्रिया है: शब्दों की कोमलता आपसी विश्वास की नींव रखती है, चिंतन की करुणा विचारों में गहराई लाती है और देने का भाव प्रेम को जीवंत करता है।
- अति-दक्षता और उद्देश्य का ह्रास अंततः मानसिक रिक्तता, अपनों से अलगाव एवं जीवन के मूल उद्देश्य के विस्मरण का कारण बनती है।
नैतिकत समन्वय: मानवीय दृष्टिकोण के साथ दक्षता
- दक्षता मात्र एक उपकरण है, जबकि करुणा ही वह अंतिम मूल्य (Value) है।
- जहाँ 'पूर्णता' (Perfection) का लक्ष्य केवल त्रुटिरहित प्रणालियों का निर्माण करना है, वहीं 'करुणा' का ध्येय एक गरिमापूर्ण और मानवीय जीवन सुनिश्चित करना है।
- वास्तविक और सतत प्रगति केवल तभी संभव है जब दक्षता का संचालन 'सहानुभूति' द्वारा हो, न कि भावनाशून्य अनुकूलन (Indifferent Optimization) द्वारा।
निष्कर्ष:
- मापदंडों और मशीनों के प्रभुत्व वाले इस युग में, करुणा ही मानवीय क्षमता का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू बनी हुई है।
- व्यवस्थाएँ मानवीय अपूर्णताओं को दूर करने में नहीं, बल्कि उन्हें समझदारी से स्वीकारने में निहित है।
- जैसा कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने याद दिलाया, "जीवन का सबसे निरंतर और महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है: आप दूसरों के लिये क्या कर रहे हैं?"
2. न्याय सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिये, न कि जनमत पर।
अपने निबंध को समृद्ध बनाने के लिये उद्धरण:
- प्लेटो: "न्याय का अर्थ है अपने कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना और दूसरों के मामलों में हस्तक्षेप न करना।"
- इमैनुअल कांट: "कानून की दृष्टि में, एक व्यक्ति तब दोषी है जब वह दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करता है।"
- महात्मा गांधी: "अंतरात्मा के मामलों में, बहुमत के कानून का कोई स्थान नहीं है।"
- जॉन रॉल्स: "सामाजिक संस्थाओं का प्रथम गुण 'न्याय' है, ठीक वैसे ही जैसे विचार प्रणालियों का प्रथम गुण 'सत्य' होता है।"
परिचय:
- न्याय किसी भी सभ्य समाज की नैतिक रीढ़ होता है, जो निष्पक्षता, अधिकारों और मानवीय गरिमा को सुनिश्चित करता है।
लोकतंत्र में जनमत का महत्त्व अवश्य है, किंतु वह प्रायः अस्थिर, भावनात्मक तथा पूर्वाग्रह या भ्रामक सूचना से प्रभावित होता है। - यह कथन रेखांकित करता है कि न्याय की वैधता जन-समर्थन से नहीं, बल्कि स्थायी और सार्वकालिक सिद्धांतों से प्राप्त होती है।
- जैसा कि प्लेटो ने कहा है, “न्याय का अर्थ है अपने कार्य में लगे रहना और दूसरों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करना।”
दार्शनिक और सैद्धांतिक आधार
- विधि का शासन बनाम बहुमत का शासन
- कानून के शासन के लिये निरंतरता, पूर्वानुमेयता और विधि के समक्ष समानता की आवश्यकता होती है।
- जनमत बहुमत की इच्छा को प्रतिबिंबित कर सकता है, लेकिन न्याय अलोकप्रिय अल्पसंख्यकों की भी रक्षा करता है।
- प्राकृतिक न्याय और नैतिक सार्वभौमिकता
- जॉन रॉल्स जैसे विचारकों ने न्याय को निष्पक्षता के रूप में महत्त्व दिया, जो सामाजिक दबावों के बजाय निष्पक्ष सिद्धांतों पर आधारित है।
- इमैनुअल कांट ने तर्क दिया कि नैतिक कार्यों का मार्गदर्शन कर्त्तव्य और सार्वभौमिक सिद्धांतों द्वारा किया जाना चाहिये, न कि परिणामों या लोकप्रियता द्वारा।
- भारतीय दार्शनिक परिप्रेक्ष्य
- भारतीय चिंतन में धर्म क्षणिक सामाजिक स्वीकृति से परे नैतिक व्यवस्था और धार्मिक आचरण का प्रतिनिधित्व करता है।
- जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, "अन्यायपूर्ण कानून स्वयं एक प्रकार की हिंसा है," उन्होंने स्वीकार्यता की अपेक्षा सिद्धांत पर ज़ोर दिया।
ऐतिहासिक उदाहरण: जब सिद्धांतों द्वारा जनमत को चुनौती दी गई
- औपनिवेशिक और सामाजिक न्याय
- सती प्रथा और बाल विवाह के उन्मूलन को जनता के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन ये नैतिक रूप से आवश्यक सुधार थे।
- राजा राम मोहन रॉय ने प्रचलित रीति-रिवाज़ों के विरुद्ध तर्कसंगत और नैतिक सिद्धांतों का समर्थन किया।
- न्यायिक साहस
- अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय का ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजुकेशन मामले में दिया गया फैसला लोकप्रिय अलगाववादी भावना के खिलाफ गया लेकिन संवैधानिक समानता को बरकरार रखा।
- विश्व भर की अदालतों ने अक्सर जनता के आक्रोश के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा की है।
- भारतीय संवैधानिक अनुभव
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि यदि सार्वजनिक नैतिकता संवैधानिक नैतिकता से अलग हो जाती है तो लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता हैं।
- मौलिक अधिकार बहुसंख्यक मत के अत्याचार के खिलाफ सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं।
न्याय, जनमत और लोकतंत्र
- जनमत का महत्त्व
- लोकतांत्रिक भागीदारी और जवाबदेही के लिये जनमत अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- हालाँकि यह नैतिक दिशा-निर्देशक नहीं है और गलत सूचना, भय या लोकलुभावनवाद से प्रभावित हो सकता है।
- लोकलुभावन न्याय के खतरे
- मीडिया ट्रायल और भीड़ द्वारा न्याय करना निष्पक्ष प्रक्रिया एवं निर्दोषता की धारणा को कमज़ोर करता है।
- त्वरित सार्वजनिक फैसले अक्सर सबूतों, आनुपातिकता और पुनर्वास की अनदेखी करते हैं।
- संवैधानिक नैतिकता
- न्यायपालिका संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने के लिये बाध्य है, भले ही वे अलोकप्रिय हों
- जैसा कि न्यायमूर्ति HR खन्ना ने आपातकाल के दौरान प्रदर्शित किया, सिद्धांत आधारित न्याय के लिये व्यक्तिगत बलिदान की आवश्यकता हो सकती है।
समकालीन प्रासंगिकता
- सोशल मीडिया और जनमत का दबाव
- वायरल आक्रोश संस्थानों पर जल्दबाज़ी या प्रतीकात्मक कार्रवाई करने का दबाव डाल सकता है।
- रुझानों पर आधारित न्याय प्रणाली असंगत और मनमानी होने का जोखिम रखती है।
- मानवाधिकार और अल्पसंख्यक संरक्षण
- LGBTQ+ अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निवारक हिरासत जैसे मुद्दों के लिये सैद्धांतिक न्यायनिर्णय की आवश्यकता होती है।
- न्यायालय अक्सर अधिकारों की रक्षा के लिये बहुसंख्यकवाद विरोधी संस्थाओं के रूप में कार्य करते हैं।
- वैश्विक परिप्रेक्ष्य
- अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित है, न कि राष्ट्रीय लोकप्रियता पर
- प्रतिशोधात्मक न्याय की मांगों के बावजूद नेल्सन मंडेला ने सुलह और विधि के शासन का समर्थन किया।
नैतिक समन्वय: अभिव्यक्ति और मूल्यों के बीच संतुलन
- जनमत शासन को दिशा प्रदान करता है: सिद्धांत न्याय का मार्गदर्शन करते हैं।
- न्याय को समाज की बात सुननी चाहिये, लेकिन उसके सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिये।
- स्थायित्वपूर्ण वैधता नैतिक संगति से उत्पन्न होती है, न कि जनमानस की स्वीकृति से।
निष्कर्ष: न्याय के नैतिक मूल सिद्धांतों को बनाए रखना
- इतिहास साक्षी है कि जनमत समय के साथ बदलता रहता है, किंतु अन्याय के दुष्परिणाम स्थायी होते हैं।
- सिद्धांतनिष्ठ न्याय पीढ़ियों तक स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और समानता की रक्षा करता है।
- वास्तव में न्यायपूर्ण समाज वही है जहाँ सिद्धांत सर्वोच्च स्थान पर हों, चाहे उस क्षण वे अल्पमत में ही क्यों न हों।
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