दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    निबंध:

    प्रश्न 1. वास्तविक खोज-यात्रा का सार नये परिदृश्यों को ढूंढने में नहीं बल्कि नयी दृष्टि विकसित करने में निहित है।

    प्रश्न 2. शक्ति का अर्थ तभी सार्थक बनता है जब वह दूसरों के सशक्तीकरण का माध्यम बने।

    06 Dec, 2025 निबंध लेखन निबंध

    उत्तर :

    1. वास्तविक खोज-यात्रा का सार नए परिदृश्यों को ढूंढने में नहीं बल्कि नई दृष्टि विकसित करने में निहित है।

    अपने निबंध को समृद्ध बनाने के लिये उद्धरण:

    • मार्सेल प्राउस्ट: "खोज की वास्तविक यात्रा नए परिदृश्यों की तलाश में नहीं, बल्कि नई दृष्टि प्राप्त करने में निहित होती है।"
    • विलियम ब्लेक: "एक रेत के कण में संपूर्ण विश्व और एक जंगली पुष्प में स्वर्ग को देखना, अनंत को अपनी हथेली में थामे रखते हुए एक क्षण में अनंतता को अनुभव करने के सामान है।"
    • अनेइस निन: हम चीज़ों को वैसे नहीं देखते जैसी वे हैं, हम उन्हें वैसे देखते हैं जैसे हम स्वयं हैं।   

    सैद्धांतिक और दार्शनिक आयाम:

    • यथार्थ के आधार के रूप में धारणा:
      • इमैनुएल कांट के दर्शन के अनुसार, मनुष्य संसार का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करता, बल्कि उसे अपनी मानसिक संरचनाओं के माध्यम से अनुभव करता है जिन्हें 'प्रत्यय' कहा गया है। अतः दृष्टिकोण में परिवर्तन होते ही संसार का अनुभव भी परिवर्तित हो जाता है।
      • वैज्ञानिक प्रतिमान परिवर्तन: विज्ञान में प्रगति प्रायः नए तथ्यों की खोज से नहीं, बल्कि पुराने आँकड़ों/तथ्यों को नए दृष्टिकोण से देखने से होती है। उदाहरण के लिये, कोपरनिकस ने सौरमंडल को पृथ्वी-केंद्रित न मानकर सूर्य-केंद्रित रूप में देखा जिससे वैज्ञानिक समझ में क्रांतिकारी परिवर्तन आया।
    • सचेतनता और सराहना:
      • ज़ेन दर्शन: जापान में विकसित बौद्ध दर्शन की महत्त्वपूर्ण शाखा ज़ेन (Zen) में 'शोशिन' अर्थात् 'नवीन चेतना' (प्रत्यक्ष अनुभव, आत्मिक बोध तथा चित्त की सजगता) की अवधारणा पर बल दिया गया है, जिसमें जीवन को खुले मन से और बिना किसी पूर्वाग्रह के देखा जाता है।
      • थिच न्हात हान्ह: उन्होंने सीख दिया कि चमत्कार पानी पर चलना नहीं है, बल्कि पूर्ण जागरूकता के साथ हरी-भरी धरती पर चलना है।  
    • विपरीत परिस्थितियों की पुनर्व्याख्या:
      • स्टोइक दर्शन (मार्कस ऑरेलियस): घटनाएँ तटस्थ होती हैं; उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण ही दुख का कारण बनता है। नए दृष्टिकोण से हम बाधाओं को अवसरों के रूप में देख सकते हैं।

    नीति और ऐतिहासिक उदाहरण:

    • प्रतिरोध की पुनर्परिभाषा (भारतीय स्वतंत्रता संग्राम):
      • गांधी का सत्याग्रह: जहाँ अन्य लोग बल को केवल शारीरिक हिंसा के रूप में देखते थे (युद्ध का एक नया स्वरूप तलाशते हुए), वहीं गांधी ने नैतिक सत्य को एक शक्ति के रूप में देखा। इस नए दृष्टिकोण ने वैश्विक स्तर पर राजनीतिक विरोध के स्वरूप को बदल दिया।
    • संसाधन प्रबंधन और अर्थशास्त्र:
      • जनांकिकीय लाभांश: माल्थस के सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या वृद्धि एक आपदा (अधिक लोगों को भोजन देना) थी। 
        • आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने इसे मानव पूंजी (काम करने के लिये अधिक लोग) के रूप में नए नज़रिये से देखा, जिससे एशियाई टाइगर्स (पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ जैसे: दक्षिण कोरिया, ताइवान,हांगकांग, सिंगापुर) के आर्थिक संवृद्धि का मार्ग प्रशस्त हुआ।
      • अपशिष्ट से संपदा: चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल अपशिष्ट को एक ऐसी वस्तु के रूप में नहीं देखता जिसे फेंक दिया जाए, बल्कि एक ऐसे संसाधन के रूप में देखता है जिसका उपयोग किया जा सकता है।
    • सामाजिक सुधार आंदोलन:
      • राजा राम मोहन रॉय: उन्होंने किसी नए धर्म की खोज नहीं की, बल्कि प्राचीन ग्रंथों को तर्कसंगत दृष्टि से अध्ययन कर सती प्रथा का विरोध किया और स्त्रियों के अधिकारों की वकालत की।

    समकालीन उदाहरण:

    • तकनीकी परिवर्तन:
      • दूरस्थ कार्य (कोविड के बाद): कोविड-19 के बाद विश्व में दूरस्थ कार्यव्यवस्था ने कार्यालय को एक भौतिक स्थान के बजाय डिजिटल मंच के रूप में देखने की नई दृष्टि दी, जिससे कार्य-जीवन संतुलन की अवधारणा में व्यापक परिवर्तन आया।
      • Uber/Airbnb: Uber व Airbnb जैसी कंपनियों ने न तो नई गाड़ियाँ बनाईं और न ही नए होटल, बल्कि मौजूदा निष्क्रिय संसाधनों को नई दृष्टि से देखकर 'शेयरिंग इकोनॉमी’ (साझा अर्थव्यवस्था) की नींव रखी।
    • दिव्यांग जनों के अधिकार:
      • दिव्यांग जनों का सामाजिक मॉडल: दिव्यांगता का सामाजिक मॉडल दिव्यांगता को व्यक्ति की चिकित्सकीय कमी के रूप में नहीं, बल्कि समाज की संरचनात्मक दोष (रैंप की कमी, सुलभ तकनीक का अभाव) के रूप में देखता है। दृष्टिकोण में यह परिवर्तन समावेशिता की दिशा में निर्णायक कदम सिद्ध होता है।

    2. शक्ति का अर्थ तभी सार्थक बनता है जब वह दूसरों के सशक्तीकरण का माध्यम बने।

    अपने निबंध को समृद्ध बनाने के लिये उद्धरण:

    • लाओ त्ज़ू: "सर्वश्रेष्ठ नेता वह होता है जिसके अस्तित्व का लोगों को लगभग आभास भी नहीं होता। जब उसका कार्य पूर्ण हो जाता है और उद्देश्य सिद्ध हो जाता है, तब लोग कहते हैं — यह हमने स्वयं किया।"
    • अब्राहम लिंकन: लगभग सभी व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं, किंतु यदि किसी व्यक्ति के चरित्र की परीक्षा लेनी हो, तो उसे शक्ति प्रदान कीजिये।”
    • रॉबर्ट जी. इंगरसोल: "हम दूसरों को ऊपर उठाकर स्वयं ऊपर उठते हैं।"

    सैद्धांतिक और दार्शनिक आयाम:

    • सेवक नेतृत्व बनाम सत्तावादी नेतृत्व:
      • रॉबर्ट ग्रीनलीफ द्वारा प्रतिपादित 'सेवक नेतृत्व' की अवधारणा यह तर्क देती है कि नेतृत्व का प्राथमिक उद्देश्य सेवा है। सत्ता प्रतिष्ठा या वर्चस्व का साधन नहीं, बल्कि जनसेवा का उपकरण है।
    • ट्रस्टीशिप (न्यास) की अवधारणा:
      • महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित 'ट्रस्टीशिप’ (न्यास) का सिद्धांत यह मानता है कि संपन्न और सत्ताधारी वर्ग अपने संसाधनों का स्वामी नहीं, बल्कि जनकल्याण हेतु उनका न्यासी होता है।
    • उबंटू दर्शन (अफ्रीकी मानवतावाद): 
      • मैं इसलिये हूँ क्योंकि हम हैं। इस दर्शन के अनुसार किसी व्यक्ति की सत्ता और मानवता समुदाय के सशक्तीकरण से अविभाज्य रूप से जुड़ी होती है।

    नीति और ऐतिहासिक उदाहरण:

    • राजनीतिक सत्ता का रचनात्मक उपयोग:
      • नेल्सन मंडेला: उन्होंने रंगभेद के उत्पीड़कों के खिलाफ प्रतिशोध के लिये सत्ता का उपयोग करने के बजाय, सत्य और सुलह आयोग के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिये इसका उपयोग किया।  
      • नेल्सन मंडेला: रंगभेद नीति के उत्पीड़कों के विरुद्ध प्रतिशोध की राजनीति अपनाने के स्थान पर, उन्होंने सत्य और सुलह आयोग के माध्यम से सत्ता का उपयोग राष्ट्र के सशक्तीकरण एवं नैतिक पुनर्निर्माण के लिये किया।
      • सम्राट अशोक: कलिंग युद्ध के पश्चात उन्होंने सैन्य विजय (दिग्विजय) के मार्ग को त्यागकर नैतिक उत्थान (धर्मविजय) का पथ अपनाया तथा कल्याणकारी नीतियों और नैतिक मूल्यों के माध्यम से प्रजा को सशक्त किया।
    • स्वार्थपरक सत्ता की विफलताएँ:
      • अधिनायकवादी शासन (हिटलर): एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण व्यापक जनसमूह के सशक्तीकरण के स्थान पर उनके दमन और विनाश का कारण बना।
      • सामंतवाद: यह ऐसी व्यवस्था थी जिसमें सत्ता का उपयोग दासों को सशक्त करने के बजाय उनसे मूल्य के लिये किया गया, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक जड़ता और अंततः विद्रोह उत्पन्न हुआ।

    समकालीन उदाहरण:

    • शासन और कल्याण:
      • जन धन-आधार-मोबाइल (JAM Trinity): राज्य ने अपनी प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग बैंकिंग सुविधाओं से वंचित आबादी को नियंत्रित करने के बजाय वित्तीय पहचान और प्रत्यक्ष लाभों के साथ सशक्त बनाने के लिये किया।
      • सूचना का अधिकार (RTI): सरकार द्वारा नागरिकों के साथ सत्ता का साझा किया जाना, जिससे वे सार्वजनिक प्राधिकारों को उत्तरदायी बनाने में सक्षम हो सके।
    • कॉर्पोरेट और सामाजिक क्षेत्र:
      • सूक्ष्म-वित्त (ग्रामीण बैंक): मोहम्मद यूनुस ने बैंकिंग की शक्ति का उपयोग ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण हेतु किया, यह सिद्ध करते हुए कि ऋण एक मौलिक मानवीय आवश्यकता है।
      • ओपन सोर्स आंदोलन: लिनक्स (Linux) या विकिपीडिया (Wikipedia) जैसे मंचों के डेवलपर्स ने अपनी बौद्धिक शक्ति को पेटेंट के माध्यम से सीमित करने के बजाय सार्वजनिक रूप से साझा किया, जिससे समस्त समाज सशक्त हुआ।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
Share Page
images-2
images-2