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प्रश्न :
निबंध विषय
प्रश्न 1. वास्तविक खोज-यात्रा नये परिदृश्यों की तलाश में नहीं बल्कि नए दृष्टिकोण धारण करने में निहित होती है।
प्रश्न 2. न्याय मानवता की प्रथम शर्त है।
29 Nov, 2025 निबंध लेखन निबंधउत्तर :
1. वास्तविक खोज-यात्रा नये परिदृश्यों की तलाश में नहीं बल्कि नए दृष्टिकोण धारण करने में निहित होती है।
आपके निबंध को समृद्ध करने के लिये उद्धरण:
- विलियम ब्लेक: “रेत के एक कण में दुनिया और एक जंगली फूल में स्वर्ग को देखना, अपनी हथेली में अनंतता को थामना और एक क्षण में शाश्वतता को अनुभव करने जैसा है।”
- एनाइस निन: "हम वस्तुओं को वैसे नहीं देखते जैसी वे हैं बल्कि वैसे देखते हैं जैसे हम स्वयं हैं।"
- महात्मा गांधी: "जो बदलाव आप दुनिया में देखना चाहते हैं, वह बदलाव आप स्वयं बनें।"
(यह कथन इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि बाह्य परिवर्तन से पूर्व आंतरिक परिवर्तन आवश्यक है।)
सैद्धांतिक और दार्शनिक आयाम:
- ज्ञानमीमांसा और बोध (Epistemology and Perception):
- इमैनुअल कांट का दर्शन का दर्शन यह प्रतिपादित करता है कि हम संसार का अनुभव अपनी मानसिक संरचनाओं के माध्यम से करते हैं; इन संरचनाओं में परिवर्तन होने पर हमारी वास्तविकता की अनुभूति भी बदल जाती है।
- निर्माणवाद (Constructivism) का तर्क है कि 'सत्य' और 'खोज' प्रायः बाह्य खोज न होकर आंतरिक बोध एवं अनुभूति का परिणाम होती हैं।
- दृष्टि और अंतर्दृष्टि के बीच का अंतर (The Difference Between Sight and Insight):
- भारतीय दर्शन में दर्शन का अर्थ केवल किसी देवता या सत्य को "देखना" नहीं है, बल्कि एक ऐसा रहस्योद्घाटन अनुभव करना है जो किसी के विश्वदृष्टिकोण को बदल देता है। भारतीय दर्शन में 'दर्शन' का अर्थ केवल किसी देवता या सत्य को देखना नहीं है बल्कि ऐसा अनुभव प्राप्त करना है जो व्यक्ति के विश्वदृष्टिकोण को रूपांतरित कर दे।
- प्लेटो की गुफा की रूपक कथा: प्लेटो की 'गुफा की उपमा (Allegory of the Cave)' में यात्रा का अर्थ भौतिक रूप से गुफा से बाहर जाना नहीं था बल्कि यह बौद्धिक बोध था कि दीवार पर दिखने वाली छायाएँ ही वास्तविकता नहीं हैं।
- वैज्ञानिक प्रतिमान परिवर्तन (Scientific Paradigm Shifts):
- थॉमस कुह्न की वैज्ञानिक क्रांतियों की संरचना: थॉमस कून की कृति “The Structure of Scientific Revolutions” के अनुसार प्रगति केवल अधिक आँकड़े (परिदृश्य) एकत्र करने से नहीं होती, बल्कि प्रतिमानों (नई दृष्टि) को बदलने से होती है अर्थात् 'नए दृष्टिकोण' से देखने से। उदाहरणस्वरूप न्यूटनियन भौतिकी से क्वांटम यांत्रिकी की ओर संक्रमण।
नीतिगत और ऐतिहासिक उदाहरण:
- संसाधनों का पुनर्परिभाषण (Reframing Resources):
- जापान का औद्योगीकरण: प्राकृतिक संसाधनों के अभाव (भूदृश्यों) में जापान ने 'नई दृष्टि' अपनाकर मानव पूँजी एवं प्रौद्योगिकी को अपनी वास्तविक संपदा माना और एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा।
- इज़रायल की कृषि: इज़रायल में मरुस्थल को बंजर भूमि मानने के बजाय ड्रिप-सिंचाई जैसी तकनीकी दृष्टि से देखा गया और उसे कृषि योग्य उपजाऊ भूमि में रूपांतरित किया गया।
- ऐतिहासिक सामाजिक सुधार:
- राजा राम मोहन राय: उन्होंने शास्त्रों को नहीं बदला, बल्कि सती प्रथा को समाप्त करने के लिये तर्क और मानवता की "नई दृष्टि " से उन्हें देखा
- पुनर्जागरण: पुनर्जागरण की शुरुआत नए भूभागों की खोज से नहीं हुई, बल्कि मानव क्षमता (मानववाद) और शास्त्रीय कलाओं के प्रति एक नए दृष्टिकोण से हुई।
- राजा राम मोहन राय: उन्होंने धर्मग्रंथों को बदला नहीं बल्कि तर्क एवं मानवीयता की 'नई दृष्टि' से उनकी व्याख्या की, जिससे सती प्रथा का उन्मूलन संभव हुआ।
- पुनर्जागरण (The Renaissance): पुनर्जागरण की शुरुआत नए भू-भागों की खोज से नहीं हुई, बल्कि मानव क्षमता (मानवतावाद) और शास्त्रीय कलाओं के प्रति एक नए दृष्टिकोण से हुई।
समकालीन उदाहरण:
- पर्यावरणीय प्रतिमान (चक्रीय अर्थव्यवस्था):
- अपशिष्ट से संपदा: परंपरागत रूप से, अपशिष्ट को त्याज्य वस्तु माना जाता था। चक्रीय अर्थव्यवस्था की 'नई दृष्टि' अपशिष्ट को कच्चे माल के रूप में देखती है, जैसे: प्लास्टिक से सड़कें या ईंधन बनाना।
- अंतर्राष्ट्रीय संबंध:
- हिंद-प्रशांत रणनीति: भारतीय महासागर की भौगोलिक स्थिति नहीं बदली बल्कि वैश्विक रणनीतिक दृष्टि बदली, जिसने इसे अलग-अलग महासागरों के बजाय एक एकीकृत भू-राजनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा।
- सामाजिक न्याय और समावेशन:
- दिव्यांगजन: दिव्यांगता को केवल चिकित्सकीय दोष मानने के स्थान पर सामाजिक अधिकारों का विषय मानने की प्रवृत्ति (Social Model of Disability) समावेशन की दिशा में 'नई दृष्टि' का उदाहरण है।
2. न्याय मानवता की प्रथम शर्त है।
आपके निबंध को समृद्ध करने के लिये उद्धरण:
- मार्टिन लूथर किंग जूनियर: “कहीं भी होने वाला अन्याय हर जगह न्याय के लिये खतरा है।”
- जॉन रॉल्स: "न्याय सामाजिक संस्थाओं का पहला सद्गुण है, जैसे सत्य विचार प्रणालियों का पहला सद्गुण है।"
- वोले सोयिंका: “न्याय मानवता की पहली शर्त है।” (स्वयं विषय-वाक्य)
सैद्धांतिक और दार्शनिक आयाम:
- सामाजिक अनुबंध की नींव:
- हॉब्स, लॉक और रूसो जैसे विचारकों के अनुसार, मनुष्य ने 'प्राकृतिक अवस्था' (अराजकता) से 'सभ्य समाज' (मानवता) की ओर मुख्यतः न्याय एवं अधिकारों की सुरक्षा के लिये संक्रमण किया है।
- न्याय के अभाव में समाज 'मत्स्यन्याय' (मछलियों का सिद्धांत, शक्तिशाली दुर्बल को निगल जाता है) की अवस्था में पहुँच जाता है, जहाँ संस्थागत संरक्षण के कमजोर पड़ते ही बलवान वर्ग सत्ता संसाधनों व अधिकारों पर एकाधिकार कर लेता है और कमज़ोर तबकों का शोषण सामान्य सामाजिक व्यवहार बन जाता है।
- नीति बनाम न्याय (अमर्त्य सेन):
- ‘नीति’ का तात्पर्य संगठनात्मक शुचिता और आचरणगत शुद्धता से है, जबकि 'न्याय' का अर्थ वास्तविक और प्रत्यक्ष न्याय से है। मानवता के लिये केवल कानूनों का अस्तित्व पर्याप्त नहीं है, बल्कि अन्याय का वास्तविक उन्मूलन आवश्यक है।
- धर्म ब्रह्मांडीय न्याय के रूप में:
- भारतीय दर्शन में 'धर्म' जगत को धारण करता है अर्थात धर्म ही संसार का आधार है। जब न्याय (धर्म) का पतन होता है, तब मानवता एक अस्तित्वगत संकट (युगांत) का सामना करती है।
नीति और ऐतिहासिक उदाहरण:
- न्याय से वंचित करने के परिणाम:
- फ्राँसीसी क्रांति (1789): राजतंत्र आर्थिक और सामाजिक न्याय प्रदान करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप समाज का हिंसक पुनर्गठन हुआ।
- भारत का विभाजन (1947): समुदायों के बीच राजनीतिक न्याय और सुरक्षा की भावना सुनिश्चित करने में विफलता के कारण इतिहास के सबसे त्रासद प्रवासों में से एक के रूप में घटित हुआ।
- पुनर्स्थापनात्मक न्याय और उपचार (Restorative Justice and Healing):
- दक्षिण अफ्रीका का सत्य और सुलह आयोग: रंगभेद के बाद केवल दण्ड पर नहीं, बल्कि न्याय के माध्यम से पीड़ितों और अपराधियों दोनों की मानवीय मूल्यबोध की पुनर्स्थापना पर बल दिया गया।
- न्यूरेंबर्ग ट्रायल्स: यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि मानवता के विरुद्ध अपराधों के संदर्भ में ‘आदेशों का पालन करना’ कोई वैध औचित्य नहीं माना जा सकता क्योंकि न्याय किसी भी प्रशासनिक या पदानुक्रमिक बाध्यता से ऊपर होता है।
समकालीन उदाहरण:
- जलवायु न्याय (CBDR):
- सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ: 'साझा लेकिन विभेदित दायित्व' का सिद्धांत— ग्लोबल साउथ का तर्क है कि न्याय के बिना मानवता जलवायु परिवर्तन की समस्या से नहीं निपट सकती; अर्थात विकसित देशों को अपने ऐतिहासिक उत्सर्जनों के लिये कीमत चुकानी चाहिये।
- आर्थिक असमानता:
- सार्वभौमिक बुनियादी आय (UBI) पर बहस: AI और स्वचालन के युग में आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना मानव गरिमा की रक्षा एवं सामाजिक पतन को रोकने की एक आवश्यक शर्त बनता जा रहा है।
- डिजिटल अधिकार:
- एक मूल अधिकार के रूप में निजता (पुट्टास्वामी निर्णय) का अधिकार: डिजिटल युग में न्याय का अर्थ अपने व्यक्तिगत आँकड़ों और डिजिटल पहचान पर व्यक्ति के नियंत्रण की मान्यता से भी है।
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