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प्रश्न 1. रेत के एक कण में संसार को देख पाना सरलता की सर्वोच्च उपलब्धि है। (1200 शब्द)
22 Nov, 2025 निबंध लेखन निबंध
प्रश्न 2. सोशल मीडिया ने ध्यान को हथियार बना दिया है; आप जिस पर ध्यान लगाते हैं वही आपको नियंत्रित करता है। (1200 शब्द)उत्तर :
1. रेत के एक कण में संसार को देख पाना सरलता की सर्वोच्च उपलब्धि है। (1200 शब्द)
परिचय:
एक वैज्ञानिक ने अपने बचपन की स्मृति साझा करते हुए बताया कि वह समुद्र तट पर घंटों तक सीपियाँ इकट्ठा करता था, परंतु उसे सबसे अधिक विस्मित उस सूक्ष्म रेत-कण ने किया, जिसे उसने आवर्धक लेंस के नीचे देखा। उस छोटे से कण में उसे छिपे हुए प्रतिरूप और एक ऐसा सूक्ष्म संसार दिखाई दिया, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था। यह उसके लिये पहला बौद्धिक सबक था कि गहन और सारगर्भित सत्य प्रायः सबसे सरल वस्तुओं में निहित होते हैं। यह अनुभव विलियम ब्लेक के विचार से साम्य रखता है कि ‘रेत के एक कण में संपूर्ण विश्व को देख पाना’ केवल काव्यात्मक कल्पना नहीं है, बल्कि यह इस तथ्य की ओर संकेत है कि जब सरलता को गहराई से समझा जाता है, तब वही अंतर्दृष्टि, अर्थ और प्रज्ञा (ज्ञान) का प्रवेश-द्वार बन जाती है।
मुख्य भाग:
सरलता एक उन्नत दृष्टि के रूप में
- दार्शनिक व्याख्या:
- सरलता स्पष्टता की ओर ले जाती है; अनावश्यक जटिलताओं से विमुक्त होकर ही यथार्थ का साक्षात्कार संभव होता है।
- पूर्वी दर्शन-परंपराएँ, जैसे: बौद्ध और वेदांत दर्शन, आत्मबोध और प्रबोधन के लिये सरल जीवन-पद्धति पर बल देती हैं।
- मनोवैज्ञानिक आयाम:
- सरलता संज्ञानात्मक अधिभार को कम करती है, जिससे अवबोधन की क्षमता और विवेक का विकास होता है।
- मानसिक स्पष्टता के माध्यम से व्यक्ति अधिक सूक्ष्म और सार्थक ढंग से वास्तविकता को ग्रहण कर पाता है।
- वैज्ञानिक आयाम:
- महान वैज्ञानिक आविष्कार और सिद्धांत विशाल यथार्थ को अत्यंत सरल सूत्रों में समाहित कर देते हैं।
- न्यूटन के नियम— द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता (E=mc²) जैसे सिद्धांत इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि सरलता प्रायः सत्य की ओर संकेत करती है।
सरलता ही सफलता क्यों है?
- व्यक्तिगत जीवन और चरित्र:
- मितव्ययी जीवन-शैली, सजग आचरण और भावनात्मक सरलता बेहतर मानसिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करती है।
- चरित्र में सरलता का अर्थ ईमानदारी, विनम्रता और प्रामाणिकता से है, जो व्यक्ति को आंतरिक स्थिरता प्रदान करती है।
- सृजनात्मकता और नवाचार:
- महान कला साधारण वस्तुओं में भी अनंत अर्थ खोज लेती है, जैसा कि टैगोर या वान गॉग की कृतियों में दृष्टिगोचर होता है।
- इसी प्रकार नवाचार भी जटिल समस्याओं के लिये सरल, सुरुचिपूर्ण और प्रभावी समाधान खोजने से ही विकसित होता है।
- नैतिकता और शासन:
- सरल नियम और स्पष्ट सिद्धांत जन-विश्वास को सुदृढ़ करते हैं, चाहे वह संवैधानिक नैतिकता हो या गांधीवादी नीतिशास्त्र।
- पारदर्शी योजनाएँ और सरल प्रक्रियाएँ सार्वजनिक सेवा-प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाती हैं।
- प्रौद्योगिकी और अभिकल्पना:
- “सरलता ही परम परिष्कार है” (स्टीव जॉब्स)।
- आधुनिक तकनीकी जगत में सहज और उपयोकर्त्ता-अनुकूल डिज़ाइन ने जीवन को व्यापक रूप से रूपांतरित किया है।
- समाज और पर्यावरण:
- पारिस्थितिक विवेक सरल जीवन-पद्धति में निहित है। संयम और मर्यादा पर आधारित जीवन-शैली से ही सतत विकास संभव होता है।
- परंपरागत समुदाय सरल आचरण और प्रथाओं के माध्यम से ब्रह्माण्ड के साथ सामंजस्य स्थापित करते रहे हैं।
विपरीत दृष्टिकोण: अति-सरलता की सीमाएँ या जोखिम
- अत्यधिक सरलीकरण यथार्थ को विकृत कर सकता है, क्योंकि जटिल समस्याओं के समाधान के लिये सूक्ष्म विवेचन और बहुआयामी दृष्टि आवश्यक होती है।
- जब जटिलताओं की उपेक्षा की जाती है, तब सतही कथाएँ और लोकलुभावन प्रवृत्तियाँ उभरती हैं।
- शासन-व्यवस्था में भी अत्यंत सरल समाधान संरचनात्मक कारणों को अनदेखा कर सकते हैं।
‘सरलता की विजय’ का अभिप्राय:
- वास्तविक सरलता गहन समझ का परिष्कृत सार है, न कि विचारों का अभाव।
- यह छोटी-छोटी घटनाओं में सार्वभौमिक प्रतिरूपों को पहचानने, विविध ज्ञान को समेकित करने और जीवन में संतुलित बने रहने की क्षमता है।
निष्कर्ष:
अंततः रेत के एक कण में ‘संपूर्ण विश्व को देखने’ की अवधारणा साधारण में असाधारण को पुनः खोजने का आह्वान है। यह हमें ठहरने, देखने और साधारण यथार्थों में छिपे गहरे सत्यों को समझने के लिये प्रेरित करती है। जटिलता, गति और सूचनाओं के अत्यधिक प्रवाह से भरे वर्तमान युग में, छोटे एवं दैनिक अनुभवों से अर्थ ग्रहण कर पाना एक मौन किंतु महत्त्वपूर्ण विजय है। सरलता समझ को सीमित नहीं करती, बल्कि उसे परिष्कृत बनाती है। जब मनुष्य लघु वस्तुओं में सौंदर्य, प्रज्ञा और पारस्परिक संबद्धता को पहचानना सीख लेता है, तब वह अधिक स्पष्टता, कृतज्ञता एवं सामंजस्य के साथ जीवन जीना भी सीखता है। इस प्रकार सरलता की विजय जीवन को कम करने में नहीं, बल्कि देखने की हमारी क्षमता को अधिक विस्तृत करने में निहित है।
2. सोशल मीडिया ने ध्यान को हथियार बना दिया है; आप जिस पर ध्यान लगाते हैं वही आपको नियंत्रित करता है। (1200 शब्द)
परिचय:
एक शाम, एक कॉलेज छात्र अपना फोन ‘केवल पाँच मिनट’ के लिये खोलता है, किंतु जब वह पुनः समय देखता है तो एक घंटा बीत चुका होता है। इस दौरान वह सनसनीखेज़ समाचारों, लक्षित विज्ञापनों और अतिरंजित प्रभावक जीवनशैलियों को देखते-देखते मानसिक रूप से थक चुका होता है। जो प्रक्रिया साधारण सहभागिता से आरंभ हुई थी, वह धीरे-धीरे उसके मनोभाव, विश्वासों और यहाँ तक कि उपभोग निर्णयों को भी प्रभावित करने लगती है। यह छोटी, रोज़मर्रा की घटना एक बड़े सत्य को दर्शाती है: डिजिटल युग में, ध्यान सबसे मूल्यवान वस्तु बन गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल सामग्री होस्ट नहीं कर रहे हैं; वे सक्रिय रूप से मानव ध्यान को पकड़ने, आकार देने और उसका मुद्रीकरण करने के लिये सिस्टम डिज़ाइन कर रहे हैं। यह हमें विश्लेषण करने के लिये आमंत्रित करता है कि कैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म द्वारा ध्यान को ‘हथियार’ बनाया गया है और किस प्रकार व्यक्ति जिस पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वह अंततः उनके विकल्पों, भावनाओं एवं विश्वदृष्टि को प्रभावित तथा प्रायः नियंत्रित करना शुरू कर देता है।
मुख्य भाग:
ध्यान के शस्त्रीकरण की अवधारणा को समझना
- ध्यान अर्थव्यवस्था: इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे मंच उपयोगकर्त्ताओं को अधिक समय तक संलग्न रखकर राजस्व अर्जित करते हैं।
- एल्गोरिदम मैनीपुलेशन: वैयक्तिकृत फीड ऐसे कंटेंट दिखाते हैं जो भावनाओं को उत्तेजित करती है तथा क्रोध, इच्छा या आक्रोश जैसी तीव्र भावनाओं को उकसाती है।
- उदाहरण: चुनावों के दौरान वायरल होने वाले राजनीतिक वीडियो बार-बार दिखाई देते हैं क्योंकि एल्गोरिदम विभाजनकारी कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं।
व्यक्तियों पर मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रभाव
- ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी: ऐप्स के बीच बार-बार स्विच करने से गहन एकाग्रता कमज़ोर हो जाती है।
- उदाहरण: अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले दशक में मनुष्यों की औसत ध्यान अवधि में काफी गिरावट आई है।
- डोपामाइन-चालित डिज़ाइन: लाइक, टिप्पणियाँ और अनन्त स्क्रॉल, लत उत्पन्न करने वाले चक्र निर्मित करते हैं।
- कुछ छूट जाने का डर (FOMO): फियर ऑफ मिसिंग आउट की प्रवृत्ति चिंता और बार-बार जाँच करने की आदत को बढ़ाती है।
- उदाहरण: सप्ताहांत के ‘ट्रेंडिंग इवेंट्स’ या वायरल चुनौतियाँ उपयोगकर्त्ताओं को ऐप्स पर वापस लाती हैं।
- पहचान का विरूपण: पहचान-विकृति भी एक प्रमुख समस्या है, जहाँ सजावटी और चयनित छवियाँ अवास्तविक अपेक्षाएँ उत्पन्न करती हैं।
- उदाहरण: फिल्टर और इन्फ्लुएंसर लाइफस्टाइल किशोरों में शारीरिक बनावट संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।
संज्ञानात्मक विकृतियाँ और सूचना नियंत्रण
- इको चैंबर्स और पुष्टिकरण पूर्वाग्रह: उपयोगकर्त्ता केवल वही देखते हैं जो उनके मौजूदा विश्वासों के अनुरूप होता है।
- उदाहरण: सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों या राजनीतिक बहसों के दौरान, विरोधी पक्षों को सच्चाई के बिल्कुल अलग-अलग संस्करण मिलते हैं।
- गलत सूचनाओं का प्रसार: भावनात्मक रूप से आवेशित फर्ज़ी खबरें तथ्यों की तुलना में तेज़ी से फैलती हैं।
- उदाहरण: व्हाट्सऐप पर फैली अफवाहों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भीड़ हिंसा भड़क उठी।
- ध्रुवीकृत सोच: आक्रोश पर आधारित कंटेंट को सबसे अधिक सहभागिता मिलती है।
सामाजिक ताने-बाने और लोकतंत्र पर प्रभाव
- सूक्ष्म स्तर पर लक्षित राजनीतिक विज्ञापन मतदान के पैटर्न को प्रभावित करते हैं।
- उदाहरण: कैम्ब्रिज एनालिटिका घोटाला।
- कृत्रिम आक्रोश समुदायों को विभाजित करता है और विश्वास को नष्ट करता है।
- चुनावों या राष्ट्रीय संकटों के दौरान वायरल प्रचार से जनता की धारणा विकृत हो जाती है।
- उपभोक्ता व्यवहार में मैनीपुलेशन: वैयक्तिकृत विज्ञापन ब्राउज़िंग इतिहास का फायदा उठाते हैं।
- उदाहरण: एक उपयोगकर्त्ता एक बार जूते खोजता है; हफ्तों तक, विज्ञापन विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर उसका पीछा करते रहते हैं।
नैतिक चिंताएँ
- स्वायत्तता बनाम हेरफेर: क्या विकल्प वास्तव में हमारे हैं यदि एल्गोरिदम यह तय करते हैं कि हम क्या देखते हैं?
- निजता का हनन: प्लेटफॉर्म व्यवहार का पूर्वानुमान करने के लिये व्यक्तिगत डेटा एकत्र करते हैं।
- लाभ बनाम कल्याण: कंपनियाँ स्वस्थ उपयोग से नहीं, बल्कि लत से लाभ उठाती हैं।
- अधिकार-आधारित चिंताएँ: जब उपयोगकर्त्ता डेटा प्रथाओं को नहीं समझते हैं, तो सहमति सतही हो जाती है।
सकारात्मक आयाम
- आपदाओं या आपात स्थितियों के दौरान नागरिक पत्रकारिता
- उदाहरण: केरल में आई बाढ़ के दौरान रियल टाइम अपडेट।
- सामाजिक जागरूकता और लामबंदी: हैशटैग आंदोलनों को सशक्त बनाते हैं (#MeToo)।
- रचनाकारों और उद्यमियों के लिये अवसर: छोटे व्यवसाय वैश्विक दर्शकों तक पहुँचते हैं।
- शैक्षिक कंटेंट: ऑनलाइन पाठ्यक्रम, व्याख्यात्मक कंटेंट, जन स्वास्थ्य अभियान।
आगे की राह
- डिजिटल साक्षरता: डिजिटल साक्षरता को सुदृढ़ किया जाना चाहिये, ताकि छात्रों को यह समझाया जा सके कि एल्गोरिदम व्यवहार को किस प्रकार आकार देते हैं।
- सख्त डेटा विनियमन: डेटा संरक्षण हेतु कठोर विनियमन आवश्यक है, जिसमें DPDP अधिनियम जैसे कानूनों को मज़बूत करना शामिल है।
- एल्गोरिदम पारदर्शिता: एल्गोरिदमिक पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिये, जिससे उपयोगकर्त्ताओं को यह ज्ञात हो कि उन्हें कोई कंटेंट क्यों दिखाया जा रहा है।
- नैतिक डिज़ाइन: नैतिक डिज़ाइन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जैसे समय-सीमा, फ्रिक्शन-बेस्ड डिज़ाइन और ऑटो-प्ले में कमी।
- सचेत उपयोग: सचेत उपयोग को अपनाना आवश्यक है, जिसमें डिजिटल डिटॉक्स और स्क्रीन-मुक्त समय शामिल हों।
- उदाहरण: कई कार्यस्थलों द्वारा अधिसूचना-मुक्त समय की व्यवस्था इसी दिशा में एक पहल है।
निष्कर्ष:
ऐसे विश्व में जहाँ डिजिटल मंच मानव एकाग्रता के लिये तीव्र प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं, ध्यान शक्ति की नई मुद्रा बन चुका है। व्यक्ति ऑनलाइन जिन विषयों का बार-बार उपभोग करता है, वे धीरे-धीरे उसकी भावनाओं, निर्णयों और पहचान को आकार देते हैं। इसलिये आत्म-जागरूकता और सचेत सहभागिता स्वतंत्रता के महत्त्वपूर्ण साधन बन जाते हैं। तकनीकी विकास और मानवीय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिये प्रणालीगत सुधार एवं व्यक्तिगत अनुशासन दोनों का संयुक्त प्रयास आवश्यक है। दार्शनिक दृष्टि से मानव अनुभव उसी दिशा में विकसित होता है, जिस पर वह अपना ध्यान केंद्रित करता है। जैसा कि दार्शनिक विलियम जेम्स ने लिखा है, "मेरा अनुभव वह है जिस पर मैं ध्यान देने के लिये सहमत होता हूँ।"
आज की चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि यह निर्णय मनुष्य स्वयं ले, न कि एल्गोरिदम।
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