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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    ''संवैधानिक रूप से न्यायिक स्वतंत्रता की गारंटी लोकतंत्र की एक पूर्व शर्त है।'' टिप्पणी कीजिये। (150 शब्द)

    19 Sep, 2023 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • अपना उत्तर संक्षिप्त और स्पष्ट परिचय के साथ शुरू कीजिये। परिभाषित कीजिये या समझाइये कि लोकतंत्र में न्यायिक स्वतंत्रता का क्या अर्थ है।
    • उन विभिन्न कारणों पर चर्चा कीजिये जिनके लिये लोकतंत्र में एक स्वतंत्र न्यायपालिका महत्त्वपूर्ण है। आप अपने तर्कों के समर्थन में कुछ उदाहरण भी प्रदान कर सकते हैं।
    • आप लोकतंत्र को संरक्षित और मज़बूत करने में संवैधानिक रूप से गारंटीकृत न्यायिक स्वतंत्रता की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर ज़ोर देते हुए उत्तर को समाप्त कीजिये।

    परिचय:

    न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत यह है कि न्यायपालिका को अपने कामकाज में किसी भी बाहरी प्रभाव या हस्तक्षेप से मुक्त होना चाहिये। यह कानून का शासन सुनिश्चित करने, मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियंत्रण तथा संतुलन बनाए रखने के लिये आवश्यक है।

    मुख्य भाग:

    न्यायिक स्वतंत्रता केवल एक आदर्श नहीं है, बल्कि निम्नलिखित कारणों से एक लोकतांत्रिक समाज के कामकाज के लिये एक मूलभूत आवश्यकता है:

    • जाँच और संतुलन: स्वतंत्र न्यायपालिका यह सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि सरकार की कार्यकारी और विधायी शाखाएँ संविधान का उल्लंघन न करें या लोगों के अधिकारों का अतिक्रमण न करें।
      • उदाहरण के लिये केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान की मूल संरचना में संशोधन नहीं कर सकती है।
    • अधिकारों का संरक्षण: स्वतंत्र न्यायपालिका सभी नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदान किये गए गारंटीकृत मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता की कट्टर रक्षक रही है। न्यायालय ने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से इन अधिकारों का दायरा बढ़ाया है, जैसे इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, जिसने पिछड़े वर्गों के लिये आरक्षण नीति को बरकरार रखा तथा नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ, जिसने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया एवं यौन अभिविन्यास के अधिकार को निजता के अधिकार के एक हिस्से के रूप में मान्यता दी।
    • निष्पक्ष एवं न्यायिक न्याय: स्वतंत्र न्यायपालिका बिना किसी डर या पक्षपात के न्याय देने का प्रयास करती है, चाहे इसमें शामिल पक्षों की स्थिति या पहचान कुछ भी हो। न्यायालय ने स्वप्रेरणा से मामलों को उठाकर, जनहित याचिका (हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य) पर विचार करके और जटिल मामलों में सहायता के लिये न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) को नियुक्त करके निष्पक्ष तथा न्यायिक न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की है।
    • युद्ध वियोजन: एक लोकतांत्रिक समाज में विवाद और संघर्ष अपरिहार्य हैं। एक स्वतंत्र न्यायपालिका संघर्षों को सुलझाने के लिये शांतिपूर्ण और वैध साधन प्रदान करती है, जिससे सामाजिक अशांति तथा अराजकता की संभावना कम हो जाती है।
      • न्यायालय ने अपने समक्ष लंबित किसी भी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिये आवश्यक आदेश पारित करने हेतु अनुच्छेद 142 के तहत संविधान द्वारा प्रदत्त अपनी असाधारण शक्तियों का भी प्रयोग किया है।
        • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संघर्ष समाधान के कुछ उदाहरण हैं: एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, जिसने राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिये दिशा-निर्देश दिये और अयोध्या निर्णय, जिसने एक धार्मिक स्थल पर लंबे समय से चले आ रहे विवाद का निपटारा किया।
    • अल्पसंख्यक अधिकारों का संरक्षण: लोकतंत्र केवल बहुमत के शासन के बारे में नहीं है, इसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना भी शामिल है। एक स्वतंत्र न्यायपालिका बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक समूहों पर अत्याचार करने या उनके खिलाफ भेदभाव करने से रोककर अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा कर सकती है।
      • न्यायालय ने अल्पसंख्यकों को भेदभाव, हिंसा या उत्पीड़न से बचाने के लिये भी हस्तक्षेप किया है, जैसे मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम मामले में तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उसके पति को दे दी और जॉन वल्लामट्टम बनाम भारत संघ मामले में ईसाइयों पर लागू भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के एक भेदभावपूर्ण प्रावधान को समाप्त कर दिया।
    • संविधान के प्रावधानों को बनाए रखना: संविधान, लोकतांत्रिक समाजों की आधारशिला है। एक स्वतंत्र न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि संविधान देश का सर्वोच्च कानून बना रहे। न्यायालय सरकार के असंवैधानिक कार्यों या संविधान में अविवेकपूर्ण संशोधन को नियंत्रित करता है।
      • न्यायालय ने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिये विभिन्न विचारधाराओं एवं सिद्धांतों को विकसित किया है, जैसे कि संविधान की भावना को बनाए रखने हेतु बुनियादी ढाँचा सिद्धांत, सामंजस्यपूर्ण निर्माण का सिद्धांत, तत्त्व और सार का सिद्धांत, आच्छादन का सिद्धांत आदि।

    निष्कर्ष:

    संवैधानिक रूप से गारंटीकृत न्यायिक स्वतंत्रता वास्तव में लोकतंत्र के लिये एक शर्त है। इसके बिना लोकतंत्र के सिद्धांतों, जैसे कानून का शासन, व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा, जवाबदेही और नियंत्रण एवं संतुलन को प्रभावी ढंग से बरकरार नहीं रखा जा सकता है। एक स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला है, जो यह सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक कानूनी ढाँचा और निगरानी प्रदान करती है कि लोकतांत्रिक प्रणाली सभी नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए उद्देश्य के अनुसार कार्य करे।

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