18 जून को लखनऊ शाखा पर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के ओपन सेमिनार का आयोजन।
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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    गांधीवादी राजनीतिक आंदोलनों में समाज के प्रत्येक वर्ग को बाँधे रखने की ताकत के साथ-साथ आत्मसंतुष्टि प्रदान करने की भी अद्भुत क्षमता समाहित थी।टिप्पणी करें।

    29 Jun, 2021 रिवीज़न टेस्ट्स इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोणः

    • गांधीवादी आंदोलन
    • गांधीवादी राजनीति आंदोलनों के प्रमुख तत्त्व
    • सभी वर्गों को एकजुट करने में गांधीजी कहां तक सफल हुए,
    • निष्कर्ष

    दक्षिण अफ्रीका से वापस आने के बाद वहां के सफल आंदोलनों से गांधी जी को इस बात का भान हो गया था कि भारत में किसी भी आंदोलन की शुरुआत से पहले यहां के गांवों, जहां भारत की अधिकांश जनसंख्या निवास करती थी को जानना जरूरी था। अतः गांधीजी ने दो वर्षों तक भारत भ्रमण किया। उन्होंने भारत के गरीब किसानों, अल्पसंख्यकों, बुनकरों आदि के निजी अनुभवों को जानने व समझने का प्रयास किया।इनको संगठित करने के उद्देश्य से गांधीजी ने कई नए प्रयोग किये जिनमें सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा आदि शामिल हैं।

    भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में गांधीजी का आगमन वर्ष 1917 में हुआ। हालाँकि वे वर्ष 1915 में ही भारत आ चुके थे, किंतु सक्रिय रूप से उनका भारतीय आंदोलनों से जुड़ाव चंपारण के आंदोलन से ही शुरू हुआ।

    गांधीवादी राजनीति से आशय गांधी के बताए मूल्यों एवं आदर्शों में विश्वास से है। गांधीजी ने अपने मूल्य एवं आदर्शों की स्थापना स्वयं के अनुभव से की थी। ‘सत्याग्रह’ नामक हथियार का विकास गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में सफलतापूर्वक किया था। सत्य एवं अहिंसा समूचे गांधीवादी आंदोलन का सार था जिसने आमलोगों को इन आंदोलनों से जुड़ने के लिये प्रेरित किया।

    गांधीवादी राजनीति मानवतावाद पर आधारित थी। असहयोग आंदोलन के लिये भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता की महती आवश्यकता थी। उस समय गांधीजी ने स्वयं को खिलाफत आंदोलन से जोड़कर स्वयं को मजबूत किया। दूसरा महत्त्वपूर्ण हथियार था- सत्याग्रह। तत्कालीन परिस्थितियों में भारतीय हथियार उठाने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी बिना मनोबल नीचे किये, संघर्ष के लिये तत्पर रहने का असीम धैर्य उन्हें ‘सत्याग्रह’ के सिद्धांतों से ही मिला। तीसरी बात थी- गांधीवादी राजनीति की देशी अवधारणा, जिसमें गांधीजी ने हिंदी भाषा की वकालत की, कुटीर उद्योगों की बात की, खादी की बात की, जिसका भारत के विशाल जनसमूह ने समर्थन किया।

    किसानों एवं निम्न वर्ग के समर्थन के बाद भी बिना उच्च वर्ग के समर्थन के आंदोलन अधूरा रह जाता। ऐसे में गांधीजी ने वर्ण व्यवस्था का भी समर्थन किया एवं समाज के उच्च वर्ग का विश्वास जीता। वर्ष 1932 में जब अंग्रेज़ों ने दलितों के लिये अलग प्रतिनिधित्व का कानून बनाया तो गांधीजी ने पूना जेल में आमरण अनशन शुरू कर दलितों को साथ लाने में सफलता प्राप्त की। इतना ही नहीं, गांधीजी ने महिलाओं को भी सक्रिय आंदोलन से जोड़ने में सफलता प्राप्त की।

    निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि गांधीवादी राजनीति के तत्त्वों में समाज के प्रत्येक वर्ग को बाँधे रखने की क्षमता के साथ-साथ आत्मसंतुष्टि प्रदान करने की भी अद्भुत क्षमता समाहित थी।

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