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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • 'त्रिपक्षीय संघर्ष में भले ही कोई भी शक्ति भारत में एक बड़ा साम्राज्य स्थापित करने में सफल नहीं हुईं लेकिन इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि इसने राजनीतिक शून्यता को काफी लम्बे समय तक भरने में कामयाब रहीं।' टिप्पणी करें।

    22 Apr, 2021 वैकल्पिक विषय इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण-

    • भूमिका
    • त्रिपक्षीय संघर्ष
    • पाल, प्रतिहार तथा राष्ट्रकूटों की भूमिका के विभिन्न पक्ष
    • निष्कर्ष

    कन्नौज पर नियंत्रण के लिए भारत के तीन प्रमुख साम्राज्यों जिनके नाम पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट थे, के बीच 8वीं सदी के दौरान, संघर्ष हुआ। चूंकि सांतवी सदी के पूर्वाद्ध से ही कन्नौज भारत की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा था। उस काल में उत्तरी भारत पर आधिपत्य का कोई भी दावा कन्नौज पर अधिकार के बिना निरर्थक था। पालों का भारत के पूर्वी भागों पर शासन था जबकि प्रतिहार के नियंत्रण में पश्चिमी भारत का अवंती-जालौर क्षेत्र था। राष्ट्रकूटों ने भारत के डक्कन क्षेत्र पर शासन किया था। इन तीन राजवंशों के बीच कन्नौज पर नियंत्रण के लिए हुए संघर्ष को भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के रूप में जाना जाता है।

    कन्नौज का सामरिक महत्व भी था, क्योंकि पालों के लिए मध्य भारत तथा पंजाब और प्रतिहारों एवं राष्ट्रकूटों के लिए गंगा दोआब में पहुँचने के मार्ग पर कन्नौज से ही नियंत्रण संभव था। इसके अलावा गंगा-यमुना दोआब का समृद्ध क्षेत्र भी ऐसी इसी के अंतर्गत आता था जो प्रचुर मात्रा में राजस्व का स्रोत था। अतः इस पर बिना नियंत्रण किये कोई भी साम्राज्य शक्तिशाली नहीं हो सकता था

    पाल, प्रतिहार एवं राष्ट्रकूट शासकों की भूमिका-

    हर्ष के शासन के पश्चात गुर्जर-प्रतिहारों ने उत्तरी भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की और अरबों को सिंध क्षेत्र से आगे बढ़ने से रोका।

    त्रिपक्षीय संघर्ष में सफलता के पश्चात् गुर्जर-प्रतिहार सर्वाधिक प्रभावशाली हो गए। पाल वंश के शासकों ने बंगाल को राजनीतिक एकता प्रदान करके सांस्कृतिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया साथ ही भारत की राजनीति में इसके महत्त्व को लगभग चार सौ वर्षों तक स्थापित करने में सफल रहे।

    महाराष्ट्र-दक्कन क्षेत्र में राष्ट्रकूट एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति थे जिनका सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रमुख योगदान था। इन्होंने ने भी अरबों के आक्रमण से भारत की रक्षा की। इतिहासकारों का मानना है कि यदि राष्ट्रकूट शासक अपनी महत्त्वाकांक्षा को दक्षिण भारत तक ही सीमित रखते तो एक शक्तिशाली राज्य का निर्माण कर सकते थे। लगभग एक सदी तक गंगा घाटी में स्थित कन्नौज के ऊपर नियंत्रण को लेकर आपस में युद्ध करने के पश्चात् अंतत: नौवीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहारों ने आधिपत्य स्थापित करने में सफलता पाई।

    पाल वंश की भूमिका देखें तो हम पाते हैं कि इसने भी बंगाल में दशकों से चली आ रही मत्स्य न्याय एवं अराजकता को समाप्त कर एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना की उल्लेखनीय है कि इनका शासनकाल तीनों ही शक्तियों में से सबसे लंबे समय तक चला।

    त्रिपक्षीय संघर्ष ने तीनों महाशक्तियों की स्थिति को कमज़ोर किया जिससे इनमें से कोई भी एक बड़ा साम्राज्य कायम करने में सफल नहीं हो सका नहीं किंतु इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा कि इसने तुर्कों को सत्ता से बेदखल करने में सक्षम बनाया। तीनों महाशक्तियों की शक्ति लगभग समान थी जो मुख्यत: विशाल संगठित सेनाओं पर आधारित थी लेकिन कन्नौज के संघर्ष का लाभ उठाकर सामंतों ने अपने-आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया, जिससे रही-सही एकता भी नष्ट हो गई।

    उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि निःसंदेह त्रिपक्षीय संघर्ष की शक्तियाँ लगभग एक साथ अस्तित्व में आई और निरंतर युद्धरत रहने के कारण शनै-शनै समाप्त हो गईं। तत्समय ये भारत में एक बड़ा साम्राज्य स्थापित करने में भले ही सफल नहीं हुईं लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसने ततत्समय उपजी राजनीतिक शून्यता को काफी लम्बे समय तक भरने में कामयाब रहीं।

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