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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    आप इस मत से कहाँ तक सहमत हैं कि 'सुकरात की दार्शनिक अभिरुचियाँ वैज्ञानिक प्रकृति की होने की बजाय नीतिपरक अधिक थीं।' चर्चा करें।

    21 Nov, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण-

    • भूमिका
    • सुकरात के दर्शन की वैज्ञानिक प्रकृति
    • सुकरात का नैतिक दर्शन
    • तुलनात्मक निष्कर्ष

    पश्चिमी दर्शन-शास्त्रीय परंपरा में सुकरात पहले सुव्यवस्थित नैतिक विचारक माने जाते हैं। वे प्राचीन यूनान में एथेनियन गणराज्य के नागरिक थे। अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत सुकरात की दार्शनिक अभिरुचियाँ वैज्ञानिक प्रकृति की होने की बजाय नीतिपरक थीं।

    सुकरात को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि वे अंतरिक्षीय अटकलबाज़ी को छोड़कर दर्शन को आकाश से धरती पर अर्थात् वास्तविकता के धरातल पर लाए। सुकरात से पूर्व यूनानी दर्शन ब्रह्मांड या सार्वभौम की प्रकृति तथा सभी वस्तुओं के सर्वोच्च सिद्धांत पर चिंतन के रूप में आरंभ हुआ था। सुकरात ने व्यावहारिक जीवन पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने जीवन के मानवीय संबंधों तथा अपनी विभिन्न भूमिकाओं में एक-दूसरे से व्यवहार करने के अनेक प्रकारों पर ध्यान केंद्रित किया। उनकी सोच थी कि ये ही बातें ज्ञान के दायरे में आती हैं और ये जीवन को सही ढंग से चलाने में सक्षम हैं। इस अर्थ में वे एक व्यावहारिक नीतिशास्त्री थे।

    सुकरात ने नैतिक सोच को अन्य के मुकाबले सर्वोपरि माना है। उनके अनुसार मानव के लिये एकमात्र वांछनीय लक्ष्य है- सद्गुण, जो श्रेष्ठ एवं प्रशंसनीय है। उनके अनुसार कौशल किसी भी काम को सर्वोत्तम रूप से करना है। सदव्यवहार की पूर्व शर्त ज्ञान है। अत: वे ज्ञान प्राप्ति को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने भोग-विलास, सम्मान और सांसारिक प्रगति की अपेक्षा आत्म-विकास व कर्त्तव्य के आनंद को पसंद किया है। सुकरात के अनुसार सद्गुणों को प्राप्त कर ही आत्मा को संपूर्ण किया जा सकता है और सद्गुण ही सर्वोच्च मनोवैज्ञानिक हित या अच्छाई है।

    उपरोक्त के आधार पर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सुकरात की दार्शनिक अभिरुचियाँ वैज्ञानिक प्रकृति की होने की बजाय नीतिपरक थीं।

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