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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • संवैधानिक मूल्य के रूप में संविधान में उल्लिखित ‘बंधुत्व’ शब्द के क्या निहितार्थ हैं? भारतीय संदर्भ में ‘बंधुत्व’ के सम्मुख आने वाली चुनौतियों की चर्चा करते हुए इसकी स्थापना हेतु किये जाने वाले प्रयासों पर प्रकाश डालें।

    28 Oct, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • भूमिका
    • बंधुत्व के निहितार्थ
    • चुनौतियां
    • समाधान

    भारतीय संस्कृति में निहित “वसुधैव कुटुंबकम” का संदेश संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की शिक्षा देता है वहीं ‘बंधुत्व’ से आशय भाईचारे की भावना से है। भारतीय संविधान एकल नागरिकता तंत्र के माध्यम से भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित करता है। मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद-51A) भी कहते हैं कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय अथवा वर्ग विविधताओं से ऊपर उठकर सौहार्द्र और आपसी भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित करेगा।

    प्रस्तावना में बताया गया है कि ‘बंधुत्व’ के दायरे में दो बातों को सुनिश्चित करना होगा- एक व्यक्ति का सम्मान और दूसरा देश की एकता और अखंडता।

    भारतीय संदर्भ में ‘बंधुत्व’ के सम्मुख आने वाली चुनौतियाँ निम्नवत हैं:

    • भारतीय संविधान में वर्णित एकल नागरिकता के बावजूद वर्ष 2002 के गुजरात दंगे, नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर विरोध एवं हिंसा, भाषाओं पर आधारित उत्तर-दक्षिण विभाजन, अक्षमता एवं विविधता के कारण अन्य सामाजिक गतिरोध आदि सामाजिक सद्भाव में असंतुलन उत्पन्न कर रहे हैं।
    • भारतीय संविधान में व्यक्तिगत एवं लोकतांत्रिक प्रणाली की बेहतरी के साथ-साथ व्यक्ति की गरिमा बनाए रखने की बात कही गई है किंतु इसके सम्मुख चुनौतियों में जाति, लिंग आधारित आय असमानता, महिलाओं की निम्न सामाजिक स्थिति जैसे- बलात्कार, घरेलू हिंसा, कम आर्थिक भागीदारी, लोकतांत्रिक देश के चुनावों में धन और बाहुबल का बढ़ता उपयोग आदि शामिल हैं।
      • भारत की 1% जनसंख्या के पास 73% संपत्ति है। वर्ष 2017 में इस शीर्ष 1% जनसंख्या की संपत्ति में वृद्धि, भारत के केंद्रीय बजट में हुई वृद्धि से अधिक थी।
      • नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ एक ओर वर्ष 2009 में गंभीर आपराधिक मामलों वाले सांसदों की संख्या 76 थी, वहीं वर्ष 2019 में यह बढ़कर 159 हो गई। इस प्रकार वर्ष 2009-19 के बीच गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या में कुल 109% की बढ़ोतरी देखने को मिली।
      • WHO की रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिदिन 3 में से 1 महिला किसी न किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा का शिकार होती है।
    • ‘देश की एकता और अखंडता’ में राष्ट्रीय अखंडता के दोनों मनोवैज्ञानिक और सीमायी आयाम शामिल हैं। इससे भारतीय संघ की बदली न जा सकने वाली प्रकृति परिलक्षित होती है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय अखंडता के लिये बाधक, सांप्रदायिक, क्षेत्रवाद, जातिवाद, भाषावाद इत्यादि जैसी बाधाओं से पार पाना है किंतु अभी भी देश में ग्रेटर नगालिम, गोरखालैंड जैसे क्षेत्रों के लिये आंदोलन किये जा रहे हैं तो वहीँ भारत-चीन सीमा विवाद, भारत-पाकिस्तान सीमा विवाद जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं।

    संवैधानिक मूल्य के रूप में ‘बंधुत्व’ की स्थापना के लिये किये जाने वाले प्रयास:

    • आपसी मतभेदों को कम करना: अल्पसंख्यकों को एक खास विचारधारा का पालन करने के लिये मजबूर नहीं किया जाना चाहिये बल्कि परस्पर सद्भाव एवं सम्मान की भावना से लोगों के बीच सभी मतभेदों को कम किया जाना चाहिये।
    • जन सहानुभूति को बढ़ावा देना: भ्रातृत्त्व का विचार सामाजिक एकजुटता के साथ घनिष्ठ रूप से संबंधित है जिसे जन सहानुभूति के बिना पूरा करना असंभव है। कुछ वैज्ञानिकों और दार्शनिकों का मानना ​​है कि सहानुभूति एक विशिष्ट मानवीय गुण है, यह मानव में जन्मजात होता है किंतु इसे सिखाया एवं पोषित किया जा सकता है।
    • सामाजिक एकजुटता: न्यायपूर्ण एवं मानवीय समाज में सामाजिक एकजुटता प्रमुख घटक होता है। न्याय के लिये लड़ाई उन लोगों द्वारा लड़ी जानी चाहिये जो उस अन्याय के साथ रहते हैं।
    • सामूहिक देखभाल: प्रत्येक वर्ष कम-से-कम दो मिलियन लोगों की भूख, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य सेवा और आवासीय सुविधा न होने के कारण मृत्यु हो जाती है। वहीँ भारत में वर्ष 1943 के बंगाल दुर्भिक्ष में मरने वाले लोगों की संख्या तीन मिलियन थी। ये आँकड़े सामाजिक और राजनीतिक जीवन में बंधुत्व की विफलता का प्रमाण हैं जिससे निपटने के लिये सामूहिक देखभाल की अवधारणा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
    • भाईचारे को बढ़ावा: भारत में हाल के वर्षों में मुसलमानों, ईसाईयों और दलितों को लक्षित करने वाले घृणित अपराधों के कारण जब समाज के बाकी लोग चुप रहते हैं तो समाज में भाईचारा विफल होने लगता है। इसलिये उन मुद्दों पर मिलकर आवाज़ उठाई जानी चाहिये जो संवैधानिक दायरे में आते हैं।

    उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के पश्चिमी विचारों ने 19वीं सदी में भारतीय समाज के पुनर्जागरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तत्कालीन भारतीय समाज में कई रुढ़िवादी धार्मिक और सामाजिक मान्यताएँ प्रचलित थीं, जिनमें से कई बुराई का स्वरूप धारण कर चुकी थीं। विभिन्न समाज सुधारकों ने इन्ही बुराईयों को समाप्त करने का प्रयास किया। इसके द्वारा न केवल भारतीय समाज जागृत हुआ, बल्कि उसमें राष्ट्रवाद की भावना का भी प्रसार हुआ। एक मज़बूत ‘नेशन-स्टेट’ के लिये ‘बंधुत्व’ एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो बड़े पैमाने पर विविधता वाले भारत जैसे देश को आपस में एक सूत्र में बांधे रख सकता है तथा समानता और स्वतंत्रता की जड़ों को मज़बूत कर सकता है।

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